Thursday, December 3, 2020

एक पेड़ की आत्म कथा

वैसे तो मुझे पता नहीं कि कब मेरा जन्म हुआ या यूं कहें कि कब मैं उगा । पर मुझे याद है जबसे मैंने होश संभाला था तो हर साल बड़ी ही तेज बारिश आती थी, तेज आंधी चलती थी और कई बार तो पास के गांव में रहने वाले लोग हमारे आसपास खड़ी सुखी घास को जलाने के लिए आग भी लगा देते थे । उस आग की लपटों को अपने बचपन से ही कई बार महसूस किया है और जलने से बच भी जाता था । पर देखता ही रहता था कि मेरे आसपास मेरे बुज़ुर्गों और मेरे साथियों की संख्या साल दर साल घटती ही जा रही है । इधर कुछ सालों पहले गांव के लिए सड़क का भी काम शुरू हुआ, रोज कोई न कोई सर्वे वाला आ खड़ा होता था मैं सबकी बातें सुनता ही रहता था, कि रोड किधर से निकाली जाय और कितने पेड़ काटने पड़ेंगे । मैं उनकी बात सुन कर सिहर सा जाता था कि क्या पता मैं और कितने दिन का मेहमान हूं । पास के स्कूल के बच्चे मेरे पास से होकर ही गुजरते थे, और जाड़ों में तो मेरे ही सूखे फूल उनकी अंगीठी में जला करते थे । कई बार तो ये लड़के मेरे ही आसपास पकड़म पकड़ाई खेला करते थे इनको मस्त खेलते देख कर मुझे भी अपना बचपन याद आ जाया करता था । मेरे भी आसपास मेरे साथी हुआ करते थे । अब मैं अकेला सा ही रह गया हूँ । तीन साल पहले किसी ने फिर से जंगल की घास को जलाने के लिए आग लगा दी थी यह आग कुछ ज्यादा ही थी और इससे मेरा तना बहुत अंदर तक जल गया था । दर्द तो बहुत हुआ पर क्या करता । उसी साल मेरे ही सामने खड़ा मेरा एक साथी एक दिन तेज आंधी में आखिरकार गिर ही गया क्योंकि उस आग में उसका भी तना जल गया था । अगले दिन सुबह जब स्कूल खुला तो मैंने मास्टर जी को कहते सुना कि चलो अच्छा हुआ कि यह पेड़ इतवार वाले दिन गिरा और स्कूल की बिल्डिंग पर नहीं गिरा वरना तो बहुत नुकसान होता । फिर वह कुछ सोचते सोचते मेरे ही पास आकर खड़े हो गए और मुझे ध्यान से देखने लगे । कुछ देर बाद बोले कि इस पेड़ का भी कोई भरोसा नहीं कि कब गिर जाए,इधर मेरे ही नीचे स्कूल की नई बिल्डिंग का काम शुरू हो गया था । इधर मैंने एक दिन कुछ बच्चों को कहते सुना कि गुरु जी ने जंगलात विभाग की लिखित में दे दिया है कि यह पेड़ बच्चों और स्कूल के लिए बहुत बड़ा खतरा बन सकता है अतः जल्द से जल्द इसको काट दिया जाय । यह सुन कर मैं डर गया और भगवान से प्रार्थना करने लगा कि भगवान पहले तो मुझे जलने की पीड़ा सहनी पड़ी क्या अब खुद को कटवाने की भी पीड़ा सहनी होगी । मैं मन ही मन भगवान से प्रार्थना करता कि किसी तेज आंधी में ही मैं गिर जाऊँ । पर भगवान को भी यह मंजूर नहीं था । इधर दो साल बीत गए मैं सुनता तो रहता ही था कि कुछ लिखा पढ़ी चल रही है कि मुझे जल्द से जल्द काट दिया जाय । मुझे सब लोग स्कूल के भवन और उसमें पढ़ने वाले बच्चों के लिए खतरा मानने लगे थे,तेज हवा में तो बच्चों को भी मेरे पास न जाने की हिदायत दी जाती थी, कई कई बार तो मैं बिल्कुल अकेला ही रह जाता । आखिर इसमे मेरी क्या गलती थी, मैं तो और भी 50 या 100 साल ऐसे ही खड़ा रह कर इनको छाया, लकड़ी और अपने फूल देता रहता था, चिड़ियों को घोंसला बनाने के लिए मेरी बड़ी बड़ी डालियां अच्छी लगती थी । कुछ लोगों ने आग लगा कर मेरे तने को कमजोर कर दिया और अब मैं इनके लिए खतरा बन गया । अब खुद मेरी भी जीने की इच्छा नहीं बची, जो बच्चे मेरे आसपास खेला करते थे अब मुझे उन्ही के लिए खतरा बताया जा रहा है अब रखा ही क्या है ऐसे जीवन में । खैर कल फिर कुछ लोग आए और सुना कि शिक्षा विभाग का भी कोई अधिकारी आया,वन विभाग वाले लोगों को मैंने कहते सुना कि हम कोशिश तो पूरी करेंगे कि स्कूल भवन को कोई नुकसान न पहुंचे किन्तु फिर भी कुछ हुआ तो हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं । शिक्षा विभाग का अधिकारी बोला कि कोई बात नहीं स्कूल बंद है और बच्चे भी नहीं हैं आप इसे काट ही दो और पूरी कोशिश करो कि बिल्डिंग को कोई नुकसान न हो । बस उसकी सहमति मिलते ही दो लोग अपना आरा लेकर मुझे काटने लगे । वैसे मैंने मन मे सोच ही लिया था कि अब इस जीवन मे कुछ शेष नहीं बचा और फिर कुछ ही देर के  उनके संघर्ष के बाद मैंने अपने आपको स्कूल बिल्डिंग को बचाते हुए गिरा ही दिया । सब लोग खुश थे कि चलो स्कूल बिल्डिंग बच गयी और बच्चों को भी कोई नुकसान नहीं हुआ । पर मैं कहाँ किसी को नुकसान पहुंचा रहा था । शायद मेरी लकड़ी अब किसी के घर का फर्नीचर बनेगी या हो सकता है कि मैं फिर किसी मुर्दे को उसकी अंतिम यात्रा के लिए भी जला दिया जाऊँ ।

