छोटी छोटी सी खुशियां
कल बहुत दिनों के बाद पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करने का मौका मिला । इधर कुछ महीनों से रुड़की से देहरादून के बीच प्रति सप्ताह अपनी ही गाड़ी से आना जाना हो रहा था । क्योंकि जिस स्थान पर देहरादून में हमारा कार्यालय है वह मुख्य सड़क से थोड़ा अंदर है जहां कोई भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं मिलता । तो स्थिति ऐसी होती है कि यदि रुड़की से बस देहरादून isbt तक आजकल आपको एक या डेढ़ घंटे में पहुंचा देती है तो आईएसबीटी से ऑफिस तक लगभग 12 से 15 किलोमीटर की दूरी के लिए ही एक घंटा लग जाता है जिससे कि ऑफिस में देर से पहुंचने के चांस बन जाते हैं । खैर कल शनिवार को सोचा कि चलो आज गाड़ी से नहीं पब्लिक ट्रांसपोर्ट से ही सफर किया जाय । कार्यालय के ही एक सहयोगी महोदय जिनका घर धर्मपुर में पड़ता है मुझे अपनी स्कूटी से सर्वे चौक तक छोड़ दिया । सर्वे चौक से ही आईएसबीटी के लिए 5 नंबर वाले विक्रम मिल जाते हैं । देहरादून शहर में अलग अलग रूट पर चलने वाले इन वाहनों की कुछ खास बात मैने नोट की हैं । क्योंकि वर्ष 2012 से 2015 के बीच मैं रुड़की से देहरादून के बीच डेली अप डाउन भी कर चुका हूं ।
देहरादून में चलने वाले विक्रम में आराम से तो 7 ही लोग बैठ सकते हैं जिनमे एक तो फ्रंट सीट पर ड्राइवर के पास तथा 3 /3 लोग पिछली दोनो सीटों पर । लेकिन ड्राइवर लोग पीछे की दोनो ही सीटों पर 4 लोग बिठाते हैं और यदि आप पीछे की सीट पर बैठने वाले अंतिम वाले चौथे आदमी हैं तो समझिए कि आप सीट पर तो आभासी रूप से ही बैठते हैं ज्यादातर वजन आपके अपने ही पैरों पर रहता है । कभी कभार अन्य सवारियों के शारीरिक बनावट के अनुसार आप उनके बीच अपने को फंसाए रखने की कोशिश भी करते रहते हैं किंतु यदि बाकी तीनों ही लोग खाते पीते घर के दिखाई दे रहे हैं तो फिर आपका सफर अपने आपको सीट पर छोटी सी जगह पर टिकाए रखने के संघर्ष में ही निकल जाएगा । खैर ऐसे ही अनुभवों की भट्टी में तप कर मैने निर्णय लिया कि विक्रम की ड्राइवर की सीट पर ही बैठने का प्रयास किया करूंगा और पीछे की चौथी सवारी बनने का तो बिलकुल भी प्रयास नहीं करूंगा फिर चाहे एक के बाद दो और कई सारे भरे हुए विक्रम सामने से निकल जाएं ।
खैर ये विक्रम चालक भी अलग अलग प्रकार के प्राणी होते हैं कई बार अपने पास वाली सीट खाली होते हुए भी पीछे बैठने को बोल देते हैं, हो सकता है अपने पास वाली सीट किसी महिला सवारी के लिए रिजर्व रखना चाहते होंगे । खैर मैं पीछे नहीं बैठता दूसरे किसी विक्रम की वेट ही करना उचित समझता हूं क्योंकि पीछे की सीट पर यदि आप पहली तीन सवारियों में से भी एक हैं तो चौथी सवारी के आते ही आपको लगने लगता है कि शायद आपकी सेहत कुछ ज्यादा ही अच्छी है, आपकी लंबाई भी ज्यादा ही है क्योंकि विक्रम के