Saturday, April 18, 2020

लॉक डाउन, कोरोना, सोशल distancing व शिक्षा

लॉक डाउन के बाद शिक्षा, शिक्षक, छात्र व विद्यालय

इस लॉक डाउन के खुलने का इंतजार हम बड़ों के साथ ही साथ नन्हे मुन्ने बच्चों के अलावा स्कूल व कॉलेज के विद्यार्थी, इनके  शिक्षक व स्वयं अभिभावक भी कर ही रहे होंगे । ज्यादातर बच्चे अब महसूस कर रहे हैं कि उनको अपना स्कूल व सहपाठी बहुत याद आ रहे हैं । ऐसे ही कॉलेज के छात्र, छात्राओं को अपने कॉलेज के क्लास रूम के साथ ही साथ कॉलेज कैंटीन की भी बहुत याद आ रही होगी । खैर समय पर सभी चीजें खुलेंगे ही किन्तु इन सभी को इस बदलते हुए परिदृश्य में हो सकता है अपने आपको भी परिवर्तित करना पड़े । देश में हमारे काफी सारे ऐसे स्कूल भी हैं जिनमे छात्र संख्या बहुत अधिक है तथा कक्षा कक्षों की संख्या बहुत कम । ऐसे में ज्यादा से ज्यादा संख्या में बच्चों को उपलब्ध संसाधनों के ही अंदर बिठा कर पढ़ाया जाता है । कई स्कूल तो इसी कारण से चल पा रहे होते हैं कि किसी भी दिन उनके सभी विद्यार्थी उपस्थित नहीं रहते अतः काम चल जाता है । इसका भी समाधान खोजा जाना चाहिए और हमारे नीति नियंता अवश्य ही इस पर भी विचार कर रहे होंगे ।

शायद इस समस्या का एक समाधान शिफ्ट सिस्टम हो सकेगा । मुझे याद आता है कि मैं स्वयं कक्षा 6 से 8 तक तथा 9 और 10 डबल शिफ्ट वाले स्कूल में पढ़ चुके हूं । कक्षा 6 से 8 तक की पढ़ाई जवालापुर स्थित शिवालिक शिशु मंदिर जूनियर हाई स्कूल में की थी जिसमे कक्षा 1 से 5 प्रथम शिफ्ट में चलती थी और 6 से 8 द्वितीय शिफ्ट में । जो कि 12 बजे से प्रारंभ होकर 4 या 5 बजे तक चलती थी । इसके उपरांत कक्षा 9 व 10 रुड़की स्थित अन्य बड़े स्कूल BSM Inter College में भी 02 शिफ्ट थी, कक्षा 9 से 12 प्रथम शिफ्ट व कक्षा 6 से 8 द्वितीय शिफ्ट । दोनो ही शिफ्टों के अध्यापक अलग अलग होते थे । किंतु जिन स्कूलों में 02 शिफ्ट चलाये जाने हेतु  पर्याप्त संख्या में अध्यापक ही उपलब्ध नहीं होंगे उनको कुछ और प्रबंध करना पड़ सकता है । मसलन कुछ कक्षाओं को एक दिन बुलाया जाय व कुछ कक्षाओं को एक दिन बुलाये जाने की संभावना पर भी विचार करना पड़ सकता है ।
स्कूल खुलते ही शहर में भीड़ भी बढ़ती ही है, बड़ी संख्या में स्कूल बस, रिक्शा, ऑटो व स्वयं अभिभावक भी बच्चों को स्कूल छोड़ने व लाये जाने का कार्य करते हैं । अतः वाहनों की इस संख्या को नियंत्रित करना भी एक बड़ी चुनौती होगा ही ।

इसी प्रकार कॉलेज स्तर पर भी कुछ विशेष प्रयास करने पड़ सकते हैं, कुछ विशेष प्रकार के पाठ्यक्रम पत्राचार या डिस्टेंस लर्निंग हेतु खोले जाने पर विचार किया जा सकता है जिनमे कि शायद प्रतिदिन कॉलेज में न जाने की आवश्यकता पड़ती हो । शायद 03 वर्षीय  LLB का पाठ्यक्रम ऐसा ही एक कोर्स हो सकता है अब जब प्रैक्टिस करने से पूर्व BCI द्वारा एक परीक्षा पास किये जाने का प्रतिबंध रखा जा चुका है ऐसे में शायद इस कोर्स को रेगुलर ही किये जाने की बाध्यता पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता समझी जाय । इसी कड़ी में शिक्षक शिक्षा के पाठ्यक्रम हो सकते हैं, अभी पिछले 02 वर्षों में ही NIOS के माध्यम से देश भर के लगभग 15 लाख अप्रशिक्षित शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया जिनको कि कुछ समय के लिए ही रेगुलर  कक्षा कक्ष के अध्ययन हेतु बुलाये जाने की आवश्यकता पड़ी । ऐसे ही और भी पाठ्यक्रम व प्रक्रिया हो सकती हैं जिनमे बदलती परिस्थितियों के सापेक्ष  कुछेक परिवर्तन किये जाने पड़ें ।

ट्यूशन व कोचिंग इंस्टीट्यूशन्स को भी अपने यहां अतिरिक्त स्थान का ध्यान रखना ही होगा, यह भी देखना ही होगा कि बड़ी संख्या में शहर शहर में खुल रहे इन कोचिंग केंद्रों की आवश्यकता भी है या नहीं क्योंकि देश मे एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो इनकी फीस वहन नहीं कर सकता व इनमे न पढ़ पाने के कारण कहीं न कहीं अपने आपको दीन हीन अवस्था मे पाकर पहले ही स्वयं को कम्पटीशन की दौड़ से बाहर संमझ लेता है । बताया जा रहा है कि अकेले कोटा, राजस्थान से कोचिंग कर रहे बच्चों को वापस लाये जाने हेतु उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ही 200 बस भेजी गई ऐसे ही न जाने देश के कितने शहरों में अलग अलग कोचिंग कर रहे बच्चे फंस गए होंगे । इस कोचिंग की अंधी दौड़ को भी नियंत्रित किये जाने की आवश्यकता शायद भविष्य में पड़ जाय ।

इसी प्रकार आवासीय स्कूल व कॉलेगों को भी अपने यहां के उपायों में और भी अधिक सुधार करने की आवश्यकता पड़ सकती है । जिसमे इनमे अनिवार्यतः डॉक्टर या पैरा मेडिकल को अपने यहां स्थाई रूप से रखा जाना व सिक रूम जैसी व्यवस्था को उपलब्ध कराया जाना भी एक उपाय हो सकता है जहां पर आवश्यकता पड़ने पर कुछ संख्या में बच्चों को बीमार होने पर कुछ समय तक अन्य से  पृथक रखा जा सके । कोरोना और सोशल distancing के इस समय में अनेकों ऐसे उपायों पर हम सभी के द्वारा सोच विचार किया ही जाना होगा ताकि हमारी शिक्षा व्यवस्था पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़ने पाए ।