Saturday, December 30, 2023

चकराता के 07 वर्ष एक अनुभव

वर्ष 2019 के अंतिम दिवस का चिंतन ।

[31/12 07:56] Pankaj Kumar: मैं अपने कार्यालय से शाम को वापस पैदल ही आता हूँ । एक तो 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा हो जाती है और शाम को 5 बजे पुरोड़ी से चकराता जाने वाली अन्य सवारियों के अभाव में रूट की  कोई गाड़ी भी नहीं मिलती । बहुत से लोग पूछते हैं कि कोई गाड़ी क्यों नहीं रख लेते ?? मेरा जवाब होता है कि जिन लोगों और बच्चों के लिए मैं काम कर रहा हूँ वो सब भी पैदल ही चलते हैं । या फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट से ही । 🙏🏼🙏🏼
इधर 07 जनवरी 2020 को उत्तराखंड PCS परीक्षा के माध्यम से चयनित होकर नवसृजित पद उप शिक्षा अधिकारी, राजपत्रित, पूर्व ग्रेड पे 5400 अब वेतन बैंड 10, पर  इस सेवा में 5 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे तथा पदोन्नति के अगले सोपान खंड शिक्षा अधिकारी, पूर्व ग्रेड पे 6600, वर्तमान लेवल 11 हेतु भी सेवा अर्हता के भी 05 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे । 
इन 05 वर्षों का अधिकतम समय अन्य विभागों को यही बताने में भी गुजरा कि अब प्रत्येक विकास खंड में खंड शिक्षा अधिकारी के अतिरिक्त एक अन्य अधिकारी का भी प्रादुर्भाव हो चुका है जिस पर विकास खंड के समस्त प्रारंभिक शिक्षा कक्षा 1 से 8 के प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों की जिम्मेदारी सौंपी गई है । इन 05 वर्षों में हमे भिन्न भिन्न पदनामों से बुलाया जाता रहा जैसे कि उप खंड शिक्षा अधिकारी, ABEO आदि इत्यादि । 
रोचक यह भी है कि हमारे राज्य कोषागारों के सॉफ्टवेयर में भी अभी तक हमारा सही पदनाम उप शिक्षा अधिकारी सृजित नहीं हुआ है और उनके हिसाब से मैं Deputy Basic Shiksha Adhikari हूँ । 
चूंकि PCS परीक्षा के माध्यम से चयनित होने वाले अन्य सभी पदनाम सभी के लिए  अपेक्षाकृत जाने पहचाने होते हैं यथा SDM, DySP, वित्त अधिकारी, Asst Commissioner वाणिज्य कर, BDO व और भी अन्य । पर चूंकि यह पद भी नया ही सृजित किया गया था तथा हम लोग इस पर चयनित होने वाले भी पहले ही बैच के लोग थे तो इन 05 वर्षों का समय अन्य विभागों को यही बताने में गुजर गया कि हम कौन लोग हैं और क्या करते हैं । 
खैर इस अपेक्षाकृत कम जाने पहचाने वाले पदनाम वाले पद को छोड़ कर हमारे कई साथियों ने दोबारा से PCS परीक्षा पास की और SDM, DySP व ARTO जैसे पदों पर चयनित होने में सफलता प्राप्त की और इस गुमनामी के जीवन से छुटकारा पाने में सफल रहे । 
01 अप्रैल 2020 को चकराता में  तैनाती के भी 05 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे । जब यहां कार्यभार ग्रहण किया था तो उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय अस्तित्व में ही नहीं आया था तथा चकराता स्थित एक बहुत पुराने जीर्ण शीर्ण से खंडहर नुमा भवन से ही काम चल रहा था, क्योंकि उप शिक्षा अधिकारी नवसृजित पद था और इस पद पर हमारे ही बैच की नियुक्ति हुई तथा प्रशिक्षण की समाप्ति पर हम सभी 65 नव नियुक्त उप शिक्षा अधिकारी 02 चरणों मे अपने अपने विकास खंडों में पहुंच गए ।
विकास खंड चकराता में मेरी नियुक्ति के समय मार्च 2015 तक विकास खंड के ही एक राजकीय इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य महोदय ही अपने प्रधानाचार्य के दायित्वों के ही साथ साथ खंड शिक्षा अधिकारी व उप शिक्षा अधिकारी के भी कार्य दायित्यों का निर्वहन इसी एक कार्यालय से कर रहे थे ।
 मार्च  2015 में चकराता में पूर्णकालिक खंड शिक्षा अधिकारी महोदय व फिर 01 अप्रैल 15 को उप शिक्षा अधिकारी यानी मेरे द्वारा भी कार्यभार ग्रहण कर लिया गया ।
चूंकि इस कार्यालय में पहले से ही राजकीय इंटर कॉलेज, चकराता का भी कार्यालय संचालित हो रहा था तथा शायद उस समय इस विद्यालय के ही प्रधानाचार्य महोदय खंड शिक्षा अधिकारी का भी कार्य दायित्व निर्वाहन करते रहे होंगे अतः यही फिर खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय के भी रूप में संचालित होता रहा व कालांतर में वर्ष 2012 में उप शिक्षा अधिकारी का पद सृजित होने के बाद यही उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय के रूप में भी चलता रहा । क्योंकि पूर्णकालिक उप शिक्षा अधिकारी के रूप में 01 अप्रैल 2015 को मेरी नियुक्ति होने से पूर्व खंड शिक्षा अधिकारी व उप शिक्षा अधिकारी के कार्य दायित्वों का निर्वहन एक ही अधिकारी,  प्रधानाचार्य श्री दोहरे जी द्वारा किया जा रहा था अतः अलग से कार्यालय की आवश्यकता नहीं समझी गयी होगी ।
कार्यालय में स्थानाभाव व हमारे प्राथमिक शिक्षकों के विभिन्न अभिलेखों को सुचारू रूप से रखे जाने व स्वयं मेरे व मेरे स्टाफ के 6 अन्य कार्मिकों के बैठने हेतु कोई स्थान उपलब्ध न होने के कारण व विकास खंड में अब पूर्णकालिक 03 अधिकारी,  खंड शिक्षा अधिकारी, चकराता, प्रधानाचार्य राजकीय इंटर कॉलेज चकराता, व उप शिक्षा अधिकारी, चकराता के आ जाने से उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय को ब्लॉक संसाधन केंद्र, चकराता में संचालित किए जाने का निर्णय लिया गया । 
चकराता विकास खंड का ब्लॉक संसाधन केंद्र पुरोड़ी नामक स्थान पर वर्ष 2004 में ही निर्मित कर दिया गया था जहां सर्व शिक्षा अभियान से संबंधित समस्त अभिलेख व प्रशिक्षण इत्यादि चलते रहे । यह भी जानना रोचक होगा कि विकास खंड चकराता का ब्लॉक संसाधन केंद्र तत्समय ऐसे स्थान पर निर्मित किया गया जो कि भौगोलिक दृष्टि से कालसी विकास खंड के क्षेत्र में स्थित है तथा इसके निकट विकास खंड चकराता का एकमात्र विद्यालय राजकीय इंटर कॉलेज, चकराता संचालित हो रहा है जिसमे मात्र कक्षा 11 व 12 ही बड़े लम्बे समय से संचालित हो रही हैं । 

