Thursday, April 2, 2020

एक गंवार की आत्मकथा - आरंभ के 17 वर्षों का जीवन

पाठक सोच रहे होंगे कि भला यह भी क्या शीर्षक हुआ नए ब्लॉग का । lockdown ने यह अवसर प्रदान किया है कि कुछ आत्मचिंतन व आत्मावलोकन कर लिया जाय । इसी कड़ी में मुझे भान हुआ व मेरे जैसे और भी लोगों को लगा होगा कि शहर में तो हम कैद से होकर रह गए हैं पर गांव में रहते तो भले ही घर के अंदर रहते पर खुलापन सा तो जरूर ही महसूस होता । मुझे भी गांव का अपना जीवन याद आया आउट इसी कड़ी में सोचा कि क्यों मैं अपने गांव और अपने जीवन के ही विषय में कुछ लिखने का प्रयास करूँ । मेरे गाँव का नाम बहादर पुर जट्ट है, शायद बहादुर पुर को सही से लिखा गया और जट्ट इसलिए कि गांव में जाटों की संख्या अधिक है । 


यह आश्चर्य की ही बात है कि इस क्षेत्र में हमारे ही गांव में जाटों की संख्या सबसे अधिक है व पास के गांव सराय में यादव लोग ज्यादा हैं बाकी अन्य गांव में चौहान लोग ज्यादा संख्या में बसे हैं । हमारा गांव वर्तमान में उत्तराखंड राज्य के हरिद्वार जनपद में आता है, जो कि वर्ष 1988 तक उत्तर प्रदेश के समय सहारनपुर जनपद में आता था, वर्ष 1988 में सहारनपुर से हरिद्वार को अलग कर इस नए जिले का निर्माण किया गया जो कि बाद में वर्ष 2000 में उत्तराखंड गठन पर उत्तराखंड में सम्मिलित हुए । 
हमारे गांव में खड़ी बोली हिंदी बोली जाती है जो कि सहारनपुर व मुज़फ्फर नगर से मिलती जुलती प्रतीत होती है किंतु उनसे अलग ही है । यह बोली हरिद्वार से लगा कर इधर सहारनपुर व उधर लगभग पुरकाजी तक समान सी प्रतीत होती है । हमारे गांव की रिश्तेदारियां भी ज्यादातर जनपद हरिद्वार, सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर, मेरठ, बिजनौर व मुरादाबाद जिलों में ही ज्यादातर हैं । पहाड़ों के जिलों जिनको हम ऋषिकेश व देहरादून से ऊपर का क्षेत्र मानते हैं हमारा नाता अधिक नहीं रहा, मात्र मसूरी घूमने के लिए ही चले जाया करते थे ।


मुझे बचपन मे भी याद नहीं आता कि हमारे गांव से शायद ही कोई व्यक्ति चारधाम यात्रा पर उस समय गया होगा । गांव के सभी लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि ही था व आज भी है कुछ लोग सरकारी नौकरियों जैसे BHEL फैक्ट्री, सेना व शिक्षक इत्यादि थे किंतु बहुत ही गिने चुने लोग नौकरियों में थे । यह बात मैं वर्ष 1977 से 1990 तक की ही कर रहा हूँ क्योंकि मेरा जन्म 1973 में हुआ व 1977 से ही मुझे अपने जीवन के महत्वपूर्ण चरण याद रह सके

 । इनमे सबसे पहली बात जो मुझे याद है बड़ी बहन का विवाह जो कि 26 जून 1977 को सम्पन्न हुआ, वर्ष 1979 में छोटे चाचा जी का विवाह याद है तथा वर्ष 1980 के बाद की तो लगभग सारी बड़ी देश विदेश की घटनाएं याद हैं क्योंकि मैंने बहुत ही कम आयु में अखबार पढ़ना शुरू कर दिया था इसलिए बाहर की घटनाओं की भी।जानकारी प्राप्त होने लगी थी । 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों की खबर में अखबार में ही पढ़ लेता था तथा मुझे अखबार की एक हैडिंग आज भी याद है


नवम एशियाई खेल, कौन पास कौन फेल । उन दिनों हमारे क्रेशर पर दिल्ली से छपा हुआ हिंदुस्तान अखबार आया करता था । जिसमे एक और भी कॉलम छपता था, जिसका नाम था


