वैसे तो मुझे पता नहीं कि कब मेरा जन्म हुआ या यूं कहें कि कब मैं उगा । पर मुझे याद है जबसे मैंने होश संभाला था तो हर साल बड़ी ही तेज बारिश आती थी, तेज आंधी चलती थी और कई बार तो पास के गांव में रहने वाले लोग हमारे आसपास खड़ी सुखी घास को जलाने के लिए आग भी लगा देते थे । उस आग की लपटों को अपने बचपन से ही कई बार महसूस किया है और जलने से बच भी जाता था । पर देखता ही रहता था कि मेरे आसपास मेरे बुज़ुर्गों और मेरे साथियों की संख्या साल दर साल घटती ही जा रही है । इधर कुछ सालों पहले गांव के लिए सड़क का भी काम शुरू हुआ, रोज कोई न कोई सर्वे वाला आ खड़ा होता था मैं सबकी बातें सुनता ही रहता था, कि रोड किधर से निकाली जाय और कितने पेड़ काटने पड़ेंगे । मैं उनकी बात सुन कर सिहर सा जाता था कि क्या पता मैं और कितने दिन का मेहमान हूं । पास के स्कूल के बच्चे मेरे पास से होकर ही गुजरते थे, और जाड़ों में तो मेरे ही सूखे फूल उनकी अंगीठी में जला करते थे । कई बार तो ये लड़के मेरे ही आसपास पकड़म पकड़ाई खेला करते थे इनको मस्त खेलते देख कर मुझे भी अपना बचपन याद आ जाया करता था । मेरे भी आसपास मेरे साथी हुआ करते थे । अब मैं अकेला सा ही रह गया हूँ । तीन साल पहले किसी ने फिर से जंगल की घास को जलाने के लिए आग लगा दी थी यह आग कुछ ज्यादा ही थी और इससे मेरा तना बहुत अंदर तक जल गया था । दर्द तो बहुत हुआ पर क्या करता । उसी साल मेरे ही सामने खड़ा मेरा एक साथी एक दिन तेज आंधी में आखिरकार गिर ही गया क्योंकि उस आग में उसका भी तना जल गया था । अगले दिन सुबह जब स्कूल खुला तो मैंने मास्टर जी को कहते सुना कि चलो अच्छा हुआ कि यह पेड़ इतवार वाले दिन गिरा और स्कूल की बिल्डिंग पर नहीं गिरा वरना तो बहुत नुकसान होता । फिर वह कुछ सोचते सोचते मेरे ही पास आकर खड़े हो गए और मुझे ध्यान से देखने लगे । कुछ देर बाद बोले कि इस पेड़ का भी कोई भरोसा नहीं कि कब गिर जाए,इधर मेरे ही नीचे स्कूल की नई बिल्डिंग का काम शुरू हो गया था । इधर मैंने एक दिन कुछ बच्चों को कहते सुना कि गुरु जी ने जंगलात विभाग की लिखित में दे दिया है कि यह पेड़ बच्चों और स्कूल के लिए बहुत बड़ा खतरा बन सकता है अतः जल्द से जल्द इसको काट दिया जाय । यह सुन कर मैं डर गया और भगवान से प्रार्थना करने लगा कि भगवान पहले तो मुझे जलने की पीड़ा सहनी पड़ी क्या अब खुद को कटवाने की भी पीड़ा सहनी होगी । मैं मन ही मन भगवान से प्रार्थना करता कि किसी तेज आंधी में ही मैं गिर जाऊँ । पर भगवान को भी यह मंजूर नहीं था । इधर दो साल बीत गए मैं सुनता तो रहता ही था कि कुछ लिखा पढ़ी चल रही है कि मुझे जल्द से जल्द काट दिया जाय । मुझे सब लोग स्कूल के भवन और उसमें पढ़ने वाले बच्चों के लिए खतरा मानने लगे थे,तेज हवा में तो बच्चों को भी मेरे पास न जाने की हिदायत दी जाती थी, कई कई बार तो मैं बिल्कुल अकेला ही रह जाता । आखिर इसमे मेरी क्या गलती थी, मैं तो और भी 50 या 100 साल ऐसे ही खड़ा रह कर इनको छाया, लकड़ी और अपने फूल देता रहता था, चिड़ियों को घोंसला बनाने के लिए मेरी बड़ी बड़ी डालियां अच्छी लगती थी । कुछ लोगों ने आग लगा कर मेरे तने को कमजोर कर दिया और अब मैं इनके लिए खतरा बन गया । अब खुद मेरी भी जीने की इच्छा नहीं बची, जो बच्चे मेरे आसपास खेला करते थे अब मुझे उन्ही के लिए खतरा बताया जा रहा है अब रखा ही क्या है ऐसे जीवन में । खैर कल फिर कुछ लोग आए और सुना कि शिक्षा विभाग का भी कोई अधिकारी आया,वन विभाग वाले लोगों को मैंने कहते सुना कि हम कोशिश तो पूरी करेंगे कि स्कूल भवन को कोई नुकसान न पहुंचे किन्तु फिर भी कुछ हुआ तो हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं । शिक्षा विभाग का अधिकारी बोला कि कोई बात नहीं स्कूल बंद है और बच्चे भी नहीं हैं आप इसे काट ही दो और पूरी कोशिश करो कि बिल्डिंग को कोई नुकसान न हो । बस उसकी सहमति मिलते ही दो लोग अपना आरा लेकर मुझे काटने लगे । वैसे मैंने मन मे सोच ही लिया था कि अब इस जीवन मे कुछ शेष नहीं बचा और फिर कुछ ही देर के उनके संघर्ष के बाद मैंने अपने आपको स्कूल बिल्डिंग को बचाते हुए गिरा ही दिया । सब लोग खुश थे कि चलो स्कूल बिल्डिंग बच गयी और बच्चों को भी कोई नुकसान नहीं हुआ । पर मैं कहाँ किसी को नुकसान पहुंचा रहा था । शायद मेरी लकड़ी अब किसी के घर का फर्नीचर बनेगी या हो सकता है कि मैं फिर किसी मुर्दे को उसकी अंतिम यात्रा के लिए भी जला दिया जाऊँ ।