बिल्कुल किनारों वाली छत आपके सर से टकराती रहती है अतः आप सीधे बैठ नहीं सकते ऊपर से पूरे रास्ते यही सुनते रहो कि भाई साहब थोड़ा खिसक जाओ, जगह बनाओ, ऊपर से विक्रम ड्राइवर भी अपनी सीट पर बैठा उपदेश देता रहता है कि चार सवारी आराम से बैठ जाती हैं, आप कैसे लोग हो एडजस्ट नहीं हो रहे और सवारियों को बड़ी हिकारत भरी नजर से घूरता है तो बेचारी सवारी एडजस्ट हो ही जाती है । वैसे कई बार समझदार सवारी जिनको अपनी शारीरिक बनावट का आभास है तथा यह भी पता है उनको आराम से बैठने हेतु कम से कम कितने क्षेत्रफल की आवश्यकता होती है तो वो लोग विक्रम की पिछली सीट की चौथी सवारी बनने से स्वयं ही बच जाते हैं । किंतु कई लोग जो संघर्ष में तपे होते हैं यह जान कर भी कि पीछे उनके लिए गुंजैयाश नहीं बची है अपने डील डौल के भरोसे बैठ ही जाते हैं कि थोड़ा बहुत खुद हिल डुल कर, थोड़ा बहुत विक्रम हिल डुल कर उनके लिए जगह बना ही देगा ।
खैर ऐसे सभी अनुभवों से परिपक्व होता हुआ अब मैं विक्रम की फ्रंट सीट ही लेने की कोशिश करता हूं । खैर मुझे दो कल दो विक्रम छोड़ने के बाद तीसरे में फ्रंट सीट मिल ही गई । विक्रम की फ्रंट सीट से आप सड़क के दोनो और के बाजार, दुकानों को अच्छी तरह से देख सकते हैं तथा पिछली सीटों पर स्थान के लिए जारी संघर्ष को देखते हुए अपने आपको वीआईपी होने का भी आभास करा सकते हैं । अपनी गाड़ी से चलते हुए भीड़ भाड़ वाली जगह पर किसी दूसरी गाड़ी से टच होने का भी खतरा बराबर बना रहता है पब्लिक ट्रांसपोर्ट में आप इस चिंता से भी बचे रहते हैं और अपने गंतव्य पर पहुंच जाते हैं । इधर कई बार आईएसबीटी से रुड़की की बस भी मिलने में दिक्कत हो जाती है क्योंकि आजकल बायपास बहुत सारे बन गए हैं लेकिन कल अंदर से ही जाने वाली बस भी मिल गई तथा उसमे भी कंडक्टर के पीछे वाली मेरी पसंदीदा सीट भी मिल ही गई ।
पाठक सोचेंगे कि कंडक्टर के ही पीछे वाली फेवरेट कैसे ? तो सज्जनों यह भी तीन साल की डेली पसेंजरी ने सिखा दी है । होता क्या है कि कंडक्टर लोग कई बार चेंज न होने के कारण आपके बाकी बचे हुए पैसे टिकट पर लिख देते हैं तथा इनमे से चूंकि ज्यादातर की याददाश्त खराब होती है तो लिखे पैसे आपका गंतव्य आ जाने तक वापस देना भूल जाते हैं हालांकि आपके उतरते ही उनकी याददाश्त वापस आ जाती होगी कि चलो आज इतने पैसे बच गए तो इनकी याददाश्त को बनाए रखने तथा बचे हुए पैसे वापस लेने हेतु कंडक्टर महोदय के पीछे वाली सीट ही ज्यादा सुविधाजनक रहती है । कल खैर ऐसी दिक्कत नहीं हुई जब कंडक्टर महोदय ने बताया कि अब हम पेटीएम से भी टिकट का भुगतान कर सकते हैं । इसके अलावा आप टिकट लेते हो एक बढ़िया सी नींद भी बस में ले सकते हैं जो कि अपनी कार में संभव नहीं हो पाता । तो बंधुओं इस प्रकार हम सभी को समय समय पर इन छोटी छोटी खुशियों का अनुभव करते रहना चाहिए ।