पहाड़ों की अधिक ऊंचाई पर बहुत से स्थान ऐसे होते हैं जहां सदियों से उन ऊंचे स्थानों के पास बसे गांव के लोगों का बराबर आना जाना रहा है । सदियों से भेड़ और बकरियों को चराने ले जाया जाता रहा है तथा इन दुर्गम स्थानों पर हमारे स्थानीय ग्रामीण विषम परिस्थितियों में महीनों तक गुजारते हैं । अपने चकराता प्रवास के दौरान ऐसे ही कई स्थानों पर इन दुर्गम रास्तों पर पैदल भृमण का अवसर मिला है तथा इन लोगों के जीवन को नजदीक से देखने का मौका मिला । ऐसी ही एक यात्रा कल अपने साथी श्री आर्यन जी के साथ की गई । स्थान का नाम भेदाच, मोराच जो कि हिमाचल में स्थित 3140 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक शिखर है तथा एक छोटा सा बुग्याल । यहां पहुंचने के लिए उत्तराखंड के त्यूणी से सड़क मार्ग द्वारा हिमाचल के साँसकिर तक गए फिर साँसकिर से ऊपर लगभग 4 घंटे का पैदल व अत्यंत दुर्गम मार्ग । रास्ते मे ऐसे ही जीवट वाले भेड़ बकरी चरा रहे और महीनों तक घर से दूर इस जंगल मे रह रहे इन 04 सज्जनों से मिलना हुआ । इनके डेरे के पास से हम गुजरे तो ये अपने भोजन की तैयारी में थे, जितना भोजन बनाया था अपने चारों की थाली में परोस कर बस खाने की तैयारी में ही थे कि हमको आता देख रुक गए क्योंकि यदि ये अपनी थाली के भोजन को खाना शुरू कर देते तो भोजन झूठा हो जाता और इस जंगल मे आया अतिथि भूखा रह जाता । इन्होंने अपने भोजन से हमको भी भोजन कराया हालांकि हमारे पास भी रोटी सब्जी व अचार था किंतु इनका अनुरोध ठुकराया नहीं गया और इनके साथ ही भोजन किया । हमने इनके दाल चावल खाये व इनकी चूल्हे पर बनी बड़ी ही अद्भुत रोटी खाई जो कि हमारे घरों में बनने वाली लगभग 5 रोटियों की मोटाई के बराबर 01 ही रोटी लग रही थी । बहुत सारी बातें हुईं इनके जीवन व संघर्ष को समझा व फिर आगे का मार्ग पूछ कर हम वापसी में चाय जरूर पीने का वायदा कर आगे बढ़े । आगे के रास्ते के बारे में इनके द्वारा बता दिया गया था कि थोड़ा खतरनाक रहेगा क्योंकि अब हमको पहाड़ की धार यानी चोटी पर ही चलना था जो कि संकरा मार्ग होता है व जंगल मे भालू व गुलदार मिलने का भी भय रहता है । खैर हम सकुशल अपने गंतव्य पहुंचे व वापसी में इनके पास आकर बिना दूध की अमृत तुल्य चाय भी पी । मन तो कर रहा था कि एक रात इनके ही साथ जंगल मे बिताई जाय पर हमारे पास कोई स्लीपिंग बैग इत्यादि नहीं था व हमने पहले ही दुर्गम जीवन जी रहे इन सज्जनों को परेशान करना उचित भी नहीं समझा । और इनसे विदा लेकर और इनके जीवन व जिजीविषा व जीवट के विषय मे विचार करते हुए वापसी का रास्ता पकड़ा ।
हम लोग कई यात्रा पुस्तकों व सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में अक्सर पढ़ते रहते हैं कि फलां स्थान किसी अंग्रेज ने खोजा, फलां किसी दूसरे अंग्रेज ने किन्तु मुझे लगता है कि हमारे इन ग्रामीणों का तो सदियों से इन स्थानों पर आना जाना अपने जीवन के विभिन्न प्रयाजनों के कारण अंग्रेजों के भी आने से पहले होता रहा है कदाचित अंग्रेजों द्वारा इन स्थानों को बाहरी दुनिया के संज्ञान में लाने का ही मात्र काम किया गया अतः अपनी अगली पीढ़ी को यह बताया जाना कि स्थान हमारा व खोज किसी बाहरी अंग्रेज द्वारा की गई अत्यंत हास्यास्पद लगता है । हमारे ग्रामीण लोग सदियों से इन जंगलों पर आजीविका हेतु निर्भर रहे हैं, प्रत्येक ऊंचे स्थान पर मान्यता के अनुसार सदियों से अपने इष्ट देवता की पूजा भी अपने ही हिसाब से करते रहे हैं किंतु बस इनका संपर्क बाहरी दुनिया से नहीं था और बाहरी दुनिया को इन स्थानों की आज भी जानकारी ज्यादा है भी नहीं । अतः यह श्रेय किसी अंग्रेज को न जाकर इन स्थानीय लोगों को ही दिया जाय । अमूमन माउंट एवेरेस्ट पर चढ़ने वाले का नाम तो जोर शोर से लिया जाता है किंतु जो शेरपा व पोर्टर उसका समान ढो कर साथ मे चलता है उसका नाम कोई नहीं जानता वह तो अपनी आजीविका हेतु अनेकों बार उस पहाड़ की ऊंचाई नाप चुका होता ह
वापसी में साँसकिर के ऊपर बने उत्तराखंड व हिमाचल दिनों ही के बीच स्थित शिखर पर स्थित शीलगुर देवता मंदिर के दर्शन किये जहां पर वर्ष 2015 के दिसंबर में भी मेरा अचानक ही अपने एक सहयोगी के साथ हुआ था जब यहां कोई बड़ी पूजा हुई थी । हुआ यूं कि मैं उनके गांव गया हुआ था सुबह उठे तो ऊपर बहुत ऊंचाई से ढोल बजने की आवाज सुनाई दी मैंने कोतुहल वश पूछा कि वहां क्या है उनके द्वारा बताया गया कि एक मंदिर है व कदाचित आज कोई पूजा है इसलिए ढोल बज रहा है । मैंने बोला कि क्या हम वहां चल सकते हैं तो श्री शर्मा जी सहर्ष तैयार हो गए और बोले कि चलिए रास्ते मे अपने कुल देवता महाराज के भी दर्शन हो जाएंगे । रास्ते मे पड़े अन्य गांव बागिया से उनके साथ उनके बचपन के सखा भी हो लिए लगभग 2 घंटे की सीधी चढ़ाई के बाद ऊपर शिखर पर पहुंच कर नजारा अद्भुत मिला, बहुत बड़ी संख्या में लोग व बच्चे आये हुए कोई बड़ी पूजा जो प्रत्येक 5 वर्षों के बाद होती है उस दिन हो रही थी । लोगों के लिए वहीं भंडारे का भी आयोजन था और वहीं हमारे एक अन्य साथी भी मिल गए श्री जयपाल सिंह जो कि हिमाचल की और से आये थे । हमारे साथ आज पुनः आये स्थानीय युवा जीतू द्वारा बताया गया कि इस वर्ष दिसंबर 2020 में भी वही बड़ी पूजा आयोजित होगी मुझे फिर उस 5 वर्ष पहले की गई उस यात्रा का स्मरण हो आया ।