लघु कथा
नेपाली
आज फिर स्कूल में गुरु जी ने उसे ड्रेस पहन कर ना आने के कारण खड़ा कर दिया । वह बहुत उदास था और सेब के बगीचे में बनी अपनी झोंपड़ी में जो अब उनका घर था छुट्टी के बाद वापस आ गया । जहां उसके पिता मजदूरी करते थे । स्कूल में भी उसे बाकी बच्चे नेपाली ही बोला करते थे । उसे अभी पता ही नहीं था कि उसका नाम तो सूरज है पर बच्चे उसे उसके नाम से नहीं बुलाते । कल गुरुजी को भी उसने फोन पर कहते सुना था कि उनके स्कूल में एक और नेपाली बच्चा आ गया है ।
इधर गांव दर गांव प्राइमरी स्कूल बंद होते जा रहे थे । गांव के बंद होते स्कूलों का सबसे बड़ा असर भोजन माताओं पर पड़ा जिन्होंने बरसो पहले बहुत थोड़े से पैसों में इन स्कूलों में खाना बनाना शुरू किया था और अब धीरे धीरे स्कूल बंद होते जा रहे थे और उनको इस बुढ़ापे में मिलने वाले तीन हजार प्रति माह भी बंद होने का खतरा बराबर मंडरा रहा था ।
इधर इस गांव के गुरु जी ने भी बाद में लगी एक भोजन माता को बोल दिया था कि 25 बच्चे अगर हुए तो एक हो हटाया जाना होगा । स्कूल में फिलहाल 26 बच्चे तो हो गए थे तो दोनों भोजन माताओं नौकरी बची रहेगी ।
आज जब फिर सूरज ने अपने पिता को स्कूल की ड्रेस के बारे में बताया कि वहां तो सरकार सब कुछ फ्री में देती है पर गुरु जी ने बताया है कि नेपालियों। को कुछ नहीं दे सकते । उनके पास कागज नहीं हैं इसलिए किताब, स्कूल का बस्ता और स्कूल की वर्दी भी नहीं मिलेगी । उसके पिता ने एक लंबी सी सांस ली और तीस साल पहले जब वह स्कूल जाता था उसे अपना समय याद आ गया था कि उसे भी यही सब सुनना पड़ा था । खैर उन दिनों स्कूलों में सब कुछ फ्री तो नहीं मिलता था और गुरु जी लोग भी अच्छे हुआ करते थे । कई बार गुरु जी लोगों को वह दूर से पानी ला दिया करता था तो वे उसे कुछ ना कुछ खाने को दे देते थे । उसे याद आया कि शायद उसके दादा जी यहां नेपाल से काम की तलाश में आ गए थे और अब यह उनकी चौथी पीढ़ी यहीं गांव में रह कर मेहनत मजदूरी कर रही है किंतु उनको आज भी नेपाली ही बोला जाता है और स्कूलों से उनको कोई भी सुविधा नहीं मिल पाती ।
फिर उसे याद आया कि कैसे गरीबी के कारण उसकी अपनी पढ़ाई भी बीच में ही छूट गई थी और अब शायद यही उसके बेटे सूरज के साथ भी hoga .
सूरज सोच रहा था उसे सब नेपाली क्यों बोलते हैं उसे तो अपने स्कूल में प्रतिदिन सुबह बोली जाने वाली प्रतिज्ञा भारत मेरा देश है भी याद कर ली थी और गुरु जी कभी कभार उससे भी यह प्रतिज्ञा बुलवाया करते थे । एक दिन उसके गुरु जी किसी को फोन पर बता भी रहे थे कि कैसे पिछली 26 जनवरी को उनके स्कूल के सारे नेपाली बच्चे भी बड़े खुश होकर अन्न जहां का हमने खाया वाले नारे बोल रहे थे ।