Sunday, October 6, 2024

ग्रामीण जीवन और आधुनिकता


गांव गांव घूमते हुए मुझे तीन पीढ़ियों के लोगों से मिलने और उनके जीवन तथा अनुभवों को निकट से देखने का अवसर प्राप्त होता है । 

सबसे पहली पीढ़ी जो 65 या 70 वर्ष से ऊपर की है इस आयु के अधिकतर लोग अपने जीवन से संतुष्ट हैं तथा पूर्ण मनोयोग से अपने कार्यों में एक कर्मयोगी की भांति लगे दिखाई पड़ते हैं।  इन्हे किसी भी मनोरंजन या समय व्यतीत करने हेतु टेलीविजन या मोबाइल इत्यादि की जरूरत आज भी नहीं है । अपने दैनिक क्रिया कलापों में और परिवार के लोगों और अपने खेतों तथा पशुओं की देख रेख में इनका जीवन व्यतीत हो रहा है । इस पीढ़ी की पढ़ाई या तो बिल्कुल ही नहीं हुई थी या थोड़ी बहुत अपने ही गांव में हुई थी । यह पीढ़ी अपने जीवन से सबसे अधिक संतुष्ट दिखाई देती है ।
दूसरी पीढ़ी जो 40 पार है तथा 65 से कम है । इस पीढ़ी की पढ़ाई हुई है हाई स्कूल, स्नातक इत्यादि तथा कुछ लोग शहर में रह कर पढ़े हैं और अब अपने गांव में रह कर खेती के साथ साथ अन्य कार्य, ठेकेदारी या कोई व्यवसाय भी कर लेते हैं । चूंकि इस पीढ़ी के ही सामने गांव तक सारी सुविधाएं आई हैं तो इस पीढ़ी की निर्भरता अनेकों कारणों से इन आधुनिक सुख सुविधाओं पर बढ़ी है, अपने व्यवसाय इत्यादि हेतु सड़क, बिजली, इंटरनेट तथा मोबाइल की आवश्यकता बढ़ी है इसके अतिरिक्त यह पीढ़ी सरकारी योजनाओं का लाभ इत्यादि लेने तथा राजनेताओं तथा अधिकारियों के भी संपर्क में बनी रहती है । इनका जुड़ाव अपने बुजुर्गों तथा गांव से बना रहता है किंतु अपनी अगली पीढ़ी के लिए या तो किराए पर या फिर खुद के मकान की व्यवस्था शहर में कर दी है।  ये अपने खेतों में स्वयं भी कार्य कर लेते हैं और मजदूरों को भी लगा लेते हैं।  इन्हें सिस्टम से बहुत सारी शिकायतें होती हैं अतः थोड़ी बहुत राजनीति भी कर लेते हैं। 
तीसरी पीढ़ी उपरोक्त पीढ़ी से अगली है जो अपने खान पान, पहनावे और बोली भाषा में बिल्कुल शहरी बन चुकी है । इनके अंदर कक्षा 12 तक की पढ़ाई पूर्ण कर जल्दी ही शहर की तरफ जाने की प्रबल इच्छा रहती है जहां ये सरकारी और प्राइवेट नौकरी की तलाश हेतु तैयारी, कोचिंग इत्यादि भी करते हैं।  इनमे जो किसी नौकरी में चयनित  हो गए वो वापस गांव नहीं आते और जो किसी भी नौकरी में नहीं गए वो गांव और शहर दोनो से जुड़ तो जाते हैं किंतु गांव से उनका जुड़ाव बस विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने तथा ठेकेदारी करने तक ही सीमित है । इनका अधिकांश समय सरकारी दफ्तरों, अधिकारियों और नेताओं के इर्द गिर्द ही गुजरता है । इनकी अगली पीढ़ी शहर में ही रहती है और गांव से उस पीढ़ी का संपर्क बस त्योहारों तक में आना ही बचता है।

Monday, January 8, 2024

यूपीएससी परीक्षा और आज का युवा

इधर जबसे से सोशल मीडिया चलन में आया है तो अचानक से ही यूपीएससी के माध्यम से चयनित होने वाले आईएएस और आईपीएस बहुत अधिक चर्चा में आ गए हैं । इनमे से बहुतों ने तो अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स भी बना रखे हैं जिन पर अधिकांश द्वारा दिखाया जाता है कि कैसे अलग अलग विभागों के अपने से नीचे के कार्मिकों को ये लोग धमकाते रहते हैं । 

आजकल सोशल मीडिया ने ही ऐसे बहुत से शिक्षकों को भी जाना पहचाना नाम बना दिया है जो कि यूपीएससी की तैयारी भी कराते हैं तथा जिनके अपने कोचिंग सेंटर चलते हैं । पिछले वर्षों में यूपीएससी का सपना देखने वाले युवाओं की संख्या में भी वृद्धि हुई है तथा इनमें से बहुत से तो ऐसे भी मिलते हैं जो अत्यंत गर्व से बताते हैं कि हम यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं और यह पूछने पर कि क्या स्टेट सिविल सेवा या अन्य कोई परीक्षा भी उनके राडार पर है तो वो आपको बड़ी ही हिकारत भरी नजरों से देखते हैं कि मानों आपने उनसे कोई अटपटी सी बात पूछ ली हो । वैसे मुझे तो ज्यादा पता नहीं है क्योंकि मैंने स्वयं कभी यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा नहीं दी, ले दे कर स्टेट पीसीएस की परीक्षा ही दी थी जिसमे कि चयन हुआ और ब्लॉक स्तर के शिक्षा अधिकारी, उप शिक्षा अधिकारी पद हेतु वर्ष 2015 में चयन हुआ । हमारे ही बैच के काफी सारे साथियों द्वारा फिर से इसी परीक्षा को दिया गया क्योंकि शायद इस परीक्षा में भी एसडीएम या डेप्युटी एसपी ही सभी लोग बनना चाहते हैं । वैसे मैंने भी दोबारा उस परीक्षा का pre दे ही दिया था मात्र इस वजह से ही कि चलो नया पैटर्न भी देख लेता हूं और मेरा प्री क्लियर भी हो चुका था । किंतु जब तक मैंस परीक्षा का समय आया तो मुझे इधर एक वर्ष हो चुका था और मुझे अपना यह कार्य अच्छा लगने लगा था, कुछ कार्यों की शुरुआत भी कर दी थी और लगा कि अब इसी पद पर रहते हुए अपना कार्य सुचारू रूप से करना है ।

