वर्ष 1984 इंदिरा जी की हत्या उस समय मैं कक्षा 6 में गांव से 5 किलोमीटर दूर शहर के स्कूल जाया करता था, पता चला कि हत्या सरदारों ने की है तो उनके खिलाफ लोगों का गुस्सा भड़क उठा,उस समय शायद 01 महीना हम स्कूल नहीं जा सके थे तथा साथ ही पढ़ने वाली लड़की मनमीत कौर का शो रूम भी नुकसान होते देखने को मिला । इसी समय पंजाब से गैर सिख मारे जाने शुरू हुए जिनमे हमारे एक फूफा जी को भी हत्या सिख आतंकवादियों ने कर दी जो पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ में प्रोफेसर थे और जिनको कई बार धमकी मिल चुकी थी कि तुम हिन्दू हो पंजाब छोड़ दो नहीं तो मारे जाओगे । इधर पंजाब और उधर कश्मीर से कम संख्या वाले हिंदुओं पर अत्याचार होना शुरू हुआ तो पता चला कि हिन्दू संख्या में जहां कम होते हैं उन्हें वहां से मार पीट कर भगाया जा रहा है । बाबरी मस्जिद के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी हिंदुओं के खिलाफ दंगे भड़क उठे और तब पता चला कि हिन्दू नाम का भी कोई धर्म है जिसको किसी राज्य से भगाया जा रहा है ।
वर्ष 1989 और 90 में कश्मीर से कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हुआ, खबरें अखबारों में आती रहती थी, पर उनको भी हिन्दू नहीं बोला गया बस पंडित ही लिखा जाता था । वर्ष 1980 के मुरादाबाद के हिन्दू मुस्लिम दंगे, वर्ष 1987 के मेरठ के दंगे अखबारों में पढ़ लिए थे । वर्ष 1988 की एक सर्द सुबह मैं स्कूल जा रहा था तभी एक दीवार पर कुछ पोस्टर चिपके दिखाई दिए जो कुछ बाबरी मस्जिद एक्शन समिति की तरफ से चिपकाए गए थे जिससे पता चला कि कोई मस्जिद है जिस पर कुछ विवाद है । इधर तब तक कक्षा 12 में आ ही चुका था और तब तक राम जन्म भूमि की समस्या भी पता चल चुकी थी । इसी बीच क्रिकेट देखते तो 1986 से ही शारजाह में होने वाले क्रिकेट मैच में तो उत्साह चरम पर होता था । समय गुजरा 1992 में अयोधया में ढांचा गिरा और 1993 में बॉम्बे में दंगे भड़क उठे और फिर बॉम्बे में बम ब्लास्ट भी हुए । बाबरी ढांचे की घटना के ही समय मुझे गोआ से मद्रास डयूटी पर ट्रेन से जाना पड़ गया था अकेले ही पर रास्ते मे कोई दिक्कत नहीं हुई मैं रामेश्वरम सही सलामत पहुंच गया था । इसी बीच पता चला कि बाबरी मस्जिद टूटने के बाद इसका बदला लेने के लिए दंगे हुए और बम ब्लास्ट भी जिनमे दाऊद इब्राहिम का हाथ बताया गया । इस समय तक आते आते यह पता चलना शुरू हुआ कि मैं ब्राह्मण होने के साथ ही साथ एक हिन्दू भी हूं । खैर अब थोड़ा वर्तमान समय की और बढ़ते हैं । मुझे जिज्ञासा हुई कि आखिर यह हिन्दू शब्द आया कहाँ से होगा तो किताबों में लिखा हुआ पाया कि विदेशियों द्वारा सिंधु नदी के इस पार होने के कारण यहां के निवासियों को हिन्दू कह दिया गया और इस भूभाग को हिंदुस्तान बोल दिया गया । यानी हिन्दू शब्द हमे विदेशियों क
