Tuesday, December 7, 2021

चरवाहों के साथ

पहाड़ों की अधिक ऊंचाई पर  बहुत से स्थान ऐसे होते हैं जहां सदियों से उन ऊंचे स्थानों के पास बसे गांव के लोगों का बराबर आना जाना रहा है । सदियों से भेड़ और बकरियों को चराने ले जाया जाता रहा है तथा इन दुर्गम स्थानों पर हमारे स्थानीय ग्रामीण विषम परिस्थितियों में महीनों तक गुजारते हैं । अपने चकराता प्रवास के दौरान ऐसे ही कई स्थानों पर इन दुर्गम रास्तों पर  पैदल भृमण का अवसर मिला है तथा इन लोगों के जीवन को नजदीक से देखने का मौका मिला । ऐसी ही एक यात्रा कल अपने साथी श्री आर्यन जी के साथ की गई । स्थान का नाम भेदाच, मोराच जो कि हिमाचल में स्थित 3140 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक शिखर है तथा एक छोटा सा बुग्याल । यहां पहुंचने के लिए उत्तराखंड के त्यूणी से सड़क मार्ग द्वारा हिमाचल के साँसकिर तक गए फिर साँसकिर से ऊपर लगभग 4 घंटे का पैदल व अत्यंत दुर्गम मार्ग । रास्ते मे ऐसे ही जीवट वाले भेड़ बकरी चरा रहे और महीनों तक घर से दूर इस जंगल मे रह रहे इन 04 सज्जनों से मिलना हुआ । इनके डेरे के पास से हम गुजरे तो ये अपने भोजन की तैयारी में थे, जितना भोजन बनाया था अपने चारों की थाली में परोस कर बस खाने की तैयारी में ही थे कि हमको आता देख रुक गए क्योंकि यदि ये अपनी थाली के भोजन को खाना शुरू कर देते तो भोजन झूठा हो जाता और इस जंगल मे आया अतिथि भूखा रह जाता । इन्होंने अपने भोजन से हमको भी भोजन कराया हालांकि हमारे पास भी रोटी सब्जी व अचार था किंतु इनका अनुरोध ठुकराया नहीं गया और इनके साथ ही भोजन किया । हमने इनके दाल चावल खाये व इनकी चूल्हे पर बनी बड़ी ही अद्भुत रोटी खाई जो कि हमारे घरों में बनने वाली लगभग 5 रोटियों की मोटाई के बराबर 01 ही रोटी लग रही थी । बहुत सारी बातें हुईं इनके जीवन व संघर्ष को समझा व फिर आगे का मार्ग पूछ कर हम वापसी में चाय जरूर पीने का वायदा कर आगे बढ़े । आगे के रास्ते के बारे में इनके द्वारा बता दिया गया था कि थोड़ा खतरनाक रहेगा क्योंकि अब हमको पहाड़ की धार यानी चोटी पर ही चलना था जो कि संकरा मार्ग होता है व जंगल मे भालू व गुलदार मिलने का भी भय रहता है । खैर हम सकुशल अपने गंतव्य पहुंचे व वापसी में इनके पास आकर बिना दूध की अमृत तुल्य चाय भी पी । मन तो कर रहा था कि एक रात इनके ही साथ जंगल मे बिताई जाय पर हमारे पास कोई स्लीपिंग बैग इत्यादि नहीं था व हमने पहले ही दुर्गम जीवन जी रहे इन सज्जनों को परेशान करना उचित भी नहीं समझा । और इनसे विदा लेकर और इनके जीवन व जिजीविषा व जीवट के विषय मे विचार करते हुए वापसी का रास्ता पकड़ा ।
हम लोग कई यात्रा पुस्तकों व सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में अक्सर पढ़ते रहते हैं कि फलां स्थान किसी अंग्रेज ने खोजा, फलां किसी दूसरे अंग्रेज ने किन्तु मुझे लगता है कि हमारे इन ग्रामीणों का तो सदियों से इन स्थानों पर आना जाना अपने जीवन के विभिन्न प्रयाजनों के कारण अंग्रेजों के भी आने से पहले होता रहा है कदाचित अंग्रेजों द्वारा इन स्थानों को बाहरी दुनिया के संज्ञान में लाने का ही मात्र काम किया गया अतः अपनी अगली पीढ़ी को यह बताया जाना कि स्थान हमारा व खोज किसी बाहरी अंग्रेज द्वारा की गई अत्यंत हास्यास्पद लगता है । हमारे ग्रामीण लोग सदियों से इन जंगलों पर आजीविका हेतु निर्भर रहे हैं, प्रत्येक ऊंचे स्थान पर मान्यता के अनुसार सदियों से अपने इष्ट देवता की पूजा भी अपने ही हिसाब से करते रहे हैं किंतु बस इनका संपर्क बाहरी दुनिया से नहीं था और बाहरी दुनिया को इन स्थानों की आज भी जानकारी ज्यादा है भी नहीं । अतः यह श्रेय किसी अंग्रेज को न जाकर इन स्थानीय लोगों को ही दिया जाय । अमूमन माउंट एवेरेस्ट पर चढ़ने वाले का नाम तो जोर शोर से लिया जाता है किंतु जो शेरपा व पोर्टर उसका समान ढो कर साथ मे चलता है उसका नाम कोई नहीं जानता वह तो अपनी आजीविका हेतु अनेकों बार उस पहाड़ की ऊंचाई नाप चुका होता ह
 वापसी में साँसकिर के ऊपर बने उत्तराखंड व हिमाचल दिनों ही के बीच स्थित शिखर पर स्थित शीलगुर देवता मंदिर के दर्शन किये जहां पर वर्ष 2015 के दिसंबर में भी मेरा अचानक ही अपने एक सहयोगी के साथ हुआ था जब यहां कोई बड़ी पूजा हुई थी । हुआ यूं कि मैं उनके गांव गया हुआ था सुबह उठे तो ऊपर बहुत ऊंचाई से ढोल बजने की आवाज सुनाई दी मैंने कोतुहल वश पूछा कि वहां क्या है उनके द्वारा बताया गया कि एक मंदिर है व कदाचित आज कोई पूजा है इसलिए ढोल बज रहा है । मैंने बोला कि क्या हम वहां चल सकते हैं तो श्री शर्मा जी सहर्ष तैयार हो गए और बोले कि चलिए रास्ते मे अपने कुल देवता महाराज के भी दर्शन हो जाएंगे । रास्ते मे पड़े अन्य गांव बागिया से उनके साथ उनके बचपन के सखा भी हो लिए लगभग 2 घंटे की सीधी चढ़ाई के बाद ऊपर शिखर पर पहुंच कर नजारा अद्भुत मिला, बहुत बड़ी संख्या में लोग व बच्चे आये हुए कोई बड़ी पूजा जो प्रत्येक 5 वर्षों के बाद होती है उस दिन हो रही थी । लोगों के लिए वहीं भंडारे का भी आयोजन था और वहीं हमारे एक अन्य साथी भी मिल गए श्री जयपाल सिंह जो कि हिमाचल की और से आये थे । हमारे साथ आज पुनः आये स्थानीय युवा जीतू द्वारा बताया गया कि इस वर्ष दिसंबर 2020 में भी वही बड़ी पूजा आयोजित होगी मुझे फिर उस 5 वर्ष पहले की गई उस यात्रा का स्मरण हो आया ।

Monday, November 22, 2021

कृषि बिल और किसान

[22/11, 20:48] Pankaj Kumar: वर्ष 1973, उस समय के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के हरिद्वार से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक गांव में जन्म लिया । शायद वर्ष 1980 से दुनिया को थोड़ा बहुत समझ पाने की समझ विकसित हो गयी थी । घर का मुख्य व्यवसाय खेती हुआ करता था, संयुक्त परिवार के पास लगभग 160 बीघा जमीन जिस पर 40 बीघे में बाग था बाकी पर खेती हो जाती थी । खेती में मुख्य तौर पर हम गन्ना, गेहूं, चावल, कभी कभी मटर, थोड़ी बहुत अपने घर के 30 से 35 सदस्यों के वर्ष भर खाने के लिए अरहर, मूंग, उडद की दाल मिश्रित खेती के रूप में उगाया करते थे । यानी गन्ने के खेत मे या किसी खेत की मेड पर ये फसलें हो जाया करती थी ।

