Sunday, March 29, 2020

लघु कथाएं , लॉक डाउन लेखन

[30/03 08:32] Pankaj Kumar: लॉक डाउन विचार, नौवां दिन ।

हमसे पहली पीढ़ी,

चलो कम से कम इस बुढ़ापे में एक बच्चा तो अपने पास है, कुछ बीमारी होगी तो अस्पताल तो ले ही जायेगा ।

हमारी पीढ़ी,

चलो कम से कम दो बच्चे तो हैं, सारा दिन आपस मे खेलते कूदते तो रहते हैं, अकेला होता तो परेशान ही हो जाता,

हमारे बाद की पीढ़ी,

चलो एक ही बच्चा है, दो होते तो बहुत ऊधम मचा कर रखते,

इस पीढ़ी का बच्चा, वर्क फ्रॉम होम के दौरान अपने अपने लैपटॉप में बिजी मम्मा और पा से, क्योंकि महानगरीय जीवन के खर्चों व बच्चे को बहुत अच्छे स्कूल में जो डे बोर्डिंग जरूर हो में भेजने के लिए दोनो का कामना जरूरी है ।

मम्मा मैं किसके साथ खेलूं ?

मम्मा उवाच
शोना, कार्टून देख लो, फ़ोन पर स्टोरी सुन लो, और देखो लॉक डाउन खुल जायेगा तो मम्मा तुम्हे CCD ले जाएगी, पिज़्ज़ा hut ले जाएगी ।

पापा के मन मे
कम से कम क्रेच तो खुले ही रखे जाने चाहिए थे ।

इनके दादी और दादा जी जो पीछे रह गए हैं,
अच्छा होता बच्चे यहीं आकर रह लेते हमारे पास लॉक डाउन में, कम से कम पोते या पोती को तो खिला ही लेते ।
कड़वा किन्तु सच ।

यह लॉक डाउन बहुत कुछ सिखा कर जाएगा हम सभी को ।
[30/03 10:00] Pankaj Kumar: हाँ माँ उठ गया ।
चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाय पर मां का फ़ोन सुबह आ ही जाता है । कंप्यूटर के की बोर्ड से नजर हटा का उसने माँ का फ़ोन रिसीव कर लिया ।

नहीं मां कनिका अभी सो रही है, उसकी अमेरिका की शिफ्ट थी तो पूरी रात जागी रही ।

नाश्ता कर लूंगा माँ, और अब तो swiggy को भी सरकार ने खोल दिया है उसी से कुछ आर्डर कर लूंगा । तुम अपना ध्यान रखना मैं तुम्हारे खाते में और पैसे डलवा दूंगा ।

नहीं माँ काम वाली तो नहीं आ रही वो लोग भी अपने अपने गांव चले गए । कोई बात नहीं ज्यादा गंदा नहीं रहता है अब तो कोई आता जाता भी नहीं ।

बगल के फ्लैट से आवाज आई, सुनो जी नाश्ता तैयार है आ जाओ । सोच रहा था कि एक रिश्ता MA पास लड़की का भी आया था पर उसे ही धुन सवार थी कि शादी करेगा तो अपने की प्रोफेशन और पैकेज वाली लड़की से ।

कनिका लो चाय पी लो, रात भर काम करके थक गई होगी, नहीं अभी सोने दो जरा और हां बाबू नाईट में मुझे भूख लग गयी थी तो मैंने मैगी बनाई और कॉफ़ी भी, देख लेना बर्तन सिंक में ही होंगे ।

वीडियो कॉन का मैसेज उसकी कंप्यूटर स्क्रीन पर भनभना उठा ।
[30/03 10:10] Pankaj Kumar: वर्तमान समय की सच्चाई बयान करती कुछ स्वरचित लघु कहानियां
[30/03 10:10] Pankaj Kumar: हाँ माँ उठ गया ।
चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाय पर मां का फ़ोन सुबह आ ही जाता है । कंप्यूटर के की बोर्ड से नजर हटा का उसने माँ का फ़ोन रिसीव कर लिया ।