पुरोड़ी चकराता से मसूरी जाने वाले सड़क मार्ग पर चकराता से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । जहां तक जाने के लिए स्थानीय यूटिलिटी ही मिल पाती हैं वह भी जब कि उनको पूरी सवारी मिल सकें । ऐसे में विकास खंड के किसी दूर के स्थान के किसी शिक्षक को चकराता से पुरोड़ी जाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ जाता है । 
 जानकर लोग बताते हैं कि चकराता क्योंकि कैंट है  तथा मिलिट्री स्टेशन होने के कारण यहां पर राज्य सरकार के वही कार्यालय चलते रहे जिनकी स्थापना या तो आज़ादी से पहले हो चुकी थी या फिर उत्तर प्रदेश राज्य के ही समय । पुराने लोग यह भी बताते हैं कि किस प्रकार उत्तर प्रदेश के दिनों में चकराता बाजार राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों, कार्मिकों व उनके परिवार जनों के यहीं निवास करने से भरा पूरा दिखाई देता था । अधिकतर कार्मिक चूंकि उत्तर प्रदेश के दूर दराज के जनपदों के निवासी हुआ करते थे तो साल में लंबी  छुट्टियों के ही दिनों में अपने घरों को जाते थे । बड़ी मात्रा में उनके लिए किराए हेतु कमरे भी बने हुए थे जो कि अब वर्तमान में होटलों में बदल चुके हैं और चकराता में कमरा ढूंढना वाकई एक कठिन कार्य है । संयोगवश मुझे वर्ष 2015 में जोइनिंग के ही समय किराए का एक कमरा मिल गया था जिसका किराया अब 3600 रुपये प्रति माह है । 
कालांतर में उत्तराखंड राज्य गठन व देहरादून राजधानी के रूप में विकसित होने व सड़क व यातायात के द्रुतगामी वाहनों की उपलब्धता होने, चकराता में आवासीय सुविधाओं के अभाव होने व सर्दियों व बरसात के दिनों के कठिन जीवन के कारण कर्मचारी वर्ग ने विकास नगर व देहरादून में ही परिवार के साथ रहना उचित समझा होगा । 