वर्ष 1992 संयुक्त परिवार का विभाजन हुआ और अब प्रत्येक परिवार के पास लगभग 25 बीघा जमीन खेती की आई बाकी पर बाग ही था । इस समय भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नकदी फसल गन्ना ही हुआ करती थी जो आज भी है । पश्चिमी उत्तर प्रदेश काफी समृद्ध इलाका रहा है शायद हरयाणा से हम हर मामले में टक्कर लेते रहे हैं । खान पीन, खेती बाड़ी, भाषा बोली और एक अखड़ जीवन शैली । 

वर्ष 1987
जनपद मुजफ्फरनगर के शामली के पास के एक बड़े गांव से एक किसान आंदोलन शुरू होता है जिसके नेता स्वर्गीय श्री महेंद्र सिंह टिकैत होते हैं । टिकैत एक पदवी है जो कि उस इलाके के जाटों के लगभग 40 गांव की एक खाप के सर्वमान्य नेता को पगड़ी के तौर पर भेंट की जाती है । यह पगड़ी इस परिवार के पास टिकी हुई है अतः इनको टिकैत का नाम दे दिया गया । श्री महेंद्र सिंह एक साधारण किसान थे जिनके द्वारा पहली बार शायद उत्तर भारत मे एक बड़ा किसान आंदोलन शुरू किया गया था । उस समय की सरकारों की प्राथमिकता में शायद खेती और किसान शायद कहीं भी नहीं आता था और न ही किसानों का खुद का कोई संगठन था और न ही कोई गैर राजनीतिक नेता । स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह चूंकि एक किसान परिवार से आते थे तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ही रहने वाले थे अतः उस समय चौधरी साहब की गांव देहात के किसानों में अच्छी पहुंच थी ।

इधर वर्ष 1987 में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत जी का उदय एक किसान नेता के रूप में हुआ जिनके द्वारा तत्समय उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार के मुखिया स्वर्गीय श्री वीर बहादुर सिंह को अपने स्थान सिसौली गांव आने को विवश किया और किसानों की मांगें मनवाई जिनमे बिजली के बिल व गन्ने की कीमत का मुद्दा सबसे बड़ा था । उस समय मैंने भी चौधरी साहब की काफी रैली अटेंड की थी ये जमीन से जुड़े नेता थे और बिल्कुल देसी ठेठ अंदाज और ठोस किस्म के किसान थे । 

इधर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन एक मजबूत ताकत बन चुकी थी और बहुत सी राजनीतिक पार्टी चौधरी साहब को लुभाने में लगी थी किन्तु चौधरी साहब का नियम था कि अपने जीवन काल मे उन्होंने किसी भी पार्टी के नेता को अपना मंच इस्तेमाल करने नहीं दिया । उन दिनों इस संगठन का नाम भी भारतीय किसान यूनियन राजनीतिक हुआ करता था । 

उन्ही दिनों महाराष्ट्र में श्री शरद जोशी भी शेतकरी आंदोलन नाम से एक बड़ा किसान आंदोलन चलाते थे तथा इन दोनों ही के बीच कई बार बातचीत भी हुई व संयुक्त रूप से उस समय की देश की कांग्रेस की सरकार के खिलाफ इनके द्वारा बड़े आदोंलन किये गए । उन दिनों BJP एक बहुत ही छोटी सी राजनैतिक पार्टी हुआ करती थी । 

खैर वर्ष 1990 आया और मैं गांव छोड़ कर नौसेना में जवान के रूप में भर्ती हो गया जो कि ज्यादातर किसानों के बच्चों का सबसे बड़ा सपना होता है । या तो फौज में जवान बनना या फिर पुलिस में सिपाही, पटवारी, रोडवेज में ड्राइवर या कंडक्टर या फिर ज्यादा से ज्यादा ITI पास कर कहीं कुछ कर लेना ।

इधर वर्ष 2000 में उत्तराखंड के रूप में एक नया राज्य बन गया और हमारा इलाका इस नवीन राज्य में आ गया । नवीन राज्य बनते ही इसमे बड़े पैमाने ओर उद्योग लगने शुरू हुए और एक बहुत बड़ा औद्योगिक केंद्र तो हमारे गांव से 8 किलोमीतर की ही दूरी पर शुरू हो गया । इन उद्योगों ने गांव में उपलब्ध सारी मैनपावर छीन ली, इसी बीच हम दो हमारे दो ने भी खेती के लिए मैनपॉवर की कमी कर दी । 

अब छोटी या बड़ी जोत का किसान खेती करने में असमर्थ सा हो रहा था अतः अधिकतर ने अपनी जमीन में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर शुरू कर दी, गेहूं और चावल सिर्फ उतना जितना कि पूरे वर्ष घर के खाने को हो जाय । गन्ने की खेती का एक फायदा होता है कि इसकी बुवाई के ही समय लेबर की जरूरत होती है इसकी कटाई के लिए ऐसे लोग मिल जाते हैं जिन्हें अपने पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था करनी होती है जो कि गन्ने का अगला हरा हिस्सा होता है जिसे वो लोग फ्री ले जाते हैं और किसान का गन्ना काट कर उसे देते हैं । मेरे गांव में आज भी यही व्यवस्था चल रही है । इसी बीच मैनपावर की और भी दिक्कत हुई और अब गन्ने के स्थान पर लोगों ने अपनी जमीनों में पॉप्लर का पेड़ लगाना शुरू कर दिया जिसे लगभग 6 से 7 साल बाद कटवा कर अच्छा मुनाफा मिल जाता है । यानी खेती करनी ही बन्द सी हो गयी ।

आज मेरे इलाके में सबसे ज्यादा पैदावार गन्ने की ही होती है और अन्य फसलें गेहूं और चावल सिर्फ अपने खाने लायक ही हो पाती हैं । इसी बीच परिवारों के बंटवारे के कारण खेती की जोत भी कम होती गयी और अब खेती एक मुनाफे का सौदा न रह कर सिर्फ गुजारे लायक का काम बन रही ।
[22/11, 20:55] Pankaj Kumar: किसान बिल आये किन्तु मेरे इलाके के किसानों को न तो इनसे कोई फायदा ही होता दिखा और न ही कोई नुकसान अतः शायद मेरे इलाके के किसान इस आंदोलन में शामिल नहीं हुए । कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का स्कोप मेरे इलाके में न के बराबर है MSP की किसी भी फसल पर कोई जरूरत नहीं क्योंकि हमारी एक ही नकदी फसल है गन्ना जिसका रेट सरकार तय कर देती है व किसानों के बैंक खातों में यह भुगतान चला जाता है । बाकी रही गेहूं और धान की फसल यह हम लोग सिर्फ अपने ही खाने के लायक उपजाते हैं किसी बिक्री मेरे इलाके में न के बराबर है । 

अतः किसान बिल और इनके फायदे या नुकसान देश व्यापी समस्या मुझे नहीं लगी हो सकता है किसी क्षेत्र विशेष पर इन बिलों का जरूर ही कोई बुरा असर पड़ रहा होगा जिसके कारण इनका विरोध हुआ है और इनको वापस लिया गया है । 

यह सब मेरा अपना थोड़ा बहुत खेती किसानी का अनुभव है बाकी मुझे भी ज्यादा समझ नहीं है । 🙏🏻🙏🏻

Friday, October 29, 2021

Regionalism in India - Experience of a Fauji turned Civilian


Regionalism in India

How a Fauji found it weired

I started my career at the age of 17 yrs in one of the organisation which had Indian or Bhartiya before its name. Indian Navy....

The year was 1990 and we all around 650 odd young sailors were recruited from all around India from differant states, speaking differant languages and belonging to differant religions and may castes as thankfully there was no reservation to segregate all of us into further categories which all the other jobs do have other than the defence forces...

1990 it was Uttar Pradesh where my village was in. Later in 2000 we became the part of Uttarakhand....

So having recruited from Uttar Pradesh I got this opportunity to undergo my training at Orrissa at Naval Training base, INS Chilka....Again there was no regional identity as we were being trained by the seniors and officers who too were from the differant parts of India. There never arose any question as to which state we came from barring only the funny incidents where we used to fondly called one another with nick names of their states as a friendly gesture. Like Tamdu, Mallu, Tambi, Dada, Jaat, Balli, Ghati, Pahadi etc..But there was still no trace of any feeling of regionalism. Having Indian before the Navy sorted out all these differances and we were to become the part and parcel of this Organisation on completion of our training of 6 months...