नहीं मां कनिका अभी सो रही है, उसकी अमेरिका की शिफ्ट थी तो पूरी रात जागी रही ।

नाश्ता कर लूंगा माँ, और अब तो swiggy को भी सरकार ने खोल दिया है उसी से कुछ आर्डर कर लूंगा । तुम अपना ध्यान रखना मैं तुम्हारे खाते में और पैसे डलवा दूंगा ।

नहीं माँ काम वाली तो नहीं आ रही वो लोग भी अपने अपने गांव चले गए । कोई बात नहीं ज्यादा गंदा नहीं रहता है अब तो कोई आता जाता भी नहीं ।

बगल के फ्लैट से आवाज आई, सुनो जी नाश्ता तैयार है आ जाओ । सोच रहा था कि एक रिश्ता MA पास लड़की का भी आया था पर उसे ही धुन सवार थी कि शादी करेगा तो अपने की प्रोफेशन और पैकेज वाली लड़की से ।

कनिका लो चाय पी लो, रात भर काम करके थक गई होगी, नहीं अभी सोने दो जरा और हां बाबू नाईट में मुझे भूख लग गयी थी तो मैंने मैगी बनाई और कॉफ़ी भी, देख लेना बर्तन सिंक में ही होंगे ।

वीडियो कॉन का मैसेज उसकी कंप्यूटर स्क्रीन पर भनभना उठा ।
[30/03 10:10] Pankaj Kumar: हम सभी के घरों में अक्सर सुनाई देने वाला वार्तालाप ।

लड़का अकेला है भाग्यवान, एक बहन है बड़ी, उसकी शादी हो चुकी है । लड़के का पैकेज भी बढ़िया है । देख लो कर दूं बात पक्की ??

पर लड़के के पिताजी नहीं हैं, हाँ तो क्या हुआ ??  नहीं मैं सोच रही थी कि हमारी टुन्नी को तो किसी के साथ रहने की आदत ही नहीं है, सास की जिम्मेदारी कैसे उठाएगी मेरी बेटी ।

कोई ऐसा देख लो ना जो यह झंझट ही ना हो ।
[30/03 10:10] Pankaj Kumar: हम्म लड़का तो सही है, दो भाई हैं, एक छोटी बहन, लड़के के पिताजी अभी अभी रिटायर हुए हैं, अभी तक तो सरकारी मकान में थे अब शायद अपना घर बनाएंगे ।

पर यह भी तो हो सकता है कि लड़के के ही साथ रहें ?? हम्म तब तो मुश्किल होगा, लड़के पर ही सारी जिम्मेदारी आ जायेगी, माँ, बाप की भी और छोटे भाई बहनों की भी, सुनो कोई दूसरा लड़का ही देख लो हमारी टुन्नी तो घर के काम के बोझ के ही नीचे दब जाएगी ।
[30/03 10:10] Pankaj Kumar: अब ये लॉक डाउन ऐसा हो गया कि ना कोई किसी के पास आ सकता और ना कोई किसी के पास जा सकता ।

टुन्नी का बच्चा अभी छोटा ही है, उसे तो घर ही रह कर काम भी करना पड़ता होगा, दामाद जी भी छुट्टी लेकर घर नहीं बैठ सकते, काश आज कोई हमारी टुन्नी के पास होता ।
[30/03 10:36] Pankaj Kumar: उसने दोनो ही लड़कियों को बहुत लिखाया पढ़ाया । लड़के की इच्छा भी कभी नहीं की । पर आसपास के लोग रिश्तेदार बोलते ही रहते थे कि लड़का होगा तो मुसीबत में काम आएगा ।

दोनो ही लड़कियों की शादी हो गयी, एक दामाद के माता पिता का आकस्मात ही देहांत हो गया । बेटी और दामाद दोनो ही बहुत बोल रहे हैं कि अकेले वहां क्या कर रहे हो हमारे ही पास आकर रह लो ।

शर्मा जी का इकलौता बेटा तो विदेश ही सेटल हो गया शर्मा जी बेचारे खुद भी बीमार और उनकी पत्नी भी बीमार ही रहती हैं । शर्मा जी उससे अक्सर बोला करते थे कि भाई लड़का होने के अपने ही  सुख हैं देख लो मान जाओ मेरी बात एक और चांस ले लो वर्मा जी के यहां भी दो बेटियों के बाद लड़का हो ही गया था ।

