Thursday, February 27, 2025

लघु कथा नेपाली

लघु कथा

नेपाली

आज फिर स्कूल में गुरु जी ने उसे ड्रेस पहन कर ना आने के कारण खड़ा कर दिया । वह बहुत उदास था और सेब के बगीचे में बनी अपनी झोंपड़ी में जो अब उनका घर था छुट्टी के बाद वापस आ गया । जहां उसके पिता मजदूरी करते थे । स्कूल में भी उसे बाकी बच्चे नेपाली ही बोला करते थे । उसे अभी पता ही नहीं था कि उसका नाम तो सूरज है पर बच्चे उसे उसके नाम से नहीं बुलाते । कल गुरुजी को भी उसने फोन पर कहते सुना था कि उनके स्कूल में एक और नेपाली बच्चा आ गया है । 

इधर गांव दर गांव प्राइमरी स्कूल बंद होते जा रहे थे । गांव के बंद होते स्कूलों का सबसे बड़ा असर भोजन माताओं पर पड़ा जिन्होंने बरसो पहले बहुत थोड़े से पैसों में इन स्कूलों में खाना बनाना शुरू किया था और अब धीरे धीरे स्कूल बंद होते जा रहे थे और उनको इस बुढ़ापे में मिलने वाले तीन हजार प्रति माह भी बंद होने का खतरा बराबर मंडरा रहा था ।

इधर इस गांव के गुरु जी ने भी बाद में लगी एक भोजन माता को बोल दिया था कि 25 बच्चे अगर हुए तो एक हो हटाया जाना होगा । स्कूल में फिलहाल 26 बच्चे तो हो गए थे तो दोनों भोजन माताओं नौकरी बची रहेगी ।

आज जब फिर सूरज ने अपने पिता को स्कूल की ड्रेस के बारे में बताया कि वहां तो सरकार सब कुछ फ्री में देती है पर गुरु जी ने बताया है कि नेपालियों। को कुछ नहीं दे सकते । उनके पास कागज नहीं हैं इसलिए किताब, स्कूल का बस्ता और स्कूल की वर्दी भी नहीं मिलेगी । उसके पिता ने एक लंबी सी सांस ली और तीस साल पहले जब वह स्कूल जाता था उसे अपना समय याद आ गया था कि उसे भी यही सब सुनना पड़ा था । खैर उन दिनों स्कूलों में सब कुछ फ्री तो नहीं मिलता था और गुरु जी लोग भी अच्छे हुआ करते थे । कई बार गुरु जी लोगों को वह दूर से पानी ला दिया करता था तो वे उसे कुछ ना कुछ खाने को दे देते थे । उसे याद आया कि शायद उसके दादा जी यहां नेपाल से काम की तलाश में आ गए थे और अब यह उनकी चौथी पीढ़ी यहीं गांव में रह कर मेहनत मजदूरी कर रही है किंतु उनको आज भी नेपाली ही बोला जाता है और स्कूलों से उनको कोई भी सुविधा नहीं मिल पाती । 

फिर उसे याद आया कि कैसे गरीबी के कारण उसकी अपनी पढ़ाई भी बीच में ही छूट गई थी और अब शायद यही उसके बेटे सूरज के साथ भी hoga .
सूरज सोच रहा था उसे सब नेपाली क्यों बोलते हैं उसे तो अपने स्कूल में प्रतिदिन सुबह बोली जाने वाली प्रतिज्ञा भारत मेरा देश है भी याद कर ली थी और गुरु जी कभी कभार उससे भी यह प्रतिज्ञा बुलवाया करते थे । एक दिन उसके गुरु जी किसी को फोन पर बता भी रहे थे कि कैसे पिछली 26 जनवरी को उनके स्कूल के सारे नेपाली बच्चे भी बड़े खुश होकर अन्न जहां का हमने खाया वाले नारे बोल रहे थे ।

