Saturday, December 30, 2023

चकराता के 07 वर्ष एक अनुभव

वर्ष 2019 के अंतिम दिवस का चिंतन ।

[31/12 07:56] Pankaj Kumar: मैं अपने कार्यालय से शाम को वापस पैदल ही आता हूँ । एक तो 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा हो जाती है और शाम को 5 बजे पुरोड़ी से चकराता जाने वाली अन्य सवारियों के अभाव में रूट की  कोई गाड़ी भी नहीं मिलती । बहुत से लोग पूछते हैं कि कोई गाड़ी क्यों नहीं रख लेते ?? मेरा जवाब होता है कि जिन लोगों और बच्चों के लिए मैं काम कर रहा हूँ वो सब भी पैदल ही चलते हैं । या फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट से ही । 🙏🏼🙏🏼
इधर 07 जनवरी 2020 को उत्तराखंड PCS परीक्षा के माध्यम से चयनित होकर नवसृजित पद उप शिक्षा अधिकारी, राजपत्रित, पूर्व ग्रेड पे 5400 अब वेतन बैंड 10, पर  इस सेवा में 5 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे तथा पदोन्नति के अगले सोपान खंड शिक्षा अधिकारी, पूर्व ग्रेड पे 6600, वर्तमान लेवल 11 हेतु भी सेवा अर्हता के भी 05 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे । 
इन 05 वर्षों का अधिकतम समय अन्य विभागों को यही बताने में भी गुजरा कि अब प्रत्येक विकास खंड में खंड शिक्षा अधिकारी के अतिरिक्त एक अन्य अधिकारी का भी प्रादुर्भाव हो चुका है जिस पर विकास खंड के समस्त प्रारंभिक शिक्षा कक्षा 1 से 8 के प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों की जिम्मेदारी सौंपी गई है । इन 05 वर्षों में हमे भिन्न भिन्न पदनामों से बुलाया जाता रहा जैसे कि उप खंड शिक्षा अधिकारी, ABEO आदि इत्यादि । 
रोचक यह भी है कि हमारे राज्य कोषागारों के सॉफ्टवेयर में भी अभी तक हमारा सही पदनाम उप शिक्षा अधिकारी सृजित नहीं हुआ है और उनके हिसाब से मैं Deputy Basic Shiksha Adhikari हूँ । 
चूंकि PCS परीक्षा के माध्यम से चयनित होने वाले अन्य सभी पदनाम सभी के लिए  अपेक्षाकृत जाने पहचाने होते हैं यथा SDM, DySP, वित्त अधिकारी, Asst Commissioner वाणिज्य कर, BDO व और भी अन्य । पर चूंकि यह पद भी नया ही सृजित किया गया था तथा हम लोग इस पर चयनित होने वाले भी पहले ही बैच के लोग थे तो इन 05 वर्षों का समय अन्य विभागों को यही बताने में गुजर गया कि हम कौन लोग हैं और क्या करते हैं । 
खैर इस अपेक्षाकृत कम जाने पहचाने वाले पदनाम वाले पद को छोड़ कर हमारे कई साथियों ने दोबारा से PCS परीक्षा पास की और SDM, DySP व ARTO जैसे पदों पर चयनित होने में सफलता प्राप्त की और इस गुमनामी के जीवन से छुटकारा पाने में सफल रहे । 
01 अप्रैल 2020 को चकराता में  तैनाती के भी 05 वर्ष पूर्ण हो जाएंगे । जब यहां कार्यभार ग्रहण किया था तो उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय अस्तित्व में ही नहीं आया था तथा चकराता स्थित एक बहुत पुराने जीर्ण शीर्ण से खंडहर नुमा भवन से ही काम चल रहा था, क्योंकि उप शिक्षा अधिकारी नवसृजित पद था और इस पद पर हमारे ही बैच की नियुक्ति हुई तथा प्रशिक्षण की समाप्ति पर हम सभी 65 नव नियुक्त उप शिक्षा अधिकारी 02 चरणों मे अपने अपने विकास खंडों में पहुंच गए ।
विकास खंड चकराता में मेरी नियुक्ति के समय मार्च 2015 तक विकास खंड के ही एक राजकीय इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य महोदय ही अपने प्रधानाचार्य के दायित्वों के ही साथ साथ खंड शिक्षा अधिकारी व उप शिक्षा अधिकारी के भी कार्य दायित्यों का निर्वहन इसी एक कार्यालय से कर रहे थे ।
 मार्च  2015 में चकराता में पूर्णकालिक खंड शिक्षा अधिकारी महोदय व फिर 01 अप्रैल 15 को उप शिक्षा अधिकारी यानी मेरे द्वारा भी कार्यभार ग्रहण कर लिया गया ।
चूंकि इस कार्यालय में पहले से ही राजकीय इंटर कॉलेज, चकराता का भी कार्यालय संचालित हो रहा था तथा शायद उस समय इस विद्यालय के ही प्रधानाचार्य महोदय खंड शिक्षा अधिकारी का भी कार्य दायित्व निर्वाहन करते रहे होंगे अतः यही फिर खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय के भी रूप में संचालित होता रहा व कालांतर में वर्ष 2012 में उप शिक्षा अधिकारी का पद सृजित होने के बाद यही उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय के रूप में भी चलता रहा । क्योंकि पूर्णकालिक उप शिक्षा अधिकारी के रूप में 01 अप्रैल 2015 को मेरी नियुक्ति होने से पूर्व खंड शिक्षा अधिकारी व उप शिक्षा अधिकारी के कार्य दायित्वों का निर्वहन एक ही अधिकारी,  प्रधानाचार्य श्री दोहरे जी द्वारा किया जा रहा था अतः अलग से कार्यालय की आवश्यकता नहीं समझी गयी होगी ।
कार्यालय में स्थानाभाव व हमारे प्राथमिक शिक्षकों के विभिन्न अभिलेखों को सुचारू रूप से रखे जाने व स्वयं मेरे व मेरे स्टाफ के 6 अन्य कार्मिकों के बैठने हेतु कोई स्थान उपलब्ध न होने के कारण व विकास खंड में अब पूर्णकालिक 03 अधिकारी,  खंड शिक्षा अधिकारी, चकराता, प्रधानाचार्य राजकीय इंटर कॉलेज चकराता, व उप शिक्षा अधिकारी, चकराता के आ जाने से उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय को ब्लॉक संसाधन केंद्र, चकराता में संचालित किए जाने का निर्णय लिया गया । 
चकराता विकास खंड का ब्लॉक संसाधन केंद्र पुरोड़ी नामक स्थान पर वर्ष 2004 में ही निर्मित कर दिया गया था जहां सर्व शिक्षा अभियान से संबंधित समस्त अभिलेख व प्रशिक्षण इत्यादि चलते रहे । यह भी जानना रोचक होगा कि विकास खंड चकराता का ब्लॉक संसाधन केंद्र तत्समय ऐसे स्थान पर निर्मित किया गया जो कि भौगोलिक दृष्टि से कालसी विकास खंड के क्षेत्र में स्थित है तथा इसके निकट विकास खंड चकराता का एकमात्र विद्यालय राजकीय इंटर कॉलेज, चकराता संचालित हो रहा है जिसमे मात्र कक्षा 11 व 12 ही बड़े लम्बे समय से संचालित हो रही हैं । 

