Thursday, April 2, 2020

बचपन की राजनैतिक समझ

किसान परिवार से होने के कारण हमारे  परिवार में राजनीति की ज्यादा कोई चर्चा नहीं करता था, हम बच्चों को भी इस विषय मे ज्यादा कुछ नहीं पता चलता था । किंतु बचपन की एक बात मुझे जरूर याद रही शायद कोई से चुनाव ही हुए होंगे जिनके प्रचार हेतु शहर से लाउडस्पीकर लगी हुई जीप गांव तक भी आ जाया करती थी, जिनमे दो नारे व एक गीत मुझे आज भी याद है जो उन पर बजाया जाता था ।

चुनाव का

निशान, हल जोतता हुआ किसान

झूठ बोले कव्वा काटे, काले कव्वे से डरियो, इंदिरा नसबंदी करवा देगी तुम देखते रहियो

उन दिनों चुनाव प्रचार काफी शोर शराबे से युक्त हुआ करता था, गांव गांव में पार्टियां अपने झंडे, बिल्ले इत्यादि बांटा करती थी, हम बच्चे सारी ही पार्टियों के बिल्ले इकठ्ठा कर लिया करते थे । वर्ष 1984 की एक बहुत ही बड़ी घटना हमारे सामने घटित हुई जो थी देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी की हत्या । उस वर्ष मैं कक्षा 6 में था तथा गांव से ज्वालापुर पढ़ने जाया करता था, उस सुबह मैं और मेरे चचेरे भाई हम दोनों अपनी चक्की में कंचे खेल रहे थे, कि अचानक से लोगों के घरों व घेरों के फाटक बंद होने शुरू हो गए । बहुत देर बाद शायद TV या रेडियो पर पता चला कि दिल्ली में यह घटना घट गई है तथा इसके बाद शहर शहर हिंसा भड़क गई है । उस समय लगभग 15 दिन तक हम बच्चे घर ही रहे स्कूल नहीं जा पाए । मुझे याद आता है कि स्वर्गीय प्रधानमंत्री जी की अंतिम यात्रा का सीधा प्रसारण tv पर हुआ था तथा हमारे घर में तिल रखने तक की जगह नहीं बची क्योंकि अंतिम यात्रा को देखने के लिए बहुत से लोग ज्यादातर महिलाएं एकत्र हुए जो कि ज्यादातर रो भी रही थी । शायद उन दिनों इंदिरा जी का देश के जनमानस पर बहुत बड़ा प्रभाव था जिसके कारण लोग विशेषकर महिलाएं उनसे जुड़ाव महसूस करती होंगी । इस घटना की स्मृति अभी तक भी ताजा है । बाद के दिनों में स्वर्गीय किसान नेता श्री महेंद्र सिंह टिकैत जी द्वारा मेरठ में चलाए गए आंदोलन में हमारे गांव से भी काफी व्यक्ति गए व 10 से 15 दिन वहीं रहे । मुझे भी एक बार श्री टिकैत का भाषण सुनने का अवसर मिला जब उनका कोई कार्यक्रम था और गांव से ही काफी लोग ट्रेक्टर ट्राली में जा रहे थे तो मैं भी चल दिया था तथा शाम को हम अपने गांव वापस आ गए थे । इसके अतिरिक्त शायद एक बार हरिद्वार में अपनी मृत्यु से पहले इंदिरा जी हरिद्वार किसी जनसभा में आई थी तो पिताजी व एक मामा जी के साथ साईकल पर उनका भाषण सुनने हम भी गए थे किंतु वह भाषण मुझे ज्यादा याद नहीं रहा । 