After our training we were transferred to undergo further training at differant training establishments located in differant states and mostly being in southern part of the country. I underwent my training at Bombay then which is in Maharashtra. After this training I got my first transfer at Goa where I spent 3 good years and witnessed celebrations of all the possible festivals of our country as we had the people from all the states living together so the celebrations too were a great affair.

My next posting again was to Bombay for 5 years, then Madras for 1 year and then Gujarat for 3 years and finally the Udupi at Karnataka for 2 years...

That was the end of my Navy job and I came out in the civil world and joined my first civil job as a Govt Teacher in an interior village of Garhwal, Uttarakhand. Here lot many other identities were thrown upon me.  

My name is Pankaj Kumar, so people even my colleagues wished to further know what my surname could be. This too did not solve their querry they then wished to know my caste, surprisingly this too did not end the matters they were further wanted to know whether I was A Garhwali or Desi....😄😄

So having been identified as an Indian for past 15 yrs did not work for me in my first civil job and so many new identities were imposed on me...And it was a big revealation for me too as to find the outside world totally differant from the organisation where I spent 15 years and I was comfortable with my just one identity of being a sailor of Indian Navy. Nothing further...


.I have completed my 10 years in State Govt job and I am still asked about my identities and many people still wonder if I am keen for a transfer to my home dist at Haridwar. When I tell them NO I AM NOT, they feel surprised....As if I am working in some foreign land. Here I am working for my country another state of this beautiful land and I feel comfortable working anywhere around the state since its the State Govt Job and I can not be transferred out of the state.....But still despite our best efforts there are times when you hear the things that you are an outsider then I really feel surprised....That how deep is the feeling of this regionalism in our minds. And I guess its hard to be erased because there may be the people around who might be fanning these feelings among the general public jus for the sake of their various gains....And there are still the people around who wish to further know as to what keeps me going around and what is my motive to work in the hills of Uttarakhand. For me these are not only the hills of this Uttarakhand state, these are the hills of भारत भूमि and I am working for the people of my भारत भूमि ।

जय हिंद ।

Sunday, July 4, 2021

एक प्रयास - राजकीयः प्राथमिक विद्यालय त्यूणी

[30/06, 13:13] Pankaj Kumar: इस विद्यालय के पुनर्निमाण हेतु पहले भी 02 बार पैसा आ चुका था किंतु दोनो ही बार पैसा वापस चला गया । कारण रहा जिस जमीन पर यह स्कूल है वह जमीन वर्ष 1960 में इस स्कूल हेतु दान दी गयी थी । इसी स्कूल के उस समय जूनियर हाई स्कूल का भी भवन बना जो कि कालांतर में इंटर कॉलेज बन कर दूसरी जगह चला गया । वर्ष 2010 तक दोनो ही स्कूलों के भवन खंडहर हो गए तथा चूंकि इंटर कॉलेज दूसरी जगह चला गया था तो उसके खंडहर भवन को गिरा कर उस पर दान देने वाले लोगों ने कब्जा करना शुरू कर दिया । चूंकि अब त्यूणी में जमीनों के रेट बहुत बढ़ गए थे तो दान देने वाले के उत्तराधिकारियों के कम में लालच आ गया कि किसी तरह जैसे इंटर कॉलेज यहां से चला गया वैसे ही यह प्राइमरी स्कूल भी चला जाय ताकि यह जमीन भी खाली हो जाये । इसलिए जब भी पैसा आता था और स्कूल की बिल्डिंग बनाये जाने का प्रयास शुरू होता था तो वो लोग आकर अध्यापकों को डरा धमका देते थे, टीचर भी चूंकि स्थानीय थे तो लोकल लोगों से उलझना नहीं चाहते थे, अधिकारी ने भी किसी ने भी कोई इंटरेस्ट नहीं लिया । इसी बीच 2015 मे मेरी यहां नियुक्ति हुई और आये दिन अखबारों में इस स्कूल की बिल्डिंग छपती रहती थी कि बच्चों की जान से खिलवाड़ । पूछने पर मुझे भी यही बताया गया कि सर इन लोगों से उलझना सही नहीं है लड़ाई झगड़ा करते हैं ।
[30/06, 13:13] Pankaj Kumar: वर्षों के संघर्ष के बाद आखिरकार हम अपने राजकीय प्राथमिक विद्यालय त्यूणी नंबर 1 के विद्यालय के नवीन भवन का पुनर्निमाण करने में सफल हुए ।
[30/06, 13:13] Pankaj Kumar: इस स्कूल को एक उदाहरण के जैसा बनाए जाने का प्रयास था तो जब बिल्डिंग बन गयी तो मैंने सबसे पहले खुद 11 हजार रुपये इस स्कूल को दान देते हए बाकी अपने टीचर्स को भी बोला । इस तरह हमने करीब 70 या 80 हजार रुपये इकठ्ठा किये और इस स्कूल में अच्छी पेंटिंग कराई और टाइल इत्यादि लगाई । इस प्रकार आज यह स्कूल एक उदाहरण के रूप में बन गया है कि यदि ईमानदारी से काम किया जाए तो सरकारी भवन भी अच्छे बन सकते हैं । इस स्कूल में आज 128 बच्चे पढ़ते हैं जो कि गरीब परिवारों से ही आते हैं । अब यह स्कूल इन बच्चों के लिए एक वरदान साबित होगा ।
[30/06, 13:13] Pankaj Kumar: वर्ष 2019 में इस स्कूल के लिए एक टॉयलेट आया मेरे लिए यह मौका था कि मैं यहां कुछ काम करवाना शुरू  करवायु। ताकि यदि मेरे सामने स्कूल को फिर से बनाये जाने का पैसा आएगा तो अंदाज हो सकेगा कि ये लोग काम करने देंगे या नहीं । इस बार सारी जिम्मेदारी मैंने ही ली क्योंकि लोकल टीचर भी किसी पंगे में फंसना नहीं चाहते थे । इस काम की जिम्मेदारी मेरे द्वारा लेते हुए जुलाई 2019 मैं त्यूणी ही चला गया और पुरानी टॉयलेट को तुड़वाने का काम खुद खड़े होकर शुरू किया । दूसरे लोग आए और ऐतराज करने लगे मैंने कहा कि भाई आपकी धमकी से काम नहीं रुकेगा, ना ही डराने और धमकाने से । मैंने इसी बीच SDM को भी बोल दिया था और त्यूणी थाने को भी बोल दिया था कि हम काम शुरू कर रहे हैं किसी भी दिक्कत की स्थिति में आपकी मदद की जरूरत पड़ सकती है । खैर शौचालय तो जैसे कैसे बन ही गया । अब अगले कदम की तैयारी शुरू करनी थी । एक दिन मैं स्कूल गया और वहां की दो बच्चियों से मुख्यमंत्री जी के लिए उनकी ही लिखावट में लेटर लिखवाया और उसे वायरल किया, ट्वीट किया, प्रेस को दिया कि मामला ऊंचे लेवल तक पहुंच सके । इस पत्र का संज्ञान मुख्यमंत्री जी द्वारा ले लिया गया और DM देहरादून को आदेश दिया गया कि मामले को देखें । हमने इस स्कूल के लिए दूसरी जमीन भी देखनी शुरू की लेकिन कोई जमीन नहीं मिली तो फिर बिल्डिंग यहीं बननी थी ।
[30/06, 13:13] Pankaj Kumar: इसी बीच पैसा भी आ गया जो कि काफी कम था क्योंकि यह पुराने समय का रेट था साढ़े बारह लाख जबकि अब साढ़े उन्नीस लाख रुपये दिए जा रहे हैं । खैर स्कूल बनाना ही था, हमने पेरेंट्स के साथ बैठक की और काम शुरू किया । पुरानी बिल्डिंग तोड़ने के टाइम मैं यहीं था ये लोग फिर लड़ने आ गए मैंने पुलिस बुला ली इसी बीच ये लोग कोर्ट में गए और मुझे मेरे नाम से पार्टी बना दिया । चकराता कोर्ट में मामला चला मैं खुद हर तारीख पर गया और यहां से हम जीत गए । हमने काम जारी रखा और वो लोग मामले को अगले कोर्ट ले गए किन्तु इनको कोर्ट से कोई स्टे नहीं मिला हमारा काम जारी रहा ।