पुरोड़ी चकराता से मसूरी जाने वाले सड़क मार्ग पर चकराता से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । जहां तक जाने के लिए स्थानीय यूटिलिटी ही मिल पाती हैं वह भी जब कि उनको पूरी सवारी मिल सकें । ऐसे में विकास खंड के किसी दूर के स्थान के किसी शिक्षक को चकराता से पुरोड़ी जाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ जाता है । 
 जानकर लोग बताते हैं कि चकराता क्योंकि कैंट है  तथा मिलिट्री स्टेशन होने के कारण यहां पर राज्य सरकार के वही कार्यालय चलते रहे जिनकी स्थापना या तो आज़ादी से पहले हो चुकी थी या फिर उत्तर प्रदेश राज्य के ही समय । पुराने लोग यह भी बताते हैं कि किस प्रकार उत्तर प्रदेश के दिनों में चकराता बाजार राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों, कार्मिकों व उनके परिवार जनों के यहीं निवास करने से भरा पूरा दिखाई देता था । अधिकतर कार्मिक चूंकि उत्तर प्रदेश के दूर दराज के जनपदों के निवासी हुआ करते थे तो साल में लंबी  छुट्टियों के ही दिनों में अपने घरों को जाते थे । बड़ी मात्रा में उनके लिए किराए हेतु कमरे भी बने हुए थे जो कि अब वर्तमान में होटलों में बदल चुके हैं और चकराता में कमरा ढूंढना वाकई एक कठिन कार्य है । संयोगवश मुझे वर्ष 2015 में जोइनिंग के ही समय किराए का एक कमरा मिल गया था जिसका किराया अब 3600 रुपये प्रति माह है । 
कालांतर में उत्तराखंड राज्य गठन व देहरादून राजधानी के रूप में विकसित होने व सड़क व यातायात के द्रुतगामी वाहनों की उपलब्धता होने, चकराता में आवासीय सुविधाओं के अभाव होने व सर्दियों व बरसात के दिनों के कठिन जीवन के कारण कर्मचारी वर्ग ने विकास नगर व देहरादून में ही परिवार के साथ रहना उचित समझा होगा । 