इसी बीच में स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी से बहुत प्रभावित हुआ और मुझे याद आता है जब मेरी NCC B सर्टिफिकेट की परीक्षा थी तो मौखिक में सैन्य अधिकारी महोदय द्वारा मुझस मेरेे प्रिय नेता के विषय में  पूछा गया तो मेरे द्वारा श्री वाजपेयी जी का ही नाम लिया गया । इन्हीं दिनों शायद जब श्री राजीव गांधी जी देश के प्रधानमंत्री थे तो उनके द्वारा दिल्ली में एक बहुत बड़ी रैल्ली का आयोजन किया गया जिसमे कि गांव गांव रोडवेज की बसें लोगों को दिल्ली ले जाने के लिए भेजी गई, मैं भी उस बस में बैठ लिया और दिल्ली तक हो आया था । लेकिन उनका भाषण सुना ही नहीं, और पता नहीं मैं और मेरे चाचा जी का लड़का हम कहाँ घूमते रहे । वह मेरी पहली दिल्ली यात्रा थी, शायद सर्दियों का समय था, बस रात को गांव से चली और सुबह सुबह दिल्ली पहुंच गई व वहां से दोपहर चल कर फिर रात तक वापस गांव आ गयी । 200 किलोमीटर का सफर 6 से 8 घंटे में पूरा हुआ । किन्तु यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि मैं इतनी दूर चला कैसे गया हालांकि चाचा जी भी गए थे किंतु में उनके पास बैठा ही नहीं था । और न ही दिल्ली में उनके साथ रहा । ज्यादा सदस्य संख्या वाले परिवारों के लोग अपने बच्चों की ज्यादा चिंता नहीं करते ।


गांव में बीता बचपन व कक्षा 5 तक की शिक्षा

हमारा परिवार गांव के अन्य परिवारों की ही भांति एक संयुक्त परिवार था, जिसमे करीब 20 से 30 सदस्य प्रतिदिन एक ही चूल्हे पर बना भोजन करते थे । खाना चूल्हे पर ही बना करता था तथा सर्दी के दिनों में रसोई में चूल्हे के ही पास बैठकर खाना खाने का अपना ही एक सुख था । उस समय हमारे गांव में 03 सरकारी स्कूल थे जिनमे 02 सरकारी प्राइमरी स्कूल जो कि कक्षा 5 तक थे, मंदिर के पास वाला प्राइमरी स्कूल कन्या पाठशाला बोला जाता था जिसमे लड़कियां पढ़ा करती थी तथा जोहड़ के पास वाले में लड़के । इन दोनों के अलावा तीसरा स्कूल जूनियर हाई स्कूल था जो कि कक्षा 6 से 8 तक था तथा इसमें आसपास के गांव से भी बच्चे पढ़ने आया करते थे । उन दिनों सरकारी प्राइमरी स्कूलों में कक्षा 5 तक अंग्रेजी भाषा नहीं पढ़ाई जाती थी तथा इन स्कूलों में पढ़े बच्चों का अंग्रेजी भाषा से पहला परिचय कक्षा 6 में ही हुआ करता था । हालांकि शहरों में ऐसे स्कूल भी खुल चुके थे जिनका माध्यम तो हिंदी ही था किंतु उनमें अंग्रेजी शायद कक्षा नर्सरी, lkg व ukg से ही पढ़ाई जाने लगी थी ।

इसी क्रम हमारे गांव में भी पहला प्राइवेट मोंटेसरी स्कूल उन्ही दिनों  खुला । हरिद्वार से 03 महिला शिक्षिका आया करती थी, जिनको हम मैडम नहीं ऑन्टी जी बोला करते थे । यह बात मुझे समझ नहीं आयी कि हमारी मैडमों ने हम बच्चों को मैडम के स्थान पर ऑन्टी क्यों कहलवाया जाना उचित समझा होगा । मेरा भी दाखिला इस स्कूल में ही कराया गया जिसका अपना कोई भवन नहीं था । उन दिनों शायद 10 रुपये प्रति माह की फीस पर यह स्कूल प्रारम्भ हुआ जिसमें हम गांव के बच्चों को नर्सरी से ही अंग्रेजी भाषा की जानकारी मिलनी शुरू हो गयी । यह स्कूल हमारे 05 वर्षों के दौरान गांव में अलग अलग जगहों पर संचालित हुआ, कभी किसी के घेर में, किसी की बैठक पर चलता रहा । जब मेरा प्रवेश इसमे हुआ तो इसका नाम ग्रामीण बाल कल्याण केंद्र था बाद में इसका नाम ग्रामीण बाल विकास केंद्र हो गया ।