इस स्कूल को एक उदाहरण के जैसा बनाए जाने का प्रयास था तो जब बिल्डिंग बन गयी तो मैंने सबसे पहले खुद 11 हजार रुपये इस स्कूल को दान देते हए बाकी अपने टीचर्स को भी बोला । इस तरह हमने करीब 70 या 80 हजार रुपये इकठ्ठा किये और इस स्कूल में अच्छी पेंटिंग कराई और टाइल इत्यादि लगाई । इस प्रकार आज यह स्कूल एक उदाहरण के रूप में बन गया है कि यदि ईमानदारी से काम किया जाए तो सरकारी भवन भी अच्छे बन सकते हैं । इस स्कूल में आज 128 बच्चे पढ़ते हैं जो कि गरीब परिवारों से ही आते हैं । अब यह स्कूल इन बच्चों के लिए एक वरदान साबित होगा ।

कार्य पूर्ण होने से पहले के फोटो

Monday, May 3, 2021

मेरी पहचान - मैं कौन हूँ

वर्ष 1973 मेरा जन्म हुआ । गांव का नाम बहादर पुर जट्ट जिला उस समय सहारनपुर और राज्य उत्तर प्रदेश, कमिश्नरी मेरठ, तहसील हरिद्वार, परगना ज्वालापुर । स्कूल में प्रवेश हुआ होगा 1978 में शायद । पता नहीं उस समय स्कूल के दाखिले के समय धर्म लिखा जाता था या नहीं । मुझे पता नहीं चला कि धर्म क्या है और कौन कौन से धर्म होते हैं। कक्षा 5 में आया तो पता चला कि साथ ही पढ़ने वाले जमशेद की शादी की बात चल रही है उस दिन पता चला कि जमशेद मुसलमान है और इनके यहां शादियां जल्दी ही हो जाती हैं । साथ पढ़ने वाली अन्य मुस्लिम लड़की की भी शादी जल्दी ही हो जाएगी ऐसा सुनने में आता रहता था । खैर जमशेद मुसलमान था ये तो पता चल गया पर मैं हिन्दू हूँ यह तब भी पता नहीं था और न ही किसी ने बताया । हां ब्राह्मण हूं यह बचपन से शायद इसलिए पता चला कि पिताजी को गांव के सब लोग आनंद पंडत बोलते थे, न्योता मिलता तो बाह्मणों की लिस्ट में हमारे परिवार का नाम होता । ऊपर से गांव के नाम के साथ जट्ट लगा ही था जिससे पता चलता था कि गांव में जाट ज्यादा संख्या में हैं । हीरों का बाग, चौहानों की बैठक, कुम्हरो की तरफ जहां से दादी माँ मिट्टी की हांडी मंगवाया करती थी, झींवारों का जोहड़ जिससे सिंघाड़े लाते थे, लच्छी धोबी के घर कपड़े धोने ले जाते थे तथा और भी अन्य ऐसे जाति सूचक नामों से यह तो पता चल गया था कि गांव में अलग अलग जाति के लोग तो रहते हैं पर यह नहीं पता था कि हिन्दू कोन है और किसको बोलते हैं । गांव में हर साल रामलीला होती थी जिसमे हर जाति के लोग अलग अलग पात्र बनते थे, हमारे श्री छोटन कुम्हार गांव की रामलीला के रामचंद्र हुआ करते थे और जाट श्री विनोद रावण, उनसे पहले श्री जयपाल रावण ही रावण बनते थे । कुक्कू धोबी ऐसे कलाकार थे जो हर रोल में फिट हो जाते थे तथा श्री नाम भूल रहा हूँ जो गड़रिया थे हनुमान का रोल बखूबी करते थे । इसके अलावा हरिजन बिरादरी से कुशल नर्तक गांव की रामलीला के मुख्य आकर्षण होते और श्री नाम फिर भूल गया वाल्मीकि बिरादरी से होते थे जिनकी ढोलक की थाप के बिना रामलीला अधूरी समझी जाती थी । और तो और श्री चमन लाल जी धीमान का हारमोनियम हमारी रामलीला में समां बांध देता था । नेन्द्र पंडत, या श्री नरेन्द्र भी कोई न कोई पाठ कर लिया करते थे । अन्य पात्र भी अलग अलग जातियों से मिल ही जाते थे l लेकिन तब तक भी नहीं पता था कि ये सारे लोग और मैं खुद भी हिन्दू बोले जाते हैं । न तो कभी किसी ने ऐसा बताया और न ही हमको कभी किसी को बताने की जरूरत पड़ी । शायद कक्षा 12 पास करने के बाद भारतीय नौसेना का फॉर्म भरने के समय यह कॉलम था जिसमे धर्म पूछा गया और मैंने हिन्दू लिखा । यह वर्ष था 1990 यानी जब मैं 17 साल का था तो पहली बार अपने आपको एक जाति के अलावा एक धर्म का भी हिस्सा बनते हुए पाया । नौसेना की ही सेवा के दौरान और भी धर्म के लोग मिले जिनके बारे में सुना ही था मसलन पारसी और ईसाई । वैसे शायद कक्षा 10 में एक लड़का साथ पढ़ता था डेनिस शार्प जिसने कभी नहीं बताया और न हमने पूछा कि वह क्या है बस इतना मालूम था कि इसका घर कहीं चर्च के आसपास है । बचपन में जो कुछ मुस्लिम नाम मैंने सबसे ज्यादा सुने थे वे थे फैयाज जो हमारे खेतों में तम्बाकू और सब्जी उगाया करते थे, मुनसब जो पिताजी के मित्र थे, शेर मुहम्मद एक अन्य चाचा जी के जिगरी और सलीम जो भाई पप्पू के लंगोटिया दोस्त । इसके अलावा बड़े भाई साहब के और एक दोस्त जो ठेकेदारी करते थे और हमारे घर खूब आया करते, सरदारों का भी खूब आना जाना हमारे घर मे रहा । यानी धर्म न तो कभी कोई बाधा ही बना और न ही यह दिखाए जाने का कोई प्रयास ही कभी किसी ने भी किया कि कोई अलग है । सबकी अपनी अपनी सीमा रेखा हुआ करती थी और गांव में जिसको कोई भी लांघना उचित नहीं समझता था ।

वर्ष 1984 इंदिरा जी की हत्या उस समय मैं कक्षा 6 में गांव से 5 किलोमीटर दूर शहर के स्कूल जाया करता था, पता चला कि हत्या सरदारों ने की है तो उनके खिलाफ लोगों का गुस्सा भड़क उठा,उस समय शायद 01 महीना हम स्कूल नहीं जा सके थे तथा साथ ही पढ़ने वाली लड़की मनमीत कौर का शो रूम भी नुकसान होते देखने को मिला । इसी समय पंजाब से गैर सिख मारे जाने शुरू हुए जिनमे हमारे एक फूफा जी को भी हत्या सिख आतंकवादियों ने कर दी जो पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ में प्रोफेसर थे और जिनको कई बार धमकी मिल चुकी थी कि तुम हिन्दू हो पंजाब छोड़ दो नहीं तो मारे जाओगे । इधर पंजाब और उधर कश्मीर से कम संख्या वाले हिंदुओं पर अत्याचार होना शुरू हुआ तो पता चला कि हिन्दू संख्या में जहां कम होते हैं उन्हें वहां से मार पीट कर भगाया जा रहा है । बाबरी मस्जिद के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी हिंदुओं के खिलाफ दंगे भड़क उठे और तब पता चला  कि हिन्दू नाम का भी कोई धर्म है जिसको किसी राज्य से भगाया जा रहा है ।

