Wednesday, May 20, 2020
वर्तमान भारत व भारतीयता
इधर काफी दिनों से देश मे एक नया प्रचलन सा देखने मे आ रहा है । धार्मिक भावनाएं भड़क रही हैं व आहत भी हो रही हैं । देश मे बहुत कुछ सही व गलत होने का ठीकरा भी बहुसंख्य समाज पर थोपने की भी प्रक्रिया चल रही है । इसी धर्म को अनेकों प्रकार की प्रताड़नाओं का सामना भी करना पड़ रहा है, कई बार अपने आराध्य देव, देवियों का अपमान भी होते हुए देखना पड़ रहा है, रूढ़िवादी होने का ठप्पा भी लग ही रहा है तथा समय समय पर देश विदेशों से धार्मिक कट्टरता व धार्मिक उन्मादी होने के विशेषणों से भी नवाजा जाता है । देश ही नहीं विदेशों से भी विश्व के इस एकमात्र देश को मात्र इसी कारण से हिकारत की नजरों से देखा जाता है कि यहां की अधिसंख्य जनसंख्या विश्व के दो सबसे बड़े धर्मों को मानने वाले वाले देशों व जनसंख्या से अलग किसी दूसरी पूजा पद्धति व जीवन शैली को मानने वाले हैं । जो जीवन शैली शैली शायद उतनी ही प्राचीन व प्रासंगिक है जितना कि मानव सभ्यता का इतिहास । फिर आखिर क्या कारण है कि एक ऐसे समुदाय को बार बार नीचा दिखाए जाने का प्रयास होता रहता है जिसके मूल में विश्व बंधुत्व, वसुधैव कुटुम्बकम, सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्व मंगल मांगल्य, बहुधा वदन्ति, अंतरिक्ष गवं शांति का पाठ करने वाले लोगों को धार्मिक उन्मादी, कट्टर, पिछड़े हुए, मूर्तिपूजक, अंधविश्वासी और भी न जाने किन किन विशेषणों से नवाजा जा रहा है । इस पूरी प्रक्रिया को देखने पर लगता है कि यह सब वैश्विक स्तर पर चल रही एक सोची समझी साजिश है इस प्राचीन संस्कृति को पृथ्वी से मिटा दिए जाने की । पर क्यों ?? आखिर एक ऐसी संस्कृति से किसी को कैसा डर हो सकता है जिसने कभी भी तलवार व हिंसा के बल पर अपना प्रचार प्रसार नहीं किया, जिसने ईश्वर तक पहुंचने के भी अनेकों मार्ग बताए व किसी भी मार्ग या पूजा पद्धति को बुरा नहीं बताया । विश्व में उपलब्ध सभी धर्मों के लोगों का स्वागत किया, उन्हें शरण दी व फलने, फूलने का मौका भी दिया । शायद उनका डर उनके अंदर व्याप्त एक असुरक्षा की भावना ही है क्योंकि इतनी उदार परंपरा व इतनी विभिन्नता वाली संस्कृति से सभी को डर सा लगता होगा कि कहीं हम इसी में न समा जाएं । और अपना अस्तित्व ही न खो बैठें । शायद यही डर उनसे बार बार ऐसे कार्य कराता रहता है जिसमे निंदा, धर्मांतरण व इस बहुसंख्य जन समुदाय को नीचा दिखाए जाने का प्रयास व कुचक्र किया जाता रहा है । यह चक्र अनेकों वर्षों से चल रहा है तथा अब सूचना तकनीकी ने इस कुचक्र को सोशल मीडिया, टिक टोक, फेसबुक, ट्विटर, TV धारावहिक, नेटफ्लिक्स व अन्य ऐसे सेंसर विहीन संसाधन व फिल्में जैसे माध्यम भी उपलब्ध करा दिए हैं जिन पर दिन रात 24 घंटे अलग अलग तरीकों से इस बहुसंख्य वर्ग को भांति भांति प्रकार से नीचा दिखाए जाने व बुरे रूप में प्रस्तुत किये जाने जे सुनियोजित प्रयास चल रहे हैं जिनको कि कभी हास्य व्यंग्य, कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कभी सृजनात्मकता के अनुपम उदाहरण तो कभी नई सोच के नाम पर हमारी युवा पीढ़ी के सामने परोसा जा रहा है ताकि इनके मस्तिष्क में यह बात बिठा दी जाय कि वास्तव में सारी बुराई बस हमारे ही अंदर है व बाकी सारी दुनिया दूध की धुली हुई है ।
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