Monday, April 27, 2020

जिला सहारनपुर में अंग्रेजी शासन में महामारी ।

महामारियों का इतिहास, स्त्रोत, अंग्रेजों के द्वारा लिखे गए सहारनपुर गजेटियर के पन्नों से
वर्ष 1872 में हरिद्वार में हैजे की बीमारी फैली और 1351 लोगों की मृत्यु हुई । इस पुस्तक में लिखा है कि बहुत सारी नहरों के खुद जाने से पानी का स्तर भी ऊपर आया और यह भी बीमारियों के फैलने का कारण बना । इसी बीमारी से वर्ष 1887 में 1254 लोग काल कवलित हुए । तथा 1880 से 1890 के बीच करीब 230 लोग प्रति वर्ष इस बीमारी से मरते थे । 1892 में पुनः हरिद्वार में इस बीमारी ने दस्तक दी जिसके कारण एक बड़े मेले को मुख्य स्नान के दिन से भी पहले ही लोगों को रेलगाड़ी द्वारा वापस भेजा गया । मेले का नाम अंग्रेजी में Mahabarni लिखा गया है । बीमारियों की अगली लिस्ट में चेचक या स्माल पॉक्स का जिक्र किया गया है जिसमे 1867 से 1873 के बीच 20,942 लोगों की मृत्यु पूरे सहारनपुर जिले में हुई । लिखा गया है कि इस बीमारी से भी लगभग 3000 लोग प्रतिवर्ष मरते थे । सन 1877 में सूखे के समय भी यह बीमारी फैली तथा 1883 में भी । अंग्रेज सरकार के समय भी टीकाकरण किया जाता था ऐसा इसमे लिखा गया है । यह भी बताया गया है कि जिले की कुल 04 नगर पालिकाओं सहारनपुर, रुड़की, देवबंद और हरिद्वार में टीकाकरण आवश्यक रूप से किया जाता था । इसके अतिरिक्त वर्ष 1897 के कुम्भ या अर्धकुम्भ मेले के दौरान अतिसार की भी बीमारी फैली जिसका कारण सिंध से हरिद्वार आये तीर्थ यात्री बताए गए हैं । इससे भी 13 लोग मारे गए । यही बीमारी सर्दियों में फिर से फैली और कनखल के आसपास के गांव में इसको रोकने के उपाय किये गए । लिखा गया है कि 1897 में प्लेग की बीमारी फैल जाने के कारण पूरे कनखल को खाली करा लिया गया था तथा करीब 2 माह बाद ही निवासियों को वापस अपने घरों में आने दिया गया । लेकिन इसी दौरान जवालापुर व आसपास के गांव में फिर से प्लेग फैला जिसको काबू करने के प्रयास किये गए और इन्ही प्रयासों में जवालापुर के एक सज्जन को अस्पताल तक पहुंचाए जाने के चक्कर मे दंगा जैसी स्थिति आयी जिसके कारण मेरठ से इन्फेंट्री की 02 कंपनियों को जवालापुर बुलाया गया इसके बाद गर्मी शुरू हो जाने पर यह बीमारी नियंत्रित हुई । 1902-03 में बीमारी पुनः आयी और बाद के वर्षों में भी इसका डर बना ही रहा । जिले के कुछ स्थानों पर हिमालयी नदियों का पानी पीते रहने के कारण घेंघा रोग भी देखा गया ।

अपनी जानकारी बढ़ाये जाने हेतु युवाओं को ऐसी ऐतिहासिक व अन्य बहुमूल्य पुस्तकें जरूर पढ़नी चाहिए । इनका संग्रह National Digital Library, IIT Kharagpur की वेबसाइट ndl.iitkgp.ac.in पर निःशुल्क उपलब्ध है ।

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