स्कूल में कभी कभी कोई सज्जन बाहर से किसी शहर से भी आते थे जिन्हें हमको बताया गया कि ये मंत्री जी हैं । राजनैतिक मंत्री न होकर शायद किसी संस्था के मंत्री होते होंगे तथा शायद उनकी ही संस्था के द्वारा हमारा स्कूल चलाया जाता था । हमें जिन 03 मैडमों द्वारा पढ़ाया गया उनके नाम शोभा ऑन्टी, शक्ति ऑन्टी व लवली आंटी थे, में आज भी उनके समर्पण व कठिन मेहनत को याद करता हूँ, कैसे भी खराब मौसम में ये तीनों प्रतिदिन रेल से हरिद्वार से गांव आकर हम बच्चों को पढ़ा कर वापस रेल से ही हरिद्वार चली जाया करती थी । इस स्कूल में हम काफी बच्चे पढ़ते थे और मुझे याद आता है जब गांव ही के राजेन्द्र डॉक्टर जी के घर हमारा स्कूल चलता था तो उसी समय हम सभी बच्चों का एक ग्रुप फ़ोटो खींचा गया था जो हम सभी बच्चों को दिया गया, यह फोटो काफी समय तक तो घर मे दिखाई दिया किन्तु वर्तमान में यह फोटो मेरे पास नहीं है । इस स्कूल में हम अंग्रेजी भाषा ही अंग्रेजी में पढ़ते थे शेष सभी विषय हिंदी में ही पढ़ाये जाते थे । मुझे याद है कि हम सभी बच्चों कक्षा 5 की बोर्ड की परीक्षा दिलाये जाने हेतु गांव के ही प्राइमरी स्कूल ले जाया गया कदाचित हमारे स्कूल की अपनी कोई मान्यता नहीं रही होगी या फिर उन दिनों प्राइवेट स्कूलों के लिए भी कक्षा 5 की बोर्ड की ही परीक्षा रखी जाती होगी । इस स्कूल में हम बच्चों को दोपहर के समय आधी छुट्टी में चने, मुरमुरे, नमकीन, कभी कभी खिचड़ी इत्यादि भी दी जाती थी जिसे हम बच्चे नाश्ता बोला करते थे । स्कूल में हमारे ही गांव की निवासी हमारी आया होती थी जो कि हम बच्चों का ध्यान रखती थी । मुझे याद है कि प्रसिद्ध हिंदी फिल्म गांधी भी शायद उन्हीं दिनों रिलीस हुई होगी और हम गांव के बच्चों को हमारी मैडमों द्वारा घोड़े बग्गी में बैठा कर शहर ले जाकर यह पिक्चर दिखाई गई । वर्ष शायद 1982 या 83 ही रहा होगा, इस पिक्चर का जालियां वाला बाग नरसंहार वाला दृश्य आज भी मस्तिष्क में अंकित है । उस दृश्य को देख कर हम सभी बच्चे बहुत ही डर गए थे ।

एक गंवार की आत्मकथा - आरंभ के 17 वर्षों का जीवन

पाठक सोच रहे होंगे कि भला यह भी क्या शीर्षक हुआ नए ब्लॉग का । lockdown ने यह अवसर प्रदान किया है कि कुछ आत्मचिंतन व आत्मावलोकन कर लिया जाय । इसी कड़ी में मुझे भान हुआ व मेरे जैसे और भी लोगों को लगा होगा कि शहर में तो हम कैद से होकर रह गए हैं पर गांव में रहते तो भले ही घर के अंदर रहते पर खुलापन सा तो जरूर ही महसूस होता । मुझे भी गांव का अपना जीवन याद आया आउट इसी कड़ी में सोचा कि क्यों मैं अपने गांव और अपने जीवन के ही विषय में कुछ लिखने का प्रयास करूँ । मेरे गाँव का नाम बहादर पुर जट्ट है, शायद बहादुर पुर को सही से लिखा गया और जट्ट इसलिए कि गांव में जाटों की संख्या अधिक है । 


