Wednesday, April 8, 2020

बचपन के दिन और वर्तमान समय



युवा पीढ़ी से आह्वान कि खुद के खाने के लिए पर्याप्त सब्जी घर पर ही उगाए जाने का प्रयास जरूर करें ।  सुरक्षित खाओ, स्वस्थ रहो ।

इस ताला बंदी के समय सबसे अधिक सुखी वही महसूस कर रहा होगा जिसकी जरूरतें सबसे कम हैं और जिसकी निर्भरता भी बाजार पर अपेक्षाकृत कम ही है । हमारे बचपन के ही दिनों तक ग्रामीण जीवन इन दोनों ही मानकों पर खरा उतर जाया करता था ।



शायद कुछ विशेष प्रकार की दालें, मेहमानों के खाने और हम बच्चों को मात्र दिखाए जाने हेतु ग्लूकोस के बिस्कुट और बारीक वाली नमकीन भी यदा कदा आ ही जाया करती थी । हर घर मे कद्दू, लौकी और तोरी की बेल जरूर कहीं न कहीं दिखाई दे जाया करती थी जिसका स्थान शहरों की भांति आधुनिक दिखने की चाह में आज मनी प्लांट की बेल लें चुकी है । जहां भी कहीं कच्चा स्थान दिखाई देता था वहीं थोड़ा सा धनिया और पुदीना हम खुद भी बो दिया करते थे । जब छोटे थे तो ईख के साथ बोई गई मूंग की दाल भी तोड़ी है, तोहर की दाल भी हो ही जाया करती थी, साग के लिए सरसों, बथुआ खेतों से ही हम लोग बचपन मे ले आया करते थे ।


किन्तु नगरीकरण हुआ और नगरों की कुछ आदतें हम गांव वालों ने भी सीख ही ली, जिसमे सबसे पहली आदत सब्जी वाले से सब्जी खरीदना हुआ और फिर धीरे धीरे घर के हाथ के तोड़े हुए जावों की जगह कब बाजार की मैगी ने ले ली हमसे अगली पीढ़ी को पता ही नहीं चला । शहर की ही देखा देखी बाजार के केक को ही काट कर हम भी जन्मदिन मनाए जाने को आधुनिकता समझने लगे, वरना तो पहले तो यहीं पता नहीं होता था कि यह भी कोई दिन होता है और यदि इसको मनाया जाना जरूरी भी प्रतीत हुआ तो मौसम के अनुसार सूजी या गाजर का हलवा बनाकर, खीर बना कर बच्चों का मन बहला दिया जाता होगा । वैसे मुझे याद नहीं आता कि हमारे बड़े संयुक्त परिवार में हमारी पीढ़ी तक भी शायद ही किसी का जन्मदिन घर मे मनाया गया होगा । और बड़ों को तो खैर अपनी सही जन्मतिथि आज भी याद नहीं होगी ।

जीवन सरल था, कम जरूरतों में जी लिया जाता था । संयुक्त परिवार के दिनों में कई दफा ऐसा भी देखा है कि रात्रि भोजन में नमक मिले आटे की पानी के हाथ की रोटियां या तो चटनी या अचार या चाय के ही साथ बहुधा सम्पूर्ण परिवार द्वारा खा ली जाती थी क्योंकि एक तो बारिश, ऊपर से बिजली नहीं और तीसरा चूल्हे में जलाए जाने हेतु सूखे ईंधन की दिक्कत । और यह दिन भी सभी के लिए एक आम दिन ही होता था जब हम सब बिना सब्जी या दाल के रोटी खा लिया करते थे ।


गांव में नाश्ते नामक खाने का प्रचलन बहुधा नहीं होता है, घर के बड़े सदस्य आम तौर पर सुबह चाय या दूध पी लिया करते थे, और हम बच्चों को नोनी घी के साथ रात की बासी रोटी मिल जाया करती थी जिसे हम बहुत देर तक कुतर कुतर कर स्वाद लेकर खा लिया करते थे, यही हमारा नाश्ता होता था । दोपहर का भोजन गांव में जल्दी हो जाया करता था, जिसमे मठ्ठा एक अभिन्न अंग हुआ करता था । ज्यादातर एक ही दाल या सब्जी बना करती थी, आजकल की तरह दोनो यदा कदा मेहमानों के ही आने पर बना करती थी । 

