चंडीगढ़ के विषय मे काफी सुन रखा था किंतु अभी तक इस शहर में जाना नहीं हुआ था । इसी सप्ताहांत के दौरान यहां पहली बार ही जाना हुआ । मुझे लगता है कि यदि किसी अजनबी शहर को आत्मसात करना है तो सबसे बेहतर तो है कि इसमें पैदल ही घुमा जाय किन्तु शहर बड़ा हो तो यह संभव नहीं हो पाता तो अगला विकल्प रहता है कोई ऑटो रिक्शा या सिटी बस । नौसेना के दिनों में तो गोआ, मद्रास, बॉम्बे, कोचीन, जामनगर, पोरबंदर, द्वारका, सोमनाथ, रामेश्वरम, मदुरै, रामनाथपुरम, बैंगलोर, मैसूर, ऊटी, मुन्नार, उडुपी, मंगलोर, मणिपाल, धनुष्कोडी इत्यादि शहर व स्थान पैदल ही खूब घूमे हैं । कई बार तो बिना पूछे ही कई कई किलोमीटर चल लिया करता था और जब दोस्तों के साथ पैदल यात्रा पर बात चलती तो दोस्त भी अचरज से बोलते कि इतना चल लिया ।
खैर चंडीगढ़ या मोहाली जिस स्थान पर मैं रात्रि विश्राम हेतु रुका था वहां सुबह की चाय की कोई व्यवस्था नहीं थी तो मैं थोड़ा शहर को समझने और एक अदद कप चाय की तलाश में सुबह 6 बजे उठ कर निकाल ही लिया । शहर जाग रहा था, घूमने वाले लोग घूमने को निकाल पड़े व कामगार अपने अपने कार्यों में व्यस्त हो चले । मैंने बरसों पहले बॉम्बे शहर को भी अच्छी तरह से सुबह सुबह जागते बहुत बार देखा है । छुट्टी काट कर वापसी देहरादून एक्सप्रेस से ही हुआ करती थी जो लगभग सुबह के सवा चार बजे बॉम्बे सेंट्रल पहुंच जाया करती थी और फिर वहां से लोकल लेकर चर्च गेट स्टेशन और चर्च गेट से नेवी डाकयार्ड, कोलाबा तक मैं सुबह सुबह लगभग 5 बजे पैदल ही पहुंचा करता था । बॉम्बे तो खैर बोला जाता है कि सोता ही नहीं पर आम आदमी को चूंकि अगले दिन भर शरीर तोड़ना ही होता है तो आम आदमी तो सो ही जाया करता था । फ़्लोरा फाउंटेन और फोर्ट एरिया के फुटपाथ पर, बॉम्बे टेलीफोन एक्सचेंज के आसपास दिन में अस्थाई दुकानों के पास ही लोग सोये हुए मिलते थे । अंधेरे में डूबा, सोया हुआ शहर का यह इलाका लगता था कि मानों कोई भीमकाय राक्षस गहरी निद्रा में सो रहा है और बस लगभग जागने ही वाला है । गोआ को भी जागते हुए 3 साल तक देखा है क्योंकि उन दिनों मीटर गेज वाली गोआ एक्सप्रेस भी सुबह 6 बजे वास्को डी गामा रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाती थी । हवा में मिली समुद्री महक जिसमे मछली और समुद्री नमी की महक भी शामिल होती थी आते ही लगता था कि गोआ आ ही गया । बॉम्बे की हवा में इन दोनों के साथ साथ एक तीसरी महक भी शामिल हो जाया करती थी जो कि ऐसा लगता था कि मानों बारूद की सी गंध हो । वहीं मद्रास की सुबह की गंध में महिलाओं के बालों में लगे फूलों की खुशबू, नारियल तेल में बन रहे केले के चिप्स की खशबू, सांभर और अन्य दक्षिण भारतीय व्यंजनों की खशबू के साथ ही साथ स्ट्रांग कॉफी की भी खशबू भी शामिल होती थी । खैर चंडीगढ़ की हवा में ऐसी कोई विशेष स्ट्रांग खुशबू की उपस्थिति का अनुभव तो नहीं हुआ पर उमस व गर्मी तो थी ही । लगभग 01 किलोमीटर भटक लिया लेकिन कोई चाय का खोखा या ठेला नजर नहीं आया । मन मे आया कि आखिरकार इन शहरों में आम आदमी कैसे रह पाता होगा ।
