Friday, March 25, 2022

बोर्ड परीक्षा का मेरा अनुभव

 

परीक्षा - मेरा अनुभव

आजकल बोर्ड परीक्षा शुरू होने वाली हैं । खंण्ड शिक्षा अधिकारी के तौर पर मुझे पहली बार अपने इस दुर्गम विकास खंड में बोर्ड परीक्षा सुचारू रूप से कराये जाने की जिम्मेदारी मिली है । बोर्ड परीक्षा की तैयारी के कुछ चरण जो मैं देख पा रहा हूँ निम्नवत हैं 
1. परीक्षा केंद्रों का चयन

2. विभिन्न विद्यालयों के बच्चों को परीक्षा केंद्र आवंटन

3 प्रत्येक परीक्षा केंद्र हेतु एक केंद्र व्यवस्थापक, कस्टोडियन, व परीक्षा प्रभारी का चयन व नियुक्ति

4 प्रत्येक परीक्षा केंद्र हेतु आसपास के विद्यालयों से उनकी जरूरत के मुताबिक कक्ष निरीक्षकों की ड्यूटी लगाया जाना ।

5 विकास खंड स्तर के कंट्रोल रूम व विकास खंड स्तरीय सचल दलों में शिक्षकों को नामित किया जाना ।

6 उपरोक्त समस्त डयूटी जनपद के मुख्य शिक्षा अधिकारी महोदय से अनुमोदित करा कर फिर इनको शिक्षकों तक पहुंचाना ।

उपरोक्त कार्यवाही शुरू होते ही काफी सारे सिफारिशी फ़ोन भी आने शुरू हो जाते हैं कि अमुक को अमुक डयूटी में रख लीजिए, अमुक को कस्टोडियन से मुक्त रखिये इत्यादि इत्यादि । खैर गत वर्ष तो बोर्ड परीक्षा कोविद के चलते हो ही नहीं सकी थी तो कोई समस्या नहीं हुई इस वर्ष परीक्षा हो रही है तो ऐसे सिफारिशी फ़ोन भी बड़ी मात्रा में आ ही रहे हैं ।

इस संबंध में मैं अपना स्वयं का ही अनुभव शेयर करना चाहूंगा कि बोर्ड परीक्षा से आखिर लोग इतना डरते क्यों होंगे ।

वर्ष 2006 के माह दिसंबर में मेरी नियुक्ति एक LT शिक्षक अंग्रेजी विषय के शिक्षक के तौर पर जनपद टेहरी के जौनपुर थत्यूड़ ब्लॉक के एक दुर्गम हाई स्कूल जामथिअल गांव में हुई । इस स्कूल की स्थिति बड़ी रोचक थी इसकी दूरी देहरादून जनपद मुख्यालय से लगभग 30 से 35 किलोमीटर पड़ती होगी और यदि सड़क मार्ग से ही ब्लॉक मुख्यालय यानी थत्यूड़ जाना पड़े तो पहले स्कूल से पैदल चल पर नजदीकी कच्ची सड़क तक डेढ़ घंटे पैदल चलो, फिर कोई यूटिलिटी पकड़ो, देहरादून आओ, देहरादून से मसूरी होते हुए फिर लगभग 60 किलोमीटर सड़क मार्ग से चल कर थत्यूड़ पहुँचों यानी 90 से 100 किलोमीटर की दूरी स्कूल से ब्लॉक मुख्यालय की पड़ जाती थी । 

इसका दूसरा मार्ग कुछ ऐसा था कि गांव से 3 घंटे की पैदल चढ़ाई धनोल्टी तक करो फिर वहां से कोई गाड़ी पकड़ कर थत्यूड़ तक जाओ । और शायद पुराने समय मे यही सुविधाजनक लगता होगा क्योंकि मुझे बताया गया था कि मेरे जॉइन करने के समय जो इस स्कूल का जो पैदल मार्ग सड़क बन जाने से डेढ़ घंटा रह गया था वह 2005 से पहले 3 ही घंटा होता था जब कि ppcl से ही इस गांव तक पैदल आया जाया जाता था ।