कैंट द्वारा अति महत्वपूर्ण समझे जाने वाले राज्य सरकार के दूसरे कार्यालयों हेतु तो भूमि उपलब्ध करा दी किन्तु शिक्षा विभाग चूंकि किसी की भी प्राथमिकता में नहीं आता अतः मुख्य चकराता में ही शिक्षा विभाग के कार्यालयों की स्थापना किये जाने के विषय मे सोचा भी नहीं गया होगा । यह भी लिखना उचित होगा कि कैंट बोर्ड द्वारा विभिन्न स्थानों पर लगाये गए सूचना पटों में भी खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय का कोई उल्लेख नहीं है । 
 राजकीय इंटर कॉलेज चकराता का स्वयं का कार्यालय अभी भी विद्यालय से 05 किलोमीटर की दूरी पर चकराता में ही संचालित हो रहा है । कदाचित राजकीय इंटर कॉलेज का संचालन वर्ष 1990 तक चकराता में होने के कारण यह कार्यालय यहीं चलता रहा और कालांतर में खंड शिक्षा अधिकारी पद सृजित होने पर दोनों ही कार्यभार एक ही अधिकारी द्वारा निर्वाहन किये जाने से राजकीय इंटर कॉलेज, चकराता के पुरोड़ी स्थित अपने नवीन भवन में स्थानांतरित होने के उपरांत भी अतिथि तक उनके कार्यालय का संचालन अभी भी चकराता से ही हो रहा है । 

वर्तमान में चकराता स्थित कार्यालय खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय व राजकीय इंटर कॉलेज चकराता के ही कार्यालय के रूप में संचालित हो रहा है । विकास खंड चकराता के अन्य कार्यालय यथा, SDM कार्यालय, BDO कार्यालय, तहसील, पुलिस थाना, खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय, बाल विकास परियोजना अधिकारी कार्यालय, सामुदायिक चिकित्सा केंद्र व अन्य कार्यालय चकराता ही संचालित हो रहे हैं, कदाचित स्थानाभाव के कारण ब्लॉक संसाधन केंद्र को चकराता से अलग 5 किलोमीटर दूर पुरोड़ी ले जाया गया जहां पर अब उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय भी संचालित किया जा रहा है ।

विकास खंड चकराता का भौगोलिक क्षेत्र बहुत ही बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है जिसे कुल 14 शैक्षिक संकुलों में बांटा गया है । इस ब्लॉक के 03 संकुलों का सुगम मार्ग विकास नगर से ही पृथक हो जाता है, संकुल कोटा तापलाद तथा लाखामंडल जाने के लिए विकास नगर से यमुनोत्री मार्ग लिया जाता है तथा संकुल क्वानु हेतु कालसी से मीनस व अताल मार्ग जो त्यूणी तक जाता है उससे ही पहुंचा जाता है । चकराता से चल कर इन संकुलों तक अपेक्षाकृत लंबे मार्ग से ही पहुंचा जा सकता है ।