यह आश्चर्य की ही बात है कि इस क्षेत्र में हमारे ही गांव में जाटों की संख्या सबसे अधिक है व पास के गांव सराय में यादव लोग ज्यादा हैं बाकी अन्य गांव में चौहान लोग ज्यादा संख्या में बसे हैं । हमारा गांव वर्तमान में उत्तराखंड राज्य के हरिद्वार जनपद में आता है, जो कि वर्ष 1988 तक उत्तर प्रदेश के समय सहारनपुर जनपद में आता था, वर्ष 1988 में सहारनपुर से हरिद्वार को अलग कर इस नए जिले का निर्माण किया गया जो कि बाद में वर्ष 2000 में उत्तराखंड गठन पर उत्तराखंड में सम्मिलित हुए । 
हमारे गांव में खड़ी बोली हिंदी बोली जाती है जो कि सहारनपुर व मुज़फ्फर नगर से मिलती जुलती प्रतीत होती है किंतु उनसे अलग ही है । यह बोली हरिद्वार से लगा कर इधर सहारनपुर व उधर लगभग पुरकाजी तक समान सी प्रतीत होती है । हमारे गांव की रिश्तेदारियां भी ज्यादातर जनपद हरिद्वार, सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर, मेरठ, बिजनौर व मुरादाबाद जिलों में ही ज्यादातर हैं । पहाड़ों के जिलों जिनको हम ऋषिकेश व देहरादून से ऊपर का क्षेत्र मानते हैं हमारा नाता अधिक नहीं रहा, मात्र मसूरी घूमने के लिए ही चले जाया करते थे ।


मुझे बचपन मे भी याद नहीं आता कि हमारे गांव से शायद ही कोई व्यक्ति चारधाम यात्रा पर उस समय गया होगा । गांव के सभी लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि ही था व आज भी है कुछ लोग सरकारी नौकरियों जैसे BHEL फैक्ट्री, सेना व शिक्षक इत्यादि थे किंतु बहुत ही गिने चुने लोग नौकरियों में थे । यह बात मैं वर्ष 1977 से 1990 तक की ही कर रहा हूँ क्योंकि मेरा जन्म 1973 में हुआ व 1977 से ही मुझे अपने जीवन के महत्वपूर्ण चरण याद रह सके

 । इनमे सबसे पहली बात जो मुझे याद है बड़ी बहन का विवाह जो कि 26 जून 1977 को सम्पन्न हुआ, वर्ष 1979 में छोटे चाचा जी का विवाह याद है तथा वर्ष 1980 के बाद की तो लगभग सारी बड़ी देश विदेश की घटनाएं याद हैं क्योंकि मैंने बहुत ही कम आयु में अखबार पढ़ना शुरू कर दिया था इसलिए बाहर की घटनाओं की भी।जानकारी प्राप्त होने लगी थी । 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों की खबर में अखबार में ही पढ़ लेता था तथा मुझे अखबार की एक हैडिंग आज भी याद है


नवम एशियाई खेल, कौन पास कौन फेल । उन दिनों हमारे क्रेशर पर दिल्ली से छपा हुआ हिंदुस्तान अखबार आया करता था । जिसमे एक और भी कॉलम छपता था, जिसका नाम था


दिल्ली ऊंचा सुनती है । वर्ष 1985 या 1986 से नवभारत टाइम्स व पंजाब केसरी भी मेरे प्रतिदिन पढ़े जाने वाले अखबारों की सूची में जुड़ गए यानी में स्कूल के बाद अलग अलग जगह जाकर 3 अखबार पढ़ लिया करता था । चाचा जी की चक्की पर, नवभारत टाइम्स, दूसरे चाचा जी की चक्की पर पंजाब केसरी व बाग में हिंदुस्तान । परिवार में पहला TV वर्ष 1983 में चाचा जी के लड़के के विवाह में आया उससे पहले TV गांव के कुछ ही घरों में हुआ करता था जिसे देखने हम बच्चे दूसरे घरों में चले जाया करते थे व हमे कोई मना भी नहीं करता था । हम दूसरों के घरों में जाकर जमीन पर ही बैठ कर TV देख लिया करते थे । 