दिल्ली ऊंचा सुनती है । वर्ष 1985 या 1986 से नवभारत टाइम्स व पंजाब केसरी भी मेरे प्रतिदिन पढ़े जाने वाले अखबारों की सूची में जुड़ गए यानी में स्कूल के बाद अलग अलग जगह जाकर 3 अखबार पढ़ लिया करता था । चाचा जी की चक्की पर, नवभारत टाइम्स, दूसरे चाचा जी की चक्की पर पंजाब केसरी व बाग में हिंदुस्तान । परिवार में पहला TV वर्ष 1983 में चाचा जी के लड़के के विवाह में आया उससे पहले TV गांव के कुछ ही घरों में हुआ करता था जिसे देखने हम बच्चे दूसरे घरों में चले जाया करते थे व हमे कोई मना भी नहीं करता था । हम दूसरों के घरों में जाकर जमीन पर ही बैठ कर TV देख लिया करते थे । 

TV पर उन दिनों का मुख्य आकर्षण बुधवार व शुक्रवार को चित्रहार व बृहस्पतिवार व रविवार को शाम को आने वाली हिंदी फिल्म हुआ करती थी । रात्रि 9 बजे के हिंदी समाचार सुनने का क्रम बाद ही में शुरू हुआ जब वर्ष 1986 में बड़े भाई साहब की शादी में TV आया । उन्ही दिनों धारावहिक हम लोग व बुनियाद भी आने शुरू हुए जो कि हम बच्चे बड़े ही चाव से देखा करते थे । इसके अतिरिक्त अन्य धारावाहिकों में नुक्कड़, तमस, ये जो है जिंदगी, सुबह, चुनौती, कच्ची धूप, विक्रम बेताल के भी नाम याद हैं । इस पोस्ट में में वर्ष 1973 से 1983 तक का ही वर्णन कर रहा हूँ क्योंकि वर्ष 1983 के बाद मेरे जीवन की बड़ी घटना थी कक्षा 6 में नजदीक के शहर ज्वालापुर में दाखिला होना ।

 इससे पहले शहर से हमारा ज्यादा परिचय नहीं था, बस बहन के विवाह के बाद उनकी ससुराल रुड़की जाना व bhel के quartor में रह रहे एक रिश्तेदार ही थे जो शहर में रहते थे ।


इस समय की एक अन्य जो याद मुझे आती है वह थी अपने गांव के रेलवे स्टेशन से शाम को चलने वाली रेलगाड़ी में देहरादून तक का सफर । बड़ी बहन ने कुछ वर्ष देहरादून छोटे नाना जी के घर रह कर पढ़ाई की थी जिससे मिलने मम्मी पिताजी के साथ शायद बचपन मे मैं भी गया हूंगा, यानी वर्ष 1977 से पहले की यही बात मुझे याद है देहरादून का रेलगाड़ी से किया गया सफर जिसकी दो तीन खास बातें याद आती हैं । एक तो कोयले से चलने वाला भाप का इंजन, जिससे धुएं के साथ बहुत से महीन कोयले के कण भी निकला करते थे जो कि बालों में भर जाया करते थे तथा यदा कदा आंखों में भी गिरते रहा करते थे । 

हरिद्वार रेलवे स्टेशन के बाद गुफा जिससे होकर रेल निकला करती थी तथा सुखी नदियां आने पर उनके पत्थरों से टकरा कर आने वाली रेल की आवाज, रात्रि के समय रेल लाइन के पास बिजली व टेलीफोन के तारों को चलती हुई रेल से देखना बहुत अच्छा लगा करता था, कि मानों कहीं कहीं इनकी आपस की दूरी बहुत अधिक हो जाती है और कहीं कहीं ये अचानक से एक दूसरे के बहुत पास भी आ जाते हैं । इन तारों का रंग भी मुझे अलग अलग सा लगता था जो कि शायद उन पर जम गए भूरे रंग के जंग के कारण होता होगा । देहरादून रेलवे स्टेशन से उतर कर नाना जी के घर तक पैदल ही जाना होता था, रास्ते मे पड़ता था परेड ग्राउंड जिसमे कोई न कोई प्रदर्शनी या सर्कस इत्यादि चलता ही रहता था । देहरादून में उन दिनों 3 व्हीलर चलते थे जिनकी आवाज भी मुझे याद रही । गांव से शहर में आने के बाद कुकर की सिटी की आवाज सुनना भी पहला ही अनुभव था क्योंकि गांव में चूल्हे पर उन दिनों तक हमारे परिवार में कुकर उपयोग में नहीं लाया जाता था । शहर के दूध का भी स्वाद मुझे बचपन मे अपने घर के दूध से अलग सा लगा ।



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