Thursday, April 2, 2020

गांव में बीता बचपन व कक्षा 5 तक की शिक्षा

हमारा परिवार गांव के अन्य परिवारों की ही भांति एक संयुक्त परिवार था, जिसमे करीब 20 से 30 सदस्य प्रतिदिन एक ही चूल्हे पर बना भोजन करते थे । खाना चूल्हे पर ही बना करता था तथा सर्दी के दिनों में रसोई में चूल्हे के ही पास बैठकर खाना खाने का अपना ही एक सुख था । उस समय हमारे गांव में 03 सरकारी स्कूल थे जिनमे 02 सरकारी प्राइमरी स्कूल जो कि कक्षा 5 तक थे, मंदिर के पास वाला प्राइमरी स्कूल कन्या पाठशाला बोला जाता था जिसमे लड़कियां पढ़ा करती थी तथा जोहड़ के पास वाले में लड़के । इन दोनों के अलावा तीसरा स्कूल जूनियर हाई स्कूल था जो कि कक्षा 6 से 8 तक था तथा इसमें आसपास के गांव से भी बच्चे पढ़ने आया करते थे । उन दिनों सरकारी प्राइमरी स्कूलों में कक्षा 5 तक अंग्रेजी भाषा नहीं पढ़ाई जाती थी तथा इन स्कूलों में पढ़े बच्चों का अंग्रेजी भाषा से पहला परिचय कक्षा 6 में ही हुआ करता था । हालांकि शहरों में ऐसे स्कूल भी खुल चुके थे जिनका माध्यम तो हिंदी ही था किंतु उनमें अंग्रेजी शायद कक्षा नर्सरी, lkg व ukg से ही पढ़ाई जाने लगी थी ।

इसी क्रम हमारे गांव में भी पहला प्राइवेट मोंटेसरी स्कूल उन्ही दिनों  खुला । हरिद्वार से 03 महिला शिक्षिका आया करती थी, जिनको हम मैडम नहीं ऑन्टी जी बोला करते थे । यह बात मुझे समझ नहीं आयी कि हमारी मैडमों ने हम बच्चों को मैडम के स्थान पर ऑन्टी क्यों कहलवाया जाना उचित समझा होगा । मेरा भी दाखिला इस स्कूल में ही कराया गया जिसका अपना कोई भवन नहीं था । उन दिनों शायद 10 रुपये प्रति माह की फीस पर यह स्कूल प्रारम्भ हुआ जिसमें हम गांव के बच्चों को नर्सरी से ही अंग्रेजी भाषा की जानकारी मिलनी शुरू हो गयी । यह स्कूल हमारे 05 वर्षों के दौरान गांव में अलग अलग जगहों पर संचालित हुआ, कभी किसी के घेर में, किसी की बैठक पर चलता रहा । जब मेरा प्रवेश इसमे हुआ तो इसका नाम ग्रामीण बाल कल्याण केंद्र था बाद में इसका नाम ग्रामीण बाल विकास केंद्र हो गया ।

स्कूल में कभी कभी कोई सज्जन बाहर से किसी शहर से भी आते थे जिन्हें हमको बताया गया कि ये मंत्री जी हैं । राजनैतिक मंत्री न होकर शायद किसी संस्था के मंत्री होते होंगे तथा शायद उनकी ही संस्था के द्वारा हमारा स्कूल चलाया जाता था । हमें जिन 03 मैडमों द्वारा पढ़ाया गया उनके नाम शोभा ऑन्टी, शक्ति ऑन्टी व लवली आंटी थे, में आज भी उनके समर्पण व कठिन मेहनत को याद करता हूँ, कैसे भी खराब मौसम में ये तीनों प्रतिदिन रेल से हरिद्वार से गांव आकर हम बच्चों को पढ़ा कर वापस रेल से ही हरिद्वार चली जाया करती थी । इस स्कूल में हम काफी बच्चे पढ़ते थे और मुझे याद आता है जब गांव ही के राजेन्द्र डॉक्टर जी के घर हमारा स्कूल चलता था तो उसी समय हम सभी बच्चों का एक ग्रुप फ़ोटो खींचा गया था जो हम सभी बच्चों को दिया गया, यह फोटो काफी समय तक तो घर मे दिखाई दिया किन्तु वर्तमान में यह फोटो मेरे पास नहीं है । इस स्कूल में हम अंग्रेजी भाषा ही अंग्रेजी में पढ़ते थे शेष सभी विषय हिंदी में ही पढ़ाये जाते थे । मुझे याद है कि हम सभी बच्चों कक्षा 5 की बोर्ड की परीक्षा दिलाये जाने हेतु गांव के ही प्राइमरी स्कूल ले जाया गया कदाचित हमारे स्कूल की अपनी कोई मान्यता नहीं रही होगी या फिर उन दिनों प्राइवेट स्कूलों के लिए भी कक्षा 5 की बोर्ड की ही परीक्षा रखी जाती होगी । इस स्कूल में हम बच्चों को दोपहर के समय आधी छुट्टी में चने, मुरमुरे, नमकीन, कभी कभी खिचड़ी इत्यादि भी दी जाती थी जिसे हम बच्चे नाश्ता बोला करते थे । स्कूल में हमारे ही गांव की निवासी हमारी आया होती थी जो कि हम बच्चों का ध्यान रखती थी । मुझे याद है कि प्रसिद्ध हिंदी फिल्म गांधी भी शायद उन्हीं दिनों रिलीस हुई होगी और हम गांव के बच्चों को हमारी मैडमों द्वारा घोड़े बग्गी में बैठा कर शहर ले जाकर यह पिक्चर दिखाई गई । वर्ष शायद 1982 या 83 ही रहा होगा, इस पिक्चर का जालियां वाला बाग नरसंहार वाला दृश्य आज भी मस्तिष्क में अंकित है । उस दृश्य को देख कर हम सभी बच्चे बहुत ही डर गए थे ।

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