Tuesday, November 3, 2020

दिल्ली यात्रा वृतांत

दिल्ली यात्रा और श्रीमती जी का जन्मदिन,

बेटी के दाखिले के बाद उसके लिए दिल्ली में कमरा देखने जाना था इसी बीच श्रीमती जी और साली साहिबा का करवा चौथ के लिए मेहंदी लगवाने का भी कार्यक्रम बन गया । 02 नवंबर की शाम की बात है मेहंदी की तलाश और गूगल बाबा की जुगलबंदी एक ऐसे बड़े लोगों के उत्तरी दिल्ली के इलाके में गलती से ले आयी जहां बड़ी खुली सड़कें,बड़ी बड़ी आलीशान कोठियां और सड़क पर चलते बहुत ही कम लोग । संयोगवश वहीं एक पार्क के पास दो महिलाएं बैठ कर मेहंदी लगा रही थी उनको गाड़ी से उतार मैं दोनो बेटियों को गाड़ी में ही बैठा कर अदद पार्किंग की तलाश में उनसे थोड़ी सी दूर गाड़ी लेकर गया और एक जगह गाड़ी खड़ी कर उतरे ही थे कि एक सभ्रांत सी फैशनेबुल महिला दौड़ती सी हमारी गाड़ी के पास आई उनको शायद उस शाम के अंधेरे में अकेले ही चलता देख कुत्तों के झुंड ने उनको सुरक्षा प्रदान करने की उतावली में शायद दौड़ा दिया था महिला दौड़ती हुई आयी व डरी हुई सी मेरी गाड़ी के पास ही खड़ी हो गयी । दोनो बच्चियां भी उन कुत्तोँ से बचने को गाड़ी के अंदर ही हो चली अब बाहर रह गयी वह महिला और मैं, मुझे उनको ऐसे बाहर ही छोड़ कर गाड़ी में बैठना उचित नहीं लगा तो मैंने उनसे पूछा कि उनको कहाँ जाना है बोली कि यहीं नजदीक एक डेंटिस्ट हैं उनके पास, हमने सोचा पत्नी और साली जी की मेहंदी में तो समय लगेगा ही और फिर मेरे साथ दोनो ही बच्चियां हैं ही तो इनको इनके गंतव्य छोड़ ही आया जाय क्योंकि वहांअँधेरा भी था और आसपास कोई ऑटो या रिक्शा भी नहीं दिखाई पड़ी । खैर बच्चियों के कहने पर वो मोहतरमा गाड़ी में पीछे बैठ ही गयी और हम उनसे रास्ता पूछ उनको छोड़ने चल पड़े । खैर लगभग आधा ही किलोमीटर बाद उनको छोड़ा और फिर वापसी के लिए आगे से u turn लेने बढ़े तो मैंने बच्चों से कहा कि बच्चों कहीं से कुछ पेस्ट्री या केक मिलेगा तो देख लेना तुम्हारी मम्मी की रात 12 बजे सरप्राइज देंगे । खैर पहले कोई गोकुल स्वीटशॉप आयी मैंने बच्चोंसे कहा कुछ ले आओ बच्चे बोले पापा थोड़ा आगे देखते हैं थोडाआगे चलते ही संयोगवश एक बहुत बड़ी सी बेकरी शॉप दिखाई दे ही गयी हमने गाड़ी रोकी और पहले बाहर से ही उसका जायजा लेना उचित समझा कि अंदर जांयें या नहीं क्योंकि बेकरी शॉप जरा हाई figh सी दिख रही थी छोटी बेटी जो जरा मेरी ही तरह समाजवादी प्रवृत्ति की है बोली पापा यहां कुछ नहीं मिलेगा क्योंकि उसको डर था कि पापा अंदर जाएंगे और रेट पूछ पाछ कर बिना कुछ लिए  वापस आ जाएंगे तो उनकी इंसल्ट हो जाएगी । पर चूंकि समय कम था और मौका सरप्राइज वाला तो मैंने हिम्मत दिखाते हुए छोटी बेटी को शांत किया कि नहीं छोटे तुम्हारी मम्मी का जन्मदिन है तो पैसे की कोई दिक्कत नहीं, डरो मत चलो चलते हैं,बड़ी बेटी ऐसे अवसरों पर अपनी कान्वेंट में सीखी अंग्रेजी और tofel की तैयारी और उसके पहले ही प्रयास में 95 स्कोर पा लेने के आत्मविश्वास का प्रदर्शन ऐसे स्थानों पर करना ज्यादा बेटर समझती है । पर मैं ऐसा ही रहता हूँ जैसा कि किसी ठेले वाले भाई से कुछ खरीदने के समय या अपने चकराता के छिद्दू भाई से 10 रुपये की जलेबी लेने के टाइम । खैर तीनों हिम्मत कर अंदर गए और शो रूम में रखे विभिन्न बेकरी पकवानों का निरीक्षण करने लगे कि हमारे बजट में क्या होगा, वहां कुछ केक भी रखे थे, मैंने वहां तैनात लड़की से पूछा कि क्या ये केक ताजे ही हैं तो जवाब में लड़की झेंपी और समझ गयी कि ये अंकल शायद पहली बार ऐसी जगह आये हैं, मेरे इस सवाल पर बड़ी बेटी ने अपनी कान्वेंट वाली स्माइल उस दुकान वाली लड़की को दी और मुझे कोहनी मार कर बोली पापा यहां ऐसे मत बोलो । इसी बीच छोटी बेटी ने अपने समाजवाद का प्रदर्शन करते हुए रुपये 150 का एक आइटम पसंद कर लिया और अपनी इस खोज पर उत्साहित होते हुए हमको बोली कि पापा ये ले लेते हैं अच्छा है, उसको लगा कि पापा का काम 150 रुपये में हो ही रहा है और फिर दुकान के अंदर आ ही गए तो खाली हाथ वापस भी नहीं जाना पड़ेगा । पर मुझे लगा कि केक तो ले ही जाना चाहिए मैं अब अपने चिर परिचित गांव, देहात के अंदाज में आ ही गया और दुकान वाली लड़की से विभिन्न केक के दाम पूछने लगा, उसके बताये जाने पर सबसे कम कीमत का रुपये 500 का केक मेरी जानकारी में आया फिर और भी आश्वस्त होने के लिए मैंने उससे कन्फर्म कर ही लिया कि क्या इससे भी कम का कोई केक मिल सकेगा ? जवाब में वह दक्षिण भारतीय सी दिखने वाली लड़की ऐसे मुस्कराई कि अंकल तो मेरे ही जैसे हैं और बड़े ही अपनत्व वाले भाव से बोली बस 500 का तो यही यह इसी बीच बड़ी बेटी अपनी कान्वेंट अंग्रेजी में उसको यह दिखाते हुए कि हम इससे महंगा भी ले सकते हैं पर मम्मी को चूंकि पाइन एप्पल केक ही पसंद है तो यही पैक कर दो, समाजवादी बेटी का 150 का एक छोटा आइटम और एक आइटम बड़ी बेटी का भी ले ही लिया, इस प्रकार कुल 800 का भुगतान अपने कार्ड से कर हम तीनों विजयी मुस्कान लिए दुकान से बाहर चल दिये । समान डिक्की में रखा और मेहंदी वाली जगह पहुंचे ही थे कि श्रीमती जी बड़े ही रौद्र रूप में मेरे पास आई और पूछा कि कहां छोड़ कर आये उसको, कौन थी , क्या मतलब था 😭😭🥱🥱

वो तो शुक्र था कि दोनों बच्चे साथ थे तो जान बच गयी खैर बच्चों ने बात संभाल ली और हम वापस घर को चले । रात 12 बजे श्रीमती जी का गुस्सा अपना सरप्राइज देख कर शांत हुआ ।

दिल्ली कथा ।

Saturday, September 19, 2020

चंडीगढ़ यात्रा वृतांत

 चंडीगढ़ के विषय मे काफी सुन रखा था किंतु अभी तक इस शहर में जाना नहीं हुआ था । इसी सप्ताहांत के दौरान यहां पहली बार ही जाना हुआ । मुझे लगता है कि यदि किसी अजनबी शहर को आत्मसात करना है तो सबसे बेहतर तो है कि इसमें पैदल ही घुमा जाय किन्तु शहर बड़ा हो तो यह संभव नहीं हो पाता तो अगला विकल्प रहता है कोई ऑटो रिक्शा या सिटी बस । नौसेना के दिनों में तो गोआ, मद्रास, बॉम्बे, कोचीन, जामनगर, पोरबंदर, द्वारका, सोमनाथ, रामेश्वरम, मदुरै, रामनाथपुरम, बैंगलोर, मैसूर, ऊटी, मुन्नार, उडुपी, मंगलोर, मणिपाल, धनुष्कोडी इत्यादि शहर व स्थान पैदल ही खूब घूमे हैं । कई बार तो बिना पूछे ही कई कई किलोमीटर चल लिया करता था और जब दोस्तों के साथ पैदल यात्रा पर बात चलती तो दोस्त भी अचरज से बोलते कि इतना चल लिया ।














खैर चंडीगढ़ या मोहाली जिस स्थान पर मैं रात्रि विश्राम हेतु रुका था वहां सुबह की चाय की कोई व्यवस्था नहीं थी तो मैं थोड़ा शहर को समझने और एक अदद कप चाय की तलाश में सुबह 6 बजे उठ कर निकाल ही लिया । शहर जाग रहा था, घूमने वाले लोग घूमने को निकाल पड़े व कामगार अपने अपने कार्यों में व्यस्त हो चले । मैंने बरसों पहले बॉम्बे शहर को भी अच्छी तरह से सुबह सुबह जागते बहुत बार देखा है । छुट्टी काट कर वापसी देहरादून एक्सप्रेस से ही हुआ करती थी जो लगभग सुबह के सवा चार बजे बॉम्बे सेंट्रल पहुंच जाया करती थी और फिर वहां से लोकल लेकर चर्च गेट स्टेशन और चर्च गेट से नेवी डाकयार्ड, कोलाबा तक मैं सुबह सुबह लगभग 5 बजे पैदल ही पहुंचा करता था । बॉम्बे तो खैर बोला जाता है कि सोता ही नहीं पर आम आदमी को चूंकि अगले दिन भर शरीर तोड़ना ही होता है तो आम आदमी तो सो ही जाया करता था । फ़्लोरा फाउंटेन और फोर्ट एरिया के फुटपाथ पर, बॉम्बे टेलीफोन एक्सचेंज के आसपास दिन में अस्थाई दुकानों के पास ही लोग सोये हुए मिलते थे । अंधेरे में डूबा, सोया हुआ शहर का यह इलाका लगता था कि मानों कोई भीमकाय राक्षस गहरी निद्रा में सो रहा है और बस लगभग जागने ही वाला है । गोआ को भी जागते हुए 3 साल तक देखा है क्योंकि उन दिनों मीटर गेज वाली गोआ एक्सप्रेस भी सुबह 6 बजे वास्को डी गामा रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाती थी । हवा में मिली समुद्री महक जिसमे मछली और समुद्री नमी की महक भी शामिल होती थी आते ही लगता था कि गोआ आ ही गया । बॉम्बे की हवा में इन दोनों के साथ साथ एक तीसरी महक भी शामिल हो जाया करती थी जो कि ऐसा लगता था कि मानों बारूद की सी गंध हो । वहीं मद्रास की सुबह की गंध में महिलाओं के बालों में लगे फूलों की खुशबू, नारियल तेल में बन रहे केले के चिप्स की खशबू, सांभर और अन्य दक्षिण भारतीय व्यंजनों की खशबू के साथ ही साथ स्ट्रांग कॉफी की भी खशबू भी शामिल होती थी । खैर चंडीगढ़ की हवा में ऐसी कोई विशेष स्ट्रांग खुशबू की उपस्थिति का अनुभव तो नहीं हुआ पर उमस व गर्मी तो थी ही । लगभग 01 किलोमीटर भटक लिया लेकिन कोई चाय का खोखा या ठेला नजर नहीं आया । मन मे आया कि आखिरकार इन शहरों में आम आदमी कैसे रह पाता होगा ।








