Tuesday, June 17, 2014

BHAIYYA : A NOVEL WAY OF ADDRESSING THE STRANGERS IN NORTH INDIA

During so many of my travels I noticed that in this part of India ladies and girls do address the strangers as Bhaiyya. Like if you wishes to speak to some rikshaw wala then you will ask Bhaiyya chaloge ??, then your auto wala bhaiyya, dhoodhwala bhaiyya and many more.
Sometimes in trains and buses you quite often hear this word for conductor or drivers. Nothing in uncommon in it but sometimes you happen to notice some comic situations, when a young girl decidd to address much older man with this word, may be due to the rehearsal and a habit of addressing everyone with this common salutation. Now a days I notice even young boys and men are also addressing these people with this word. Which sometimes looks awkward. But then there is not other work which could be used in such situations. 
During my stay in south and specially at Chennai I find they address everyone with respected word like SIR, but here in north this word is not used much, may be due to the reason we North Indians are not accustomed to use respectable words for strangers or the common people like drivers, conductors, rikshawalas or autowalas, drivers and conductors and expect them to give us respect.. May be a cultural issue something to do with lawlessness of           North India ??

Thursday, June 5, 2014

सब्जी वाली माई

              यह नाम आज ही  मैंने उन्हें दिया है. काफी बार सिटी बस में उन्हें चढ़ते उतरते देखा है. उम्र करीब 60 के पार, जीर्ण-शीर्ण हालत, पावँ में पुरानी सी टूटी घिसी हुई चप्पल. बस में चढ़ते ही यदि कही जगह मिलती तो बैठ जाती, नहीं तो खड़ी रहती. मैं भी रोज सिटी बस में ही सफ़र करता हूँ. बस अड्डे से सीधे अपने ऑफिस तक. इन सिटी बसों की एक विशेषता है कि यदि इनमें आपको बैठने की जगह मिल जाती है तो ठीक है पर इनमें खड़े होकर जाना ज्यादा कष्टकारी है, यूँ तो मैंने खड़े - खड़े कई बार सफ़र किया है, मुझे याद है कोंकण रूट पर जब भी ट्रेन आ जाती थी तो मैं ज्यादातर खड़े होकर ही सफ़र करता था,  बाहर की प्राकर्तिक सुन्दरता का अवलोकन किया करता था.

               गोवा के पुराने रूट पर भी मीटर गेज वाली गाडी में भी ज्यादातर यात्रा या तो खड़े होकर की है या फिर पायदान पर बैठकर. क्योंकि वहां बाहर कुछ देखने को मिलता था. किन्तु इन सिटी बसों में सबसे पहले तो कंडक्टर आपको एक जगह पर खड़े होने ही नहीं देगा यदि आप अगले दरवाजे के पास हैं तो आप को पीछे जाने के लिए बोला जाएगा और यदि पिछले दरवाजे के पास हैं तो आगे जाने के लिए बोला जाएगा. और बोलने का तरीका इनता बुरा कि आपको गुस्सा आ जाएगा. शुरू -शुरू में मैं खड़े होकर भी इन बसों में गया हूँ किन्तु फिर मैंने यही निर्णय लिया कि यदि इनमें बैठने का स्थान मिलता है तो ही चढ़ना ठीक है नहीं तो फिर या तो अगली बस का इंतज़ार या  फिर कोई और साधन. दूसरी दिक्कत आती है कि कई बार आपको बैठने की सीट मिल जाती है और फिर कोई महिला आपके पास आकर खड़ी हो जाती है तो मैं उठ जाता हूँ, किन्तु खड़े होने में जो कठिनाई होती है उसका जिक्र में पहले ही कर चुका हूँ तो ऐसा भी हुआ है कि पूरा किराया देने के बावजूद अपनी सीट किसी महिला को देकर बस से बीच में ही उतरा हूँ क्योंकि नहीं तो कंडक्टर के साथ झगडा होने का खतरा बना रहता है.

           खैर मैं अपनी बात को सब्जी वाली माई पर ही ले जाता हूँ. आज वे बस में चढ़ी,  मेरे पास वाली सीट खाली हुई मैंने उन्हें अपने पास बुला लिया और बात करनी शुरू की.  मैंने पूछा कि कहाँ जायेंगी, माई बोली, सर्वे चौक, मैंने पूछा घर कहाँ है, बोली - वहीँ, पर मंडी पर आना कैसे हुए तो उन्होंने बताया कि सब्जी खरीदने आती हूँ. उनके पास मुझे कोई सब्जी दिखाई नहीं दी तो पूछा कि सब्जी कहाँ है तो बोली कि भैया सब्जी भेज दी है, मुझे लगा कि ज्यादा सब्जी होगी, उन्होंने बताया कि वे सब्जी बेचने का काम करती हैं, मैंने पूछा कि अपनी दुकान है, उन्होंने दुखी सा होते बताया कि नहीं भैया दुकान नहीं ठेले पर ही रख कर सब्जी बेचती हैं. मुझे उनकी हिम्मत और म्हणत पर आश्चर्य हुआ कि इस उम्र में जब उन्हें आराम करना चाहिए था तो वे काम कर रही है. मैंने उनके ठेले के पता पूछा, डी.ए.वी. कॉलेज इस पास पीपल के पेड़ के नीचे.

           गरीब आदमी इतनी गरीबी में भी खुश रहकर जी लेता है इसका एक कारण मुझे आज उनसे बात करने के बाद भी पता चला, मेरे इतनी सी बात करने के बाद उन्होंने मुझे अपनी पूरी कहानी बता दी, कि कैसे उनके पति का देहांत दमे के रोग के कारण हो चुका है, कि कैसे उनकी देवरानी ने उनके मकान पर कब्ज़ा कर लिया है, तथा एक बार उनको जला कर मारने की भी कोशिश की गयी जिससे कि  देवरानी का कब्ज़ा पूरे मकान पर हो जाए.  एक पूर्णतया अजनबी व्यक्ति के साथ अपनी पूरी परेशानी शेयर करने से शायद उन्हें लगता होगा कि हमारा दुःख कोई सुन रहा है, मैं उनकी कोई मदद नहीं कर सकता, थोड़ी देर में उनका स्टॉप आ जाएगा और वे उतर जायेंगी फिर शायद किसी और दिन बस में मिल जायेंगी, पर उस दिन वो मुझे भूल चुकी होंगी , उन्हें याद भी नहीं होगा कि उन्होंने मुझसे बात की थी, ऐसे होते हैं गरीब लोग, वे किसी से अपने मतलब से बात नहीं करते, बस बात का लेते हैं, उन्हें यह  भी उम्मीद नहीं होती कि कोई उनकी मदद करे, बस अपना दुःख किसी को सुना कर अपने आप को हल्का कर लेते हैं. शायद उनकी यही जीवन शैली उन्हें जीवन में होने वाले तनाव से बचा लेती  हैं और वे अपनी गरीबी में भी जीवन जी लेते हैं.  शायद हम इनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं. किसी दिन माई के ठेले पर जाऊँगा सब्जी खरीदने तो नहीं, बस यूँ ही देखने के लिए कि सब्जी वाली माई कैसी हैं.