Thursday, September 14, 2023

अनजाने में ही कर ली धनुष कोड़ी की यात्रा

जब मैं अनजाने में ही धनुषकोडी तक हो आया था । 

बात है वर्ष 1992 की शायद दिसंबर का माह रहा होगा । नौसेना की सेवा के दौरान गोवा से मुझे अस्थाई रूप से कुछ समय हेतु रामेश्वरम से लगभग 40 किलोमीटर पहले एक स्थान पर भेजा गया । चूंकि रामेश्वरम नजदीक ही था तो हम युवा नौसैनिक किसी भी छुट्टी के दिन स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस पकड़ कर रामेश्वरम चल दिया करते थे । रामेश्वरम जाने का एक अन्य आकर्षण वहां के एक राजस्थानी होटल में मिलने वाले शुद्ध उत्तर भारतीय भोजन को चखने का भी हुआ करता था । मुझे याद आता है कि एक बार तो हम चार साथियों ने उस होटल में कुछ भी न हो तो 10=10 रोटियां तो खा ही ली थी जिसकी उन दिनों डाइट थी शायद 25 रूपये की भरपेट थाली । चूंकि हमारी मेस में रोटी नहीं बनती थी तो हम उत्तर भारतीयों के लिए तो देश के अंतिम छोर पर राजस्थानी रामदेव होटल किसी वरदान के समान ही था ।

खैर एक बार ऐसे ही अवसर पर मैं अपने साथियों से थोड़ा अलग होकर अकेले ही एक यात्रा पर निकल गया । पहले तो वह स्थान देखा जहां से हनुमान जी ने श्रीलंका हेतु खड़े होकर छलांग लगाई थी । उस स्थान से आगे भी कुछ स्थानीय लोग पैदल ही जा रहे थे जो कि कदाचित मछुआरे थे और अपनी नौका के पास जा रहे होंगे ।  मैं भी उनके साथ ही चलता रहा बातचीत बस थोड़ी बहुत ही हो पा रही थी क्योंकि उनको हिंदी बहुत कम आती थी और अपना तमिल में हाथ बहुत तंग था । खैर काफी दूर तक तो मैं अकेला ही चलता गया और फिर रेत में दबी दिखाई दी रेलवे लाइन और कुछ टूटी फूटी पुरानी बिल्डिंगों के खंडहर । जिनको देख कर ऐसा लगा मानो कि यहां कभी कोई बहुत ही खतरनाक तूफान आया होगा या फिर कोई भूकंप । खैर वह स्थान घूम घाम पर मैं वापस शाम को अपने स्थान पर पहुंच गया और बाद में पता चला कि मैं तो गलती से धनुषकोडी तक की यात्रा कर आया था ।

हमारी जैसलमेर यात्रा

बहुत दिनों से सोच रहे थे कि कही घूम कर आया जाए. ऐसा अवसर ही प्राप्त नहीं हो पा रहा था. कारण आर्थिक भी थे तथा सामाजिक भी. आर्थिक समस्या जब सुलझी तो सोचा कि अब और नहीं अब टी कहीं न कहीं  जाना ही है, क्योंकि मैं इधर देख रहा था कि नौसेना की नौकरी छोड़ने के बाद एवं रूडकी रहना शुरू करने के बाद कहीं जाया ही नहीं गया था तथा इसलिए लम्बे सफ़र से डर सा भी लगने लगा था . मैंने इस यात्रा के लिए अक्टूबर के महीने का चुनाव इसलिए किये कि सफ़र में ज्यादा गर्म कपडे भी नहीं रखने पड़ेंगे, क्योंकि भाई मध्यम वर्गीय परिवार बिन तथा बन्दे की पूरी आस्था समाजवाद में है इसलिए समाजवादी विचार पर आस्था रखते हुए स्लीपर श्रेणी में ही जाने का प्लान बनाया. 
जब बच्चो को पता चला तो वे भी बड़े खुश हुए कि चलो स्लीपर क्लास की कम से कम खिड़कियाँ खुल तो जाती हैं, और बस या रेल के सफ़र का मजा ही जब आता है जब आपको सीट खिड़की की मिल जाए. मुझे याद आता है नौसेना की नौकरी के दौरान जब एक बार मुझे उडुपी से दिल्ली तक राजधानी एक्सप्रेस गाडी में ए.सी. 3 स्लीपर में यात्रा का अवसर (मुफ्त में) प्राप्त हुआ था तो बड़ी बेटी उस समय 02 वर्ष की थी गाडी में बैठते ही फटाफट खिड़की पर पहुंची तथा अपनी तोतली आवाज में बोली पापा जल्दी से डिंग-डोंग खोल दो (विंडो को वह ऐसा कह कर बोल रही थी). अब मेरे सामने यक्ष प्रश्न कि इस बच्ची को कैसे बताया जाए कि बेटा यह महँगी वाली ट्रेन है तथा इसमें ऐसे ही  बैठ कर जाया जाता है . बेटी बड़ी नाराज हुई बोली यह तो ख़राब ट्रेन है इसमें क्यों बैठे, मैं उसी दिन समझ गया था कि बच्ची में अपने पापा के समाजवादी विचारों का  समावेश हो चुका है. 
खैर साब अब बात इस सफ़र  की करते हैं, हमारा आरक्षण रात की गाडी में था जो हरिद्वार से चलती है तथा सीधे बाड़मेर तक जाती है. धर्मपत्नी ने जाने की सारी  तैयारी कर ली थी (सबसे बड़ी तैयारी सफ़र के दौरान खाने पीने की व्यवस्था करने की होती है) तथा इस कार्य में हमारी लेडीज एकदम एक्सपर्ट होती हैं पूरी, आलू वगैरा बन गए तथा बच्चों के लिए भी काफी मात्रा में चिप्स आदि सामन रख लिया गया था. बच्चों में ऐसा देख जाता है कि चाहे हमारा सफ़र बस या ट्रेनमें थोड़े से ही समय का क्यों न हो बैठते ही उन्हें अचानक भूख लग ही जाती है तो इस संभावना पर विचार हमारी श्रीमति जी ने पहले से ही कर लिया था तथा उनकी उदरपूर्ति की सारे साधन जमा कर लिए गए थे.
अगली सुबह गाडी राजस्थान राज्य में प्रवेश कर चुकी थी. अब ट्रेन की खिड़की से बाहर का नजारा बदलने लगा था दूर दूर तक खाली जमीन जो कि अपने इलाके में असंभव बात है (जनसँख्या घनत्व अधिक होने की कारण) . रास्ते मैं बीकानेर व नागौर जैसे कुछ बड़े स्टेशन पड़े खैर रात करीब आठ बजे हमारी ट्रेन बाड़मेर पहुँच गयी. स्टेशन के पास ही के होटल में कमरे का इंतजाम हो जाने के उपरांत खाने की लिए निकले . 
इस मुद्दे पर भी मेरी समाजवादी विचारधारा तथा बन्दे का पहले से किये गए कई बार के ऐसी यात्राओं का  अनुभव काम आया बन्दे ने स्टेशन सी बाहर निकलते ही एक ढाबा नुमा होटल देख लिया था, खैर उस स्थान का खाना हमें काफी पसंद आया, एक सब्जी तथा एक दाल का आर्डर दिया गया. बड़ी बेटी भले ही सफ़र के मामले में समाजवादी है पर खान -पान पर वह बाजारवादी ताकतों का शिकार हो चुकी है परिणामस्वरूप उसने खाना खाने में शुरुआत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, परन्तु हम सबको खाना न्जोय करते देख उसने भी खाना शुरू किया तो उसे भी खाना पसंद आया. खाना खा चुकने की बाद थोड़ी आईस क्रीम खाई गयी तथा फिर वापस आकर आराम किया क्योंकि अगले सुबह हमें बस द्वारा जैसलमेर के लिए निकलना था. 

