Wednesday, November 26, 2025

सोशल मीडिया का बदलता स्वरूप

फेसबुक पर अपना पहला प्रोफाइल शायद वर्ष 2009 या 2010 में बनाया था जब आजकल के अधिकांश युवा यू ट्यूबर और ब्लॉगर अपने बचपन में रहे होंगे । उन दिनों इसे चलाने के लिए हफ्ते में एक बार किसी साइबर कैफे पर चले जाया करते थे और बहुत पुराने जाने पहचाने चेहरे वाले प्रोफाइल देख कर खुशी होती थी कि ये भी दिखाई दे गया इतने वर्षों बाद । ज्यादातर खोज अपने नौसेना के ही मित्रों की थी जिनसे वर्ष 1990 में परिचय हुआ था और 15 साल कहीं ना कहीं मिलते जुलते रहे और वर्ष 2005 में नौसेना की अनिवार्य 15 वर्ष की सैन्य सेवा पूर्ण कर आने के बाद सब अपने अपने नवीन जीवन की शुरुआत में लग गए । हममे से बहुत से साथी मर्चेंट नेवी में भी चले गए थे जिनसे वापस इस फेसबुक के ही माध्यम से जुड़ना हुआ । शुरू में फेसबुक बस इसी जान पहचान का माध्यम भर था । फिर आता स्मार्ट फोन का युग वर्ष 2015 में अब यह आपके फोन पर भी सहज ही उपलब्ध हो गया तो शायद इसके यूजर्स और भी बड़ी संख्या में बढ़े। इस दौर में आपसी जान पहचान के इस माध्यम का स्वरूप भी बदल गया अब इसे प्रचार और अपने विचारों अच्छे या बुरे के प्रसार का भी माध्यम बनते देखा । अनगिनत लोग अलग अलग व्यवसायों में लगे थे एका एक फेसबुक पर भी अवतरित होने लगे । शायद राजनीतिक पार्टियां भी अब अपने विचारों के प्रचार का इन माध्यमों को एक बड़ा और आसान साधन समझ रही थी । कहां तो एक छोटी सी जन सभा में भीड़ जुटाने हेतु एक समय किसी जाने पहचाने फिल्मी कलाकार को बुलाना पड़ता था वहीं इस माध्यम ने यह बाध्यता भी समाप्त कर दी । अब आपके फॉलोअर आपकी एक एक बात सुनते हैं और अपनी प्रतिक्रिया भी तुरंत रख देते हैं । कालांतर में इन प्रतिक्रियाओं ने अनेकों विवादों को भी जन्म दिया कानून और व्यवस्था भी बिगड़ी । यानी अचानक से आए इस परिवर्तन से इसका जो स्वरूप बदला उसका शायद किसी को भी अनुमान नहीं रहा होगा । वर्तमान में तो अनेकों रूप सामने आ रहे हैं अब एक आम से आम आदमी भी अपना दैनिक जीवन सभी को दिखा कर प्रसिद्धि प्राप्त कर रहा है, छोटी छोटी दुकानों के मालिक, ट्रक चलाने वाले, किसान, लोक गायक और पर्यटकों ने इस माध्यम को दर्शकों हेतु और भी रुचिप्रद बना दिया है । जिन लोगों को अपने आपको किसी समय बड़ी स्क्रीन पर या टीवी की छोटी ही स्क्रीन पर देखने की इच्छा होती थी वो लोग एक समय अपनी या फिर किसी परिचित की शादी के वीडियो में अपने को देख कर खुश हो जाते थे लेकिन आज उनके पास भी विकल्प हो गया है कि छोटी स्क्रीन पर तो दिखाई दे ही सकते हैं । अनगिनत ऐसे लोग अपने पसंदीदा कलाकार की एक्टिंग और नृत्य की कॉपी करते हुए रील बना रहे हैं और अपने अंदर के कलाकार को सभी के सम्मुख रख रहे हैं । अनेक बुजुर्ग और रिटायर्ड लोग भी अपने जीवन के खाली हो चुके पलों को इस माध्यम से व्यस्त करते दिखाई पड़ते हैं वहीं बहुत से चालक उत्पादक अपना उत्पाद भी बेच देते हैं । 

खैर जो भी हो परन्तु इस माध्यम को गंभीरता से कतई नहीं लिया जा सकता अनेकों इतिहासकार, विचारक भी आपको यहां मिलेंगे किंतु उनका ज्ञान कितना है कहां से प्राप्त किया है उसकी वो कोई जानकारी आपको नहीं देते । कुछ चुनिंदा लोग जरूर इस माध्यम पर मिल जाते हैं जिनका एक लंबा अनुभव इस माध्यम पर आने से पहले का रहा है कोई पत्रकार, कोई प्रोफेसर, कोई किसी अन्य व्यवसाय के अनुभवी लोग भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं किंतु उनकी बातों को कितने लोग पढ़ते और समझ पाते हैं । शायद युवा पीढ़ी का अटेंशन स्पॉन उतना भी नहीं रह गया है कि वे कोई विचारोत्तेजक लेख इस माध्यम पर पढ़ते दिखाई देते होंगे । शायद वर्तमान में तो यह माध्यम एक बड़ी आबादी हेतु मनोरंजन का ही बना हुआ है ।