TV पर उन दिनों का मुख्य आकर्षण बुधवार व शुक्रवार को चित्रहार व बृहस्पतिवार व रविवार को शाम को आने वाली हिंदी फिल्म हुआ करती थी । रात्रि 9 बजे के हिंदी समाचार सुनने का क्रम बाद ही में शुरू हुआ जब वर्ष 1986 में बड़े भाई साहब की शादी में TV आया । उन्ही दिनों धारावहिक हम लोग व बुनियाद भी आने शुरू हुए जो कि हम बच्चे बड़े ही चाव से देखा करते थे । इसके अतिरिक्त अन्य धारावाहिकों में नुक्कड़, तमस, ये जो है जिंदगी, सुबह, चुनौती, कच्ची धूप, विक्रम बेताल के भी नाम याद हैं । इस पोस्ट में में वर्ष 1973 से 1983 तक का ही वर्णन कर रहा हूँ क्योंकि वर्ष 1983 के बाद मेरे जीवन की बड़ी घटना थी कक्षा 6 में नजदीक के शहर ज्वालापुर में दाखिला होना ।

 इससे पहले शहर से हमारा ज्यादा परिचय नहीं था, बस बहन के विवाह के बाद उनकी ससुराल रुड़की जाना व bhel के quartor में रह रहे एक रिश्तेदार ही थे जो शहर में रहते थे ।


इस समय की एक अन्य जो याद मुझे आती है वह थी अपने गांव के रेलवे स्टेशन से शाम को चलने वाली रेलगाड़ी में देहरादून तक का सफर । बड़ी बहन ने कुछ वर्ष देहरादून छोटे नाना जी के घर रह कर पढ़ाई की थी जिससे मिलने मम्मी पिताजी के साथ शायद बचपन मे मैं भी गया हूंगा, यानी वर्ष 1977 से पहले की यही बात मुझे याद है देहरादून का रेलगाड़ी से किया गया सफर जिसकी दो तीन खास बातें याद आती हैं । एक तो कोयले से चलने वाला भाप का इंजन, जिससे धुएं के साथ बहुत से महीन कोयले के कण भी निकला करते थे जो कि बालों में भर जाया करते थे तथा यदा कदा आंखों में भी गिरते रहा करते थे । 

हरिद्वार रेलवे स्टेशन के बाद गुफा जिससे होकर रेल निकला करती थी तथा सुखी नदियां आने पर उनके पत्थरों से टकरा कर आने वाली रेल की आवाज, रात्रि के समय रेल लाइन के पास बिजली व टेलीफोन के तारों को चलती हुई रेल से देखना बहुत अच्छा लगा करता था, कि मानों कहीं कहीं इनकी आपस की दूरी बहुत अधिक हो जाती है और कहीं कहीं ये अचानक से एक दूसरे के बहुत पास भी आ जाते हैं । इन तारों का रंग भी मुझे अलग अलग सा लगता था जो कि शायद उन पर जम गए भूरे रंग के जंग के कारण होता होगा । देहरादून रेलवे स्टेशन से उतर कर नाना जी के घर तक पैदल ही जाना होता था, रास्ते मे पड़ता था परेड ग्राउंड जिसमे कोई न कोई प्रदर्शनी या सर्कस इत्यादि चलता ही रहता था । देहरादून में उन दिनों 3 व्हीलर चलते थे जिनकी आवाज भी मुझे याद रही । गांव से शहर में आने के बाद कुकर की सिटी की आवाज सुनना भी पहला ही अनुभव था क्योंकि गांव में चूल्हे पर उन दिनों तक हमारे परिवार में कुकर उपयोग में नहीं लाया जाता था । शहर के दूध का भी स्वाद मुझे बचपन मे अपने घर के दूध से अलग सा लगा ।