वर्ष 2004 की आगम्बे और श्रृंगेरी यात्रा

अचानक से की गई एक यादगार यात्रा । वर्ष 2004 रहा होगा शायद उस समय मैं कर्नाटक की श्रीकृष्ण जी की नगरी दक्षिण की काशी कही जाने वाले स्थान उडुपी में था । हमारे पास उन दिनों अपना कोई दोपहिया वाहन नहीं था संयोग से एक दिन किसी मित्र की बाइक मिल गई हम पति पत्नी और एक दो वर्ष की बेटी ने सोचा चलो किसी नजदीक की जगह घूम आते हैं । हम उडुपी से कारकला के लिए निकले वहां भगवान बाहुबली की बहुत विशाल मूर्ति के दर्शन के बाद करकला का मशहूर चर्च भी देखा और वापसी के लिए निकल पड़े । रास्ते में कुछ दूरी बताने वाले साइन बोर्ड दिखाई दिए तो देखा कि श्रृंगेरी भी कहीं आसपास ही है हमने सोचा चलो श्रृंगेरी भी घूम लेते हैं और शाम को वापस आ जायेंगे । हमारे पास कपड़े भी नहीं थे और ना ही रास्ते का कोई अंदाज था ।खैर शुरू में तो सब सही रहा परंतु जब हम आगंबे के आसपास पहुंचे तो सारा नजारा बदल चुका था, सड़क पर जबरदस्त चढ़ाई और बारिश और बादल इतने जैसे कि हमारे हरिद्वार में सर्दियों के दिनों में कोहरा रहता है । ऊपर से बारिश में भीग गए थे तो ठंड भी लगने लगी थी खैर बच्ची को तो जैसे कैसे श्रीमती जी ने अपनी चुन्नी में लपेट लिया था । रास्ता देख कर एक बार मन में आया कि वापस ही हो लेते हैं पर देखा कि अब भीग भी चुके हैं और अंधेरा भी हो चला था और उडुपी वापसी में भी रात ही हो जाती । श्रृंगेरी की दूरी कम ही रह गई थी खैर भगवान का नाम लिया और श्रृंगेरी तक पहुंच गए । 

वहां श्रृंगेरी मठ की धर्मशाला में कमरा लिया और मंदिर दर्शन करने के उपरांत मठ में ही प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण किया और रात्रि विश्राम किया । उन दिनों श्रृंगेरी बहुत ही शांत था और ऐसा ही नजारा लग रहा था मानों कि हम ऋषिकेश में ही कहीं हैं । अगले दिन सुबह फिर मंदिर दर्शन किए और शंकराचार्य जी के भी दर्शन किए । वापसी के लिए हमने फिर अगंबे के खतरनाक ढलान वाला रास्ता नहीं लिया बल्कि थोड़ा लम्बा रास्ता लिया था जो कि कुद्रेमुख जंगल  के बीच से होकर गुजर रहा था । यह भी पहाड़ी सा रास्ता था लेकिन बहुत ही सुंदर और हरा भरा । रास्ते में रुकते रुकाते फोटो खींचते हुए हम शाम तक उडुपी वापस लौट आए थे । यह सफर आज भी याद करते हैं तो बड़ा ही रोमांच हो उठता है क्योंकि हमको आगंबे के बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि यह स्थान भी अपनी बारिश के लिए मशहूर है और रास्ता भी इतनी चढ़ाई का होगा । उसी यात्रा की कुछ स्मृतियां ।