लघु कथा अंतिमा का टिफिन

लघु कथा 3

अंतिमा का टिफिन

उसे पता भी नहीं था कि उसका नाम अन्तिमा क्यों रखा गया । किसी ने बताया कि वह अपने माता पिता की चौथी बेटी है और पांचवीं बेटी ना हो जाए इसलिए उसका यही नाम रख दिया गया । खैर पांचवां बेटा ही हुआ और अंतिमा का दाखिला तो उसकी अन्य तीन बहनों के साथ गांव के ही प्राइमरी स्कूल में हो गया था । जहां वह अपनी बड़ी बहनों के साथ खुशी खुशी चली जाती ।

भैया भी अब स्कूल जाने लायक हो गया था, अंतिमा बहुत खुश थी क्योंकि बड़ी दीदियां अब दूसरे बड़े स्कूल में चली गई थी और अंतिमा को अकेले ही स्कूल जाना पड़ता था । वह देखती भी रहती थी कि अन्य बच्चियां भी अपने अपने छोटे भाई बहनों का हाथ पकड़े स्कूल जाती हैं । अंतिमा रोज अपनी मम्मी से आकर पूछती कि हमारा भैया कब स्कूल जाएगा । मम्मी समझाती कि अभी बड़ा हो जाने दो ।

अंतिमा एक दिन घर आई तो देखा कि एक नया सा टिफिन भाई लेकर खेल रहा है । थोड़ा सा अंदर आई तो कुछ नए नए से कपड़े और एक नया स्कूल बैग भी दिखाई दिया । और यह क्या कुछ नए और अच्छे से रंग वाले कपड़े, जूते और मोजे भी रखे मिले । 

अंतिमा खुश हो गई कि शायद यह सब उसके लिए ही लाया गया होगा क्योंकि भाई तो अभी छोटा है गुरुजी ने बताया भी था कि बेटा अब 6 साल का बच्चा ही कक्षा 1 में आएगा । छोटे बच्चों की आंगनवाड़ी वाली बुआ जिनकी शादी दूसरे गांव में हो चुकी थी बस महीने के शुरू में आकर राशन बांट जाया करती थी । अंतिमा खुश थी । और पूरी रात उन्हीं कपड़ों को सपने में देखती रही और टिफिन में सोचती रही कि क्या क्या लेकर जाएगी । हालांकि स्कूल में खाना बनता ही है लेकिन उसे मां के हाथ की बनी अलग अलग चीज भी अच्छी लगती थी जो मां आजकल यूट्यूब से देख कर बनाना सीखने लगी थी । हालांकि उसे लग भी रहा था कि मां रोज एक कागज सामने रख लेती है और कुछ पढ़ती है और फिर यूट्यूब खोलती है ।

अगला दिन हुआ, अंतिमा तैयार हुई तो देखा कि जो कपड़े कल आए थे छोटा भैया पहन कर तैयार हो गया है, नए जूते, नया स्कूल बैग, टाई, कोट सब कुछ नया । उसने सोचा कि आज तो भैया का जन्मदिन भी नहीं है हो सकता है कि मां मामा कोट जा रही होगी ।

तभी एक गाड़ी घर के बाहर रुकी मां ने अंतिमा को बोला कि भैया स्कूल जाएगा इसको छोड़ने चलो । अंतिमा हैरान हो गई कि भैया तो अभी छोटा ही है और गुरु जी ने बताया भी था कि अभी उसका दाखिला नहीं होगा । 

उसने बाहर जाकर देखा तो यह तो वही गाड़ी है जिसमें बहुत से बच्चे अभी हाल ही में खुले किसी प्राइवेट स्कूल में जाया करते हैं ।।एक बार उसने भी अपनी मां से कहा था कि मैं भी उसी स्कूल में जाऊंगी तब मां ने समझाया था कि बेटा उसकी फीस बहुत ज्यादा है और गाड़ी का खर्चा भी अलग से । ऊपर से ड्रेस भी खरीदनी पड़ती है अभी तेरे पापा यह सब कुछ नहीं कर पाएंगे । बड़ी सभी बहने जिस स्कूल में जाती हैं उसी में चली जाया कर । अंतिमा मान गई । 