😭😭 पर मैं अपनी चाय की तलाश में चलता ही रहा और निराश नहीं होना पड़ा । आम आदमी की चाय का जुगाड़ हो ही गया । 😀😀 वहां काफी कामगार अपने दिन की शुरुआत खैनी, तम्बाकू और चाय के मिले जुले असर से करते दिखाई पड़े । यही लोग इन बड़े शहरों को दिन भर चलाते हैं, रिक्शे वाले, ऑटो वाले, रेहड़ी वाले, मजदूर व मेरे जैसे आम आदमी भी इनके बीच चाय पीकर इनके जीवन की झलक पा जाते हैं । जमीन पर रखा चाय का सामान ऊपर एक तिरपाल यही थी चाय की दुकान । खैर चाय तो अच्छी बनी थी वापसी में एक जॉगिंग पार्क के बाहर चाय के बाद आयुष काढ़ा भी मिल गया । पंजाब पुलिस के ये रिटायर्ड सब इंस्पेक्टर मिले एक जॉगिंग पार्क के बाहर यह काढ़ा बेचते बता रहे थे कि कल से ही शुरू किया है टाइम पास के लिए । मैंने भी इनका काढ़ा पिया । आयुर्वेद की अच्छी जानकारी रखते हैं । इनके बेटे की मृत्यु कैंसर से हो गयी थी बाद में इनकी रुचि आयुर्वेद में बढ़ गयी ।











नाश्ता थोड़ा जल्दी ही करना था किंतु अभी तक बड़े होटल खुले ही नहीं थे तो मेरी खोज नाश्ते के लिए भी एक ऐसे ही स्थान पर जा टिकी जहां कामगार आदमी अपने दिन की शुरुआत में अपना पेट अपने बजट में भर लेता है । बड़े शहर में ठेले की तलाश पूरी हुई, इन जगहों पर एक आम आदमी का पेट कम पैसों में भर जाता है । जहां एक और CCD और मैक डोनाल्ड जैसे ब्रांड पानी भी फ्री में नहीं देते, इन जगहों पर पेट भरने के लिए कुछ भी नहीं मिलता । 😭😭 दुकान संचालक यादव भाई, उत्तर प्रदेश के प्रताप गढ़ जिले से आये अपना एक पैर पोलियो ग्रस्त हो जाने के बावजूद भी युवा अवस्था मे ही अपने पैरों पर खड़े होकर मेहनत करते दिखे । इनका सहयोगी एक बालक जिसने पूछने पर बताया कि गांव में रह कर कक्षा 5 ही पढ़ पाया फिर यहीं आ गया काम करने,भले ही ये बच्चे ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाते पर समय के साथ निपुण व्यवसायी बन जाते हैं । पाक कला व प्रबंधन की जो डिग्री हम अपने बच्चों को लाखों रुपये खर्च कर BHM, BBA, MBA में सिखाते हैं ये युवा इन सभी मे सहज ही पारंगत होकर भविष्य में अपना स्वयं का काम शुरू कर देते हैं । खैर गर्म आलू के परांठे बन रहे थे मेरे 3 परांठे 01 चाय के कुल हुए रुपये 55 मात्र । मैंने भाई को 60 रुपये दिए, 5 वापस कर रहा था किंतु मैंने आग्रह किया कि रख लो भाई आपके परांठे बढ़िया थे ।









कल किस प्रयोजन हेतु चंडीगढ़ आना हुआ पहली बार । काफी व्यवस्थित तरीके से बसाए हुए शहर हैं जहां सड़कों पर कोई भीड़ भाड़ नहीं, कोई विज्ञापन व इश्तहार चिपका नहीं दिखा, हरा भरा शहर और चौड़ी सड़कें । बाजार भी व्यवस्थित सड़क पर कोई कुछ बेचता भी नजर नहीं आया ।

यहां तक कि शहर के मुख्य आकर्षण सुखना लेक के आस पास भी कोई मूंगफली, चाय, चना इत्यादि बेचता नहीं मिला जैसा कि बॉम्बे चौपाटी और अमूमन हमारे सभी शहरों में दिखाई दे ही जाता है । बाजार भी सुपर बाजार की तरह व्यवस्थित, पार्किंग भी उपलब्ध वह भी मात्र 10 रुपये में । लोगों की कोठियां भी अत्यंत सुरुचिपूर्ण और बड़ी बड़ी बनी हुई जैसी की हमारे अन्य शहरों में मात्र कुछ की पॉश कहे जाने वाले इलाकों में मिलती हैं । मैं सोच रहा था कि आखिर इस सबके बीच वह आम आदमी कहाँ और कैसे रहता होगा जिसके बल पर ऐसे शहर चलते हैं । वह आम आदमी जो यहां गार्ड है, चौकीदार है, साफ सफाई करता है, सब्जी और दूध बेचता है आखिर वो और उसका परिवार कहाँ रहता होगा । क्या उन लोगों के लिए भी कोई व्यवस्था बनाई गई होगी ??
खैर सुबह आदतन मॉर्निंग वॉक पर निकल पड़ा इस व्यवस्थित शहर में एक कप चाय की तलाश में जो कि वहीं मिल पाई शहर के एक कोने से में जहां आम आदमी रह लेता होगा और खा पी लेता होगा ।
आगे चला तो एक जॉगर्स पार्क की हरी घास पर भी नंगे पैर घूम लिया बाहर एक सज्जन लेमन ग्रास का जूस और कुछ ही दूरी पर अन्य सज्जन आयुष काढ़ा बेचते दिखाई दिए । कुछ लोग ऐसे होते ही हैं कि उनसे बात करने की आपकी इच्छा अनायास हो ही जाती है मैं कोतुहलवश रुक गया और इनसे बात की । बताते हुए थोड़ा झिझक से रहे थे कि कल से ही शुरू किया है यह काढ़ा बेचने, पंजाब पुलिस से रिटायर्ड सब इंस्पेक्टर हैं बेटे की मृत्यु कैंसर से हुई तो इनकी रुचि आयुर्वेद में बढ़ी । सुबह थोड़ा टाइम पास के लिए आना शुरू ही किया है । एक बुजुर्ग महिला भी मुझे इनका काढ़ा पीते देख आयी किन्तु उनके पास पैसे नहीं थे, घूमने ही आयी थी । ऐसी स्थिति से मेरा भी सामना होता ही रहता है क्योंकि सुबह की मॉर्निंग वॉक पर मैं भी ज्यादा पैसे जेब मे डाल कर नहीं चलता । 10 या 20 रुपये ताकि कहीं रुक कर एक या दो कप चाय भी पी ली जाय । मैंने उनसे आग्रह किया कि पी लीजिये पैसे मैं ही दे देता हूँ काढ़ा अच्छा बना है । महिला थोड़ी झेंपी पर इसी बीच इन सज्जन ने पंजाबी बोल कर उनको सहज कर लिया कोई बात नहीं पैसे कल दे दीजिए ।
जबकि कल रात्रि भोजन सागर रत्ना में किया उन्होंने पता नहीं कौन सा मिनर ल वाटर रुपये 95 में 01 लीटर भेड़ दिया था । मुझे लगा कि इन बड़े शहरों में सड़क पर अच्छी चाय बेचती वह दुकान और परांठे खिलाते यादव भाई जैसे लोग न हों तो इन शहरों में मेरे जैसे आम आदमी का तो एक दिन भी गुजारा संभव नहीं हो सकता ।

Thursday, June 11, 2020

कोरोना काल मे सफर

[12/06 06:46] Pankaj Kumar: कोरोना काल मे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सफर,

इधर लोकडौन के 3 महीने चकराता ड्यूटी पर ही गुजरे । कल 11 जून को घर आने का प्रयास किया । जनता का आदमी हूँ तो जनता के ही साथ सफर करने की आदत है । देहरादून तक तो अपने ही विभाग के एक सज्जन की निजी कार से आ गया । रास्ते मे विकास नगर भूख लग आयी अक्सर एक दुकान पर रुक कर चाय समोसे काफी बार खाये हैं जैसे ही उस दुकान के सामने से निकलना हुआ मैंने गाड़ी रुकवाई और चल दिया चाय और समोसे की तलाश में क्योंकि सुबह खुद का ही बनाया थोडा नाश्ता कर लिया था तथा सफर अभी लंबा था । साथ वालों ने तो मना ही कर दिया खैर मैंने एक छोला समोसा दुकान पर ही रुक कर खाया और चाय भी पी । दुकानदार ने दोनों ही चीज डिस्पोजेबल में दी, पीने का पानी भी उसने बाहर ही रख दिया था वही पिया । मैं देख रहा था कि दुकान पर अधिकतर मजदूर ही आ रहे थे जो कि आसपास कहीं न कहीं काम कर रहे होंगे । पास ही गन्ने के रस की ठेली वाला भी ग्राहकों की इन्तजार में था क्योंकि रात के खाने की चिंता तो उसे भी रही होगी ।

