इधर लोकडौन के 3 महीने चकराता ड्यूटी पर ही गुजरे । कल 11 जून को घर आने का प्रयास किया । जनता का आदमी हूँ तो जनता के ही साथ सफर करने की आदत है । देहरादून तक तो अपने ही विभाग के एक सज्जन की निजी कार से आ गया । रास्ते मे विकास नगर भूख लग आयी अक्सर एक दुकान पर रुक कर चाय समोसे काफी बार खाये हैं जैसे ही उस दुकान के सामने से निकलना हुआ मैंने गाड़ी रुकवाई और चल दिया चाय और समोसे की तलाश में क्योंकि सुबह खुद का ही बनाया थोडा नाश्ता कर लिया था तथा सफर अभी लंबा था । साथ वालों ने तो मना ही कर दिया खैर मैंने एक छोला समोसा दुकान पर ही रुक कर खाया और चाय भी पी । दुकानदार ने दोनों ही चीज डिस्पोजेबल में दी, पीने का पानी भी उसने बाहर ही रख दिया था वही पिया । मैं देख रहा था कि दुकान पर अधिकतर मजदूर ही आ रहे थे जो कि आसपास कहीं न कहीं काम कर रहे होंगे । पास ही गन्ने के रस की ठेली वाला भी ग्राहकों की इन्तजार में था क्योंकि रात के खाने की चिंता तो उसे भी रही होगी ।
खैर हम देहरादून पहुंचे मेरे सहयोगी बोले कि आप मेरी गाड़ी ले जाइए मैंने उनको मना कर दिया हालांकि मेरे पास एक और भी विकल्प था कि हरिद्वार से किसी को बुला लूं मुझे ले जाने को पर मैंने सोचा कि चलो एक आम आदमी को ही देखा जाय कि कैसे सफर कर रहा है । हम जैसे साधनसम्पन्न लोग तो आराम से सफर कर लेंगे लेकिन आम आदमी जो रोज काम की तलाश में निकलता है और शाम को थोड़ा बहुत कमा कर घर जाता है वह इस समय कैसे सफर कर रहा होगा । खैर रिस्पना पुल पर हरिद्वार के लिए मैक्सी कैब लगी खड़ी थी, ड्राइवर ने बताया कि किराया रुपये 300 होगा और 5 सवारी होते ही चल देगा । गाड़ी में धीरे धीरे 5 सवारी हो ही गयी, जिनमे से एक को मुज़फ्फरनगर, एक को प्रतापगढ़, मुझे रुड़की व एक बुज़ुर्ग सज्जन को शांति कुंज व एक अन्य हरिद्वार जाने वाला था । मैं ड्राइवर के ही पास बैठ गया 2 सवारी बीच की सीट पर और 02 पीछे बैठे । रास्ते मे ड्राइवर से बात हुई कि इस दौरान तो गाड़ियां यात्रा में चलती है और इन लोगों को बहुत नुकसान हो रहा है किन्तु कुछ बुकिंग जरूर मिली जिनमे लोगों को उनके गांव तक छोड़ने up के विभिन्न शहरों तक बुकिंग भी मिली । पीछे बैठे सज्जन को प्रतापगढ़ जाना था उसने ड्राइवर से ही बुकिंग की बात की तो ड्राइवर ने बोला कि कम से कम 16 से 17 हजार का खर्च आएगा । खैर गाड़ी दो घंटे में हरिद्वार चांदी घाट पुल पर पहुंच गई । अब यहां से रुड़की जाना था मैं सोच रहा था कि कोई ट्रक, मिनी ट्रक,छोटा हाथी कुछ भी मिलेगा तो मैं पीछे खड़े होकर भी चला जाऊंगा । काफी ट्रक वालों को हाथ दिया किन्तु कोई नहीं रुका मैंने सोचा कि जवालापुर तक चल लेता हूँ एक विक्रम आता दिखाई दिया जिसमे हम 2 लोग थे उसने रुपये 30 में जवालापुर पहुंचा दिया ।
अब यहां से रुड़की 30 किलोमीटर का सफर शेष था मैं फिर किसी गाड़ी की तलाश में खड़ा हो गया और टैक्सी नंबर की ही गाड़ियों को हाथ देता रहा कि शायद कोई गाड़ी वाला बुकिंग छोड़ कर खाली वापस जाता मिल जाय । एक मिनी बस आती दिखाई दी उसको हाथ दिया बिल्कुल खाली ही थी पर वह बोला कि बहादराबाद तक चलो वहां से मैं भगवानपुर जाऊंगा लेकिन वहां से गाड़ी की कम संभावना देख मैंने यहीं से गाड़ी लेना उचित समझा । खैर एक मैक्सी कैब आती दिखाई दी और हाथ देने पर रुक भी गयी । उसको चौराहे पर तैनात पुलिस वाले ने ही रुकवाया था ड्राइवर के पास वाली सीट पुलिस वाले सज्जन ने लपक ली, बीच की सीट पर 2 लोग पहले से ही थे मैं पीछे की तरफ बैठ गया वहां एक सवारी और भी थी, इसी बीच एक आदमी और पूछता हुआ आ गया जिसको मुज़फ्फरनगर जाना था खैर पीछे अब हम 3 हो गए । गाड़ी चल दी गर्मी तो थी पर बाहर की ठंडी हवा लगी तो मैं सो गया और रुड़की पहुंच ही गया । और दिनों रुपये 30 लेने वाले ड्राइवर महोदय ने 150 रुपये की मांग की जिसको कि पूरा किया गया । इस प्रकार मैं घर पहुंचा । रास्ते मे मास्क तो लगाया ही था आगे ईश्वर इच्छा ।
लेकिन काम की तलाश में घर से निकले मजदूर व गरीब आदमी को यह सफर महंगा तो पड़ ही रहा है । देहरादून से रुड़की रोडवेज का किराया रुपये 100 है, जबकि इस तरीके से 480 लग गए, सरकार चाहे तो इस किराए को रुपये 200 करके बस चलाने पर विचार कर सकती है जिसमे कि लिमिटेड सवारी बिठा कर लोगों को सुरक्षित सफर कराया जा सके ।