अन्य 01 संकुल हाजा जाने के लिए भी चकराता तक नहीं आना पड़ता इसका मार्ग चकराता से 20 किलोमीटर पहले सहिया नामक स्थान से ही अलग हो जाता है ।

अतः पुरोड़ी स्थित उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय से विकास खंड का निकटतम स्कूल क्वान्सी मार्ग पर डाकरा लगभग 10 से 12 किलोमीटर व सकनाइ त्यूणी मार्ग पर लगभग 12 से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । जबकि विकास खंड कालसी के कुछ  स्कूल लांघा पोखरी, ठाना, तुंगरा इत्यादि अपेक्षाकृत नजदीक मात्र 2 से 05 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं ।

विकास खंड के 02 संकुल मोहना व दूँगीयरा चकराता से नजदीक पड़ते हैं जिनके अधिकतम  दूरी वाले स्कूलों टावरा, मोहना संकुल की दूरी लगभग 30 किलोमीटर व घनता, दूँगीयरा की दूरी भी इतनी ही होगी या इससे अधिक । शेष समस्त विद्यालय उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय से 30 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर स्थित हैं जिनमे से सबसे दूरस्थ सड़क मार्ग का विद्यालय राजकीय प्राथमिक विद्यालय पट्यूड लगभग 145 किलोमीटर की दूरी पर व अन्य स्कूल चोरलानी व प्यूनल जिनका मुंधौल से पैदल मार्ग है लगभग इतने ही  किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं ।

विकास खंड के दूरस्थ भाग त्यूणी, कात्यान तक रोडवेज की बस की सर्विस उपलब्ध है किंतु यह बस प्रतिदिन एक ही फेरा लगाती है । पहली बस जो देहरादून से सुबह 5 बजे चलती है और चकराता सुबह 8.30 बजे पहुंच जाती है । यही बस चकराता से  चलकर लोखंडी, कोटि कानासर, सावदा, दारगाड होते हुए त्यूणी लगभग 12.30 बजे तक और शाम 5 बजे तक विकास खंड के दूरस्थ छोर कात्यान तक पहुंच जाती है । किंतु कात्यान से आगे के गांव में स्थित  स्कूलों तक पहुंच पाने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं होती है । पैदल चलना ही फिर अन्य विकल्प होता है या फिर गांव गांव से सुबह 8 बजे बाजार के लिए निकलने वाली यूटिलिटी जो कि शाम को समान व जन साधारण से लदी हुई वापस गांव तक आती हैं । चकराता से त्यूणी वाया कोटि कानासर तथा कालसी से त्यूणी वाया अताल मीनस पर ही रोडवेज की सेवा उपलब्ध होती है इसके अतिरिक्त विकास खंड की 116 ग्राम पंचायतों में स्थित 216 प्राथमिक व 47 उच्च प्राथमिक स्कूलों तक।पहुंचने हेतु या तो स्वयं के वाहन से या पैदल या फिर गांव गांव की इन्ही यूटिलिटी का सहारा लेना पड़ता है ।

