[22/11, 20:48] Pankaj Kumar: वर्ष 1973, उस समय के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के हरिद्वार से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक गांव में जन्म लिया । शायद वर्ष 1980 से दुनिया को थोड़ा बहुत समझ पाने की समझ विकसित हो गयी थी । घर का मुख्य व्यवसाय खेती हुआ करता था, संयुक्त परिवार के पास लगभग 160 बीघा जमीन जिस पर 40 बीघे में बाग था बाकी पर खेती हो जाती थी । खेती में मुख्य तौर पर हम गन्ना, गेहूं, चावल, कभी कभी मटर, थोड़ी बहुत अपने घर के 30 से 35 सदस्यों के वर्ष भर खाने के लिए अरहर, मूंग, उडद की दाल मिश्रित खेती के रूप में उगाया करते थे । यानी गन्ने के खेत मे या किसी खेत की मेड पर ये फसलें हो जाया करती थी ।
वर्ष 1992 संयुक्त परिवार का विभाजन हुआ और अब प्रत्येक परिवार के पास लगभग 25 बीघा जमीन खेती की आई बाकी पर बाग ही था । इस समय भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नकदी फसल गन्ना ही हुआ करती थी जो आज भी है । पश्चिमी उत्तर प्रदेश काफी समृद्ध इलाका रहा है शायद हरयाणा से हम हर मामले में टक्कर लेते रहे हैं । खान पीन, खेती बाड़ी, भाषा बोली और एक अखड़ जीवन शैली ।
वर्ष 1987
जनपद मुजफ्फरनगर के शामली के पास के एक बड़े गांव से एक किसान आंदोलन शुरू होता है जिसके नेता स्वर्गीय श्री महेंद्र सिंह टिकैत होते हैं । टिकैत एक पदवी है जो कि उस इलाके के जाटों के लगभग 40 गांव की एक खाप के सर्वमान्य नेता को पगड़ी के तौर पर भेंट की जाती है । यह पगड़ी इस परिवार के पास टिकी हुई है अतः इनको टिकैत का नाम दे दिया गया । श्री महेंद्र सिंह एक साधारण किसान थे जिनके द्वारा पहली बार शायद उत्तर भारत मे एक बड़ा किसान आंदोलन शुरू किया गया था । उस समय की सरकारों की प्राथमिकता में शायद खेती और किसान शायद कहीं भी नहीं आता था और न ही किसानों का खुद का कोई संगठन था और न ही कोई गैर राजनीतिक नेता । स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह चूंकि एक किसान परिवार से आते थे तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ही रहने वाले थे अतः उस समय चौधरी साहब की गांव देहात के किसानों में अच्छी पहुंच थी ।
इधर वर्ष 1987 में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत जी का उदय एक किसान नेता के रूप में हुआ जिनके द्वारा तत्समय उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार के मुखिया स्वर्गीय श्री वीर बहादुर सिंह को अपने स्थान सिसौली गांव आने को विवश किया और किसानों की मांगें मनवाई जिनमे बिजली के बिल व गन्ने की कीमत का मुद्दा सबसे बड़ा था । उस समय मैंने भी चौधरी साहब की काफी रैली अटेंड की थी ये जमीन से जुड़े नेता थे और बिल्कुल देसी ठेठ अंदाज और ठोस किस्म के किसान थे ।
इधर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन एक मजबूत ताकत बन चुकी थी और बहुत सी राजनीतिक पार्टी चौधरी साहब को लुभाने में लगी थी किन्तु चौधरी साहब का नियम था कि अपने जीवन काल मे उन्होंने किसी भी पार्टी के नेता को अपना मंच इस्तेमाल करने नहीं दिया । उन दिनों इस संगठन का नाम भी भारतीय किसान यूनियन राजनीतिक हुआ करता था ।