लॉक डाउन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

लॉक डाउन  के आठवें दिन का चिंतन

29 मार्च 2020, रविवार

कोरोना के चलते दिनांक 25 मार्च 2020 से देश व्यापी लॉक डाउन 15 अप्रैल 2020 तक प्रभावी हो गया है । इस लॉक डाउन के चलते महानगरों से एक बहुत बड़े जनसमुदाय द्वारा अपने अपने गांव के लिए बड़े पैमाने पर पलायन प्रारम्भ कर दिया गया है । लॉक डाउन के चलते क्योंकि शहरों में अस्थाई रूप से रह रहे इस कामगार वर्ग की रोजी रोटी का संकट आ खड़ा हुआ है अतः इस संकट की घड़ी में यह वर्ग अब अपने गांव की और लौट जाना ही उचित संमझ रहा है ।  हालांकि यह पलायन कोरोना की समस्या के बिना भी होता ही है क्योंकि गेहूं की कटाई का समय निकट आ रहा है अतः कुछ लोग इस समय भी अपने गांव की और रुख करते हैं ताकि गांव में रह गए अपने बुज़ुर्ग माँ बाप के लिए साल भर का अनाज जुटा कर रख जाएं । प्रायः इस प्रकार का पलायन प्रति वर्ष गेहूं व धान की फसलों की कटाई के समय देखा ही जाता है ।

किन्तु सामान्य दिनों में चूंकि रेल की सुविधा जारी रहती है अतः इतना बड़ा जन सैलाब सड़कों पर दिखाई नहीं देता पर अब चूंकि दोनो ही कारण बन रहे हैं एक तो फसल कटाई का समय और दूसरा कोरोना के कारण रोजी रोटी का भी संकट ।

आखिर गांव के आदमी को अपने गांव से शहर में पलायन करने की नौबत क्यों आन पड़ती है जबकि वर्तमान में मनरेगा, इंदिरा आवास योजना, रियायती दरों पर राशन की उपलब्धता, आंगनवाड़ी से गर्भवती महिला से लगा कर 3 वर्ष की आयु होने तक घर के लिए राशन, बच्चे के 3 साल से 6 साल तक की आयु तक आंगनवाड़ी में उसके लिए बना बनाया भोजन, इसके उपरांत गांव में स्थित सरकारी स्कूल में कक्षा 1 से 12 तक की मुफ्त पढ़ाई, जिसमे कक्षा 8 तक स्कूलों में मिल रहा दोपहर का  पौष्टिक भोजन व कमजोर वर्गों हेतु छात्रवृत्ति, फ्री स्वास्थ्य परीक्षण, फ्री टीकाकरण, आयुष्मान योजना जैसे लाभ, अपना काम शुरू करने हेतु अनेकों सरकारी योजनाएं व सुविधा व सब्सिडी युक्त ऋण की सुविधाओं के बावजूद भी क्यों ग्रामीण अंचलों का युवा अपने गांव के सुरक्षा कवच को छोड़ कर शहर की भीड़ में खो जाने, अपने परिवार की शहर की झुग्गी झोंपड़ियों में रखने हेतु पलायन कर जाता है ।

इसके कारण जानने हेतु गांव के जीवन से भली भांति परिचित होना आवश्यक हो जाता है । मैं भी स्वयं एक गांव से हूं तथा किसान परिवार से संबंध रखता हूँ । हरिद्वार जनपद में स्थित मेरा गांव उत्तर प्रदेश के दिनों में जिला सहारनपुर में आया करता था तथा उत्तर प्रदेश के ही दिनों में जनपद सहारनपुर से वर्ष 1988 में अलग  हरिद्वार जनपद अस्तित्व में आया जो कि कालांतर में वर्ष 2000 में उत्तराखंड बनने पर उत्तराखंड में शामिल किया गया । उत्तर प्रदेश के दिनों में जिस समय जनपद हरिद्वार का गठन किया गया उस समय मैं कक्षा 10 का छात्र था तथा अखबार इत्यादि में रुचि होने के कारण थोड़ी बहुत आसपास की खबर भी रख लिया करता था । उन दिनों स्थानीय लोगों को बहुत ही आश्चर्य हुआ कि जिला हरिद्वार बनाया गया जबकि बहुत से लोगों की उसी समय राय थी कि हरिद्वार के स्थान पर रुड़की शायद ज्यादा उचित रहता क्योंकि हरिद्वार में सदैव ही उपयुक्त स्थान की कमी महसूस की गई है । वर्तमान समय जनपद हरिद्वार के समस्त जिला स्तर के जो कार्यालय आज रोशनाबाद नामक स्थान पर संचालित हो रहे हैं एक समय वह क्षेत्र अत्यंत पिछड़ा व जन यातायात की भी सुविधा से वंचित था । खैर वर्ष 2000 में पृथक उत्तराखंड राज्य की स्थापना व वर्ष 2005 में सिडकुल की स्थापना व अनेकों फैक्टरियां बनने के बाद तो वर्तमान यह स्थान चमक ही उठा है पूर्व में एक चाय की दुकान को तरसने वाले क्षेत्र में आज होटल रेडिसन ब्लू व हरिद्वार का सबसे बड़ा माल आज स्थापित हो चुका है ।

