चुनाव का
निशान, हल जोतता हुआ किसानझूठ बोले कव्वा काटे, काले कव्वे से डरियो, इंदिरा नसबंदी करवा देगी तुम देखते रहियो
उन दिनों चुनाव प्रचार काफी शोर शराबे से युक्त हुआ करता था, गांव गांव में पार्टियां अपने झंडे, बिल्ले इत्यादि बांटा करती थी, हम बच्चे सारी ही पार्टियों के बिल्ले इकठ्ठा कर लिया करते थे । वर्ष 1984 की एक बहुत ही बड़ी घटना हमारे सामने घटित हुई जो थी देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी की हत्या । उस वर्ष मैं कक्षा 6 में था तथा गांव से ज्वालापुर पढ़ने जाया करता था, उस सुबह मैं और मेरे चचेरे भाई हम दोनों अपनी चक्की में कंचे खेल रहे थे, कि अचानक से लोगों के घरों व घेरों के फाटक बंद होने शुरू हो गए । बहुत देर बाद शायद TV या रेडियो पर पता चला कि दिल्ली में यह घटना घट गई है तथा इसके बाद शहर शहर हिंसा भड़क गई है । उस समय लगभग 15 दिन तक हम बच्चे घर ही रहे स्कूल नहीं जा पाए । मुझे याद आता है कि स्वर्गीय प्रधानमंत्री जी की अंतिम यात्रा का सीधा प्रसारण tv पर हुआ था तथा हमारे घर में तिल रखने तक की जगह नहीं बची क्योंकि अंतिम यात्रा को देखने के लिए बहुत से लोग ज्यादातर महिलाएं एकत्र हुए जो कि ज्यादातर रो भी रही थी । शायद उन दिनों इंदिरा जी का देश के जनमानस पर बहुत बड़ा प्रभाव था जिसके कारण लोग विशेषकर महिलाएं उनसे जुड़ाव महसूस करती होंगी । इस घटना की स्मृति अभी तक भी ताजा है । बाद के दिनों में स्वर्गीय किसान नेता श्री महेंद्र सिंह टिकैत जी द्वारा मेरठ में चलाए गए आंदोलन में हमारे गांव से भी काफी व्यक्ति गए व 10 से 15 दिन वहीं रहे । मुझे भी एक बार श्री टिकैत का भाषण सुनने का अवसर मिला जब उनका कोई कार्यक्रम था और गांव से ही काफी लोग ट्रेक्टर ट्राली में जा रहे थे तो मैं भी चल दिया था तथा शाम को हम अपने गांव वापस आ गए थे । इसके अतिरिक्त शायद एक बार हरिद्वार में अपनी मृत्यु से पहले इंदिरा जी हरिद्वार किसी जनसभा में आई थी तो पिताजी व एक मामा जी के साथ साईकल पर उनका भाषण सुनने हम भी गए थे किंतु वह भाषण मुझे ज्यादा याद नहीं रहा ।
इसी बीच में स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी से बहुत प्रभावित हुआ और मुझे याद आता है जब मेरी NCC B सर्टिफिकेट की परीक्षा थी तो मौखिक में सैन्य अधिकारी महोदय द्वारा मुझस मेरेे प्रिय नेता के विषय में पूछा गया तो मेरे द्वारा श्री वाजपेयी जी का ही नाम लिया गया । इन्हीं दिनों शायद जब श्री राजीव गांधी जी देश के प्रधानमंत्री थे तो उनके द्वारा दिल्ली में एक बहुत बड़ी रैल्ली का आयोजन किया गया जिसमे कि गांव गांव रोडवेज की बसें लोगों को दिल्ली ले जाने के लिए भेजी गई, मैं भी उस बस में बैठ लिया और दिल्ली तक हो आया था । लेकिन उनका भाषण सुना ही नहीं, और पता नहीं मैं और मेरे चाचा जी का लड़का हम कहाँ घूमते रहे । वह मेरी पहली दिल्ली यात्रा थी, शायद सर्दियों का समय था, बस रात को गांव से चली और सुबह सुबह दिल्ली पहुंच गई व वहां से दोपहर चल कर फिर रात तक वापस गांव आ गयी । 200 किलोमीटर का सफर 6 से 8 घंटे में पूरा हुआ । किन्तु यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि मैं इतनी दूर चला कैसे गया हालांकि चाचा जी भी गए थे किंतु में उनके पास बैठा ही नहीं था । और न ही दिल्ली में उनके साथ रहा । ज्यादा सदस्य संख्या वाले परिवारों के लोग अपने बच्चों की ज्यादा चिंता नहीं करते ।