का दिया हुआ है तो फिर विदेशियों के यहां आने से पहले हमको क्या बोला जाता होगा इस पर इतिहास में कुछ भी नहीं मिलता । सिंधु घाटी सभ्यता, वैदिक काल का तो जिक्र है काफी पुराने राजवंशों का भी जिक्र है किंतु यह कहीं नहीं बताया गया कि उस समय धर्म कौन सा प्रचलित था । जैन धर्म बताया गया है, बौद्ध धर्म बताया गया है, इस्लाम धर्म, इसाई धर्म,पारसी, यहूदी सभी धर्म बताए गए, इनकी पवित्र पुस्तक भी बताई गई इनके संस्थापक भी बताए गए पर हिन्दू धर्म की न तो कोई पवित्र पुस्तक किसी भी पाठ में बताई गयी और न ही इसके कोई संस्थापक ही बताए गए । और अगर अन्य धर्मों की ही भांति इसे भी धर्म बता दिया गया तो इस धर्म का क्यों कोई इतिहास नहीं है और यदि कोई इतिहास है तो वह लिखा क्यों नहीं गया और पढ़ाया क्यों नहीं गया । क्या हिन्दू नामक शब्द को हम पर मात्र इस कारण से थोप दिया गया कि इस्लाम है, जैन है, बौद्ध है, इसाई है, यहूदी है, पारसी है तो कुछ तो इन लोगों का भी होना चाहिए चलो जब इन्ही को नहीं मालूम कि ये क्या हैं तो इनको हिन्दू ही बोल दो और साहब हम हिन्दू कहलाये जाने लगे ।
अभी एक दिन इंटरनेट पर श्री विकास दिव्यकीर्ति जी को सुन रहा था जिन्होंने संविधान के हिसाब से हिन्दू शब्द की व्याख्या की थी जिसके अनुसार जो व्यक्ति मुस्लिम, ईसाई, पारसी, यहूदी नहीं है वह हिन्दू है और जिसमे जैन, बौद्ध, सिख भी शामिल हैं यानि जो धर्म इस भूमि पर फले फूले वह सब हिन्दू कहलाये जा सकते हैं व जिन धर्मों का उद्गम इस भूमि से बाहर का रहा वह अन्य धर्म कहलाये गए । यहां यह जानना भी रोचक है कि संविधान के मुताबिक अनुसूचित जातियां मात्र हिन्दू, सिख और बौद्ध धर्म मे ही पाई जा सकती हैं । इनके अलावा किसी और धर्म मे नहीं ।
पर यहीं एक बहुत ही मजे की बात हुई कि इसी देश के एक बहुत बड़े वर्ग को इस हिन्दू शब्द से बाहर रख दिया गया और इस बड़े वर्ग को नाम दिया गया अनुसूचित जनजाति यानी ST या ट्राइबल । यहां यह समझ नहीं आ सका कि किस आधार पर इस बड़े वर्ग को हिन्दू नहीं माना गया और जिनको हिन्दू मान लिया गया उन्हें हिन्दू किस आधार पर मान लिया गया होगा । इतिहास इस पर भी मौन है । क्या यह आधार पूजा पद्धति था या जीवन शैली यह भी कुछ परिभाषित नहीं है । यदि इस वर्ग को भी हिन्दू मान लिए जाने के बाद इस वर्ग का आरक्षण भी दे ही दिया जाता तो क्या बिगड़ जाता यानि इसी देश के एक बहुत बड़े वर्ग को धर्मांतरण होने के लिए उनके हाल पर छोड़ दिया गया । धर्मांतरण क्या करता है यह एक परंपरा, विश्वास, जीवन पद्धति जो कि सदियों के संघर्ष में बाद विकसित हुई को एक ही क्षण में छिन्न भिन्न कर एक इतिहास का विनाश कर देता है । एक जीवन शैली जो विशिष्ट भगौलिक स्थिति में रहने, खान, पान, संस्कार से पनपी एक ही झटके में समाप्त कर दी गयी और फिर वह इतिहास के पन्नों में कहीं विलुप्त हो गयी । और धर्मांतरण क्या कह कर किया जाता है कि