Tuesday, November 3, 2020

दिल्ली यात्रा वृतांत

दिल्ली यात्रा और श्रीमती जी का जन्मदिन,

बेटी के दाखिले के बाद उसके लिए दिल्ली में कमरा देखने जाना था इसी बीच श्रीमती जी और साली साहिबा का करवा चौथ के लिए मेहंदी लगवाने का भी कार्यक्रम बन गया । 02 नवंबर की शाम की बात है मेहंदी की तलाश और गूगल बाबा की जुगलबंदी एक ऐसे बड़े लोगों के उत्तरी दिल्ली के इलाके में गलती से ले आयी जहां बड़ी खुली सड़कें,बड़ी बड़ी आलीशान कोठियां और सड़क पर चलते बहुत ही कम लोग । संयोगवश वहीं एक पार्क के पास दो महिलाएं बैठ कर मेहंदी लगा रही थी उनको गाड़ी से उतार मैं दोनो बेटियों को गाड़ी में ही बैठा कर अदद पार्किंग की तलाश में उनसे थोड़ी सी दूर गाड़ी लेकर गया और एक जगह गाड़ी खड़ी कर उतरे ही थे कि एक सभ्रांत सी फैशनेबुल महिला दौड़ती सी हमारी गाड़ी के पास आई उनको शायद उस शाम के अंधेरे में अकेले ही चलता देख कुत्तों के झुंड ने उनको सुरक्षा प्रदान करने की उतावली में शायद दौड़ा दिया था महिला दौड़ती हुई आयी व डरी हुई सी मेरी गाड़ी के पास ही खड़ी हो गयी । दोनो बच्चियां भी उन कुत्तोँ से बचने को गाड़ी के अंदर ही हो चली अब बाहर रह गयी वह महिला और मैं, मुझे उनको ऐसे बाहर ही छोड़ कर गाड़ी में बैठना उचित नहीं लगा तो मैंने उनसे पूछा कि उनको कहाँ जाना है बोली कि यहीं नजदीक एक डेंटिस्ट हैं उनके पास, हमने सोचा पत्नी और साली जी की मेहंदी में तो समय लगेगा ही और फिर मेरे साथ दोनो ही बच्चियां हैं ही तो इनको इनके गंतव्य छोड़ ही आया जाय क्योंकि वहांअँधेरा भी था और आसपास कोई ऑटो या रिक्शा भी नहीं दिखाई पड़ी । खैर बच्चियों के कहने पर वो मोहतरमा गाड़ी में पीछे बैठ ही गयी और हम उनसे रास्ता पूछ उनको छोड़ने चल पड़े । खैर लगभग आधा ही किलोमीटर बाद उनको छोड़ा और फिर वापसी के लिए आगे से u turn लेने बढ़े तो मैंने बच्चों से कहा कि बच्चों कहीं से कुछ पेस्ट्री या केक मिलेगा तो देख लेना तुम्हारी मम्मी की रात 12 बजे सरप्राइज देंगे । खैर पहले कोई गोकुल स्वीटशॉप आयी मैंने बच्चोंसे कहा कुछ ले आओ बच्चे बोले पापा थोड़ा आगे देखते हैं थोडाआगे चलते ही संयोगवश एक बहुत बड़ी सी बेकरी शॉप दिखाई दे ही गयी हमने गाड़ी रोकी और पहले बाहर से ही उसका जायजा लेना उचित समझा कि अंदर जांयें या नहीं क्योंकि बेकरी शॉप जरा हाई figh सी दिख रही थी छोटी बेटी जो जरा मेरी ही तरह समाजवादी प्रवृत्ति की है बोली पापा यहां कुछ नहीं मिलेगा क्योंकि उसको डर था कि पापा अंदर जाएंगे और रेट पूछ पाछ कर बिना कुछ लिए  वापस आ जाएंगे तो उनकी इंसल्ट हो जाएगी । पर चूंकि समय कम था और मौका सरप्राइज वाला तो मैंने हिम्मत दिखाते हुए छोटी बेटी