खैर हम अपने पलायन के ही विषय पर वापस आ जाते हैं । आखिर यह पलायन होता क्यों है आज जबकि सरकार की हर संभव कोशिश समाज के हर तबके तक विभिन्न लाभकारी योजनाएं पहुंचाई जाने की है फिर भी लोग क्यों शहरों की और चल पड़ते हैं । इस पलायन के अनेकों सामाजिक व आर्थिक कारण हो सकते हैं जो हमको समझने पड़ेंगे ।

अपने बचपन के दिनों तक मैंने स्वयं देखा है कि गांव से शहर के लिए ज्यादा पलायन नहीं था, गांव से शहर वही व्यक्ति अपने परिवार के साथ निकलता था जिसे कि शहर में कोई नौकरी मिल जाती थी व ज्यादातर सरकारी नौकरियों वाले ही लोग शहरों में बसने चले जाया करते थे । किंतु शहर में छोटा मोटा काम करने वाले लोग व कोई प्राइवेट नौकरी करने वाले लोग गांव में ही रह कर शहर में अपना काम करते रहते थे । हो सकता है कि यह स्थिति हमारे यहां इसलिए अच्छी हो कि यह क्षेत्र संसाधनों से भरपूर है, खेती हेतु उपजाऊ जमीन, सिंचाई के बढ़िया साधन, नहर का पानी के कारण शायद इस क्षेत्र में भीषण गरीबी वाली समस्या दिखाई नहीं पड़ी । यानी गांव से शहर की और पलायन उन ग्रामीण  क्षेत्रों से ज्यादा संख्या में हो रहा है जो कि संसाधनों से वंचित हैं और जहां गरीबी ज्यादा है तथा गांव में कृषि क्षेत्र में मजदूरी के अतिरिक्त अन्य रोजगार के साधन उपलब्ध नहीं हैं ।

पुराने समय मे किसान व मजदूर का बड़ा ही अनोखा संबंध होता है एक दूसरे पर दोनो ही निर्भर हुआ करते थे, किसान अपने खेतों में श्रम शक्ति हेतु मजदूरों पर निर्भर तथा मजदूर वर्ष भर के अपने अनाज की आपूर्ति हेतु किसान पर निर्भर होता था । उन दिनों भी हम सुना करते थे कि गांव में मजदूरी की दर शहरों की अपेक्षा कम होती थी किन्तु भुखमरी की नौबत फिर भी नहीं आती थी, मजदूर अपने बाल बच्चों के साथ गांव में ही रह कर अपना जीवन यापन कर लिया करता था साथ ही साथ किसान की सहायता से अपने घर मे एक दो पशु भी रख लिया करता था जिसका दूध स्वयं के काम आने के अतिरिक्त बेचने के भी काम आ जाता था । किसान व मजदूर लम्बे समय तक एक दूसरे के सहारे अपने अपने कार्य चलाते रहे ।