मैं भी समय समय पर अपने स्कूलों तक पहुंचने के लिए इन्ही रोडवेज की बस सेवा या फिर इन्ही यूटिलिटी से सफर करता हूँ । काफी लोग बोलते भी हैं कि आप एक अधिकारी हो, ऐसे क्यों पैदल चलते हो या यूटिलिटी में पीछे या छत पर सफर करते हो उनको मेरा यही उत्तर होता है कि इससे मैं आम आदमी को होने वाली दिक्कतों को नजदीक से देखता हूँ, उनसे जुड़ाव महसूस करता हूँ और सबसे अच्छा तब लगता है जब किसी पैदल रास्ते पर कोई बच्चा हमारे किसी स्कूल का मुझे पहचान कर आकर पैर छू लेता है या किसी स्थानीय व्यक्ति, खेतों में काम करते बुज़ुर्गों से दुआ सलाम हो जाती है ।  जन यातायात से आम आदमी के साथ सफर करने का अपना ही एक आनंद है और मुझे उम्मीद है कि मैं अपने बाकी बचे हुए सेवा काल मे भी ऐसे ही सफर करता रहूंगा । कभी देहरादून की भीड़ भारी सिटी बस में खड़े होकर, कभी देहरादून के विक्रम में उस जांबाज़ चौथे आदमी के रूप में जो 3 अन्य यात्रिओ के बीच फंस कर अपने ही पैरों के सहारे व विक्रम की सीट के आभासी सहारे से अपने गंतव्य तक पहुंच जाता है । कई बार देहरादून विक्रम की फ्रंट सीट मिलने पर,  रोडवेज की त्यूणी जाने वाली बस में सीट मिलने पर और यूटिलिटी में अंदर जगह मिलने पर जो खुशी होती है वह शायद अपने खुद के वाहन में सफर करने पर भी नहीं मिलती होगी । इसके अतिरिक्त 5 सीटों वाली कार में अकेले सफर करना भी संसाधनों का अपव्यय ही नजर आता है । पहाड़ों में रह कर सीट फुल होने के बाद ही चलने की आदत पड़ चुकी है ।

 यह भी जानना आवश्यक होगा कि कालसी से त्यूणी के बीच के 120 किलोमीटर के मार्ग पर कोई भी पेट्रोल पंप नहीं है, कालसी के बाद अगला पेट्रोल पंप त्यूणी से भी आगे हिमाचल के पन्द्रानु नामक स्थान पर है । यद्यपि इस बीच मे दुकानों पर खुला पेट्रोल कुछ लोग बेचते हैं किंतु उनकी भी उपलब्धता निश्चित नहीं होती । बीच मे यदि कोई वाहन खराब भी हो जाता है तो मरम्मत करने वाले भी उपलब्ध नहीं हो पाते ।

मोरी = एक परिचय

मोरी  एक परिचय

मोरी उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले का एक दूरस्थ ब्लॉक और तहसील है । मोरी ग्राम पंचायत नानई में आता है । यह देहरादून से दो प्रमुख सड़क मार्गों से जुड़ा है । देहरादून से यहां ज्यादातर मसूरी, नैनबाग, नौगांव, पुरोला तथा जरमोला होते हुए आया जा सकता है । यह मार्ग यमुना नदी की किनारे किनारे नौगांव तक चलता है तथा नौगांव से एक सड़क सीधे बड़कोट होते हुए यमुनोत्री की और जाती है तथा दूसरी सड़क पुरोला होते हुए मोरी होकर हनोल, त्यूनी तथा हिमाचल के रोहड़ू और शिमला तथा मोरी से ही एक सड़क आजकल प्रसिद्ध हो चुके ट्रेकिंग बेस सांकरी तक जाती है । सांकरी से दो प्रमुख ट्रेक शुरू होती हैं जहां काफी बड़ी संख्या में देश विदेश के ट्रेकर हर की दून तथा केदारकांठा ट्रेक के लिए आते हैं । सांकरी से पहले नैतवाड़ नामक स्थान पड़ता है जहां रूपिन और सूपिन नदियां मिल कर टोंस नदी बनती हैं । टोंस नदी कालसी में जाकर यमुना जी में मिल जाती है । हालांकि टोंस नदी यमुना जी की सहायक नदी है किंतु यमुना जी से अधिक मात्रा में जल लेकर आती है । टोंस नदी के ही किनारे पर प्राचीन महासू देवता जी का मंदिर है जो कि त्यूनी से कुछ पहले हनोल नामक स्थान पर स्थित है । त्यूनी के ही रास्ते में एक अन्य प्रमुख महासू मंदिर मेंडरथ नामक स्थान पर भी पड़ता है ।