खैर हम देहरादून पहुंचे मेरे सहयोगी बोले कि आप मेरी गाड़ी ले जाइए मैंने उनको मना कर दिया हालांकि मेरे पास एक और भी विकल्प था कि हरिद्वार से किसी को बुला लूं मुझे ले जाने को पर मैंने सोचा कि चलो एक आम आदमी को ही देखा जाय कि कैसे सफर कर रहा है । हम जैसे साधनसम्पन्न लोग तो आराम से सफर कर लेंगे लेकिन आम आदमी जो रोज काम की तलाश में निकलता है और शाम को थोड़ा बहुत कमा कर घर जाता है वह इस समय कैसे सफर कर रहा होगा । खैर रिस्पना पुल पर हरिद्वार के लिए मैक्सी कैब लगी खड़ी थी, ड्राइवर ने बताया कि किराया रुपये 300 होगा और 5 सवारी होते ही चल देगा । गाड़ी में धीरे धीरे 5 सवारी हो ही गयी, जिनमे से एक को मुज़फ्फरनगर, एक को प्रतापगढ़, मुझे रुड़की व एक बुज़ुर्ग सज्जन को शांति कुंज व एक अन्य हरिद्वार जाने वाला था । मैं ड्राइवर के ही पास बैठ गया 2 सवारी बीच की सीट पर और 02 पीछे बैठे । रास्ते मे ड्राइवर से बात हुई कि इस दौरान तो गाड़ियां यात्रा में चलती है और इन लोगों को बहुत नुकसान हो रहा है किन्तु कुछ बुकिंग जरूर मिली जिनमे लोगों को उनके गांव तक छोड़ने up के विभिन्न शहरों तक बुकिंग भी मिली । पीछे बैठे सज्जन को प्रतापगढ़ जाना था उसने ड्राइवर से ही बुकिंग की बात की तो ड्राइवर ने बोला कि कम से कम 16 से 17 हजार का खर्च आएगा । खैर गाड़ी दो घंटे में हरिद्वार चांदी घाट पुल पर पहुंच गई । अब यहां से रुड़की जाना था मैं सोच रहा था कि कोई ट्रक, मिनी ट्रक,छोटा हाथी कुछ भी मिलेगा तो मैं पीछे खड़े होकर भी चला जाऊंगा । काफी ट्रक वालों को हाथ दिया किन्तु कोई नहीं रुका मैंने सोचा कि जवालापुर तक चल लेता हूँ एक विक्रम आता दिखाई दिया जिसमे हम 2 लोग थे उसने रुपये 30 में जवालापुर पहुंचा दिया ।

अब यहां से रुड़की 30 किलोमीटर का सफर शेष था मैं फिर किसी गाड़ी की तलाश में खड़ा हो गया और टैक्सी नंबर की ही गाड़ियों को हाथ देता रहा कि शायद कोई गाड़ी वाला बुकिंग छोड़ कर खाली वापस जाता मिल जाय । एक मिनी बस आती दिखाई दी उसको हाथ दिया बिल्कुल खाली ही थी पर वह बोला कि बहादराबाद तक चलो वहां से मैं भगवानपुर जाऊंगा लेकिन वहां से गाड़ी की कम संभावना देख मैंने यहीं से गाड़ी लेना उचित समझा । खैर एक मैक्सी कैब आती दिखाई दी और हाथ देने पर रुक भी गयी । उसको चौराहे पर तैनात पुलिस वाले ने ही रुकवाया था ड्राइवर के पास वाली सीट पुलिस वाले सज्जन ने लपक ली, बीच की सीट पर 2 लोग पहले से ही थे मैं पीछे की तरफ बैठ गया वहां एक सवारी और भी थी, इसी बीच एक आदमी और पूछता हुआ आ गया जिसको मुज़फ्फरनगर जाना था खैर पीछे अब हम 3 हो गए  । गाड़ी चल दी गर्मी तो थी पर बाहर की ठंडी हवा लगी तो मैं सो गया और रुड़की पहुंच ही गया । और दिनों रुपये 30 लेने वाले ड्राइवर महोदय ने 150 रुपये की मांग की जिसको कि पूरा किया गया । इस प्रकार मैं घर पहुंचा । रास्ते मे मास्क तो लगाया ही था आगे ईश्वर इच्छा ।

लेकिन काम की तलाश में घर से निकले मजदूर व गरीब आदमी को यह सफर महंगा तो पड़ ही रहा है । देहरादून से रुड़की रोडवेज का किराया रुपये 100 है, जबकि इस तरीके से 480 लग गए, सरकार चाहे तो इस किराए को रुपये 200 करके बस चलाने पर विचार कर सकती है जिसमे कि लिमिटेड सवारी बिठा कर लोगों को सुरक्षित सफर कराया जा सके ।

Wednesday, May 20, 2020

वर्तमान भारत व भारतीयता

इधर काफी दिनों से देश मे एक नया प्रचलन सा देखने मे आ रहा है । धार्मिक भावनाएं भड़क रही हैं व आहत भी हो रही हैं । देश मे बहुत कुछ सही व गलत होने का ठीकरा भी बहुसंख्य समाज पर थोपने की भी प्रक्रिया चल रही है । इसी धर्म को अनेकों प्रकार की प्रताड़नाओं का सामना भी करना पड़ रहा है, कई बार अपने आराध्य देव, देवियों का अपमान भी होते हुए देखना पड़ रहा है, रूढ़िवादी होने का ठप्पा भी लग ही रहा है तथा समय समय पर देश विदेशों से धार्मिक कट्टरता व धार्मिक उन्मादी होने के विशेषणों से भी नवाजा जाता है । देश ही नहीं विदेशों से भी विश्व के इस एकमात्र देश को मात्र इसी कारण से हिकारत की नजरों से देखा जाता है कि यहां की अधिसंख्य जनसंख्या विश्व के दो सबसे बड़े धर्मों को मानने  वाले वाले देशों व जनसंख्या से अलग किसी दूसरी पूजा पद्धति व जीवन शैली को मानने वाले हैं । जो जीवन शैली शैली शायद उतनी ही प्राचीन व प्रासंगिक है जितना कि मानव सभ्यता का इतिहास । फिर आखिर क्या कारण है कि एक ऐसे समुदाय को बार बार नीचा दिखाए जाने का प्रयास होता रहता है जिसके मूल में विश्व बंधुत्व, वसुधैव कुटुम्बकम, सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्व मंगल मांगल्य, बहुधा वदन्ति, अंतरिक्ष गवं शांति का पाठ करने वाले लोगों को धार्मिक उन्मादी, कट्टर, पिछड़े हुए, मूर्तिपूजक, अंधविश्वासी और भी न जाने किन किन विशेषणों से नवाजा जा रहा है । इस पूरी प्रक्रिया को देखने पर लगता है कि यह सब वैश्विक स्तर पर चल रही एक सोची समझी साजिश है इस प्राचीन संस्कृति को पृथ्वी से मिटा दिए जाने की । पर क्यों ?? आखिर एक ऐसी संस्कृति से किसी को कैसा डर हो सकता है जिसने कभी भी तलवार व हिंसा के बल पर अपना प्रचार प्रसार नहीं किया, जिसने ईश्वर तक पहुंचने के भी अनेकों मार्ग बताए व किसी भी मार्ग या पूजा पद्धति को बुरा नहीं बताया । विश्व में उपलब्ध सभी धर्मों के लोगों का स्वागत किया, उन्हें शरण दी व फलने, फूलने का मौका भी दिया ।  शायद उनका डर उनके अंदर व्याप्त एक असुरक्षा की भावना ही है क्योंकि इतनी उदार परंपरा व इतनी विभिन्नता वाली संस्कृति से सभी को डर सा लगता होगा कि कहीं हम इसी में न समा जाएं । और अपना अस्तित्व ही न खो बैठें । शायद यही डर उनसे बार बार ऐसे कार्य कराता रहता है जिसमे निंदा, धर्मांतरण व इस बहुसंख्य जन समुदाय को नीचा दिखाए जाने का प्रयास व कुचक्र किया जाता रहा है । यह चक्र अनेकों वर्षों से चल रहा है तथा अब सूचना तकनीकी ने इस कुचक्र को सोशल मीडिया, टिक टोक, फेसबुक, ट्विटर, TV धारावहिक, नेटफ्लिक्स व अन्य ऐसे सेंसर विहीन संसाधन व फिल्में जैसे माध्यम भी उपलब्ध करा दिए हैं जिन पर दिन रात 24 घंटे अलग अलग तरीकों से इस बहुसंख्य वर्ग को भांति भांति प्रकार से नीचा दिखाए जाने व बुरे रूप में प्रस्तुत किये जाने जे सुनियोजित प्रयास चल रहे हैं जिनको कि कभी हास्य व्यंग्य, कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कभी सृजनात्मकता के अनुपम उदाहरण तो कभी नई सोच के नाम पर हमारी युवा पीढ़ी के सामने परोसा जा रहा है ताकि इनके मस्तिष्क में यह बात बिठा दी जाय कि वास्तव में सारी बुराई बस हमारे ही अंदर है व बाकी सारी दुनिया दूध की धुली हुई है ।