वर्ष 1989 और 90 में कश्मीर से कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हुआ, खबरें अखबारों में आती रहती थी, पर उनको भी हिन्दू नहीं बोला गया बस पंडित ही लिखा जाता था । वर्ष 1980 के मुरादाबाद के हिन्दू मुस्लिम दंगे, वर्ष 1987 के मेरठ के दंगे अखबारों में पढ़ लिए थे । वर्ष 1988 की एक सर्द सुबह मैं स्कूल जा रहा था तभी एक दीवार पर कुछ पोस्टर चिपके दिखाई दिए जो कुछ बाबरी मस्जिद एक्शन समिति की तरफ से चिपकाए गए थे जिससे पता चला कि कोई मस्जिद है जिस पर कुछ विवाद है । इधर तब तक कक्षा 12 में आ ही चुका था और तब तक राम जन्म भूमि की समस्या भी पता चल चुकी थी । इसी बीच क्रिकेट देखते तो 1986 से ही शारजाह में होने वाले क्रिकेट मैच में तो उत्साह चरम पर होता था । समय गुजरा 1992 में अयोधया में ढांचा गिरा और 1993 में बॉम्बे में दंगे भड़क उठे और फिर बॉम्बे में बम ब्लास्ट भी हुए । बाबरी ढांचे की घटना के ही समय मुझे गोआ से मद्रास डयूटी पर ट्रेन से जाना पड़ गया था अकेले ही पर रास्ते मे कोई दिक्कत नहीं हुई मैं रामेश्वरम सही सलामत पहुंच गया था । इसी बीच पता चला कि बाबरी मस्जिद टूटने के बाद इसका बदला लेने के लिए दंगे हुए और बम ब्लास्ट भी जिनमे दाऊद इब्राहिम का हाथ बताया गया । इस समय तक आते आते यह पता चलना शुरू हुआ कि मैं ब्राह्मण होने के साथ ही साथ एक हिन्दू भी हूं । खैर अब थोड़ा वर्तमान समय की और बढ़ते हैं । मुझे जिज्ञासा हुई कि आखिर यह हिन्दू शब्द आया कहाँ से होगा तो किताबों में लिखा हुआ पाया कि विदेशियों द्वारा सिंधु नदी के इस पार होने के कारण यहां के निवासियों को हिन्दू कह दिया गया और इस भूभाग को हिंदुस्तान बोल दिया गया । यानी हिन्दू शब्द हमे विदेशियों क
का दिया हुआ है तो फिर विदेशियों के यहां आने से पहले हमको क्या बोला जाता होगा इस पर इतिहास में कुछ भी नहीं मिलता । सिंधु घाटी सभ्यता, वैदिक काल का तो जिक्र है काफी पुराने राजवंशों का भी जिक्र है किंतु यह कहीं नहीं बताया गया कि उस समय धर्म कौन सा प्रचलित था । जैन धर्म बताया गया है, बौद्ध धर्म बताया गया है, इस्लाम धर्म, इसाई धर्म,पारसी, यहूदी सभी धर्म बताए गए, इनकी पवित्र पुस्तक भी बताई गई इनके संस्थापक भी बताए गए पर हिन्दू धर्म की न तो कोई पवित्र पुस्तक किसी भी पाठ में बताई गयी और न ही इसके कोई संस्थापक ही बताए गए । और अगर अन्य धर्मों की ही भांति इसे भी धर्म बता दिया गया तो इस धर्म का क्यों कोई इतिहास नहीं है और यदि कोई इतिहास है तो वह लिखा क्यों नहीं गया और पढ़ाया क्यों नहीं गया । क्या हिन्दू नामक शब्द को हम पर मात्र इस कारण से थोप दिया गया कि इस्लाम है, जैन है, बौद्ध है, इसाई है, यहूदी है, पारसी है तो कुछ तो इन लोगों का भी होना चाहिए चलो जब इन्ही को नहीं मालूम कि ये क्या हैं तो इनको हिन्दू ही बोल दो और साहब हम हिन्दू कहलाये जाने लगे ।

अभी एक दिन इंटरनेट पर श्री विकास दिव्यकीर्ति जी को सुन रहा था जिन्होंने संविधान के हिसाब से हिन्दू शब्द की व्याख्या की थी जिसके अनुसार जो व्यक्ति मुस्लिम, ईसाई, पारसी, यहूदी नहीं है वह हिन्दू है और जिसमे जैन, बौद्ध, सिख भी शामिल हैं यानि जो धर्म इस भूमि पर फले फूले वह सब हिन्दू कहलाये जा सकते हैं व जिन धर्मों का उद्गम इस भूमि से बाहर का रहा वह अन्य धर्म कहलाये गए । यहां यह जानना भी रोचक है कि संविधान के मुताबिक अनुसूचित जातियां मात्र हिन्दू, सिख और बौद्ध धर्म मे ही पाई जा सकती हैं । इनके अलावा किसी और धर्म मे नहीं । 

पर यहीं एक बहुत ही मजे की बात हुई कि इसी देश के एक बहुत बड़े वर्ग को इस हिन्दू शब्द से बाहर रख दिया गया और इस बड़े वर्ग को नाम दिया गया अनुसूचित जनजाति यानी ST या ट्राइबल । यहां यह समझ नहीं आ सका कि किस आधार पर इस बड़े वर्ग को हिन्दू नहीं माना गया और जिनको हिन्दू मान लिया गया उन्हें हिन्दू किस आधार पर मान लिया गया होगा । इतिहास इस पर भी मौन है । क्या यह आधार पूजा पद्धति था या जीवन शैली यह भी कुछ परिभाषित नहीं है । यदि इस वर्ग को भी हिन्दू मान लिए जाने के बाद इस वर्ग का आरक्षण भी दे ही दिया जाता तो क्या बिगड़ जाता यानि इसी देश के एक बहुत बड़े वर्ग को धर्मांतरण होने के लिए उनके हाल पर छोड़ दिया गया । धर्मांतरण क्या करता है यह एक परंपरा, विश्वास, जीवन पद्धति जो कि सदियों के संघर्ष में बाद विकसित हुई को एक ही क्षण में छिन्न भिन्न कर एक इतिहास का विनाश कर देता है । एक जीवन शैली जो विशिष्ट भगौलिक स्थिति में रहने, खान, पान, संस्कार से पनपी एक ही झटके में समाप्त कर दी गयी और फिर वह इतिहास के पन्नों में कहीं विलुप्त हो गयी । और धर्मांतरण क्या कह कर किया जाता है कि अमुक भगवान कुछ नहीं है मात्र अंधविश्वास है और अमुक गॉड बहुत कुछ है इसको मान लेने से बहुत लाभ हो सकता है । यानी उनको उनके ही हाल पर नहीं छोड़ा जाता । यदि किसी विशेष धर्म से जुड़ना ही दुनिया की सबसे बड़ी उपलब्धि है तो मेरे विचार से हमारे ही देश के अंडमान द्वीप पर आज भी ऐसे मनुष्य निवास करते हैं जिनके बारे में कोई कुछ नहीं जानता, जिनका बाहरी दुनिया से अभी तक भी कोई संपर्क नहीं हुआ और जो न जाने कितने ही हजार वर्षों से अपने ही जंगल मे अपना जीवन गुजार रहे हैं, हो सकता है उनका भी अपना कोई देवता हो और उस देवता पर उन्हें विश्वास भी हो और उसी विश्वास के सहारे हम तथाकथित सभ्य कहलाये जाने वाले समाज की ही भांति उनका भी अस्तित्व बचा है और चल भी रहा है । अभी पिछले ही साल एक सिरफिरा वहां भी चल दिया था उनको भी ईसाई बनाये जाने के चक्कर मे जिसे उन्होंने टापू पर पहुंचते ही मार दिया था ।