अमुक भगवान कुछ नहीं है मात्र अंधविश्वास है और अमुक गॉड बहुत कुछ है इसको मान लेने से बहुत लाभ हो सकता है । यानी उनको उनके ही हाल पर नहीं छोड़ा जाता । यदि किसी विशेष धर्म से जुड़ना ही दुनिया की सबसे बड़ी उपलब्धि है तो मेरे विचार से हमारे ही देश के अंडमान द्वीप पर आज भी ऐसे मनुष्य निवास करते हैं जिनके बारे में कोई कुछ नहीं जानता, जिनका बाहरी दुनिया से अभी तक भी कोई संपर्क नहीं हुआ और जो न जाने कितने ही हजार वर्षों से अपने ही जंगल मे अपना जीवन गुजार रहे हैं, हो सकता है उनका भी अपना कोई देवता हो और उस देवता पर उन्हें विश्वास भी हो और उसी विश्वास के सहारे हम तथाकथित सभ्य कहलाये जाने वाले समाज की ही भांति उनका भी अस्तित्व बचा है और चल भी रहा है । अभी पिछले ही साल एक सिरफिरा वहां भी चल दिया था उनको भी ईसाई बनाये जाने के चक्कर मे जिसे उन्होंने टापू पर पहुंचते ही मार दिया था ।
अंडमान की इस आदिम जाति को देखने से पता चल सकता है कि मनुष्य के जीने और मरने के बीच के समय पर धर्म का कोई खास फर्क नहीं पड़ता, शायद धर्म एक अत्यंत ही निजी अनुभव है जो किसी को कहीं भी कैसे भी हो सकता है । सभी का अपना अपना सिस्टम है जिसे जो अच्छा लगा मान लिया और अपने हिसाब से अपने इष्ट देव को पूज लिया । पर ऐसा दिखाई नहीं देता, देखने मे तो यही आता है कि मैं जिस धर्म को मानने वाला बताया जाता हूँ उसकी लाख बुराई बता दी जाती हैं, उसे बुरे से बुरा बता दिया जाता है और कहीं न कहीं गलत ही ठहरा दिया जाता है । आआख़िर इसकी जरूरत पड़ी ही क्यों, क्या एक लाइन को छोटा दिखाए जाने के लिए उससे बड़ी लाइन नहीं खींची जानी चाहिए या फिर पहले की खींची गई लाइन को बल पूर्वक मिटा कर बाद की खींची गई लाइन से छोटा कर दिया जाना चाहिए । शायद आज यही किया जा रहा है व यही होता दिखाई दे भी रहा है । मुझे गलत सिद्ध करने के रास्ते ईजाद किये जा रहे हैं, झूठ फैलाया जा रहा है और कहीं न कहीं इस लाइन को मिटाए जाने का कुचक्र भी चल रहा है । धर्म यदि एक जीवन शैली है तो इसका विकास भी अचानक से नहीं हो गया सदियों लगी होंगी, कुछ विचार जरूर आये होंगे लोगों के मन में जिनके कारण ही एक पद्धति और जीवन शैली विकसित हुई होगी और जिस समय यह विकसित हुई होगी उस समय की यही जरूरत भी रही होगी, समय के साथ ही साथ इसमे भी बदलाव आए और जहां तक मुझे जान पड़ता है कि हिन्दू धर्म ने जितना सुधार अपने अंदर किया शायद ही किसी अन्य धर्म ने किया होगा । हमने हर आधुनिक बात को सहज ही अपना लिया, हमने अंग्रेजी भी सीखी, अपना पहनावा भी बदल लिया, अपना खान पान, जीवन शैली भी वक्त के साथ बदल ली, और तो और अपने धार्मिक स्थल जाकर पूजा करना भी छोड़ दिया वहीं किसी धर्म मे रविवार की प्रेयर और शुक्रवार की नमाज के बहुत अधिक महत्व है हमने अपनी नई पीढ़ी को कभी कुछ नहीं सिखाया या बताया कि तुमको अमुक दिन तो