Monday, April 27, 2020

जिला सहारनपुर में अंग्रेजी शासन में महामारी ।

महामारियों का इतिहास, स्त्रोत, अंग्रेजों के द्वारा लिखे गए सहारनपुर गजेटियर के पन्नों से
वर्ष 1872 में हरिद्वार में हैजे की बीमारी फैली और 1351 लोगों की मृत्यु हुई । इस पुस्तक में लिखा है कि बहुत सारी नहरों के खुद जाने से पानी का स्तर भी ऊपर आया और यह भी बीमारियों के फैलने का कारण बना । इसी बीमारी से वर्ष 1887 में 1254 लोग काल कवलित हुए । तथा 1880 से 1890 के बीच करीब 230 लोग प्रति वर्ष इस बीमारी से मरते थे । 1892 में पुनः हरिद्वार में इस बीमारी ने दस्तक दी जिसके कारण एक बड़े मेले को मुख्य स्नान के दिन से भी पहले ही लोगों को रेलगाड़ी द्वारा वापस भेजा गया । मेले का नाम अंग्रेजी में Mahabarni लिखा गया है । बीमारियों की अगली लिस्ट में चेचक या स्माल पॉक्स का जिक्र किया गया है जिसमे 1867 से 1873 के बीच 20,942 लोगों की मृत्यु पूरे सहारनपुर जिले में हुई । लिखा गया है कि इस बीमारी से भी लगभग 3000 लोग प्रतिवर्ष मरते थे । सन 1877 में सूखे के समय भी यह बीमारी फैली तथा 1883 में भी । अंग्रेज सरकार के समय भी टीकाकरण किया जाता था ऐसा इसमे लिखा गया है । यह भी बताया गया है कि जिले की कुल 04 नगर पालिकाओं सहारनपुर, रुड़की, देवबंद और हरिद्वार में टीकाकरण आवश्यक रूप से किया जाता था । इसके अतिरिक्त वर्ष 1897 के कुम्भ या अर्धकुम्भ मेले के दौरान अतिसार की भी बीमारी फैली जिसका कारण सिंध से हरिद्वार आये तीर्थ यात्री बताए गए हैं । इससे भी 13 लोग मारे गए । यही बीमारी सर्दियों में फिर से फैली और कनखल के आसपास के गांव में इसको रोकने के उपाय किये गए । लिखा गया है कि 1897 में प्लेग की बीमारी फैल जाने के कारण पूरे कनखल को खाली करा लिया गया था तथा करीब 2 माह बाद ही निवासियों को वापस अपने घरों में आने दिया गया । लेकिन इसी दौरान जवालापुर व आसपास के गांव में फिर से प्लेग फैला जिसको काबू करने के प्रयास किये गए और इन्ही प्रयासों में जवालापुर के एक सज्जन को अस्पताल तक पहुंचाए जाने के चक्कर मे दंगा जैसी स्थिति आयी जिसके कारण मेरठ से इन्फेंट्री की 02 कंपनियों को जवालापुर बुलाया गया इसके बाद गर्मी शुरू हो जाने पर यह बीमारी नियंत्रित हुई । 1902-03 में बीमारी पुनः आयी और बाद के वर्षों में भी इसका डर बना ही रहा । जिले के कुछ स्थानों पर हिमालयी नदियों का पानी पीते रहने के कारण घेंघा रोग भी देखा गया ।

अपनी जानकारी बढ़ाये जाने हेतु युवाओं को ऐसी ऐतिहासिक व अन्य बहुमूल्य पुस्तकें जरूर पढ़नी चाहिए । इनका संग्रह National Digital Library, IIT Kharagpur की वेबसाइट ndl.iitkgp.ac.in पर निःशुल्क उपलब्ध है ।

परीक्षा की तैयारी

बहुत से युवा अक्सर मुझसे पूछते हैं कि मैंने PCS की तैयारी कैसे की ? कोई कोचिंग इत्यादि ली या नहीं ? नोट्स बनाये या नहीं ? इन सभी युवाओं को मेरा उत्तर शायद अटपटा लगेगा क्योंकि एक तो PCS क्वालीफाई करना कभी मेरा लक्ष्य रहा ही नहीं क्योंकि घर मे ऐसा कोई माहौल नहीं था, हमारे बचपन के दिनों में आसपास की रिश्तेदारियों में भी ले देकर कुछ लोग या तो पुलिस में सिपाही थे या फौज में जवान, घर मे चाचा जी ग्राम विकास अधिकारी के पद पर एकमात्र सरकारी नौकरी करने वाले सदस्य थे । हालांकि परिवार में एक चाचा जी इलेक्ट्रिकल से पॉलिटेक्निक थे पर घर के ही व्यवसाय में रत रहे बड़े सभी भाई भी ग्रेजुएट हुए भाई संजय ने बीएड भी की किन्तु किसी ने भी नौकरी के लिए कोई प्रयास नहीं किये प्रतीत होता है । अतः किसी भी मार्गदर्शन के अभाव में व गांव की पृष्ठभूमि में फौज में जवान के रूप में भर्ती हो जाना भी अपने आपमें एक अचीवमेंट समझा जाता था, कारण गांव में फौजी लोग बहुत थे फूफा जी भी फौज में थे हम देखते थे कि जब भी ये लोग छुट्टी आते हैं सब इनका बहुत सम्मान करते हैं और ये अलग अलग स्थानों की बातें बताते हैं जिन स्थानों को हम सिर्फ भारत के नक्शे में ही देखते थे ये लोग उनको देख कर आ गए । यही हमारे लिए भी एक बहुत बड़ा कारण बना की फौज में ही भर्ती होना सही रहेगा । कक्षा 11 व12 में मैंने और भाई संदीप दोनो ने साथ ही पढ़ाई की और हम दोनों ही ने NCC भी ली और B सर्टिफिकेट प्राप्त किया । NCC के ही दौरान हमको रुड़की BEG में एक आर्मी अटैचमेंट कैम्प करने का अवसर मिला जिसमे हम आर्मी के साथ 12 दिन रहे और फौजी जीवन को निकट से देखने का अवसर मिला । बस यही कुछ कारण थे कि फौज में भर्ती मैं भी हुआ व भाई संदीप भी । नौकरी करना, पैसे कमाना हमारा लक्ष्य नहीं था, हमको यह भी नहीं पता था कि हमको कितनी तनख्वाह मिलेगी बस इतना पता था कि खाना और रहना फौज में फ्री होता है और एक युवा को क्या चाहिए होता है । आजकल तो फौज में भर्ती होने के लिए भी कोचिंग खुल गयी है हमारे समय ऐसा कुछ नहीं था अपने ही प्रयास से करना होता था । इसके अलावा किसान परिवार से होने के कारण हमारे खुद के मन में ऐसा कोई लक्ष्य भी नहीं था कि नौकरी करनी है, और न ही किसी बड़े न कभी ऐसा कुछ कहा कि यह पढ़ाई कर लो, यह नौकरी कर लो, नौकरी करने वालो के नाम पर हम गांव में भी सिर्फ भेल BHEL फैक्ट्री में ही नौकरी करने वाले लोगों को देखा करते थे ।

नेवी से आने के बाद भी ऐसा कुछ मन में नहीं था कि कोई बड़ी नौकरी करनी है जिस समय 2005 में नेवी की  नौकरी छोड़ी उन दिनों फण्ड वगैरा कटने के बाद 5 हजार वेतन हाथ मे आता था जिसमे मजे से जीवन गुजर जाता था, अतः हिसाब यह लगाया कि कम से कम 2 हजार तो पेंशन मिल ही जाएगी और 3 हजार की कोई छोटी मोटी नौकरी तो मिल ही जाएगी अतः चलते हैं 15 साल घर से दूर रह लिए अब अपने ही इलाके में कुछ करेंगे । इसी उम्मीद पर बाहर आये और आशा के अनुरूप ही मुझे पहली नौकरी का आफर भी मिल ही गया एसपी बजाज की एजेंसी पर सेल्स एक्जेक्यूटिव के लिए जगह निकली, उन दिनों सब जगह जहां की vacancy अखबार में दिख जाती थी इंटरव्यू के लिए चले ही जाता था । अतः वहां भी गया उन्होंने सिलेक्शन कर लिया और रुपये  2500 की तनख्वाह का आफर दिया जो मैंने सहर्ष ही स्वीकार भी कर लिया ।