अंडमान की इस आदिम जाति को देखने से पता चल सकता है कि मनुष्य के जीने और मरने के बीच के समय पर धर्म का कोई खास फर्क नहीं पड़ता, शायद धर्म एक अत्यंत ही निजी अनुभव है जो किसी को कहीं भी कैसे भी हो सकता है । सभी का अपना अपना सिस्टम है जिसे जो अच्छा लगा मान लिया और अपने हिसाब से अपने इष्ट देव को पूज लिया । पर ऐसा दिखाई नहीं देता, देखने मे तो यही आता है कि मैं जिस धर्म को मानने वाला बताया जाता हूँ उसकी लाख बुराई बता दी जाती हैं, उसे बुरे से बुरा बता दिया जाता है और कहीं न कहीं गलत ही ठहरा दिया जाता है । आआख़िर इसकी जरूरत पड़ी ही क्यों, क्या एक लाइन को छोटा दिखाए जाने के लिए उससे बड़ी लाइन नहीं खींची जानी चाहिए या फिर पहले की खींची गई लाइन को बल पूर्वक मिटा कर बाद की खींची गई लाइन से छोटा कर दिया जाना चाहिए । शायद आज यही किया जा रहा है व यही होता दिखाई दे भी रहा है । मुझे गलत सिद्ध करने के रास्ते ईजाद किये जा रहे हैं, झूठ फैलाया जा रहा है और कहीं न कहीं इस लाइन को मिटाए जाने का कुचक्र भी चल रहा है । धर्म यदि एक जीवन शैली है तो इसका विकास भी अचानक से नहीं हो गया सदियों लगी होंगी, कुछ विचार जरूर आये होंगे लोगों के मन में जिनके कारण ही एक पद्धति और जीवन शैली विकसित हुई होगी और जिस समय यह विकसित हुई होगी उस समय की यही जरूरत भी रही होगी, समय के साथ ही साथ इसमे भी बदलाव आए और जहां तक मुझे जान पड़ता है कि हिन्दू धर्म ने जितना सुधार अपने अंदर किया शायद ही किसी अन्य धर्म ने किया होगा । हमने हर आधुनिक बात को सहज ही अपना लिया, हमने अंग्रेजी भी सीखी, अपना पहनावा भी बदल लिया, अपना खान पान, जीवन शैली भी वक्त के साथ बदल ली, और तो और अपने धार्मिक स्थल जाकर पूजा करना भी छोड़ दिया वहीं किसी धर्म मे रविवार की प्रेयर और शुक्रवार की नमाज के बहुत अधिक महत्व है हमने अपनी नई पीढ़ी को कभी कुछ नहीं सिखाया या बताया कि तुमको अमुक दिन तो मंदिर जरूर जाना चाहिए । कोई चला गया तो ठीक और नहीं भी गया तो भी ठीक । हमने अपनी पीढ़ी को कोई भी धार्मिक चिन्ह चुनकर पहनने को नहीं बोला,किसी ने जनेऊ पहन लिया, टीका लगा लिया, चुटिया रख ली तब ठीक नहीं रखी तब ठीक । हमारे मंदिर में प्रवेश की भी कोई बंदिश नहीं, स्त्रियां खुद ही अपना सर ढक लेती हैं यदि नहीं भी ढकती तो कोई पुजारी या पहरेदार उनको कुछ नहीं बोलता न ही कोई बड़ा सा भाला लिए उनको डराता कि सर पर पटका नहीं है या सर ढाका नहीं है । इतना उदार होने के बाद भी हमें ही intolerance कह दिया जाता है तो लगता है कि हिन्द महासागर में डूब मरना ही हमारी नियति है । हम अपने मंदिरों को अपनी निजी कमाई का दान देते हैं उस पर भी सरकार की और न जाने किस किस भी नजर लगी रहती है, और आये दिन मंदिरों की हुंडी तोड़ कर न जाने कहाँ कहाँ उनका पैसा बांट दिया जाता है और फिर भी हमको ही स्वार्थी भी बोल दिया जाता है ।

इस सबको देखने से यह भी पता चलता है कि विदेशी हमलों से पहले अपने आपको बिना हिन्दू समझे ही हमारा काम चल रहा था, हम श्रम व्यवस्था का पालन करते हुए एक ऐसा सामाजिक जीवन बिता रहे थे जिसमें हर हाथ को रोजगार था और हर सर पर छत भी थी । आज के सरकारी नौकरियों की ही भांति ABCD ग्रुप जैसे ही 4 वर्ण भी उस समय की जरूरत के हिसाब से बन गए होंगे और आज की ही IPC CrPC और विभिन्न कर्मचारी आचरण नियमावली व सरकारी सेवक अनुशासन व अपील नियमावली जैसी ही स्मृति बनी होंगी जिनका नाम आज बड़ा ही बदनाम कर दिया गया है । आज समूह क या ग्रुप A उसमे भी IAS के क्लब में मेरे जैसा समूह ख या ग्रुप B का अधिकारी प्रवेश नहीं कर सकता और न ही उनके जैसी सुख सुविधा प्राप्त कर सकता और कदाचित आने वाले इतिहास में इन व्यबस्थाओं को भी स्मृतियों की ही भांति कोसा जाएगा और इस व्यवस्था को भी भेदभावपूर्ण बताया जाएगा ।

विदेशी आये और उन्होंने पाया कि हम उनसे अलग से हैं तो उन्होंने हमारे पूजा स्थलों को तोड़ा, उनको लूटा, नष्ट भृष्ट किया और डराया धमकाया और बोले कि तुम असभ्य हो पत्थर की पूजा करते हो हमारा अल्लाह या गॉड ही असली भगवान है उसी को मानो । इस डर व प्रलोभन से काफी लोगों ने अपना लंबा सदियों का इतिहास छोड़ कर अपने को बदल भी लिया । इधर अंग्रेज आये और अपने साथ मिशनरी लाये जिन्होंने पहले अस्पताल खोले, फिर स्कूल और गरीब दीन हीन धर्म विहीन लोगों को बताया कि तुम जब तक जीसस को नहीं मानोगे स्वर्ग में नहीं जा पाओगे और बड़े पैमाने पर जंगलों में निवास कर रही एक बहुत बड़ी आबादी को एक झटके में इसाई बना दिया और इनका खेल आज भी बदस्तूर जारी है । ये लोग जो सदियों से हमारा ही हिस्सा थे और चूंकि हमारा विश्वास भी था कि एकोहम ब्रह्म, बहुधा वदन्ति तो हमने उन्हें नहीं बताया कि तुम्हारी पूजा पद्धति गलत है तुम यज्ञ करो, संस्कार करो यानी हिन्दू बनो क्योंकि यह एक अटूट विश्वास आज भी है कि यदि कोई एक सर्वशक्तिमान है तो उस तक पहुंचने के अनेकों मार्ग हैं, उसके अनेकों नाम भी हैं और जिसे जो मार्ग अच्छा लगता है वह उसका अनुसरण करते हुए उस तक पहुंच ही जायेगा । शायद अपने विशिष्ट इष्ट देव में आस्था रखे जाने के ही कारण मत तो प्रचलित थे किंतु तब भी हम हिन्दू थे या नहीं थे यह कोई नहीं जानता । हम शैव थे, वैष्णव थे, चार्वाक भी थे, नाग, किरात, किन्नर, भोट, भील, मुंडा तथा न जाने क्या क्या थे पर हिन्दू शायद हमें विदेशियों ने ही बताया । ये आये और इन्हें हमारा सब कुछ अपने से अलग लगा और चूंकि वह सब विजेता थे तो उन्होंने अपना सब हम पर थोपा । मुझे बुत परस्त बोला गया, पगान बोला गया, infidel बोला गया, non believer बोला गया, हिन्दू भी बोला ही गया और मुझे समय समय पर मेरे धार्मिक काम करने पर जजिया टैक्स लगाया गया, युद्ध मे जीती गयी स्त्रियों war booty को अपने शील की रक्षा के लिए जौहर करने पर मजबूर किया गया, पर्दा प्रथा आयी, बालविवाह भी अपनी स्त्रियों की रक्षा हेतु अपनाए गए और न जाने क्या क्या करना पड़ा, अपने धर्म और अपने प्राण बचाने हेतु हिमालय की कंदराओं में जाकर कठिन जीवन भी जीना पड़ा और यदि आज मैं अपने को इस नाम से जो मुझे दूसरों का ही दिया है पुकारता हूं तो मुझे फ़ासिस्ट, supremacist, रेसिस्ट न जाने क्या क्या कह दिया जाता है । 
हम आपस मे ही लड़ झगड़ लिया करते थे और अपने झगड़े निपटा भी लिया करते थे पर विदेशी आगमन तक भी हम शायद हिन्दू नहीं कहलाये जाते थे । जो लोग बाहर से आये उन्होंने हमारा जीवन अपने से अलग देख हमे कदाचित यह नाम दे दिया । यानी हम सभी वर्णों व जातियों के अंदर कोई तो समानता रही होगी जिस कारण उन लोगों ने हम सभी को इस एक ही नाम हिन्दू से पुकारना उचित समझा जिसे हमने कालांतर में अपना भी लिया । 
रजाकारों, मोपलो और डायरेक्ट एक्शन डे के बाद विभाजन की महान त्रासदी देख मैं भी लुटा, पिटा सा आज़ादी को बड़ी ही उत्सुकता से देख रहा था कि चलो किसी को तो किसी धर्म के नाम पर एक क्या आज तो दो देश ही मिल गए मुझे क्या मिलेगा ?? मुझे मिली धर्म निरपेक्षता और यह सीख कि अब तुम हिन्दू नहीं हो और अगर अपने को ऐसा बोलोगे तो पिछड़े, अनपढ़ और गंवार कहलाये जाओगे, मेरे मंदिरों का चढ़ावा अब सरकार का होगा जिसे मैं टैक्स अलग से देता हूँ, अल्पसंख्यक आयोग भी बन गया जैसे कि मैं बहुसंख्यक हूं तो पता नहीं क्या नहीं कर दूंगा और अब तो हाल में एक PIL भी लगी है कि इसी देश के 8 राज्यों में मैं भी अल्पसंख्यक हो गया हूँ तो मेरी भी रक्षा की जाय अब पता नहीं सम्मानित ऐसे लोग सुनते भी हैं या नहीं जिनके पूर्वज सदियों पहले ईरान से खदेड़े गए और उनको यहीं शरण मिली फुले फले और आज इसी देश की सदियों पहले की लिखी बातों की निंदा भी कर रहे हैं । ऐसे लोग मुझे क्या न्याय देंगे जिन्हें मेरी विरासत पर ही संदेह है । 