मंदिर जरूर जाना चाहिए । कोई चला गया तो ठीक और नहीं भी गया तो भी ठीक । हमने अपनी पीढ़ी को कोई भी धार्मिक चिन्ह चुनकर पहनने को नहीं बोला,किसी ने जनेऊ पहन लिया, टीका लगा लिया, चुटिया रख ली तब ठीक नहीं रखी तब ठीक । हमारे मंदिर में प्रवेश की भी कोई बंदिश नहीं, स्त्रियां खुद ही अपना सर ढक लेती हैं यदि नहीं भी ढकती तो कोई पुजारी या पहरेदार उनको कुछ नहीं बोलता न ही कोई बड़ा सा भाला लिए उनको डराता कि सर पर पटका नहीं है या सर ढाका नहीं है । इतना उदार होने के बाद भी हमें ही intolerance कह दिया जाता है तो लगता है कि हिन्द महासागर में डूब मरना ही हमारी नियति है । हम अपने मंदिरों को अपनी निजी कमाई का दान देते हैं उस पर भी सरकार की और न जाने किस किस भी नजर लगी रहती है, और आये दिन मंदिरों की हुंडी तोड़ कर न जाने कहाँ कहाँ उनका पैसा बांट दिया जाता है और फिर भी हमको ही स्वार्थी भी बोल दिया जाता है ।
इस सबको देखने से यह भी पता चलता है कि विदेशी हमलों से पहले अपने आपको बिना हिन्दू समझे ही हमारा काम चल रहा था, हम श्रम व्यवस्था का पालन करते हुए एक ऐसा सामाजिक जीवन बिता रहे थे जिसमें हर हाथ को रोजगार था और हर सर पर छत भी थी । आज के सरकारी नौकरियों की ही भांति ABCD ग्रुप जैसे ही 4 वर्ण भी उस समय की जरूरत के हिसाब से बन गए होंगे और आज की ही IPC CrPC और विभिन्न कर्मचारी आचरण नियमावली व सरकारी सेवक अनुशासन व अपील नियमावली जैसी ही स्मृति बनी होंगी जिनका नाम आज बड़ा ही बदनाम कर दिया गया है । आज समूह क या ग्रुप A उसमे भी IAS के क्लब में मेरे जैसा समूह ख या ग्रुप B का अधिकारी प्रवेश नहीं कर सकता और न ही उनके जैसी सुख सुविधा प्राप्त कर सकता और कदाचित आने वाले इतिहास में इन व्यबस्थाओं को भी स्मृतियों की ही भांति कोसा जाएगा और इस व्यवस्था को भी भेदभावपूर्ण बताया जाएगा ।
विदेशी आये और उन्होंने पाया कि हम उनसे अलग से हैं तो उन्होंने हमारे पूजा स्थलों को तोड़ा, उनको लूटा, नष्ट भृष्ट किया और डराया धमकाया और बोले कि तुम असभ्य हो पत्थर की पूजा करते हो हमारा अल्लाह या गॉड ही असली भगवान है उसी को मानो । इस डर व प्रलोभन से काफी लोगों ने अपना लंबा सदियों का इतिहास छोड़ कर अपने को बदल भी लिया । इधर अंग्रेज आये और अपने साथ मिशनरी लाये जिन्होंने पहले अस्पताल खोले, फिर स्कूल और गरीब दीन हीन धर्म विहीन लोगों को बताया कि तुम जब तक जीसस को नहीं मानोगे स्वर्ग में नहीं जा पाओगे और बड़े पैमाने पर जंगलों में निवास कर रही एक बहुत बड़ी आबादी को एक झटके में इसाई बना दिया और इनका खेल आज भी बदस्तूर जारी है । ये लोग जो सदियों से हमारा ही हिस्सा थे और चूंकि हमारा विश्वास भी था कि एकोहम ब्रह्म, बहुधा वदन्ति तो हमने उन्हें नहीं बताया कि तुम्हारी पूजा पद्धति गलत है तुम यज्ञ करो, संस्कार करो यानी हिन्दू बनो क्योंकि यह एक अटूट विश्वास