किन्तु उसी समय मेरा बीएड की प्रवेश परीक्षा का रिजल्ट भी आ गया व मुझे रुड़की kldav कॉलेज में फ्री सीट मिल गयी फीस सिर्फ 2865 रुपये पूरे कोर्स की । उन दिनों निजी बीएड कॉलेज बीएड के एक से डेढ़ लाख रुपये ले रहे थे तो इस हिसाब से मुझे लगा कि चलो बीएड ही कर ली जाय । अतः बीएड करने रुड़की पहुंच गया और बीएड बैच में वाकई कुछ अच्छे तैयारी वाले लोगों से परिचय हुआ जो कि PCS इत्यादि की तैयारी कर रहे थे, गांव में भी स्कूली दिनों के साथी विकास द्वारा भी PCS का इंटरव्यू दिया गया था। अतः शुरुआती प्रेरणा इन्ही लोगों से मिली । किन्तु PCS जैसी बड़ी परीक्षा के विषय मे उस समय भी नहीं सोचा था खैर इधर बीएड हुई और फिर नौकरी की तलाश में लग गया तकरीबन 50 स्कूलों में खुद जा जाकर बॉयोडाटा दे दिया जिसमें सराय का आर्यन पब्लिक स्कूल, होली गंगेश और जवालापुर, कनखल के भी सभी स्कूल थे । रुड़की के pvt स्कूलों में भी बॉयोडाटा दिया गया कॉल आनी शुरू हुई,काफी इंटरव्यू दिए और रुड़की के स्क्यवार्ड पब्लिक स्कूल में 3000 की तनख्वाह की नौकरी मिल ही गयी । बीएड के दौरान साथियों से पूछ कर लुसेंट सामान्य ज्ञान व उत्तराखंड सामान्य ज्ञान के लिए बिनसर ईयर बुक खरीद के खाली समय मे पढ़ना शुरू किया, किन्तु PCS जैसी परीक्षा का लक्ष्य तब भी मन में कहीं नहीं था बस यही था कि कोई भी छोटी मोटी नौकरी मिल जाएगी तो जीवन चल पड़ेगा । इसी बीच उत्तराखंड में LT की रिक्ति आयी और बीएड के बेस पर मुझे पहली सरकारी नौकरी एक हाई स्कूल अध्यापक की मिल गयी टेहरी जिले के एक गांव में जिसका डेढ़ घंटे का पैदल रास्ता होता था, खैर जॉइन किया और कुछ माह रहने के बाद पता चल गया कि यदि कुछ नहीं किया तो पूरा जीवन इसी गांव में गुरु जी के रूप में निकल जायेगा । उसी समय उत्तराखंड सचिवालय के समीक्षा अधिकारी के फॉर्म निकले फरवरी 2007 की बात है मैंने फॉर्म भर दिया, और भूल भी गया । उस गांव की नौकरी में मन नहीं लगा और मेरा चयन रुड़की के आर्मी स्कूल में होने पर मैं सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर आर्मी स्कूल की प्राइवेट नौकरी में यही सोच कर चला आया कि घर तो रहना मिलेगा फिर चाहे तनख्वाह कम ही क्यों न मिले । इसी बीच सैनिक स्कूल घोड़ाखाल में भी चयन हुआ किन्तु वहां के फौजी माहौल को देख कर मन नहीं किया कि फिर ऐसे माहौल में रहा जाए ।

आर्मी स्कूल में मेरा विषय सामाजिक विज्ञान था तथा कक्षा 6 से 10 तक मैं यही पढ़ाता था इसी बीच MA अंग्रेजी हो गयी थी, और MA इतिहास भी । इस स्कूल में बच्चे अच्छे मिले जिनको अच्छी तरह पढ़ाने के लिए मैं भी कुछ न कुछ अतिरिक्त पढ़ता ही रहा और NCERT की कक्षा 6 से 10 की सोशल की तीनों चारों किताबें 2 ही साल की वहां की नौकरी में कंठस्थ याद सी हो गयी । जिसका आगे चल कर बहुत लाभ मिला । खैर रुड़की में आर्मी स्कूल में जीवन शुरू हुआ तो समीक्षा अधिकारी वाला 2007 में भरे फॉर्म का pre एग्जाम शायद सचिन के विवाह की तिथि को ही वर्ष नवंबर  2009 में आ गया, तैयारी कोई विशेष थी नहीं किन्तु दो किताबें लुसेंट और उत्तराखंड सामान्य ज्ञान की पढ़ ही रहा था फिर सोशल यहां बच्चों को पढ़ा रहा था, इसके अलावा प्रतिदिन अखबार पढ़ना ही था और कोई प्रतियोगी परीक्षाओं की पत्रिका पढ़ लेता था । खैर समीक्षा अधिकारी का pre निकल गया और main 2010 में हुआ, उसकी तैयारी मैंने दिल लगा कर स्वयं ही की विकास भी उस परीक्षा को दे रहा था अतः उससे ही काफी जानकारी मिली कि क्या पढ़ना है और कोन सी किताबें लेनी हैं । खैर समीक्षा अधिकारी में मेरा चयन हो गया व 2012 जनवरी में वहां जॉइन कर लिया । उन दिनों उत्तराखंड सचिवालय में अन्य प्रदेश के निवासी भी आ सकते थे अब तो रोक दिया गया अतः हमारे बैच में बड़ी संख्या में उत्तरप्रदेश के बंदे अच्छी रैंकिंग के साथ चयनित होकर आए,इनमे से बहुतों ने UPPCS और IAS तक के इंटरव्यू दे रखे थे, इनकी बात ही अलग हुए करती थी, शुद्ध हिंदी वाले लोग लेकिन पढ़ाई में हम लोगों से बहुत ही आगे । खैर इनसे भी काफी कुछ पता चला कि क्या पढ़ना है किताबें कौन सी ली जानी हैं । लोअर PCS और PCS दोनो ही के pre में निकलने के बाद फिर mains की तैयारी में लग गया कोचिंग का कोई इरादा नहीं था अतः स्वयं ही तैयारी की और बड़ों के आशीर्वाद व ईश्वर की कृपा से दोनो ही में चयन भी हुआ पहले लोअर PCS के द्वारा नायब तहसीलदार फिर PCS परीक्षा के बाद उप शिक्षा अधिकारी में । हालांकि मेरा कम्पटीशन अपने ही जैसे भूतपूर्व सैनिकों से था क्योंकि जनरल के मुकाबले हम बहुत पीछे छूट गए थे, सेना की नौकरी में ऐसा कुछ भी पढ़ने का अवसर नहीं मिला और न ही ऐसा कोई लक्ष्य ही था । अतः युवा साथियों को यही संदेश दूंगा कि शायद मेरे लिए भूतपूर्व सैनिक होने के नाते हो सकता है कम्पटीशन थोड़ा कम रहा होगा और मेरा काम बिना कोचिंग, बिना किसी योजना, बिना किसी नोट्स इत्यादि के चल गया किन्तु वर्तमान में आपका कम्पटीशन अच्छी तैयारी वाले लोगों से ही होना है जो आप ही के जैसे युवा भी हैं अतः अपनी तैयारी मन लगा कर करें, कोचिंग जरूर कर लें क्योंकि आजकल हर बंदा कोचिंग जरूर कर रहा है वहां आपको क्या पढ़ना है, कितना पढ़ना है यह पता चलता है तथा आपका एक ग्रुप बन जाता है जिसके साथ आप मुद्दों पर डिस्कशन कर पाते हैं । हमारा काम बिना कोचिंग इसलिए चल पाया कि पिछले कई वर्षों की कुछ भी पढ़ते रहने की आदत व सामाजिक का शिक्षक बनने का अनुभव और 04 विषयों में मेहनत वाली MA कहीं न कहीं काम आयी । आप यह सब नहीं कर पाएंगे क्योंकि आपके पास न तो इतना लंबा समय है और न ही आप तनाव मुक्त होंगे हम तनाव मुक्त इसलिए रह पाए कि एक तो खाली रह कर ये परीक्षा नहीं दी, दूसरा कोचिंग इत्यादि पर कोई खर्चा ही किया अतः हमारा चयन न भी होता तो हमारा जीवन दूसरी जगह, दूसरी नौकरी में भी चलता ही रहता किन्तु आप लोग लोगों को हमारी तरह संतुष्ट नहीं होना चाहिए युवा हो, जिम्मेदारियों से मुक्त हो अतः कमसे कम एक वर्ष जरूर तैयारी करो, कोचिंग करो और अपने लक्ष्य को प्राप्त करो । मेरी तैयारी की कथा मैं आप सभी को बता ही चुका हूं अब आप अपने लिए अपनी प्लानिंग और स्ट्रेटेजी स्वयं बनाएं । हमने कोचिंग इसलिए भी नहीं ली कि एक तो इनकी फीस भी बहुत होती है दूसरा लगातार किसी न किसी नौकरी में ही रहा, नेवी से आने के बाद बस बीएड करने के ही दौरान अगस्त 2005 से मार्च 2006 तक मैं रेगुलर बीएड कर रहा था अतः कोई नौकरी नहीं कर पाया लेकिन बीएड के बाद फिर कहीं न कहीं नौकरी करता ही रहा इसलिए कोचिंग के लिए कोई ब्रेक नहीं ले सका ।

My PCS and Lower PCS results just to give an idea of the posts for which these exams are conducted. PCS and Lower PCS exams are conducted by the State Public Service Commission  to recruit Group B Gazatted Officers for diff state govt departments.  Likewise Lower PCS exam is conducted for Non Gazatted Grp C posts but at supervisory level. Thereafter many other exams are conducted  to recruit clerks and other grp C staff below the supervisory levels by separate selection process in Uttarakhand Subordinate Selection Commission do conduct them. Selection is depend on the choice and ranking in merit. Eg. For PCS the post of SDM is the topmost which is the first choice for every candidate and in lower PCS the post of Nayab Tehsildar is the topmost post so candidates with higher merit are managed to be selected here and thereafter further merit and choice filled by the candidate. There are few posts where specialised qualification is required like M.Sc Agri, Fisheries, Horticulture, Sociology in Graduation and Journalism diploma. But again you dont know when would the post for these qualification can come. The posts of SDM and DySP comes for each PCS but same can not be said for many other posts. Like there was no post of BDOs in our batch and the post for which I am selected came first time in PCS and thereafter this post has not come in next two PCS exams. So you need to prepare for the topmost post only. If not able to secure it then depend upon the merit where you are finding your place.