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पर मैं अपनी चाय की तलाश में चलता ही रहा और निराश नहीं होना पड़ा । आम आदमी की चाय का जुगाड़ हो ही गया । ![]()
वहां काफी कामगार अपने दिन की शुरुआत खैनी, तम्बाकू और चाय के मिले जुले असर से करते दिखाई पड़े । यही लोग इन बड़े शहरों को दिन भर चलाते हैं, रिक्शे वाले, ऑटो वाले, रेहड़ी वाले, मजदूर व मेरे जैसे आम आदमी भी इनके बीच चाय पीकर इनके जीवन की झलक पा जाते हैं । जमीन पर रखा चाय का सामान ऊपर एक तिरपाल यही थी चाय की दुकान । खैर चाय तो अच्छी बनी थी वापसी में एक जॉगिंग पार्क के बाहर चाय के बाद आयुष काढ़ा भी मिल गया । पंजाब पुलिस के ये रिटायर्ड सब इंस्पेक्टर मिले एक जॉगिंग पार्क के बाहर यह काढ़ा बेचते बता रहे थे कि कल से ही शुरू किया है टाइम पास के लिए । मैंने भी इनका काढ़ा पिया । आयुर्वेद की अच्छी जानकारी रखते हैं । इनके बेटे की मृत्यु कैंसर से हो गयी थी बाद में इनकी रुचि आयुर्वेद में बढ़ गयी ।
नाश्ता थोड़ा जल्दी ही करना था किंतु अभी तक बड़े होटल खुले ही नहीं थे तो मेरी खोज नाश्ते के लिए भी एक ऐसे ही स्थान पर जा टिकी जहां कामगार आदमी अपने दिन की शुरुआत में अपना पेट अपने बजट में भर लेता है । बड़े शहर में ठेले की तलाश पूरी हुई, इन जगहों पर एक आम आदमी का पेट कम पैसों में भर जाता है । जहां एक और CCD और मैक डोनाल्ड जैसे ब्रांड पानी भी फ्री में नहीं देते, इन जगहों पर पेट भरने के लिए कुछ भी नहीं मिलता । ![]()
दुकान संचालक यादव भाई, उत्तर प्रदेश के प्रताप गढ़ जिले से आये अपना एक पैर पोलियो ग्रस्त हो जाने के बावजूद भी युवा अवस्था मे ही अपने पैरों पर खड़े होकर मेहनत करते दिखे । इनका सहयोगी एक बालक जिसने पूछने पर बताया कि गांव में रह कर कक्षा 5 ही पढ़ पाया फिर यहीं आ गया काम करने,भले ही ये बच्चे ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाते पर समय के साथ निपुण व्यवसायी बन जाते हैं । पाक कला व प्रबंधन की जो डिग्री हम अपने बच्चों को लाखों रुपये खर्च कर BHM, BBA, MBA में सिखाते हैं ये युवा इन सभी मे सहज ही पारंगत होकर भविष्य में अपना स्वयं का काम शुरू कर देते हैं । खैर गर्म आलू के परांठे बन रहे थे मेरे 3 परांठे 01 चाय के कुल हुए रुपये 55 मात्र । मैंने भाई को 60 रुपये दिए, 5 वापस कर रहा था किंतु मैंने आग्रह किया कि रख लो भाई आपके परांठे बढ़िया थे ।
कल किस प्रयोजन हेतु चंडीगढ़ आना हुआ पहली बार । काफी व्यवस्थित तरीके से बसाए हुए शहर हैं जहां सड़कों पर कोई भीड़ भाड़ नहीं, कोई विज्ञापन व इश्तहार चिपका नहीं दिखा, हरा भरा शहर और चौड़ी सड़कें । बाजार भी व्यवस्थित सड़क पर कोई कुछ बेचता भी नजर नहीं आया ।




