इस धर्म निरपेक्षता ने एक काम और भी किया अन्य धर्मों और मजहबो को तो अपनी धर्म और संस्कृति व भाषा की रक्षा हेतु मदरसे और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान खोलने की विधि सम्मत अनुमति दे दी पर मुझे बोल दिया तुम धर्म निरपेक्ष ही बने रहो, और तो और शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत मेरे बच्चों को किसी भी माइनॉरिटी के स्कूल में दाखिले से भी वंचित रख दिया गया भले ही वह सिर्फ नाम का ही माइनॉरिटी राह गया हो क्योंकि ऐसे हजारों कान्वेंट स्कूल इस देश मे चल रहे हैं जिनमे अमीर मेजोरिटी का बच्चा तो ऊंची फीस देकर पढ़ सकता है किंतु कोई गरीब बच्चे वहां मात्र इसलिए एडमिशन नहीं ले सकता कि उसे RTE से मुक्त रख दिया गया है । 

मैंने लोकतंत्र पर भी विश्वास जताया और एक पार्टी को वोट देना शुरू किया जो मेरे हितों की रक्षा करेगी और कल ही इसी देश के एक राज्य के चुनाव नतीजे आये और जीती हुई पार्टी ने इस पार्टी के लोगों को सिर्फ इसलिए मारना, औरतों का बलात्कार करना शुरू कर दिया कि उनके द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेते हुए अपने मन से किसी पार्टी को वोट किया था । आज यह दशा मेरी एक राज्य में हो रही है न जाने आने वाले समय मे कितनों में होगी । 

मैं कभी कट्टर नहीं था, मेरे मत मतांतर थे, लोग बोलते हैं कि 33 करोड़ तो मेरे देवी देवता ही हुआ करते थे और तो और जिस औरत को पर्दे में रखना मुनासिब समझा जाता है उस स्त्री को तो मैंने बचपन से ज्ञान की देवी, वैभव की देवी और वीर रूपिणी देवी के रूप में भी पूजना सीख लिया था । बड़े ही आश्चर्य की बात है कि अन्य सभी धर्मों के तो सारे के सारे पूजनीय पुरुष ही हैं और मुझे ही बोला जाता है कि तुम्हारे यहां तो औरतों को भी आज़ादी नहीं है । अब मैं कहाँ जाऊं और किसको अपनी पीड़ा बताऊं । मेरे शब्दकोश में तो ईश निंदा या ब्लासफेमी जैसा कुछ था ही नहीं, न ही inquisition जैसा ही कुछ हुआ, सब मस्त रहे फले, फुले अपने हिसाब से हमने तो ऋण कृत्वा, घृतम पिबैत बोलने वाले चार्वाक को भी महात्मा ही बोला, वसुधैव कुटुम्बकम बोलने वालों को आज असहिष्णु बोला जा रहा है  ।  अब तो कहीं ठौर ठिकाना ही नहीं है मेरा ।

विडंबना किन्तु यही रही कि सदियां गुजर गई, इस देश का इतिहास भी बदल गया और भूगोल भी किन्तु हम एक न हो पाए । यदि आज भी नहीं जागे तो फिर इतिहास ही बन कर रह जाएंगे आख़िर बचा भी क्या हमारे पास अपना यही एक देश जिसके पहले ही 3 हिस्से हो चुके हैं और आने वाले समय मे और भी न जाने कितने हो सकते हैं । इसमे हमारा भी क्या कोई हिस्सा बचेगा यह तो आने वाली पीढियां ही इतिहास में पढ़ेंगी । यह भी हो सकता है कि वर्ष 2050 तक सम्पूर्ण विश्व मे हमारी यह एकमात्र आश्रयस्थली भारत ही हमसे छीन ली जाय और यह 21 वी शताब्दी इस महान व प्राचीन परंपरा की अंतिम शताब्दी ही सिद्ध हो ।

Saturday, May 1, 2021

धर्मेंद्र - कमांडो एक स्मृति

कमांडो धर्मेंद्र तोमर - एक अविस्मरणीय व्यक्तित्व,

कल ग्रुप पर किसी मित्र ने लिखा कि तोमर नहीं रहा और कोविड से जंग हार गया । इस बात को पढ़ कर एक दम विश्वास नहीं हुआ और तुरंत ही उसके नंबर पर मैसेज किया जिसका उत्तर उसके बेटे ने दिया कि Uncle Papa is no more with us....जिस बात को मानने का मन नहीं कर रहा था आखिर वह सत्य निकली । धर्मेंद्र से वर्ष 1990 की जुलाई में मिलना हुआ था हम चार साथी बीआरओ लैंसडौन से भर्ती होकर नौसेना की ट्रेनिंग हेतु chilka पहुंचे वहीं उसी रात मेरठ से भर्ती तोमर और YK Sharma भी मिले । हमे रात को एक जगह रुकवाया गया कि वहीं पिछले बैच का एक सीनियर आ गया और बोला जो भी तुम लोगों के पास खाने पीने का सामान घर से ला रखा है आज ही खा लो कल तुमसे तुम्हारा सिविल का सारा सामान ले लिया जाएगा और कुछ भी वापस नहीं मिलेगा । धर्मेंद्र घर से लड्डू लेकर चला था, देसी घी के बेसन के लड्डू, जितने हम सभी खा सकते थे खा लिए बाकी हमने उस सीनियर को ही दे दिए । धर्मेंद्र उसी समय धुन का पक्का और मजबूत कद काठी का बंदा था । ज्यादा बोलता तो नहीं था पर फिजिकल में हमेशा आगे ही रहता था । खैर 6 महीने की ट्रेनिंग में कभी कभार हम सब आपस मे वेट कैंटीन में मिल लिया करते थे । ट्रेनिंग के बाद सबको अलग अलग ब्रांच मिली और फिर अपनी अपनी ड्यूटी पर तैनात हो गए । उन दिनों फ़ोन तो होते नहीं थे तो एक दूसरे से संपर्क का माध्यम पत्र ही हुआ करता था ।

वर्ष 1996 मेरी पोस्टिंग INS Viraat से कारंजा CNW हुई हमारी बैरक INS अभिमन्यु के साथ ही थी वहीं अपने 3 साथी फिर से मिले जो कमांडो बन चुके थे । तोमर, jai प्रकाश और कठैत । वहां मैं भी 3 साल रहा और बराबर मिलना जुलना होता रहता था कभी कभी हम बहुत सारे बटर में दाल फ्राई कर डिनर साथ कर लिया करते थे, इधर धर्मेंद्र को चॉकलेट मिला करती थी वह भी हम खाया करते थे । 