Tuesday, April 21, 2020

चकराता में 06 वर्ष


मैं अपने कार्यालय से शाम को वापस पैदल ही आता हूँ । एक तो 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा हो जाती है और शाम को 5 बजे पुरोड़ी से चकराता जाने वाली अन्य सवारियों के अभाव में रूट की  कोई गाड़ी भी नहीं मिलती । बहुत से लोग पूछते हैं कि कोई गाड़ी क्यों नहीं रख लेते ?? मेरा जवाब होता है कि जिन लोगों और बच्चों के लिए मैं काम कर रहा हूँ वो सब भी पैदल ही चलते हैं । या फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट से ही । 🙏🏼🙏🏼



इधर 07 जनवरी 2020 को उत्तराखंड PCS परीक्षा के माध्यम से चयनित होकर नवसृजित पद उप शिक्षा अधिकारी, राजपत्रित, पूर्व ग्रेड पे 5400 अब वेतन बैंड 10, पर  इस सेवा में 5 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे तथा पदोन्नति के अगले सोपान खंड शिक्षा अधिकारी, पूर्व ग्रेड पे 6600, वर्तमान लेवल 11 हेतु भी सेवा अर्हता के भी 05 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे ।



इन 05 वर्षों का अधिकतम समय अन्य विभागों को यही बताने में भी गुजरा कि अब प्रत्येक विकास खंड में खंड शिक्षा अधिकारी के अतिरिक्त एक अन्य अधिकारी का भी प्रादुर्भाव हो चुका है जिस पर विकास खंड के समस्त प्रारंभिक शिक्षा कक्षा 1 से 8 के प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों की जिम्मेदारी सौंपी गई है । इन 05 वर्षों में हमे भिन्न भिन्न पदनामों से बुलाया जाता रहा जैसे कि उप खंड शिक्षा अधिकारी, ABEO आदि इत्यादि ।



रोचक यह भी है कि हमारे राज्य कोषागारों के सॉफ्टवेयर में भी अभी तक हमारा सही पदनाम उप शिक्षा अधिकारी सृजित नहीं हुआ है और उनके हिसाब से मैं Deputy Basic Shiksha Adhikari हूँ ।



चूंकि PCS परीक्षा के माध्यम से चयनित होने वाले अन्य सभी पदनाम सभी के लिए  अपेक्षाकृत जाने पहचाने होते हैं यथा SDM, DySP, वित्त अधिकारी, Asst Commissioner वाणिज्य कर, BDO व और भी अन्य । पर चूंकि यह पद भी नया ही सृजित किया गया था तथा हम लोग इस पर चयनित होने वाले भी पहले ही बैच के लोग थे तो इन 05 वर्षों का समय अन्य विभागों को यही बताने में गुजर गया कि हम कौन लोग हैं और क्या करते हैं ।


खैर इस अपेक्षाकृत कम जाने पहचाने वाले पदनाम वाले पद को छोड़ कर हमारे कई साथियों ने दोबारा से PCS परीक्षा पास की और SDM, DySP व ARTO जैसे पदों पर चयनित होने में सफलता प्राप्त की और इस गुमनामी के जीवन से छुटकारा पाने में सफल रहे ।


01 अप्रैल 2020 को चकराता में  तैनाती के भी 05 वर्ष पूर्ण हो गए हैं । जब यहां कार्यभार ग्रहण किया था तो उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय अस्तित्व में ही नहीं आया था तथा चकराता स्थित एक बहुत पुराने जीर्ण शीर्ण से खंडहर नुमा भवन से ही काम चल रहा था, क्योंकि उप शिक्षा अधिकारी नवसृजित पद था और इस पद पर हमारे ही बैच की नियुक्ति हुई तथा प्रशिक्षण की समाप्ति पर हम सभी 65 नव नियुक्त उप शिक्षा अधिकारी 02 चरणों मे अपने अपने विकास खंडों में पहुंच गए ।


विकास खंड चकराता में मेरी नियुक्ति के समय मार्च 2015 तक विकास खंड के ही एक राजकीय इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य महोदय ही अपने प्रधानाचार्य के दायित्वों के ही साथ साथ खंड शिक्षा अधिकारी व उप शिक्षा अधिकारी के भी कार्य दायित्यों का निर्वहन इसी एक कार्यालय से कर रहे थे ।


मार्च  2015 में चकराता में पूर्णकालिक खंड शिक्षा अधिकारी महोदय व फिर 01 अप्रैल 15 को उप शिक्षा अधिकारी यानी मेरे द्वारा भी कार्यभार ग्रहण कर लिया गया ।



चूंकि इस कार्यालय में पहले से ही राजकीय इंटर कॉलेज, चकराता का भी कार्यालय संचालित हो रहा था तथा शायद उस समय इस विद्यालय के ही प्रधानाचार्य महोदय खंड शिक्षा अधिकारी का भी कार्य दायित्व निर्वाहन करते रहे होंगे अतः यही फिर खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय के भी रूप में संचालित होता रहा व कालांतर में वर्ष 2012 में उप शिक्षा अधिकारी का पद सृजित होने के बाद यही उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय के रूप में भी चलता रहा । क्योंकि पूर्णकालिक उप शिक्षा अधिकारी के रूप में 01 अप्रैल 2015 को मेरी नियुक्ति होने से पूर्व खंड शिक्षा अधिकारी व उप शिक्षा अधिकारी के कार्य दायित्वों का निर्वहन एक ही अधिकारी,  प्रधानाचार्य श्री दोहरे जी द्वारा किया जा रहा था अतः अलग से कार्यालय की आवश्यकता नहीं समझी गयी होगी ।


कार्यालय में स्थानाभाव व हमारे प्राथमिक शिक्षकों के विभिन्न अभिलेखों को सुचारू रूप से रखे जाने व स्वयं मेरे व मेरे स्टाफ के 6 अन्य कार्मिकों के बैठने हेतु कोई स्थान उपलब्ध न होने के कारण व विकास खंड में अब पूर्णकालिक 03 अधिकारी,  खंड शिक्षा अधिकारी, चकराता, प्रधानाचार्य राजकीय इंटर कॉलेज चकराता, व उप शिक्षा अधिकारी, चकराता के आ जाने से उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय को ब्लॉक संसाधन केंद्र, चकराता में संचालित किए जाने का निर्णय लिया गया ।


चकराता विकास खंड का ब्लॉक संसाधन केंद्र पुरोड़ी नामक स्थान पर वर्ष 2004 में ही निर्मित कर दिया गया था जहां सर्व शिक्षा अभियान से संबंधित समस्त अभिलेख व प्रशिक्षण इत्यादि चलते रहे । यह भी जानना रोचक होगा कि विकास खंड चकराता का ब्लॉक संसाधन केंद्र तत्समय ऐसे स्थान पर निर्मित किया गया जो कि भौगोलिक दृष्टि से कालसी विकास खंड के क्षेत्र में स्थित है तथा इसके निकट विकास खंड चकराता का एकमात्र विद्यालय राजकीय इंटर कॉलेज, चकराता संचालित हो रहा है जिसमे मात्र कक्षा 11 व 12 ही बड़े लम्बे समय से संचालित हो रही हैं ।


पुरोड़ी चकराता से मसूरी जाने वाले सड़क मार्ग पर चकराता से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । जहां तक जाने के लिए स्थानीय यूटिलिटी ही मिल पाती हैं वह भी जब कि उनको पूरी सवारी मिल सकें । ऐसे में विकास खंड के किसी दूर के स्थान के किसी शिक्षक को चकराता से पुरोड़ी जाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ जाता है ।


जानकर लोग बताते हैं कि चकराता क्योंकि कैंट है  तथा मिलिट्री स्टेशन होने के कारण यहां पर राज्य सरकार के वही कार्यालय चलते रहे जिनकी स्थापना या तो आज़ादी से पहले हो चुकी थी या फिर उत्तर प्रदेश राज्य के ही समय । पुराने लोग यह भी बताते हैं कि किस प्रकार उत्तर प्रदेश के दिनों में चकराता बाजार राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों, कार्मिकों व उनके परिवार जनों के यहीं निवास करने से भरा पूरा दिखाई देता था । अधिकतर कार्मिक चूंकि उत्तर प्रदेश के दूर दराज के जनपदों के निवासी हुआ करते थे तो साल में लंबी  छुट्टियों के ही दिनों में अपने घरों को जाते थे । बड़ी मात्रा में उनके लिए किराए हेतु कमरे भी बने हुए थे जो कि अब वर्तमान में होटलों में बदल चुके हैं और चकराता में कमरा ढूंढना वाकई एक कठिन कार्य है । संयोगवश मुझे वर्ष 2015 में जोइनिंग के ही समय किराए का एक कमरा मिल गया था जिसका किराया अब 3600 रुपये प्रति माह है ।