मोरी चूंकि पहले से आबाद कोई गांव नहीं था अतः यहां कोई पुराना घर या मंदिर स्थित नहीं है । कदाचित नदी के किनारे सिंचित और उपजाऊ भूमि होने के कारण यहां नानाई गांव के लोगों की कृषि भूमि हुआ करती थी जिन्हें पहाड़ों में छानी बोला जाता है जिनमे परिवार का कोई एक सदस्य पशुओं के साथ फसलों की देखभाल करने हेतु अस्थाई घर बना कर रहा करते थे । चूंकि कालांतर में ये दो प्रमुख सड़कें यहां से गुजरी तो आसपास के गांव के लोगों ने यहां घर बना कर रहना शुरू किया होगा, फिर दुकानें खुली होंगी, कुछ होटल भी और कालांतर में प्रशासनिक सुविधा तथा सड़क मार्ग से जुड़ा होने के कारण यहीं पर विकास खंड यानी ब्लॉक बनाया गया और तहसील भी ।  ब्लॉक और तहसील का मुख्यालय होने के ही कारण यहां अन्य सुविधाएं जैसे कि स्कूल, बैंक, पोस्ट ऑफिस तथा अन्य विभागों के सरकारी कार्यालय खोले गए होंगे । वर्तमान में यहां अच्छी संख्या में दुकानें तथा होटल खुल गए हैं और आसपास के गांव के ही साथ साथ सरकारी विभागों में कार्यरत कार्मिक भी निवास करते हैं । मोरी भी टोंस नदी के ही किनारे पर बसा है तथा चारों और से ऊंचे पहाड़ों से घिरा होने के कारण धूप सुबह को थोड़ा देर से आती है तथा शाम को जल्दी ही विदा भी हो जाती है।  आजकल सर्दियों में तो शाम के छः बजते ही यहां अंधेरा हो जाता है तथा 8 बजे तो लगता है कि आधी रात ही हो गई हो ।

मोरी में एक सरकारी प्राइमरी स्कूल, एक सरकारी बालिका हाई स्कूल तथा एक इंटर कॉलेज के साथ ही साथ वर्ष 2021 में एक राजकीय डिग्री कॉलेज भी खोल दिया गया है । जहां बड़ी संख्या में आसपास के दूरस्थ गांव से आए बच्चे यहां कमरे किराए पर लेकर रहते हैं तथा अपनी पढ़ाई करते हैं । यहां घर से दूर रह कर पढ़ने वाली बच्चियां अपने छोटे भाई बहनों की भी देखभाल करती हैं जिनके माता पिता गांव में ही रहते हैं ।

 मोरी के आसपास कुछ बड़े गांव भी हैं जैसे खरसादी, देई, मोटाड इत्यादि । यहां रुकने के लिए होटल भी खुल गए हैं तथा भोजन हेतु भी काफी होटल उपलब्ध हैं । मोरी का बाजार ज्यादा बड़ा नहीं है किंतु बड़ी बड़ी दुकानों में जरूरत का प्रायः सारा समान मिल जाता है । मोरी में एक शिव मंदिर तथा एक देवी का मंदिर भी स्थित है । मोरी से टोंस नदी पार करने के लिए एक झूला पुल है तथा त्यूनी की तरफ चलने पर मोटाड़ गांव जाने के लिए बड़ा पुल भी बनाया गया है।  सांकरी के नजदीक होने के कारण यहां से बड़ी संख्या में पर्यटक होकर गुजरते हैं जिनमे से कुछ चाय और खाने के लिए रुकते भी होंगे किन्तु चूंकि बाजार में सड़क मार्ग बहुत ही संकरा है अतः यहां के बाजार को इन पर्यटकों का शायद कम ही लाभ मिल पता है क्योंकि उनके वाहनों के लिए पार्किंग की बड़ी समस्या रहती होगी ।

कुल मिला कर एक शांत सी जगह है जहां आप दो नदियों के कलरव के बीच समय व्यतीत कर सकते हैं । दूसरी नदी जिसे स्थानीय लोग खड्ड बोलते हैं केदार गंगा के नाम से जानी जाती है जिसका उद्गम स्थान केदारकांठा बताया गया है। मोरी से आगे सांकरी रोड पर नैतवाड है जहां पर दानवीर कर्ण का मंदिर है तथा दूसरा प्रसिद्ध मंदिर यहां के स्थानीय देवता पोखू जी का मंदिर भी स्थित है । सांकरी से आगे का क्षेत्र पर्वत क्षेत्र बोला जाता है जहां पर ज्यादातर पैदल मार्ग वाले गांव जैसे ओसला, धातमीर, गंगाड, पावनी इत्यादि और अन्य बहुत से गांव हैं । #beopankaj #mori #uttarkashi #uttarakhand

