Thursday, September 14, 2023

वर्ष 2004 की आगम्बे और श्रृंगेरी यात्रा

अचानक से की गई एक यादगार यात्रा । वर्ष 2004 रहा होगा शायद उस समय मैं कर्नाटक की श्रीकृष्ण जी की नगरी दक्षिण की काशी कही जाने वाले स्थान उडुपी में था । हमारे पास उन दिनों अपना कोई दोपहिया वाहन नहीं था संयोग से एक दिन किसी मित्र की बाइक मिल गई हम पति पत्नी और एक दो वर्ष की बेटी ने सोचा चलो किसी नजदीक की जगह घूम आते हैं । हम उडुपी से कारकला के लिए निकले वहां भगवान बाहुबली की बहुत विशाल मूर्ति के दर्शन के बाद करकला का मशहूर चर्च भी देखा और वापसी के लिए निकल पड़े । रास्ते में कुछ दूरी बताने वाले साइन बोर्ड दिखाई दिए तो देखा कि श्रृंगेरी भी कहीं आसपास ही है हमने सोचा चलो श्रृंगेरी भी घूम लेते हैं और शाम को वापस आ जायेंगे । हमारे पास कपड़े भी नहीं थे और ना ही रास्ते का कोई अंदाज था ।खैर शुरू में तो सब सही रहा परंतु जब हम आगंबे के आसपास पहुंचे तो सारा नजारा बदल चुका था, सड़क पर जबरदस्त चढ़ाई और बारिश और बादल इतने जैसे कि हमारे हरिद्वार में सर्दियों के दिनों में कोहरा रहता है । ऊपर से बारिश में भीग गए थे तो ठंड भी लगने लगी थी खैर बच्ची को तो जैसे कैसे श्रीमती जी ने अपनी चुन्नी में लपेट लिया था । रास्ता देख कर एक बार मन में आया कि वापस ही हो लेते हैं पर देखा कि अब भीग भी चुके हैं और अंधेरा भी हो चला था और उडुपी वापसी में भी रात ही हो जाती । श्रृंगेरी की दूरी कम ही रह गई थी खैर भगवान का नाम लिया और श्रृंगेरी तक पहुंच गए । 

वहां श्रृंगेरी मठ की धर्मशाला में कमरा लिया और मंदिर दर्शन करने के उपरांत मठ में ही प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण किया और रात्रि विश्राम किया । उन दिनों श्रृंगेरी बहुत ही शांत था और ऐसा ही नजारा लग रहा था मानों कि हम ऋषिकेश में ही कहीं हैं । अगले दिन सुबह फिर मंदिर दर्शन किए और शंकराचार्य जी के भी दर्शन किए । वापसी के लिए हमने फिर अगंबे के खतरनाक ढलान वाला रास्ता नहीं लिया बल्कि थोड़ा लम्बा रास्ता लिया था जो कि कुद्रेमुख जंगल  के बीच से होकर गुजर रहा था । यह भी पहाड़ी सा रास्ता था लेकिन बहुत ही सुंदर और हरा भरा । रास्ते में रुकते रुकाते फोटो खींचते हुए हम शाम तक उडुपी वापस लौट आए थे । यह सफर आज भी याद करते हैं तो बड़ा ही रोमांच हो उठता है क्योंकि हमको आगंबे के बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि यह स्थान भी अपनी बारिश के लिए मशहूर है और रास्ता भी इतनी चढ़ाई का होगा । उसी यात्रा की कुछ स्मृतियां ।

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