को शांत किया कि नहीं छोटे तुम्हारी मम्मी का जन्मदिन है तो पैसे की कोई दिक्कत नहीं, डरो मत चलो चलते हैं,बड़ी बेटी ऐसे अवसरों पर अपनी कान्वेंट में सीखी अंग्रेजी और tofel की तैयारी और उसके पहले ही प्रयास में 95 स्कोर पा लेने के आत्मविश्वास का प्रदर्शन ऐसे स्थानों पर करना ज्यादा बेटर समझती है । पर मैं ऐसा ही रहता हूँ जैसा कि किसी ठेले वाले भाई से कुछ खरीदने के समय या अपने चकराता के छिद्दू भाई से 10 रुपये की जलेबी लेने के टाइम । खैर तीनों हिम्मत कर अंदर गए और शो रूम में रखे विभिन्न बेकरी पकवानों का निरीक्षण करने लगे कि हमारे बजट में क्या होगा, वहां कुछ केक भी रखे थे, मैंने वहां तैनात लड़की से पूछा कि क्या ये केक ताजे ही हैं तो जवाब में लड़की झेंपी और समझ गयी कि ये अंकल शायद पहली बार ऐसी जगह आये हैं, मेरे इस सवाल पर बड़ी बेटी ने अपनी कान्वेंट वाली स्माइल उस दुकान वाली लड़की को दी और मुझे कोहनी मार कर बोली पापा यहां ऐसे मत बोलो । इसी बीच छोटी बेटी ने अपने समाजवाद का प्रदर्शन करते हुए रुपये 150 का एक आइटम पसंद कर लिया और अपनी इस खोज पर उत्साहित होते हुए हमको बोली कि पापा ये ले लेते हैं अच्छा है, उसको लगा कि पापा का काम 150 रुपये में हो ही रहा है और फिर दुकान के अंदर आ ही गए तो खाली हाथ वापस भी नहीं जाना पड़ेगा । पर मुझे लगा कि केक तो ले ही जाना चाहिए मैं अब अपने चिर परिचित गांव, देहात के अंदाज में आ ही गया और दुकान वाली लड़की से विभिन्न केक के दाम पूछने लगा, उसके बताये जाने पर सबसे कम कीमत का रुपये 500 का केक मेरी जानकारी में आया फिर और भी आश्वस्त होने के लिए मैंने उससे कन्फर्म कर ही लिया कि क्या इससे भी कम का कोई केक मिल सकेगा ? जवाब में वह दक्षिण भारतीय सी दिखने वाली लड़की ऐसे मुस्कराई कि अंकल तो मेरे ही जैसे हैं और बड़े ही अपनत्व वाले भाव से बोली बस 500 का तो यही यह इसी बीच बड़ी बेटी अपनी कान्वेंट अंग्रेजी में उसको यह दिखाते हुए कि हम इससे महंगा भी ले सकते हैं पर मम्मी को चूंकि पाइन एप्पल केक ही पसंद है तो यही पैक कर दो, समाजवादी बेटी का 150 का एक छोटा आइटम और एक आइटम बड़ी बेटी का भी ले ही लिया, इस प्रकार कुल 800 का भुगतान अपने कार्ड से कर हम तीनों विजयी मुस्कान लिए दुकान से बाहर चल दिये । समान डिक्की में रखा और मेहंदी वाली जगह पहुंचे ही थे कि श्रीमती जी बड़े ही रौद्र रूप में मेरे पास आई और पूछा कि कहां छोड़ कर आये उसको, कौन थी , क्या मतलब था 😭😭🥱🥱

वो तो शुक्र था कि दोनों बच्चे साथ थे तो जान बच गयी खैर बच्चों ने बात संभाल ली और हम वापस घर को चले । रात 12 बजे श्रीमती जी का गुस्सा अपना सरप्राइज देख कर शांत हुआ ।

दिल्ली कथा ।