आज भी है कि यदि कोई एक सर्वशक्तिमान है तो उस तक पहुंचने के अनेकों मार्ग हैं, उसके अनेकों नाम भी हैं और जिसे जो मार्ग अच्छा लगता है वह उसका अनुसरण करते हुए उस तक पहुंच ही जायेगा । शायद अपने विशिष्ट इष्ट देव में आस्था रखे जाने के ही कारण मत तो प्रचलित थे किंतु तब भी हम हिन्दू थे या नहीं थे यह कोई नहीं जानता । हम शैव थे, वैष्णव थे, चार्वाक भी थे, नाग, किरात, किन्नर, भोट, भील, मुंडा तथा न जाने क्या क्या थे पर हिन्दू शायद हमें विदेशियों ने ही बताया । ये आये और इन्हें हमारा सब कुछ अपने से अलग लगा और चूंकि वह सब विजेता थे तो उन्होंने अपना सब हम पर थोपा । मुझे बुत परस्त बोला गया, पगान बोला गया, infidel बोला गया, non believer बोला गया, हिन्दू भी बोला ही गया और मुझे समय समय पर मेरे धार्मिक काम करने पर जजिया टैक्स लगाया गया, युद्ध मे जीती गयी स्त्रियों war booty को अपने शील की रक्षा के लिए जौहर करने पर मजबूर किया गया, पर्दा प्रथा आयी, बालविवाह भी अपनी स्त्रियों की रक्षा हेतु अपनाए गए और न जाने क्या क्या करना पड़ा, अपने धर्म और अपने प्राण बचाने हेतु हिमालय की कंदराओं में जाकर कठिन जीवन भी जीना पड़ा और यदि आज मैं अपने को इस नाम से जो मुझे दूसरों का ही दिया है पुकारता हूं तो मुझे फ़ासिस्ट, supremacist, रेसिस्ट न जाने क्या क्या कह दिया जाता है ।
हम आपस मे ही लड़ झगड़ लिया करते थे और अपने झगड़े निपटा भी लिया करते थे पर विदेशी आगमन तक भी हम शायद हिन्दू नहीं कहलाये जाते थे । जो लोग बाहर से आये उन्होंने हमारा जीवन अपने से अलग देख हमे कदाचित यह नाम दे दिया । यानी हम सभी वर्णों व जातियों के अंदर कोई तो समानता रही होगी जिस कारण उन लोगों ने हम सभी को इस एक ही नाम हिन्दू से पुकारना उचित समझा जिसे हमने कालांतर में अपना भी लिया ।
रजाकारों, मोपलो और डायरेक्ट एक्शन डे के बाद विभाजन की महान त्रासदी देख मैं भी लुटा, पिटा सा आज़ादी को बड़ी ही उत्सुकता से देख रहा था कि चलो किसी को तो किसी धर्म के नाम पर एक क्या आज तो दो देश ही मिल गए मुझे क्या मिलेगा ?? मुझे मिली धर्म निरपेक्षता और यह सीख कि अब तुम हिन्दू नहीं हो और अगर अपने को ऐसा बोलोगे तो पिछड़े, अनपढ़ और गंवार कहलाये जाओगे, मेरे मंदिरों का चढ़ावा अब सरकार का होगा जिसे मैं टैक्स अलग से देता हूँ, अल्पसंख्यक आयोग भी बन गया जैसे कि मैं बहुसंख्यक हूं तो पता नहीं क्या नहीं कर दूंगा और अब तो हाल में एक PIL भी लगी है कि इसी देश के 8 राज्यों में मैं भी अल्पसंख्यक हो गया हूँ तो मेरी भी रक्षा की जाय अब पता नहीं सम्मानित ऐसे लोग सुनते भी हैं या नहीं जिनके पूर्वज सदियों पहले ईरान से खदेड़े गए और उनको यहीं शरण मिली फुले फले और आज इसी देश की सदियों पहले की लिखी बातों की निंदा भी कर रहे हैं । ऐसे लोग मुझे क्या न्याय देंगे जिन्हें मेरी विरासत पर ही संदेह है ।