वर्ष 2005 में हम सभी ने अपनी नौसेना की सेवा 15 वर्ष पूरी कर छोड़ दी और हम सब वापस बॉम्बे में मिले वहीं किसी दिन यह फोटो हम 4 साथियों ने साथ साथ खिंचा ली थी जो कि वर्दी में मेरी अंतिम फ़ोटो भी है और धर्मेंद्र के साथ पहली और अब कहना पड़ रहा है अंतिम ही हो गयी । 2005 के बाद फ़ोन पर बात हो जाया करती थी हम अपने अपने संघर्ष एक दूसरे से शेयर करते थे, धर्मेंद्र ने घर के ही पास ट्रोनिका सिटी में सेटल होना पसंद किया । जब भी बात होती तो बिल्कुल बिंदास तरीके से बात करता भाई, बेफिक्र और बेखौफ आख़िर कमांडो जो ठहरा । कभी कभी बता देता था कि कश्मीर की तैनाती के दौरान किस तरह आतंवादियों से सामना हो जाता था और काफी एनकाउंटर भी हुए । हमारे योद्धा ने वहां भी अपनी छाप छोड़ी पर आज इस बीमारी ने एक भाई को छीन लिया जो दिल के बहुत ही करीब था । भले ही हम मिल जुल नहीं पाते थे पर मन मे एक विश्वास रहता है कि अपना भाई है उधर अगर कोई भी बात होगी तो देख लेगा । यह जो होने की तसल्ली होती है यही बहुत बड़ी ताकत सी होती है । भाई तू जहां भी है मुझे यकीन है तुझे भगवान ने वहां भी किसी स्पेशल टास्क के लिए बुलाया है । जिसके लिए तु ना नहीं कर सका होगा । तेरे जैसी शख्सियत की मृत्यु नहीं होती तुम लोग सदा सभी की स्मृतियों में बने रहते हो । आज यह लिखते हुए आंखें बार बार हम हो रही हैं किंतु किया ही जा सकता है । शायद भाई का साथ हम सबके साथ इतना ही रहा होगा ।

सादर नमन कमांडो ।

Saturday, April 17, 2021

नाम मे क्या रखा है

फौजी कहानी,

आज एक आदमी आया और बोला कि सर मेरी बहन जिसकी शादी एक फौजी से हुई है का नाम सही करना है । मैंने पूछा बहन ने कोन सी क्लास पास की बोला कि BA करने के बाद उसकी शादी हुई । मैंने फिर पूछा कि  क्या करेक्शन होनी है है नाम मे तो वो बोला कि 10 की मार्क्स शीट में उसका नाम अंग्रेजी में Km Nisha लिखा गया है और यही नाम उस जवान ने जब अपनी शादी डिक्लेअर की होगी तो अपने सर्विस रिकॉर्ड में लिखवा दिया । बाद में आधार बना, और उनकी बेटी का भी जन्म हुआ और बाकी सारे डॉक्यूमेंट में उसका नाम निशा ही लिखवा दिया गया क्योंकि अब वह कुमारी नहीं रह गयी थी ।

जवान ने अपनी बच्ची का नाम अपने सर्विस रिकॉर्ड में लिखवाए जाने के लिए अपने फौजी आफिस को बोला तो फौजी आफिस वालों ने उसे बताया कि आपकी पत्नी के आधार में नाम निशा है और आपकी बेटी के जन्म प्रमाण पत्र में भी आपकी पत्नी यानी उस बच्ची की माता का नाम निशा ही लिखा है जबकि आपके सर्विस रिकॉर्ड में आपकी पत्नी का नाम Km Nisha लिखा हुआ है । अब आप हमको Nisha नाम का ही प्रमाण लाकर दो तभी हम आपकी बच्ची का नाम आपके रिकॉर्ड में दर्ज करेंगे । मैंने बताया कि भाई यह काम तो एक affadavit से हो जाएगा नोटरी करा कर दे देना कि शादी से पहले नाम Km Nisha था जो कि शादी के बाद श्रीमती निशा हो गया है । किंतु उसने बताया कि फौज वाले नहीं मान रहे उनको प्रूफ ही चाहिए । मैंने समझाया कि नोटरी वाला affadavit प्रूफ ही तो है । पर वह बोला कि वो नहीं मान रहे । अब कल उस जवान से खुद ही बात करनी पड़ेगी जो कहीं पश्चिम बंगाल में तैनात है कि भाई अपने उस अधिकारी से मेरी बात करा दे जो अविवाहित लड़की के नाम के आगे कुमारी की शार्ट फॉर्म अंग्रेजी में Km लिखे जाने पर ऐतराज कर रहा है ।

Sunday, February 21, 2021

भारतीय जनमानस में बसी सरकारी अफसर की छवि



अधिकारी हो ?? जी हाँ, मैं बोल देता हूँ । PCS के थ्रू सेलेक्ट हुए ?? जी उत्तराखंड PCS में पहली बार यह पोस्ट आयी थी और हमारा ही पहला बैच है । हम्म अच्छा बढ़िया है ठाट की नौकरी कर रहे हो भाई फिर तो । सरकारी गाड़ी मिली होगी, सरकारी मकान भी मिला होगा । फिर मैं बोलता हूं कि नहीं भाई मैं किराए के मामूली से छोटे से कमरे में रहता हूँ और पैदल या फिर जो भी सवारी चलती हैं उनसे ही आवागमन करता हूँ । और कई बार तो पहाड़ों में गाड़ियों की छत पर बैठ कर या फिर यूटिलिटी और लोडर के पीछे खड़े होकर भी चल देता हूँ । यह सुन कर पूछने वाले को बहुत आश्चर्य होता है तो फिर से पूछा जाता है कि भाई फिर सचिवालय की इतने आराम वाली बिना ट्रांसफर वाली नौकरी छोड़ कर पहाड़ों में क्यों भटकने का निर्णय लिया । और तुम्हारा तो नायाब तहसीलदार में भी सिलेक्शन हुआ था वहीं चले जाते तो एक दिन SDM तो बन ही जाते, गाड़ी मिलती, बंगला मिलता और लोग भी डरते । साथ मे पुलिस का जवान रहा करता हमेशा ।


मैं फिर सोच में पड़ जाता हूँ कि भारतीय समाज मे क्या अधिकारी या अफसर सिर्फ इसलिए ही बना जाता है कि आप ज्यादा से ज्यादा सुविधा उठाओ, लोगों को अपनी पावर से डराओ और अफसर की अकड़ के साथ पूरी जिंदगी काट दो ?? मैं शायद सरकारी अफसर के खांचे में फिट ही नहीं बैठता, चाय पीकर अपना कप खुद साफ करता हूँ, कमरे पर कई बार पानी नहीं आता तो सामने जनता नल पर लाइन में लग कर भी एक दो बाल्टी पानी भर लेता हूँ,शाम को आफिस से 5 किलोमीटर चल कर वापस आता हूँ तो छेडू भाई की दुकान पर 10 रुपये की जलेबी और नेपाली ढाबे पर चाय पिये बिना कमरे की तरफ नहीं बढ़ता । अभी पिछले कुछ दिन पहले ही नेपाली भाई और उनकी पत्नी जो ढाबे पर ही रहती हैं नेपाल से उनके घर से आया हूँ चिड़वा और कुछ मीठा बड़े ही कौतूहल से खिलाया कि सर ये हमारे गांव से आया है क्या आप खा लोगे ??मैंने मजे से खाया और तारीफ भी की । 

आज चकराता में  6 वर्ष होने को हैं, हर दुकानदार, झाड़ू वाला, छोटे छोटे बच्चे, मजदूर, गाड़ियों के ड्राइवर सभी तो मुझे जानते हैं । पर हाँ बहुत ही कम लोगों को पता है कि मैं कौन हूँ ?? क्योंकि भारतीय जन मानस में अफसर या अधिकारी की जो छवि बन चुकी है उससे मैं मेल ही नहीं खाता, क्योंकि मैं उनके ही जैसे एक आम आदमी का जीवन उनके बीच रह कर व्यतीत कर रहा हूँ । ज्यादातर लोग तो मुझे गुरु जी ही कह कर बुलाते हैं । और मैं भी उनका यह भृम नहीं तोड़ता । 😄😄 पर शायद मुझे लगता है कि जो अनुभव मुझे इस आम आदमी के जीवन को जीकर यहां पहाड़ों में हुए वह शायद एक अफसर की अफसरी से कहीं ज्यादा मूल्यवान हैं ।