प्रारंभिक शिक्षा - मेरा अनुभव

प्रारंभिक शिक्षा और चुनौतियां ।

नई शिक्षा नीति प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल तथा क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आई है । सबसे बड़ा परिवर्तन प्री प्राइमरी शिक्षा को लेकर आया है जो कि अभी तक सरकारी स्कूलों में उपलब्ध नहीं थी । इसकी शुरुआत ऐसे आंगनवाड़ी केंद्रों से कर दी गई है जो कि किसी राजकीय प्राथमिक स्कूल के ही परिसर में संचालित हो रहे हैं । हालांकि इनमें कार्यरत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को अभी ECCE में प्रशिक्षित नहीं किया गया है इनके प्रशिक्षण की रूपरेखा अभी तैयारी की अवस्था में है । 
आने वाले समय में निश्चित ही स्वतंत्र रूप से संचालित हो रहे आंगनवाड़ी केंद्रों में भी प्री प्राइमरी शिक्षा प्रारंभ हो सकेगी जिसका बहुत बड़ा लाभ ग्रामीण क्षेत्रों में निवास रत बच्चों को होगा जो कि किसी प्ले स्कूल इत्यादि में नहीं जा पा रहे थे । प्री प्राइमरी कक्षाओं के संचालन से एक उम्मीद यह भी है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन में वृद्धि भी देखी जा सकती है क्योंकि पूर्व में सरकारी स्कूलों में सबसे छोटी कक्षा १ में प्रवेश की आयु कम से कम ६ वर्ष निर्धारित थी किंतु अभिभावकों के अनुरोध तथा बच्चे की योग्यता को देखते हुए ५ वर्ष पूर्ण कर चुके बालक को भी प्रवेश दे दिया जाता था ।