समय बदला, शहरों में निर्माण कार्य बढ़े, फैक्टरियां लगीं और मजदूरी के रेट भी बढ़ गए उसके अतिरिक्त खेती का काम सामान्यतः 24 घंटे का भी हो सकता है क्योंकि गांव में दिन की शुरुआत सुबह 4 या 5 बजे ही हो जाती है । सबसे पहले पशुओं को सुबह का चारा डालना, फिर दूध निकलना उसके बाद खेत मे जाना दोपहर वापस आकर भोजन के बाद थोड़ा आराम फिर 3 से 4 बजे शाम के बीच पशुओं को दूसरा चारा डालना,उससे पहले खेत से लाये गए चारे को मशीन से काटना, शाम को पशुओं को पानी पिलाकर सर्दियों में अंदर बांध देने के ही बाद मजदूर के दिन का काम समाप्त होता था । इस ड्यूटी के बाद रात के समय खेतों की सिंचाई हेतु खेतों में भी जाना पड़ जाता है । जिस समय मजदूर खेत मे जाता था उसके साथ उसकी पत्नी व बच्चे भी चले जाया करते थे तथा आपसी सहमति से किसान के खेत से अपने पशुओं हेतु भी चारा ले जाया करते थे जिसका कोई मूल्य किसान उनसे नहीं लेता था ।

इसके अतिरिक्त जरूरत के समय किसान अपने साथी मजदूर की यदा कदा अन्य मदद भी करते रहते थे, मसलन शादी विवाह के समय एडवांस दे देना, घर से अनाज या या जो भी अन्य साधन होता था दे दिया करते थे व मजदूर की ज्यादातर समस्याओं का समाधान किसान कर दिया करता था ।

समय बदला व शहरों में मिल रही अधिक मजदूरी व नियत  काम के घंटों के कारण मजदूर खेती जैसे श्रम साध्य कार्य से विमुख सा हो गया इसके अतिरिक्त नवीन पीढ़ी के युवा वर्ग द्वारा कृषि कार्य को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा व गांव से शहर में काम करना व शहर में ही जाकर अपने परिवार के साथ रहना एक आधुनिकता का भी प्रतीक माना जाने लगा । अतः खेती जैसे अधिक जन श्रम की आवश्यकता वाले कार्य हेतु श्रम शक्ति की कमी हो चली, बड़े बड़े किसान भी श्रम शक्ति की इस बहुत बड़ी कमी से अत्यंत प्रभावित हुए, परिवार सीमित रखे जाने व किसान के स्वयं के ही बच्चों की कृषि कार्य से विमुखता के कारण खेती का भी स्वरूप बदल सा गया । अब किसान ने भी ऐसी फसलें बोनी शुरू कर दी जिनके लिए कम श्रमिकों की जरूरत पड़ती है यह फिर फसल की कटाई व गन्ने की ही च्छुलाई हेतु श्रम की जरूरत पड़ती है जो कि अपनी आवश्यकता की भी पूर्ति हेतु मजदूर उपलब्ध हो जाता है । आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर गन्ने की ही खेती हो रही है, गांव में उपलब्ध  श्रम शक्ति की कमी के कारण आज ज्यादातर बड़े किसान अपनी भूमि के एक बड़े भाग पर फसल उगाए जाने के बजाय पोपलर के पेड़ों को लगवा रहें ताकि श्रम की कमी से निबटा जा सके । किसानों ने श्रम शक्ति की कमी के भी कारण ज्यादा पशु रखने बंद कर दिए, आज बैलों की जोड़ी शायद ही किसी किसान के यहां देखने को मिले, इसके अतिरिक्त दूध का भी उत्पादन घट गया है क्योंकि पशु रखना भी अब प्रत्येक किसान हेतु संभव नहीं रहा ।

उपरोक्त के आधार पर व इस लॉक डाउन द्वारा उत्पन्न की गई परिस्थिति में शायद मजदूर व किसान पुनः एकजुट हो सकेंगे, इतना तो विश्वास जरूर है कि वर्तमान में सरकार द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं व किसान व मजदूर की आपस की मेहनत से ये सभी अपने गांव की और रुख कर रहे लोग भूखे तो नहीं रहेंगे, खाली पड़े सरकारी स्कूल व आंगनवाड़ी केंद्र भी इनके बच्चों की किलकारियों से आबाद हो सकेंगे और शायद श्रम शक्ति की कमी से जूझ रहे किसान भी शायद कुछ राहत महसूस कर सकेंगे ।