खैर माह जनवरी और फरवरी की पढ़ाई के ही तुरंत बाद बोर्ड वर्ष 2007 की बोर्ड परीक्षा ऊपर से मेरा विषय भी अंग्रेजी जिसमे छात्र जीवन तक तो मेरा स्वयं का भी हाथ तंग ही रहा ऊपर से जिन कक्षा 10 के बच्चों की जिम्मेदारी मुझे मिली थी उनके अंग्रेजी शिक्षक वहां से ट्रांसफर चले गए थे और नई नियुक्ति और दुर्गम स्कूल रिक्त होने के नाते मुझे इस स्थान पर नियुक्ति मिली । खैर बच्चों का स्तर देखा तो यही लगा कि इन 2 महीनों में कुछ ऐसा किया जाय कि हर बच्चा कम से कम पास तो हो ही जाय । उन दिनों परीक्षा का पैटर्न भी बदल रहा था और 2007 शायद पुराने पैटर्न का अंतिम वर्ष था जब कि हर विषय के 2 या 3 पेपर  हुआ करते थे । खैर उस पुराने पैटर्न में ट्रांसलेशन और कॉम्प्रिहेंशन होता था और मुझे लगा कि यदि इन दोनों की अच्छी प्रैक्टिस करा दी जाय और थोड़ा बहुत एक्टिव पैसिव और डायरेक्ट इनडाइरेक्ट भी करा दिया जाय तो हर  बच्चा चाहे जितना भी कमजोर होगा कम से कम पास तो हो ही जायेगा । खैर दो माह व्यतीत हुए और बोर्ड परीक्षा भी पास आ गयी । अब डयूटी की सुगबुगाहट शुरू हुई और पुराने लोग जो वहां लंबे समय से थे और जिनके घर भी देहरादून में थे जनपद टेहरी के ऐसे ही कुछ स्कूलों जहां पर देहरादून से जाया जा सकता था जैसे कि रागड़गाओं, उनियाल गांव इत्यादि में चले गए और मैं और मेरे साथ एक कला शिक्षक जो अक्सर गोले को वर्ग के जैसा दिखने वाला बना दिया करते थे की ड्यूटी ब्लॉक मुख्यालय के स्कूल GIC थत्यूड़ में लग गयी । चूंकि उन युवा ड्राइंग अध्यापक के दिल की धड़कन अक्सर ऐसे समय बढ़ जाया करती थी जबकि उन्हें कुछ भी लिखा पढ़ी का अतिरिक्त कार्य या फिर कहीं और डयूटी के लिए भेज दिया जाता था तो वह भी अपने अनेकों मेडिकल के कागज लेकर जहां से भी डयूटी कट सकती थी कटवाने के जुगाड़ में अंतिम दिन तक लगे रहे । मुझे कोई ऐसा डर था ही नहीं मन मे यही थी कि वर्ष 1982-83  में शायद कक्षा 5 की बोर्ड परीक्षा, 1985-86 में शायद कक्षा 8 की बोर्ड परीक्षा व 1988 में उत्तर प्रदेश के समय हाई स्कूल और वर्ष 1990 में इंटर की बोर्ड परीक्षा एक छात्र के रूप में देने के बाद अब कम से कम कक्ष निरीक्षक के रूप में देखने का मौका मिल रहा है और वह भी एक नई जगह तो चल ही देते हैं । इसके अलावा नौकरी में भी नए, परिवार तो क्या दूर दूर तक की रिश्तेदारियों में सरकारी नौकरी में तो कोई भी नहीं तो अपनी कोई जान पहचान भी नहीं थी तो डयूटी पर चल ही दिए थे । खैर साथ के कला शिक्षक साथी का भी दुख भरा फ़ोन आ ही गया कि शर्मा जी मेरी डयूटी नहीं कटी और मैं आपको थत्यूड़ मिल जाऊंगा । अब मेरे पर बोर्ड परीक्षा के साथ ही साथ उनकी दिल की धड़कन को सामान्य रखने की भी बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी थी । खैर मैं निश्चित दिवस पर सुबह रुड़की से चल कर शाम तक थत्यूड़ पहुंच गया था । उस दिन बारिश भी हुई थी और  थत्यूड़ थोड़ा ठंडा भी हो गया था । कला शिक्षक मुझे वहीं मिले हम दोनों ही स्कूल जायजा लेने और रात्रि विश्राम की सुविधा देखने स्कूल की तरफ चले गए ।
[26/03, 09:10] Pankaj Kumar: हम दोनों ने प्रधानाचार्य महोदय को अपनी उपस्थिति सूचना दी और साथ ही अपनी रात्रि विश्राम की समस्या उनके सामने रख दी । उन्होंने चौकीदार महोदय को निर्देश दिए कि इन दोनों को अमुक कमरा दिखा दो । हम अमुक कमरे में गए जहां की खिड़कियों के पल्ले गायब थे और उस अमुक कमरे में धूल का अंबार व विद्यालय का टूटा फूटा फर्नीचर भी विराजमान था । इसी बीच कला शिक्षक की दिल की धड़कन तेज हो ही चुकी थी अतः मैंने उस अमुक कमरे में ज्यादा समय व्यतीत करना उचित नहीं समझा और किसी अन्य ठिकाने की तलाश में बाजार की तरफ बढ़ चले । खैर बाजार का पुल पार करते ही हमे एक होटल दिखाई दिया नाम शायद असवाल होटल था । वह रात हमने उस होटल में ही काटी पर चूंकि परीक्षा का समय भी लंबा था और मेरे साथी के दिल की धड़कन का भी मामला था जो कभी भी वापस जा सकते थे और अकेले के लिए मुझे वह होटल का कमरा भी इतने लंबे समय के लिए महंगा ही पड़ता तो हमने अपनी समस्या उस विद्यालय के अध्यापकों के सम्मुख रखी । मुझे याद आता है कि उस विद्यालय में उत्तर प्रदेश के दूर के जनपदों के काफी सारे शिक्षक थे जिनमें एक श्री उपाध्याय जी ने हमारी मदद की और एक श्री अग्गरवाल जी का खाली कमरा दिला दिया जिनकी डयूटी कहीं और लगी थी । हमने बोल दिया था सर कि बस कमरा दिलवा दीजिये खाना हम होटल से खा लिया करेंगे और यदि सर को कोई दिक्कत होगी तो हम बिस्तर भी कहीं से किराए पर ले आएंगे । खैर मैं आज भी उन अपने वरिष्ठ शिक्षक साथियों को याद करता हूँ और नमन करता हूँ कि उनके सहयोग से हम दोनों के ऊपर होटल में रुकने का अतिरिक्त व्यय भार नहीं पड़ा और हम अपनी बोर्ड डयूटी सही तरह से करने में सफल हुए । 