उन्ही दिनों महाराष्ट्र में श्री शरद जोशी भी शेतकरी आंदोलन नाम से एक बड़ा किसान आंदोलन चलाते थे तथा इन दोनों ही के बीच कई बार बातचीत भी हुई व संयुक्त रूप से उस समय की देश की कांग्रेस की सरकार के खिलाफ इनके द्वारा बड़े आदोंलन किये गए । उन दिनों BJP एक बहुत ही छोटी सी राजनैतिक पार्टी हुआ करती थी ।
खैर वर्ष 1990 आया और मैं गांव छोड़ कर नौसेना में जवान के रूप में भर्ती हो गया जो कि ज्यादातर किसानों के बच्चों का सबसे बड़ा सपना होता है । या तो फौज में जवान बनना या फिर पुलिस में सिपाही, पटवारी, रोडवेज में ड्राइवर या कंडक्टर या फिर ज्यादा से ज्यादा ITI पास कर कहीं कुछ कर लेना ।
इधर वर्ष 2000 में उत्तराखंड के रूप में एक नया राज्य बन गया और हमारा इलाका इस नवीन राज्य में आ गया । नवीन राज्य बनते ही इसमे बड़े पैमाने ओर उद्योग लगने शुरू हुए और एक बहुत बड़ा औद्योगिक केंद्र तो हमारे गांव से 8 किलोमीतर की ही दूरी पर शुरू हो गया । इन उद्योगों ने गांव में उपलब्ध सारी मैनपावर छीन ली, इसी बीच हम दो हमारे दो ने भी खेती के लिए मैनपॉवर की कमी कर दी ।
अब छोटी या बड़ी जोत का किसान खेती करने में असमर्थ सा हो रहा था अतः अधिकतर ने अपनी जमीन में गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर शुरू कर दी, गेहूं और चावल सिर्फ उतना जितना कि पूरे वर्ष घर के खाने को हो जाय । गन्ने की खेती का एक फायदा होता है कि इसकी बुवाई के ही समय लेबर की जरूरत होती है इसकी कटाई के लिए ऐसे लोग मिल जाते हैं जिन्हें अपने पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था करनी होती है जो कि गन्ने का अगला हरा हिस्सा होता है जिसे वो लोग फ्री ले जाते हैं और किसान का गन्ना काट कर उसे देते हैं । मेरे गांव में आज भी यही व्यवस्था चल रही है । इसी बीच मैनपावर की और भी दिक्कत हुई और अब गन्ने के स्थान पर लोगों ने अपनी जमीनों में पॉप्लर का पेड़ लगाना शुरू कर दिया जिसे लगभग 6 से 7 साल बाद कटवा कर अच्छा मुनाफा मिल जाता है । यानी खेती करनी ही बन्द सी हो गयी ।
आज मेरे इलाके में सबसे ज्यादा पैदावार गन्ने की ही होती है और अन्य फसलें गेहूं और चावल सिर्फ अपने खाने लायक ही हो पाती हैं । इसी बीच परिवारों के बंटवारे के कारण खेती की जोत भी कम होती गयी और अब खेती एक मुनाफे का सौदा न रह कर सिर्फ गुजारे लायक का काम बन रही ।
[22/11, 20:55] Pankaj Kumar: किसान बिल आये किन्तु मेरे इलाके के किसानों को न तो इनसे कोई फायदा ही होता दिखा और न ही कोई नुकसान अतः शायद मेरे इलाके के किसान इस आंदोलन में शामिल नहीं हुए । कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का स्कोप मेरे इलाके में न के बराबर है MSP की किसी भी फसल पर कोई जरूरत नहीं क्योंकि हमारी एक ही नकदी फसल है गन्ना जिसका रेट सरकार तय कर देती है व किसानों के बैंक खातों में यह भुगतान चला जाता है । बाकी रही गेहूं और धान की फसल यह हम लोग सिर्फ अपने ही खाने के लायक उपजाते हैं किसी बिक्री मेरे इलाके में न के बराबर है ।
अतः किसान बिल और इनके फायदे या नुकसान देश व्यापी समस्या मुझे नहीं लगी हो सकता है किसी क्षेत्र विशेष पर इन बिलों का जरूर ही कोई बुरा असर पड़ रहा होगा जिसके कारण इनका विरोध हुआ है और इनको वापस लिया गया है ।
यह सब मेरा अपना थोड़ा बहुत खेती किसानी का अनुभव है बाकी मुझे भी ज्यादा समझ नहीं है । 🙏🏻🙏🏻