इस पोस्ट में उत्तराखंड और हिमाचल राज्यों के एक बड़े भाग के इष्ट देवता महासु देवता का इतिहास जो मेरे द्वारा यहां रहते हुए सुना गया लिखने का प्रयास किया गया है । महासू देवता न्याय के देवता के रूप में भी जाने जाते हैं, जब यहां के लोग सभी जगह से निराश हो जातें हैं तो यहां अपनी बात कहते हैं और न्याय की गुहार लगाते हैं । उन्हे न्याय मिलता भी है, गलत करने वाला स्वयं यहां आकर देवता महाराज के सामने माफी मांगता है ।
जिन लोगों ने उत्तराखंड में देहरादून जिले के जोनसार बावर क्षेत्र का भ्रमण किया होगा उन्हे स्थानीय गाड़ियों पर जय महासू या जय चार महासू लिखा हुआ जरूर मिला होगा । महासू देवता की पूजा पूरे जोनसार बावर क्षेत्र में जिसने देहरादून जिले के दो ब्लॉक और दोनो तहसील कालसी और चकराता के गांव आते हैं में की जाती है । इसके अलावा जोनसार की सीमा से लगते जिला टेहरी के जोनपुर, जिला उत्तरकाशी के रवाई तथा फतेह पर्वत क्षेत्र में और हिमाचल के सिरमौर तथा शिमला जिलों में भी महासू जी की पूजा की जाती है । माना जाता है कि महासू मंदिर के ही समीप रहने वाली नदी जिसे आज टोंस के नाम से जाना जाता है और पहले तमसा के नाम से उसमे एक राक्षस किरमिरी का निवास था जो कि स्थानीय लोगों को खा जाया करता था । इसी क्रम यहां के स्थानीय निवास ऊना भाट नामक ब्राह्मण का भी नंबर आने वाला था जिसका इकलौता ही पुत्र था । ऊना भाट चिंतित हुए और रात्रि सपने में उन्हे निर्देश प्राप्त हुए कि इस राक्षस का वध करने वाले देवताओं को कश्मीर से लाना होगा । ऊना भाट इस लंबी और कठिन यात्रा पर चल दिए और कश्मीर पहुंच कर उन्हें निर्देश हुए कि आप वापस जाओ और अमुक तिथि और समय पर एक खेत में हल लगाना जहां हम स्वयं ही प्रकट हो जाएंगे । ऊना भाट वापस लौट आए और उन्होंने चिंता वश हल निर्धारित समय से पहले ही लगा दिया । हल का फल एक देवता को लगा जो बौंठा महासू के रूप में हनोल में स्थापित हुए, एक और भाई प्रकट हुए पबासी महासू जिन्होंने अपना निवास तमसा के पर थाड्यर नामक स्थान पर बनाया, तीसरे बाशिक देवता का मंदिर मेंडराथ नामक स्थान पर है और चौथे का कहीं कोई स्थाई निवास नहीं है ये अपने पूरे लाव लश्कर के साथ एक बड़े क्षेत्र का निश्चित समय में निर्धारित स्थानों पर रुक पर आगे बढ़ जाते हैं । कुछ समय पूर्व इनका प्रवास कोटि कानासर था, वहां से मोहना गांव और फिर समलता और अब इनका निवास दसू नामक गांव में है । जहां बने मंदिर में इनकी पूजा होती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इनके दर्शन हेतु पहुंचते हैं । इन सभी मंदिरों में हनोल स्थित मंदिर अत्यधिक प्राचीन माना जाता है जिसका निर्माण पांडवों द्वारा किया माना जाता है यहां खुदाई में प्राचीन मंदिर के मिले अवशेषों को पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है ।