 सरकारी पेज और चैनल भी इस भीड़ में अपनी पहचान बनाए जाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं जिन्हें अभी अपने आपको उपयोगी बनाए जाने हेतु बहुत से प्रयास करने होंगे । अंत में अभी भी इस माध्यम पर पड़ोसी जा रही सारी की सारी जानकारी पर भरोसा नहीं कर लेना चाहिए । साथ ही चूंकि अपने विचार रखने की सभी को स्वतंत्रता भी इस माध्यम ने दी है तो यदि हमको किसी के विचार पसंद नहीं भी आए तो आगे बढ़ाए और कोई दूसरा पोस्ट पढ़ लीजिए जिसके विचार हमसे मिल जाएं फालतू का विवाद क्यों ही किसी से करना । यही शायद आज की युवा पीढ़ी को इन सभी माध्यमों से सीखने की आवश्यकता है । 

हम शायद वह पीढ़ी हैं जिनके सामने सोशल मीडिया का जन्म हुआ, इसे विकसित होते हुए भी देखा और इसका स्वरूप भी बदलते हुए देख रहे हैं ।

फोटो प्रतीकात्मक, कुछ बुजुर्गों के साथ जो अपने फोटो देख कर खुश हो जाते हैं ।

Tuesday, November 4, 2025

देहरादून के विक्रम में सफर और चौथी सवारी

 सभी शहरों में लोकल में सफर करने के लिए कोई न कोई साधन होता ही है । पुराने समय में साइकिल रिक्शा होती थी, घोड़े तांगे, तिपहिया छोटे साइज के और एक और प्रजाति है इन तिपहिया वाहनों की जिन्हे विक्रम कहा जाता है । उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में कई लोकल रूट पर यह प्रजाति यानी विक्रम सवारियों को ठूंस ठांस कर उनके गंतव्य तक सकुशल छोड़ देती है । 

यातायात के इस साधन से देहरादून शहर में मेरा पहला परिचय पहली बार शायद वर्ष 2007 में हुआ था जब मैं दो विक्रम बदल बदल कर आईएसबीटी से पहले परेड ग्राउंड और फिर वहां से रायपुर तक जाया करता था । शुरू शुरू में मुझे इस सवारी में सफर करने का कोई अनुभव नहीं था तो खाली सीट देख कर मैं पीछे ही बैठ जाया करता था । 

शुरू में देखा कि तीन तीन सवारी पीछे वाली सीटों पर बिठाए जाने के बाद ये चल देते हैं और फिर रास्ते में मिलने वाली 2 और सवारियों को आमने सामने वाली सीटों पर एडजस्ट करते हैं । मुझे इसका अनुभव नहीं था तो जब पहली बार चौथा आदमी बैठने के लिए आया तो समझ ही नहीं आया कि ये भाई या बहन कहां एडजस्ट होंगे पर चूंकि वो अनुभवी लोग थे तो अपने लिए जगह बना ही लेते हैं और इस बीच ड्राइवर महोदय भी लगभग डांटते हुए बोलते हैं कि चार चार हो जाओ तो उनकी आज्ञा का भी अनुपालन किया जाना अनिवार्य होता है । 

कई बार मुझे भी वह अभागा चौथा आदमी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसमे कि चौथा आदमी अपने शरीर को अपनी टांगों के सहारे और विक्रम की सीट की आभासी उपस्थिति से खुद को अटकाए हुए रखता है ।

इसी तरह के अनुभवों से तपते हुए समझ में आया कि विक्रम में मात्र एक ही सीट बहुमूल्य है जो कि ड्राइवर साहब के पास वाली आगे की सीट होती है । पहले तो वहां भी ये लोग दो सवारी बिठा लिया करते थे किंतु अब ट्रैफिक विभाग ने नियम थोड़ा सख्त किया तो अब आगे मात्र एक ही सवारी बैठती है । इधर जब से मेरे ज्ञान चक्षु खुले हैं तो अब मैं जब भी विक्रम महोदय में सफर करता हूं तो ड्राइवर महोदय के पास वाली ही सीट पर बैठने का प्रयास करता हूं । इस कारण कई बार तो कई सारे विक्रम निकल भी जाते हैं जिनमे आगे कोई सज्जन पहले ही बैठ चुका होता है और पीछे की सीट पर तीन लोग पहले से ही होते हैं तो वो अभागा चौथा आदमी बनने से बचता हूं ।  आगे की सीट मिलने की जो खुशी होती है उसका अनुभव तभी होता है जब आपकी पदोन्नति उस अभागी चौथी सवारी से ड्राइवर महोदय की बगल वाली सीट मिलने पर होती है ।