इस धर्म निरपेक्षता ने एक काम और भी किया अन्य धर्मों और मजहबो को तो अपनी धर्म और संस्कृति व भाषा की रक्षा हेतु मदरसे और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान खोलने की विधि सम्मत अनुमति दे दी पर मुझे बोल दिया तुम धर्म निरपेक्ष ही बने रहो, और तो और शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत मेरे बच्चों को किसी भी माइनॉरिटी के स्कूल में दाखिले से भी वंचित रख दिया गया भले ही वह सिर्फ नाम का ही माइनॉरिटी राह गया हो क्योंकि ऐसे हजारों कान्वेंट स्कूल इस देश मे चल रहे हैं जिनमे अमीर मेजोरिटी का बच्चा तो ऊंची फीस देकर पढ़ सकता है किंतु कोई गरीब बच्चे वहां मात्र इसलिए एडमिशन नहीं ले सकता कि उसे RTE से मुक्त रख दिया गया है ।
मैंने लोकतंत्र पर भी विश्वास जताया और एक पार्टी को वोट देना शुरू किया जो मेरे हितों की रक्षा करेगी और कल ही इसी देश के एक राज्य के चुनाव नतीजे आये और जीती हुई पार्टी ने इस पार्टी के लोगों को सिर्फ इसलिए मारना, औरतों का बलात्कार करना शुरू कर दिया कि उनके द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेते हुए अपने मन से किसी पार्टी को वोट किया था । आज यह दशा मेरी एक राज्य में हो रही है न जाने आने वाले समय मे कितनों में होगी ।
मैं कभी कट्टर नहीं था, मेरे मत मतांतर थे, लोग बोलते हैं कि 33 करोड़ तो मेरे देवी देवता ही हुआ करते थे और तो और जिस औरत को पर्दे में रखना मुनासिब समझा जाता है उस स्त्री को तो मैंने बचपन से ज्ञान की देवी, वैभव की देवी और वीर रूपिणी देवी के रूप में भी पूजना सीख लिया था । बड़े ही आश्चर्य की बात है कि अन्य सभी धर्मों के तो सारे के सारे पूजनीय पुरुष ही हैं और मुझे ही बोला जाता है कि तुम्हारे यहां तो औरतों को भी आज़ादी नहीं है । अब मैं कहाँ जाऊं और किसको अपनी पीड़ा बताऊं । मेरे शब्दकोश में तो ईश निंदा या ब्लासफेमी जैसा कुछ था ही नहीं, न ही inquisition जैसा ही कुछ हुआ, सब मस्त रहे फले, फुले अपने हिसाब से हमने तो ऋण कृत्वा, घृतम पिबैत बोलने वाले चार्वाक को भी महात्मा ही बोला, वसुधैव कुटुम्बकम बोलने वालों को आज असहिष्णु बोला जा रहा है । अब तो कहीं ठौर ठिकाना ही नहीं है मेरा ।
विडंबना किन्तु यही रही कि सदियां गुजर गई, इस देश का इतिहास भी बदल गया और भूगोल भी किन्तु हम एक न हो पाए । यदि आज भी नहीं जागे तो फिर इतिहास ही बन कर रह जाएंगे आख़िर बचा भी क्या हमारे पास अपना यही एक देश जिसके पहले ही 3 हिस्से हो चुके हैं और आने वाले समय मे और भी न जाने कितने हो सकते हैं । इसमे हमारा भी क्या कोई हिस्सा बचेगा यह तो आने वाली पीढियां ही इतिहास में पढ़ेंगी । यह भी हो सकता है कि वर्ष 2050 तक सम्पूर्ण विश्व मे हमारी यह एकमात्र आश्रयस्थली भारत ही हमसे छीन ली जाय और यह 21 वी शताब्दी इस महान व प्राचीन परंपरा की अंतिम शताब्दी ही सिद्ध हो ।