जब मैं अनजाने में ही धनुषकोडी तक हो आया था ।
बात है वर्ष 1992 की शायद दिसंबर का माह रहा होगा । नौसेना की सेवा के दौरान गोवा से मुझे अस्थाई रूप से कुछ समय हेतु रामेश्वरम से लगभग 40 किलोमीटर पहले एक स्थान पर भेजा गया । चूंकि रामेश्वरम नजदीक ही था तो हम युवा नौसैनिक किसी भी छुट्टी के दिन स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस पकड़ कर रामेश्वरम चल दिया करते थे । रामेश्वरम जाने का एक अन्य आकर्षण वहां के एक राजस्थानी होटल में मिलने वाले शुद्ध उत्तर भारतीय भोजन को चखने का भी हुआ करता था । मुझे याद आता है कि एक बार तो हम चार साथियों ने उस होटल में कुछ भी न हो तो 10=10 रोटियां तो खा ही ली थी जिसकी उन दिनों डाइट थी शायद 25 रूपये की भरपेट थाली । चूंकि हमारी मेस में रोटी नहीं बनती थी तो हम उत्तर भारतीयों के लिए तो देश के अंतिम छोर पर राजस्थानी रामदेव होटल किसी वरदान के समान ही था ।
खैर एक बार ऐसे ही अवसर पर मैं अपने साथियों से थोड़ा अलग होकर अकेले ही एक यात्रा पर निकल गया । पहले तो वह स्थान देखा जहां से हनुमान जी ने श्रीलंका हेतु खड़े होकर छलांग लगाई थी । उस स्थान से आगे भी कुछ स्थानीय लोग पैदल ही जा रहे थे जो कि कदाचित मछुआरे थे और अपनी नौका के पास जा रहे होंगे । मैं भी उनके साथ ही चलता रहा बातचीत बस थोड़ी बहुत ही हो पा रही थी क्योंकि उनको हिंदी बहुत कम आती थी और अपना तमिल में हाथ बहुत तंग था । खैर काफी दूर तक तो मैं अकेला ही चलता गया और फिर रेत में दबी दिखाई दी रेलवे लाइन और कुछ टूटी फूटी पुरानी बिल्डिंगों के खंडहर । जिनको देख कर ऐसा लगा मानो कि यहां कभी कोई बहुत ही खतरनाक तूफान आया होगा या फिर कोई भूकंप । खैर वह स्थान घूम घाम पर मैं वापस शाम को अपने स्थान पर पहुंच गया और बाद में पता चला कि मैं तो गलती से धनुषकोडी तक की यात्रा कर आया था ।