उस विद्यालय में उन दिनों फर्नीचर भी पर्याप्त नहीं हुआ करता था और कक्षा 10 और 12 के बच्चे इतनी ठंड में भी नीचे बैठ कर परीक्षा देते थे । एक डयूटी पर ऐसे ही कक्षा 12 की एक बालिका की कॉपी पर नजर पड़ी बड़ी अच्छी हैंड राइटिंग और बड़ा ही अच्छा लिख भी रही थी । मैंने उससे पूछा कि कक्षा 12 के बाद क्या करोगी तो बच्ची बोली कि सर इंजीनियरिंग, मुझे उसका आत्मविश्वास देख कर बड़ा अच्छा लगा और ऐसा भी लगा कि ये बच्ची जरूर कुछ अच्छा ही करेगी । वर्ष 2016 या 17 में हमारे ही विकास खंड के एक विद्यालय में उस वर्ष कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा दे रहे एक शिक्षक साथी से परिचय हुआ और मैंने उस बच्ची के बारे में पूछा तो पता चला कि वाकई उस बच्ची ने पंतनगर से इंजीनियरिंग कर ली थी मैंने फेसबुक पर उसे ढूंढा वह मिल भी गयी और तक वह IIT बॉम्बे से अपनी M Tech शायद PhD भी कर रही थी । आज उसका विवाह भी एक उच्च शिक्षित युवा से हो चुका है और दोनो ही कहीं बड़ी अच्छी जगह सेटल हैं । 
खैर कला अध्यापक महोदय के साथ अच्छा समय कट गया था एकाध बार उनके दिल की धड़कन भी बढ़ी पर ज्यादा नहीं और मैं उन्हें सकुशल अपने विद्यालय वापस लेकर गया ताकि उनका गोला, गोला जैसे ही बन सके ।

अगले वर्ष फिर बोर्ड डयूटी लगी पर इस बार उनियाल गांव में लगी थी जो ज्यादा दूर तो नहीं था और इस बार हमारे स्कूल से भी हम दो तीन लोग वहां गए और अन्य स्कूल के भी साथी थे । वहां हमे स्कूल में ही एक सही सा कमरा मिल गया था खाना हम बाहर होटल में ही खा लिया करते थे । वहां भी समय अच्छा ही कट गया हम सब साथी पोलिंग पार्टी की तरह स्कूल के उस कमरे में मजे से सो जाया करते थे । सब अपने अपने बिस्तर लेकर गए थे । वह समय भी सबके साथ बढ़िया निकल गया था । इस समय को ऐसे ही और एक नए अनुभव के तौर पर लिया जाय तो ही शायद इसका एन्जॉय किया जा सकता है ।