कालांतर में उत्तराखंड राज्य गठन व देहरादून राजधानी के रूप में विकसित होने व सड़क व यातायात के द्रुतगामी वाहनों की उपलब्धता होने, चकराता में आवासीय सुविधाओं के अभाव होने व सर्दियों व बरसात के दिनों के कठिन जीवन के कारण कर्मचारी वर्ग ने विकास नगर व देहरादून में ही परिवार के साथ रहना उचित समझा होगा ।


कैंट द्वारा अति महत्वपूर्ण समझे जाने वाले राज्य सरकार के दूसरे कार्यालयों हेतु तो भूमि उपलब्ध करा दी किन्तु शिक्षा विभाग चूंकि किसी की भी प्राथमिकता में नहीं आता अतः मुख्य चकराता में ही शिक्षा विभाग के कार्यालयों की स्थापना किये जाने के विषय मे सोचा भी नहीं गया होगा । 


यह भी लिखना उचित होगा कि कैंट बोर्ड द्वारा विभिन्न स्थानों पर लगाये गए सूचना पटों में भी खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय का कोई उल्लेख नहीं है ।




राजकीय इंटर कॉलेज चकराता का स्वयं का कार्यालय अभी भी विद्यालय से 05 किलोमीटर की दूरी पर चकराता में ही संचालित हो रहा है । कदाचित राजकीय इंटर कॉलेज का संचालन वर्ष 1990 तक चकराता में होने के कारण यह कार्यालय यहीं चलता रहा और कालांतर में खंड शिक्षा अधिकारी पद सृजित होने पर दोनों ही कार्यभार एक ही अधिकारी द्वारा निर्वाहन किये जाने से राजकीय इंटर कॉलेज, चकराता के पुरोड़ी स्थित अपने नवीन भवन में स्थानांतरित होने के उपरांत भी अतिथि तक उनके कार्यालय का संचालन अभी भी चकराता से ही हो रहा है ।


वर्तमान में चकराता स्थित कार्यालय खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय व राजकीय इंटर कॉलेज चकराता के ही कार्यालय के रूप में संचालित हो रहा है । विकास खंड चकराता के अन्य कार्यालय यथा, SDM कार्यालय, BDO कार्यालय, तहसील, पुलिस थाना, खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय, बाल विकास परियोजना अधिकारी कार्यालय, सामुदायिक चिकित्सा केंद्र व अन्य कार्यालय चकराता ही संचालित हो रहे हैं, कदाचित स्थानाभाव के कारण ब्लॉक संसाधन केंद्र को चकराता से अलग 5 किलोमीटर दूर पुरोड़ी ले जाया गया जहां पर अब उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय भी संचालित किया जा रहा है ।



विकास खंड चकराता का भौगोलिक क्षेत्र बहुत ही बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है जिसे कुल 14 शैक्षिक संकुलों में बांटा गया है । इस ब्लॉक के 03 संकुलों का सुगम मार्ग विकास नगर से ही पृथक हो जाता है, संकुल कोटा तापलाद तथा लाखामंडल जाने के लिए विकास नगर से यमुनोत्री मार्ग लिया जाता है तथा संकुल क्वानु हेतु कालसी से मीनस व अताल मार्ग जो त्यूणी तक जाता है उससे ही पहुंचा जाता है । चकराता से चल कर इन संकुलों तक अपेक्षाकृत लंबे मार्ग से ही पहुंचा जा सकता है ।


अन्य 01 संकुल हाजा जाने के लिए भी चकराता तक नहीं आना पड़ता इसका मार्ग चकराता से 20 किलोमीटर पहले सहिया नामक स्थान से ही अलग हो जाता है ।


अतः पुरोड़ी स्थित उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय से विकास खंड का निकटतम स्कूल क्वान्सी मार्ग पर डाकरा लगभग 10 से 12 किलोमीटर व सकनाइ त्यूणी मार्ग पर लगभग 12 से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । जबकि विकास खंड कालसी के कुछ  स्कूल लांघा पोखरी, ठाना, तुंगरा इत्यादि अपेक्षाकृत नजदीक मात्र 2 से 05 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं ।


विकास खंड के 02 संकुल मोहना व दूँगीयरा चकराता से नजदीक पड़ते हैं जिनके अधिकतम  दूरी वाले स्कूलों टावरा, मोहना संकुल की दूरी लगभग 30 किलोमीटर व घनता, दूँगीयरा की दूरी भी इतनी ही होगी या इससे अधिक । शेष समस्त विद्यालय उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय से 30 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर स्थित हैं जिनमे से सबसे दूरस्थ सड़क मार्ग का विद्यालय राजकीय प्राथमिक विद्यालय पट्यूड लगभग 145 किलोमीटर की दूरी पर व अन्य स्कूल चोरलानी व प्यूनल जिनका मुंधौल से पैदल मार्ग है लगभग इतने ही  किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं ।


विकास खंड के दूरस्थ भाग त्यूणी, कात्यान तक रोडवेज की बस की सर्विस उपलब्ध है किंतु यह बस प्रतिदिन एक ही फेरा लगाती है । पहली बस जो देहरादून से सुबह 5 बजे चलती है और चकराता सुबह 8.30 बजे पहुंच जाती है । यही बस चकराता से  चलकर लोखंडी, कोटि कानासर, सावदा, दारगाड होते हुए त्यूणी लगभग 12.30 बजे तक और शाम 5 बजे तक विकास खंड के दूरस्थ छोर कात्यान तक पहुंच जाती है । किंतु कात्यान से आगे के गांव में स्थित  स्कूलों तक पहुंच पाने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं होती है । पैदल चलना ही फिर अन्य विकल्प होता है या फिर गांव गांव से सुबह 8 बजे बाजार के लिए निकलने वाली यूटिलिटी जो कि शाम को समान व जन साधारण से लदी हुई वापस गांव तक आती हैं । 

चकराता से त्यूणी वाया कोटि कानासर तथा कालसी से त्यूणी वाया अताल मीनस पर ही रोडवेज की सेवा उपलब्ध होती है इसके अतिरिक्त विकास खंड की 116 ग्राम पंचायतों में स्थित 216 प्राथमिक व 47 उच्च प्राथमिक स्कूलों तक।पहुंचने हेतु या तो स्वयं के वाहन से या पैदल या फिर गांव गांव की इन्ही यूटिलिटी का सहारा लेना पड़ता है ।


मैं भी समय समय पर अपने स्कूलों तक पहुंचने के लिए इन्ही रोडवेज की बस सेवा या फिर इन्ही यूटिलिटी से सफर करता हूँ । काफी लोग बोलते भी हैं कि आप एक अधिकारी हो, ऐसे क्यों पैदल चलते हो या यूटिलिटी में पीछे या छत पर सफर करते हो उनको मेरा यही उत्तर होता है कि इससे मैं आम आदमी को होने वाली दिक्कतों को नजदीक से देखता हूँ, उनसे जुड़ाव महसूस करता हूँ और सबसे अच्छा तब लगता है जब किसी पैदल रास्ते पर कोई बच्चा हमारे किसी स्कूल का मुझे पहचान कर आकर पैर छू लेता है या किसी स्थानीय व्यक्ति, खेतों में काम करते बुज़ुर्गों से दुआ सलाम हो जाती है ।  

जन यातायात से आम आदमी के साथ सफर करने का अपना ही एक आनंद है और मुझे उम्मीद है कि मैं अपने बाकी बचे हुए सेवा काल मे भी ऐसे ही सफर करता रहूंगा । कभी देहरादून की भीड़ भारी सिटी बस में खड़े होकर, कभी देहरादून के विक्रम में उस जांबाज़ चौथे आदमी के रूप में जो 3 अन्य यात्रिओ के बीच फंस कर अपने ही पैरों के सहारे व विक्रम की सीट के आभासी सहारे से अपने गंतव्य तक पहुंच जाता है । कई बार देहरादून विक्रम की फ्रंट सीट मिलने पर,  रोडवेज की त्यूणी जाने वाली बस में सीट मिलने पर और यूटिलिटी में अंदर जगह मिलने पर जो खुशी होती है वह शायद अपने खुद के वाहन में सफर करने पर भी नहीं मिलती होगी । इसके अतिरिक्त 5 सीटों वाली कार में अकेले सफर करना भी संसाधनों का अपव्यय ही नजर आता है । पहाड़ों में रह कर सीट फुल होने के बाद ही चलने की आदत पड़ चुकी है ।


यह भी जानना आवश्यक होगा कि कालसी से त्यूणी के बीच के 120 किलोमीटर के मार्ग पर कोई भी पेट्रोल पंप नहीं है, कालसी के बाद अगला पेट्रोल पंप त्यूणी से भी आगे हिमाचल के पन्द्रानु नामक स्थान पर है । यद्यपि इस बीच मे दुकानों पर खुला पेट्रोल कुछ लोग बेचते हैं किंतु उनकी भी उपलब्धता निश्चित नहीं होती । बीच मे यदि कोई वाहन खराब भी हो जाता है तो मरम्मत करने वाले भी उपलब्ध नहीं हो पाते ।