इधर जबसे से सोशल मीडिया चलन में आया है तो अचानक से ही यूपीएससी के माध्यम से चयनित होने वाले आईएएस और आईपीएस बहुत अधिक चर्चा में आ गए हैं । इनमे से बहुतों ने तो अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स भी बना रखे हैं जिन पर अधिकांश द्वारा दिखाया जाता है कि कैसे अलग अलग विभागों के अपने से नीचे के कार्मिकों को ये लोग धमकाते रहते हैं ।
आजकल सोशल मीडिया ने ही ऐसे बहुत से शिक्षकों को भी जाना पहचाना नाम बना दिया है जो कि यूपीएससी की तैयारी भी कराते हैं तथा जिनके अपने कोचिंग सेंटर चलते हैं । पिछले वर्षों में यूपीएससी का सपना देखने वाले युवाओं की संख्या में भी वृद्धि हुई है तथा इनमें से बहुत से तो ऐसे भी मिलते हैं जो अत्यंत गर्व से बताते हैं कि हम यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं और यह पूछने पर कि क्या स्टेट सिविल सेवा या अन्य कोई परीक्षा भी उनके राडार पर है तो वो आपको बड़ी ही हिकारत भरी नजरों से देखते हैं कि मानों आपने उनसे कोई अटपटी सी बात पूछ ली हो । वैसे मुझे तो ज्यादा पता नहीं है क्योंकि मैंने स्वयं कभी यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा नहीं दी, ले दे कर स्टेट पीसीएस की परीक्षा ही दी थी जिसमे कि चयन हुआ और ब्लॉक स्तर के शिक्षा अधिकारी, उप शिक्षा अधिकारी पद हेतु वर्ष 2015 में चयन हुआ । हमारे ही बैच के काफी सारे साथियों द्वारा फिर से इसी परीक्षा को दिया गया क्योंकि शायद इस परीक्षा में भी एसडीएम या डेप्युटी एसपी ही सभी लोग बनना चाहते हैं । वैसे मैंने भी दोबारा उस परीक्षा का pre दे ही दिया था मात्र इस वजह से ही कि चलो नया पैटर्न भी देख लेता हूं और मेरा प्री क्लियर भी हो चुका था । किंतु जब तक मैंस परीक्षा का समय आया तो मुझे इधर एक वर्ष हो चुका था और मुझे अपना यह कार्य अच्छा लगने लगा था, कुछ कार्यों की शुरुआत भी कर दी थी और लगा कि अब इसी पद पर रहते हुए अपना कार्य सुचारू रूप से करना है ।
अभी हाल ही में किसी आईपीएस के ऊपर एक मूवी भी बनी है 12 फेल जिसे काफी पसंद किया जा रहा है । इधर देखने में आ रहा है कि बड़ी संख्या में युवा ऐसे आईएएस और पीसीएस के यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज देख कर, उनके इंटरव्यू इत्यादि देख कर उनके ही जैसा बनने के सपने देखने शुरू करते हैं। और इसमें कोई बुराई भी नहीं दिखाई पड़ती क्योंकि युवा यदि किसी अच्छे स्तर की परीक्षा की तैयारी करता है तो वह उससे नीचे स्तर पर भी चयनित होने की संभावना रखता है । लेकिन वह स्थिति बड़ी ही विकट हो जाती होगी जब कि युवा आईएएस/आईपीएस में चयनित नहीं हो पाता और किसी दूसरे विकल्प पर विचार ही नहीं कर पाता । वैसे तो आजकल किसी यूट्यूब चैनल ने ऐसे भी कुछ युवाओं के वीडियो बनाए हैं जो इन परीक्षाओं में कई कई बार बैठे और बहुत ही कम अंतर से चयनित होने से चूक भी गए ।
अन्त में यही कहना चाहूंगा कि कोई भी आईएएस या आईपीएस अपने जिले का मुखिया तो होता ही है किंतु उसका जिला तभी अच्छा कार्य करता है जबकि अन्य विभागों के जिला स्तरीय अधिकारी और उनके मातहत हर स्तर के अधिकारी अपना कार्य सुचारू रूप से संपादित करते रहते हैं ऐसे में मात्र एक ही पद धारक के कार्य का महिमा मंडन कहीं न कहीं अनुचित सा प्रतीत होता है। जिले के हर विभाग का सुचारू संचालन हर विभाग के अधिकारी की जिम्मेदारी होता है लेकिन शायद ही मीडिया या फिर सोशल मीडिया अन्य विभागों के कार्यों को इतनी प्रमुखता से दिखाते हैं। और जितनी मीडिया कवरेज डीएम के पद को मिलती है तो ऐसा प्रतीत होता है कि कलेक्ट्रेट या तहसील में जो इनके सीधे नियंत्रण में कार्य करते हैं वहां जरूर ऐसी कोई व्यवस्था बन जाती होगी जहां कि पब्लिक का कार्य बड़ी ही आसानी से बिना ज्यादा चक्कर लगाए हो जाता होगा । ऐसी कार्य प्रणाली अवश्य ही इस प्रत्येक कार्यालय की होनी चाहिए जिसका प्रमुख आईएएस होता है । और यदि वास्तव में ऐसा नहीं होता या कम हो रहा है तो फिर शायद इन पदों का इतना महिमा मंडन आखिर किस आधार पर किया जाता है
यदि यह आधार मात्र परीक्षा में बैठने और चयनित होने वालों की संख्या पर ही निर्भर करता है तो भी विचार करने वाली बात है क्योंकि इस परीक्षा में बैठने की शैक्षिक योग्यता मात्र स्नातक ही होती है तो ऐसे में बहुत से युवा तो कई बार इस परीक्षा का पैटर्न ही देखने के उद्देश्य से बैठ जाते होंगे और यदि यह मानक इस परीक्षा के कठिनाई के आधार पर होता है तो देखना होगा कि क्या अन्य परीक्षाएं जैसे कि कैट है या फिर वैज्ञानिक बनने में लगने वाली मेहनत और लंबी पढ़ाई इस परीक्षा के सामने कम तर होती होंगी ?
वैसे पिछले कुछ ही वर्षों में वहा भी शायद हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी के ही कार्यों से आज की पीढ़ी इसरो के वैज्ञानिकों को भी जानने पहचानने लगी है कहीं न कहीं उनकी मन की बात कार्यक्रमों में समाज के ऐसे लोगों का भी जिक्र होता है जो कि चमक दमक से दूर रह कर अपना समाज सेवा का कार्य कर रहे हैं और बड़ी संख्या में आम जन के जीवन में परिवर्तन ला रहे हैं । ऐसे में मात्र एक या दो पदों को ही हर प्रकार का महत्व प्रदान करना कहीं न कहीं बड़ी संख्या में अन्य परीक्षाओं और अन्य सेवाओं में जाने वाले तथा स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ने वाले युवाओं या ऐसी इच्छा रखने वाले युवाओं हेतु उचित प्रतीत नहीं होता ।