आज लेकिन भैया को उसी स्कूल में भेज दिया गया और टिफिन भी दे दिया । अब अंतिमा रोज देखती कि भैया के टिफिन में रोज कोई ना कोई नई खाने की चीज मां बना कर देती है । क्योंकि भाई के स्कूल वालों ने ऐसा करने के लिए बोला है। 

कल उसके स्कूल मैं सपनों की उड़ान हुई उसने भी एक कविता सुनाई थी और इस बार गुरुजी ने सब बच्चों को टिफिन बॉक्स लाकर इनाम में दिया था । अंतिमा को भी अब अपना टिफिन मिल गया था । पर स्कूल में खाना मिलता ही था तो उसने वह टिफिन घर लाकर भैया को ही दे दिया । कल से अंतिमा अपनी नई बनी सहेली के साथ ही स्कूल जाया करेगी क्योंकि उसके छोटे भाई को भी गाड़ी वाले स्कूल में दाखिल कर दिया गया है ।

लघु कथा ग्रुप सी की तैयारी

लघु कथा 

ग्रुप सी की तैयारी

रिया आज बहुत खुश थी । आखिर उसका कक्षा 12 का  बोर्ड का आज आखिरी एग्जाम था । पिछले एक साल से वह अपने माता पिता को समझाती रही कि उसे 12 के बाद देहरादून ही जाकर पढ़ना है । पर दोनों उसे समझाते रहते कि डिग्री कॉलेज तो यहां भी खुल ही गया है और BA ही तो करनी है आखिर क्यों शहर का फालतू का खर्चा करना । 

लेकिन रिया ने अब तक गांव और आसपास के और गांव की दसियों लड़कियों के नाम उन्हें गिनवा दिए थे कि ये सब भी देहरादून चली गई हैं और वहीं रह कर ग्रुप सी की तैयारी भी करती हैं और पढ़ाई के साथ साथ नौकरी भी ।

माता पिता सीधे सादे थे उन्हें लगता था कि चलो यह परिवार की बड़ी बेटी है इसके बाद तीन और भी हैं बेटा तो कोई हुआ ही नहीं अगर ये कुछ नौकरी कर लेगी तो शायद बाकी छोटी जो हैं उनको भी आगे का रास्ता मिलेगा ।

इधर डिग्री कॉलेज के टीचर लोग भी प्रतिदिन गांव गांव जाकर सबको समझा रहे थे कि सरकार ने डिग्री कॉलेज खोल दिया है और यदि बच्चे इसमें नहीं रहेंगे तो फिर यह बंद भी हो सकता है । 

किंतु ज्यादातर बच्चे देहरादून जाकर ही पढ़ने की जिद में थे । वो रोज अपने गांव के बच्चों की रील इंस्टाग्राम पर देखा करते कि आज कौन सा बच्चा देहरादून के किस मॉल में गया है । अब  तो उनका पहनावा भी बदल गया है सबके सब शहरी कपड़ों में दिखाई देते जो शायद देहरादून में सस्ते मिल जाते होंगे ।
गांव में आकर भी ये बच्चे अन्य सारे बच्चों को देहरादून की बातें बताया करते कि वहां कैसा है और क्या क्या होता है। पढ़ाई के अलावा भी बहुत सारी चीजें होती हैं करने को। 