अभी हाल ही में किसी आईपीएस के ऊपर एक मूवी भी बनी है 12 फेल जिसे काफी पसंद किया जा रहा है । इधर देखने में आ रहा है कि बड़ी संख्या में युवा ऐसे आईएएस और पीसीएस के यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज देख कर, उनके इंटरव्यू इत्यादि देख कर उनके ही जैसा बनने के सपने देखने शुरू करते हैं।  और इसमें कोई बुराई भी नहीं दिखाई पड़ती क्योंकि युवा यदि किसी अच्छे स्तर की परीक्षा की तैयारी करता है तो वह उससे नीचे स्तर पर भी चयनित होने की संभावना रखता है । लेकिन वह स्थिति बड़ी ही विकट हो जाती होगी जब कि युवा आईएएस/आईपीएस में चयनित नहीं हो पाता और किसी दूसरे विकल्प पर विचार ही नहीं कर पाता । वैसे तो आजकल किसी यूट्यूब चैनल ने ऐसे भी कुछ युवाओं के वीडियो बनाए हैं जो इन परीक्षाओं में कई कई बार बैठे और बहुत ही कम अंतर से चयनित होने से चूक भी गए । 

अन्त में यही कहना चाहूंगा कि कोई भी आईएएस या आईपीएस अपने जिले का मुखिया तो होता ही है किंतु उसका जिला तभी अच्छा कार्य करता है जबकि अन्य विभागों के जिला स्तरीय अधिकारी और उनके मातहत हर स्तर के अधिकारी अपना कार्य सुचारू रूप से संपादित करते रहते हैं ऐसे में मात्र एक ही पद धारक के कार्य का महिमा मंडन कहीं न कहीं अनुचित सा प्रतीत होता है।  जिले के हर विभाग का सुचारू संचालन हर विभाग के अधिकारी की जिम्मेदारी होता है लेकिन शायद ही मीडिया या फिर सोशल मीडिया अन्य विभागों के कार्यों को इतनी प्रमुखता से दिखाते हैं। और जितनी मीडिया कवरेज डीएम के पद को मिलती है तो ऐसा प्रतीत होता है कि कलेक्ट्रेट या तहसील में जो इनके सीधे नियंत्रण में कार्य करते हैं वहां जरूर ऐसी कोई व्यवस्था बन जाती होगी जहां कि पब्लिक का कार्य बड़ी ही आसानी से बिना ज्यादा चक्कर लगाए हो जाता होगा । ऐसी कार्य प्रणाली अवश्य ही इस प्रत्येक कार्यालय की होनी चाहिए जिसका प्रमुख आईएएस होता है । और यदि वास्तव में ऐसा नहीं होता या कम हो रहा है तो फिर शायद इन पदों का इतना महिमा मंडन आखिर किस आधार पर किया जाता है

यदि यह आधार मात्र परीक्षा में बैठने और चयनित होने वालों की संख्या पर ही निर्भर करता है तो भी विचार करने वाली बात है क्योंकि इस परीक्षा में बैठने की शैक्षिक योग्यता मात्र स्नातक ही होती है तो ऐसे में बहुत से युवा तो कई बार इस परीक्षा का पैटर्न ही देखने के उद्देश्य से बैठ जाते होंगे और यदि यह मानक इस परीक्षा के कठिनाई के आधार पर होता है तो देखना होगा कि क्या अन्य परीक्षाएं जैसे कि कैट है या फिर वैज्ञानिक बनने में लगने वाली मेहनत और लंबी पढ़ाई इस परीक्षा के सामने कम तर होती होंगी ?

वैसे पिछले कुछ ही वर्षों में वहा भी शायद हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी के ही कार्यों से आज की पीढ़ी इसरो के वैज्ञानिकों को भी जानने पहचानने लगी है कहीं न कहीं उनकी मन की बात कार्यक्रमों में समाज के ऐसे लोगों का भी जिक्र होता है जो कि चमक दमक से दूर रह कर अपना समाज सेवा का कार्य कर रहे हैं और बड़ी संख्या में आम जन के जीवन में परिवर्तन ला रहे हैं । ऐसे में मात्र एक या दो पदों को ही हर प्रकार का महत्व प्रदान करना कहीं न कहीं बड़ी संख्या में अन्य परीक्षाओं और अन्य सेवाओं में जाने वाले तथा स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ने वाले युवाओं या ऐसी इच्छा रखने वाले युवाओं हेतु उचित प्रतीत नहीं होता ।