हाँ आवश्यकता पड़ने पर शक्कर में घी या मलाई डाल कर भोजन का स्वाद बढ़ा लिया जाता था । उन दिनों बाजार पर निर्भरता बहुत कम थी । प्याज और टमाटर से दाल या सब्जी को फ्राई किये जाने का चलन भी नहीं था, हींग और जीरे का तड़का लग कर सभी 20 से 25 सदस्यों की दाल बन जाया करती थी और परोसने के समय इसमे घर का घी जरूर डाल दिया जाता था । प्याज टमाटर की सलाद भी मेहमानों के ही आने पर काट ली जाती थी, हाँ मौसम के दौरान ककड़ी व खीरा जरूर आ जाया करता था । घर मे कुछ बड़े प्याज कढ़ी के साथ खा लिया करते थे । श्री सुरेंद्र चाचा जी को खाने में वैरायटी थोड़ा ज्यादा पसंद थी तो हम इस जुगाड़ में रहते थे कि जब चाचा जी खाने के लिए बैठेंगे तभी हम भी क्योंकि चाचा जी कभी कभी उनके ही शब्दों में दो पत्ते लाल मिर्चों के देशी घी की कड़छी में गर्म कर अपनी दाल या सब्जी में डलवा लिया करते थे । यह हम बच्चों के लिए अत्यंत ही विलक्षण क्षण हुआ करता था जबकि लार टपकाये हम बच्चों की दाल में भी उस लाल रंग के घी की कुछ बूंदें टपका दी जाती थी । इसके अतिरिक्त चाचा जी को विभिन्न प्रकार की चटनी व अन्य सहायक सामग्री भोजन के साथ खाने का शौक था जिसका पूरा ध्यान रखने की।जिम्मेदारी दादी जी की भी हुआ करती थी जो कि समय समय पर सिल बट्टे पर विभिन्न प्रकार की चटनी हम सभी के लिए  बना दिया करती थी । रात्रि भोजन के बाद शक्कर का मीठा दूध पिये जाने का बकायदा रिवाज सा ही था जिसको पीने के बाद ही हमारी व हमसे पहली पीढ़ी के लोगों को नींद आया करती थी । गांव में हम दोनों समय की चाय खाली ही पी लिया करते थे, और मैंने बाद में पाया कि शहर में लोग चाय के साथ भी नमकीन या बिस्कुट जरूर खाते हैं । हमारे बचपन के दिनों में ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी, रोटी ज्यादातर और कुछ विशेष अवसरों पर बनने वाली घर की मठरी या मीठी मठरी जिसे फल बोलते थे या पंजरी इत्यादि उपलब्ध होने पर चाय के साथ खा ली जाती थी ।  फलों में भी हम कभी कोई फल खरीद कर नहीं खाते थे, मौसम पर घर के आम व लीची व मेहमानों के द्वारा लाये जाने वाले केले ही हमारा प्रिय फल होता था । सेब और अंगूर जैसे महंगे फल मात्र बीमारों के ही लिए कभी कभार ला दिए जाते थे अन्यथा कोई और फल खाने का चलन नहीं था । मिठाई में भी घर की ही बनी मिठाई या फिर विशेष अवसरों पर गांव ही के हलवाई की दुकान से सभी के लिए जलेबी ला दी जाती थी ।


आज की नई पीढ़ी को अपने से पहली पीढ़ी से कुछ चीज़ें तो जरूर ही बनानी सीख लेनी चाहिये ताकि ऐसे समय बाजार पर से निर्भरता कुछ तो कम हो सके । घर के जवें, बड़ी, अचार, पापड़, मंगोड़ी, इत्यादि चीजें बना कर रखी जा सकती हैं ।