अब रिया भी जल्दी ही अपनी किसी दोस्त को बोलेगी कि उसके लिए भी कमरा ढूंढ कर रखे वो भी आ रही है देहरादून पढ़ने। वो स्कूल जाते हुए देखती भी है कि गांव से रोडवेज की सुबह चलने वाली बस में प्रतिदिन कोई ना कोई बुजुर्ग अपने नातियों के लिए दिखाई दूध, मठ्ठा या गेहूं और चावल का कट्टा लेकर फ्री के टिकट में देहरादून जाता रहता था।  कितना अच्छा लगता है कि उसके दादा जी भी उसके पास ये सब भेज दिया करेंगे ।

लघु कथा काली चाय

लघु कथा 

काली चाय

सुबह हुई दादा और दादी दोनों उठे तो उन्हें लगा कि कुछ कमी सी है।  पर कमी भी किसी गाय भी अपनी जगह पर बंधी हुई घास खा रही है और रोज सुबह सुबह उनके आंगन में आने वाली चिड़िया भी शोर मचा रही हैं पड़ोसी के मुर्गे भी बांग देने में व्यस्त हैं और तो और पड़ोस की 80 साल की हो चली सरला भी धूप में अपनी चिलम लेकर बैठ गई । 

सब कुछ तो वही है जैसा इस छोटे से गांव के इस पुराने हो चले घर में बरसों से चलता आ रहा था । आज लेकिन घर में चाय भी नहीं बनी वरना तो स्कूल की पहली घंटी से पहले ही चाय और रात की रखी हुई बासी रोटी मिल जाया करती थी ।

दादा जी रसोई की तरफ बढ़े तो देखा कि दादी चाय तो बना रही है पर बड़ी उदासी के साथ, अनमने ढंग से दादा जी का भी मन उखड़ा हुआ सा ही था । दादी ने दोनों के ही लिए काली चाय बनाई और दोनों ने एक दूसरे को देखा और बिना कुछ बोले अपनी अपनी काली चाय पीने लगे और एक दूसरे से आंख बचाते हुए चूल्हे में जलती हुई आग को देखते रहे । दोनो की ही आंखों में नमी तो थी पर शायद एक दूसरे से अंजान बनने की कोशिश सी कर रहे थे कि ये नमी छुपी रहे ।

इधर स्कूल की घंटी भी बज गई, रोज इस पहली घंटी के समय जो बच्चों को बुलाने के लिए लगाई जाती है दादा जी तैयार हो जाया करते थे और अपनी नतिनी को उसके स्कूल छोड़ने निकलते । दादी नतिनी को चाय नाश्ता कराती क्योंकि खाना तो स्कूल में मिल जाता था । 

खेत तो बंजर हो ही चुके थे और खाने पीने लायक अनाज गांव की राशन की दुकान से मिल जाया करता था और फिर दोनों की वृद्धावस्था पेंशन भी आ ही जाती थी । थोड़े बहुत पैसे बेटा भी शहर से भेजता रहता था क्योंकि कुछ साल पहले आए corona में सब लोग अपने अपने गांव लौट आए, बच्चे भी आए थे और गांव के स्कूल और घर कुछ आबाद से हुए थे।  लेकिन अब जब सब कुछ फिर से सामान्य हो चला था तो जो लोग आए थे वापस भी चले गए ।

आज दोनों यही सोच रहे थे कि आखिर ये लोग आए ही क्यों बहुत से वर्षों से तो अकेले ही रहने की आदत डाल ली थी हम दोनों ने अब दो साल से घर में रौनक सी आ गई थी । दोनो बूढ़े जनों को नतिनी के आने से पूरे दिन का काम मिल गया था । स्कूल से आते ही उसकी शोरगुल शुरू हो जाती थी जो रात तक खाना खाकर कहानी सुनने तक चलती । उसे तो पता भी नहीं रहता था कि कब उसकी मम्मी रात में उसको कहानी सुनते सुनते सोते में ही उठा कर अपने पास ले जाया करती ।

इधर दादी को तो उसके जाने के बाद से नींद भी नहीं आई और दादा जी अब स्कूल की पहली घंटी को अनसुना करने का प्रयास करते रहते ।