Saturday, May 1, 2021

धर्मेंद्र - कमांडो एक स्मृति

कमांडो धर्मेंद्र तोमर - एक अविस्मरणीय व्यक्तित्व,

कल ग्रुप पर किसी मित्र ने लिखा कि तोमर नहीं रहा और कोविड से जंग हार गया । इस बात को पढ़ कर एक दम विश्वास नहीं हुआ और तुरंत ही उसके नंबर पर मैसेज किया जिसका उत्तर उसके बेटे ने दिया कि Uncle Papa is no more with us....जिस बात को मानने का मन नहीं कर रहा था आखिर वह सत्य निकली । धर्मेंद्र से वर्ष 1990 की जुलाई में मिलना हुआ था हम चार साथी बीआरओ लैंसडौन से भर्ती होकर नौसेना की ट्रेनिंग हेतु chilka पहुंचे वहीं उसी रात मेरठ से भर्ती तोमर और YK Sharma भी मिले । हमे रात को एक जगह रुकवाया गया कि वहीं पिछले बैच का एक सीनियर आ गया और बोला जो भी तुम लोगों के पास खाने पीने का सामान घर से ला रखा है आज ही खा लो कल तुमसे तुम्हारा सिविल का सारा सामान ले लिया जाएगा और कुछ भी वापस नहीं मिलेगा । धर्मेंद्र घर से लड्डू लेकर चला था, देसी घी के बेसन के लड्डू, जितने हम सभी खा सकते थे खा लिए बाकी हमने उस सीनियर को ही दे दिए । धर्मेंद्र उसी समय धुन का पक्का और मजबूत कद काठी का बंदा था । ज्यादा बोलता तो नहीं था पर फिजिकल में हमेशा आगे ही रहता था । खैर 6 महीने की ट्रेनिंग में कभी कभार हम सब आपस मे वेट कैंटीन में मिल लिया करते थे । ट्रेनिंग के बाद सबको अलग अलग ब्रांच मिली और फिर अपनी अपनी ड्यूटी पर तैनात हो गए । उन दिनों फ़ोन तो होते नहीं थे तो एक दूसरे से संपर्क का माध्यम पत्र ही हुआ करता था ।

वर्ष 1996 मेरी पोस्टिंग INS Viraat से कारंजा CNW हुई हमारी बैरक INS अभिमन्यु के साथ ही थी वहीं अपने 3 साथी फिर से मिले जो कमांडो बन चुके थे । तोमर, jai प्रकाश और कठैत । वहां मैं भी 3 साल रहा और बराबर मिलना जुलना होता रहता था कभी कभी हम बहुत सारे बटर में दाल फ्राई कर डिनर साथ कर लिया करते थे, इधर धर्मेंद्र को चॉकलेट मिला करती थी वह भी हम खाया करते थे । 

वर्ष 2005 में हम सभी ने अपनी नौसेना की सेवा 15 वर्ष पूरी कर छोड़ दी और हम सब वापस बॉम्बे में मिले वहीं किसी दिन यह फोटो हम 4 साथियों ने साथ साथ खिंचा ली थी जो कि वर्दी में मेरी अंतिम फ़ोटो भी है और धर्मेंद्र के साथ पहली और अब कहना पड़ रहा है अंतिम ही हो गयी । 2005 के बाद फ़ोन पर बात हो जाया करती थी हम अपने अपने संघर्ष एक दूसरे से शेयर करते थे, धर्मेंद्र ने घर के ही पास ट्रोनिका सिटी में सेटल होना पसंद किया । जब भी बात होती तो बिल्कुल बिंदास तरीके से बात करता भाई, बेफिक्र और बेखौफ आख़िर कमांडो जो ठहरा । कभी कभी बता देता था कि कश्मीर की तैनाती के दौरान किस तरह आतंवादियों से सामना हो जाता था और काफी एनकाउंटर भी हुए । हमारे योद्धा ने वहां भी अपनी छाप छोड़ी पर आज इस बीमारी ने एक भाई को छीन लिया जो दिल के बहुत ही करीब था । भले ही हम मिल जुल नहीं पाते थे पर मन मे एक विश्वास रहता है कि अपना भाई है उधर अगर कोई भी बात होगी तो देख लेगा । यह जो होने की तसल्ली होती है यही बहुत बड़ी ताकत सी होती है । भाई तू जहां भी है मुझे यकीन है तुझे भगवान ने वहां भी किसी स्पेशल टास्क के लिए बुलाया है । जिसके लिए तु ना नहीं कर सका होगा । तेरे जैसी शख्सियत की मृत्यु नहीं होती तुम लोग सदा सभी की स्मृतियों में बने रहते हो । आज यह लिखते हुए आंखें बार बार हम हो रही हैं किंतु किया ही जा सकता है । शायद भाई का साथ हम सबके साथ इतना ही रहा होगा ।

सादर नमन कमांडो ।