आज सुबह चाय की दुकान पर ।
आज सुबह सुबह ही कहीं के लिए निकलना था तो धन सिंह भाई को रात को ही बोल दिया था कि थोड़ा जल्दी आऊंगा सुबह कुछ खिला देना । भाई ने बोला बंद ऑमलेट बन जाएगा । खैर मैं भाई के पास लगभग 5.30 पहुंच गया तो दृश्य कुछ अलग ही था । कुछ रिटायर्ड से संभ्रांत से दिखने वाले बुजुर्ग महिला पुरुष बैठे हुए थे । धन सिंह भाई बड़ी ही तत्परता के साथ उनकी अलग अलग फरमाइश सुन रहे थे, मुझे चाय की दुकान पर बैठने के बाद यह अनुभव हुआ कि एक साधारण सी दिखने वाली चाय भी कितने ही प्रकार की हो सकती है । कोई बोलता, फीकी, कोई बोलता कम मीठे वाली, कोई अदरक इलायची की फरमाइश और कोई तो धन सिंह भाई को सख्त ताकीद दे रहे थे कि जल्दी बनाओ, चाय का गिलास साफ होना चाहिए, डिस्पोजल में दे दो आदि इत्यादि ।
ये सभी लोग दुकान के पास ही स्थित तपोवन आश्रम आए हुए हैं किसी शिविर में कदाचित आश्रम में सुबह की चाय नहीं मिलती इसलिए आजकल ये यहां धन सिंह भाई की दुकान में सुबह सुबह दिखाई पड़ जाते हैं । इनकी बातें सुन कर भी मजा आ जाता है एक सज्जन अपनी बहुत ही बुलंद आवाज में बता रहे थे कि वे कैसे फलाने बैंक से चीफ मैनेजर बन कर रिटायर हुए थे और इस पद तक पहुंचने में उनको कितनी मेहनत और समय लगा था और आज के लोग तो बहुत जल्दी ही बन जा रहे हैं । उन्होंने साथ ही साथ यह भी बताया कि वे आज की पीढ़ी से कहीं अधिक पढ़े लिखे हैं और अगर अपनी डिग्री बताने पर आ जाएं तो पूरे तीन मिनट लगेंगे जो फिलहाल बहुत कीमती हैं चूंकि उन्हे वापस आश्रम में जाकर तैयार होना है हवन पूजन में बैठने हेतु । इसी बीच एक बुजुर्ग सी महिला भी आई और बड़ी अधिकारपूर्ण आवाज में धन सिंह भाई को बहुत जल्दी एक कप फीकी चाय का ऑर्डर फेंक कर आगे की तरफ चल दी । धन सिंह भाई इन अलग अलग तरीके की चाय बनाने में व्यस्त थे कि थोड़ी ही देर बाद महिला आ धमकी और लगभग धमकाने वाले अंदाज में बोली कि मेरी चाय कहां है मैं एक घंटे से खड़ी हूं, धन सिंह भाई बोला मैडम एक घंटा तो दुकान खुले भी नहीं हुआ । महिला की चाय रेडी हो थी धन सिंह भाई ने उनको देनी चाही महिला तुनक कर बोली नहीं चाहिए चाय ये रखो दस रुपए, धन भाई भी ठहरा स्वाभिमानी आदमी बोला चाय पियो तभी पैसे लूंगा, महिला की नाराजगी खैर थोड़ा कम हुई चाय की एक चुस्की ली और फिर वही खतरनाक सास वाले अंदाज में बोली इसमें चीनी नहीं डाली, भाई बोला आप फीकी बोल कर गई थी । खैर धन सिंह भाई ने चीनी भी डाल दी ।
इसी बीच बाहर बैठे कुछ हम जैसे डेली वालों में खुसर फुसर होने लगी कि कैसे कई बार चाय वाले ये फीकी मीठी के झंझट में नहीं पड़ते और मना कर देते हैं ।
खैर इन चाय की दुकानों में बैठ कर यह अनुभव तो होता है कि ये जो तथा कथित बड़े लोग होते हैं कई ऐसी आदतें पाल लेते हैं की अपने घर से कहीं बाहर जाकर इनका गुजारा मुश्किल ही होता होगा । घर में भी शायद ये अकेले ही रहते हैं बच्चे, बेटा, बहु सब बाहर कहीं और । इनके तो नौकर भी इनके बरताव से जल्दी जल्दी काम छोड़ देते होंगे ।
वहीं एक आम आदमी चुपचाप आता है बिना किसी टीका टिप्पणी के अपनी चाय पीता है और अपने काम पर चल देता है ।