 अब यह भी समस्या नहीं रहेगी हालांकि अभी भी कक्षा १ में प्रवेश की आयु ६ वर्ष ही निर्धारित कर दी गई है किंतु बाल वाटिका की शुरुआत से बच्चा कक्षा १ में कुछ तो सीख कर आएगा ही । वर्तमान में नई शिक्षा नीति की अनुशंसाओं के आलोक में अध्यापकों का भी प्रशिक्षण प्रारंभ कर दिया गया है जिसमे कि उन्हें  निपुण भारत मिशन के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु दक्ष किया जा रहा है । मिशन निपुण भारत के अंतर्गत वर्ष २०२५ तक कक्षा ३ तक पहुंचने वाले समस्त छात्र छात्राओं को प्रारंभिक गणित तथा भाषा में निर्धारित योग्यता प्राप्त कराए जाने पर बल दिया जा रहा है ताकि बच्चे कक्षा ३ से आगे की अपनी पढ़ाई बिना किसी भय और किसी भी विषय से डरे बिना करते रहें ।
लोक शिक्षा के क्षेत्र में निपुण भारत मिशन भी अपने ही आप में एक अत्यंत क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है यदि इसका संचालन सही प्रकार से किया जा सके तो । इसके संचालन में सबसे बड़ी कठिनाई ऐसे दुर्गम और दूर दराज के क्षेत्रों में आ सकती है जहां पर मानक के अनुरूप शिक्षक तैनात नहीं है तथा बड़ी संख्या में ऐसे क्षेत्रों के प्राइमरी स्कूलों में सभी ५ कक्षाओं का संचालन मात्र एक ही शिक्षक द्वारा किया जा रहा है । अतः किसी भी प्रकार से ऐसे क्षेत्रों में जल्द से जल्द शिक्षकों की तैनाती की जानी आवश्यक होगी नहीं तो ऐसे क्षेत्रों के बच्चे आवश्यक दक्षता की प्राप्ति से वंचित रह जाएंगे । ऐसे क्षेत्रों में निर्धारित समय हेतु मानदेय पर स्वयंसेवी शिक्षकों की सेवा लेने पर विचार किया जा सकता है । ऐसे शिक्षक प्रशिक्षण केंद्रों से भी MoU किया जा सकता है जहां के प्रशिक्षु इन क्षेत्रों में आकर निर्धारित मानदेय पर निश्चित अवधि तक अपनी सेवा देने को तैयार हों तथा बाद में स्थाई नौकरी हेतु इन्हे इनके कार्य के अनुभव के आधार पर कुछ अतिरिक्त अंक देकर भर्ती होने में सहायता प्रदान की जा सकती है ।
प्रारंभिक शिक्षा की दूसरी बड़ी चुनौती विद्यालय भवनों की स्थिति भी है । अधिकांश राज्यों में प्राइमरी और जूनियर हाई स्कूल के भवन निर्माण का कार्य अभिभावकों द्वारा बनी हुई विद्यालय प्रबंध समिति द्वारा ही कराया जाता है जिसकी देखरेख हेतु संविदा पर भर्ती जूनियर इंजीनियर रखे जाते हैं । देखने में आया है कि SMC भवन निर्माण में तकनीकी रूप से सक्षम नहीं हो पाती है तथा संविदा पर रखे JE भी निर्मित भवन की खराब गुणवत्ता हेतु जिम्मेदार नहीं ठहराए जा सकते अतः किसी भी प्रकार तत्काल ही समस्त प्रकार के निर्माण कार्य कार्यदाई संस्थाओं के ही द्वारा उनकी देख रेख में ही कराए जाने की नितांत आवश्यकता है ताकि विद्यालय में कार्यरत शिक्षक भी बिना किसी विवाद में फंसे अपना शिक्षण कार्य सुचारू रूप से करते रहें । SMC द्वारा निर्माण की अवस्था में विद्यालय में कार्यरत शिक्षक पर स्थानीय लोगों का भी बहुत बड़ा दबाव होता है तथा कई बार आपसी विवाद के ही चलते विद्यालय भवन या तो आधा अधूरा ही बन पता है या फिर उसकी गुणवत्ता भी सही नहीं रहती जिसमे कि शिक्षक की कोई भी भूमिका नहीं होने पर भी उन्ही को दोषी भी ठहरा दिया जाता है ।
देखने में यह भी आया है कि उपरोक्त तथा अन्य काफी प्रकार की चुनौतियों का सामना करने के उपरांत भी प्रारंभिक शिक्षा में कार्यरत शिक्षक पूर्ण मनोयोग से अपना कार्य संचालित कर रहे हैं । एकल शिक्षक होने के उपरांत भी शिक्षण कार्य करने के ही साथ अन्य कई प्रशासनिक कार्य भी कुशलतापूर्वक निपटाते हैं ।
यह भी देखने में आया है कि प्रारंभिक शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत शिक्षकों को उनकी योग्यता के अनुरूप शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों जैसे DIET, SCERT, जिला समन्वयक, ब्लॉक समन्वयक, संकुल समन्वयक इत्यादि जैसे पदों पर कार्य करने के अवसर भी उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं ऐसे में प्रारंभिक शिक्षा में कार्यरत शिक्षकों का मनोबल बनाए रखने हेतु तथा इनके अनुभव का लाभ उठाए जाने हेतु यह भी अत्यंत आवश्यक है कि निर्धारित योग्यता प्राप्त जैसे कि M.Ed, NET, PhD प्राप्त अनुभवी शिक्षकों को भी अन्य शिक्षकों के समान अवसर प्रदान कराए जाने चाहिए ताकि इनके अंदर किसी भी प्रकार से कमतर आंके जाने की भावना भी विकसित न होने पाए । अनेक दूर दराज के स्थानों पर प्राथमिक विद्यालयों का एकाकीपन भी एक बड़ी समस्या है जहां पर कार्यरत शिक्षक को किसी भी प्रकार की मदद नहीं मिल पाती ऐसे में ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों, सरकार के साथ कार्य कर रहे विभिन्न फाउंडेशन तथा एनजीओ को भी शहर ही नहीं वरन दूर दराज के क्षेत्रों तक अपनी पहुंच बनानी होगी ताकि एकल शिक्षकों को भी किसी न किसी प्रकार की मदद मिल सके ।