कैंट द्वारा अति महत्वपूर्ण समझे जाने वाले राज्य सरकार के दूसरे कार्यालयों हेतु तो भूमि उपलब्ध करा दी किन्तु शिक्षा विभाग चूंकि किसी की भी प्राथमिकता में नहीं आता अतः मुख्य चकराता में ही शिक्षा विभाग के कार्यालयों की स्थापना किये जाने के विषय मे सोचा भी नहीं गया होगा । यह भी लिखना उचित होगा कि कैंट बोर्ड द्वारा विभिन्न स्थानों पर लगाये गए सूचना पटों में भी खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय का कोई उल्लेख नहीं है । 
 राजकीय इंटर कॉलेज चकराता का स्वयं का कार्यालय अभी भी विद्यालय से 05 किलोमीटर की दूरी पर चकराता में ही संचालित हो रहा है । कदाचित राजकीय इंटर कॉलेज का संचालन वर्ष 1990 तक चकराता में होने के कारण यह कार्यालय यहीं चलता रहा और कालांतर में खंड शिक्षा अधिकारी पद सृजित होने पर दोनों ही कार्यभार एक ही अधिकारी द्वारा निर्वाहन किये जाने से राजकीय इंटर कॉलेज, चकराता के पुरोड़ी स्थित अपने नवीन भवन में स्थानांतरित होने के उपरांत भी अतिथि तक उनके कार्यालय का संचालन अभी भी चकराता से ही हो रहा है । 

वर्तमान में चकराता स्थित कार्यालय खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय व राजकीय इंटर कॉलेज चकराता के ही कार्यालय के रूप में संचालित हो रहा है । विकास खंड चकराता के अन्य कार्यालय यथा, SDM कार्यालय, BDO कार्यालय, तहसील, पुलिस थाना, खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय, बाल विकास परियोजना अधिकारी कार्यालय, सामुदायिक चिकित्सा केंद्र व अन्य कार्यालय चकराता ही संचालित हो रहे हैं, कदाचित स्थानाभाव के कारण ब्लॉक संसाधन केंद्र को चकराता से अलग 5 किलोमीटर दूर पुरोड़ी ले जाया गया जहां पर अब उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय भी संचालित किया जा रहा है ।

विकास खंड चकराता का भौगोलिक क्षेत्र बहुत ही बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है जिसे कुल 14 शैक्षिक संकुलों में बांटा गया है । इस ब्लॉक के 03 संकुलों का सुगम मार्ग विकास नगर से ही पृथक हो जाता है, संकुल कोटा तापलाद तथा लाखामंडल जाने के लिए विकास नगर से यमुनोत्री मार्ग लिया जाता है तथा संकुल क्वानु हेतु कालसी से मीनस व अताल मार्ग जो त्यूणी तक जाता है उससे ही पहुंचा जाता है । चकराता से चल कर इन संकुलों तक अपेक्षाकृत लंबे मार्ग से ही पहुंचा जा सकता है ।

अन्य 01 संकुल हाजा जाने के लिए भी चकराता तक नहीं आना पड़ता इसका मार्ग चकराता से 20 किलोमीटर पहले सहिया नामक स्थान से ही अलग हो जाता है ।

अतः पुरोड़ी स्थित उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय से विकास खंड का निकटतम स्कूल क्वान्सी मार्ग पर डाकरा लगभग 10 से 12 किलोमीटर व सकनाइ त्यूणी मार्ग पर लगभग 12 से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । जबकि विकास खंड कालसी के कुछ  स्कूल लांघा पोखरी, ठाना, तुंगरा इत्यादि अपेक्षाकृत नजदीक मात्र 2 से 05 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं ।

विकास खंड के 02 संकुल मोहना व दूँगीयरा चकराता से नजदीक पड़ते हैं जिनके अधिकतम  दूरी वाले स्कूलों टावरा, मोहना संकुल की दूरी लगभग 30 किलोमीटर व घनता, दूँगीयरा की दूरी भी इतनी ही होगी या इससे अधिक । शेष समस्त विद्यालय उप शिक्षा अधिकारी कार्यालय से 30 किलोमीटर से अधिक की दूरी पर स्थित हैं जिनमे से सबसे दूरस्थ सड़क मार्ग का विद्यालय राजकीय प्राथमिक विद्यालय पट्यूड लगभग 145 किलोमीटर की दूरी पर व अन्य स्कूल चोरलानी व प्यूनल जिनका मुंधौल से पैदल मार्ग है लगभग इतने ही  किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं ।

विकास खंड के दूरस्थ भाग त्यूणी, कात्यान तक रोडवेज की बस की सर्विस उपलब्ध है किंतु यह बस प्रतिदिन एक ही फेरा लगाती है । पहली बस जो देहरादून से सुबह 5 बजे चलती है और चकराता सुबह 8.30 बजे पहुंच जाती है । यही बस चकराता से  चलकर लोखंडी, कोटि कानासर, सावदा, दारगाड होते हुए त्यूणी लगभग 12.30 बजे तक और शाम 5 बजे तक विकास खंड के दूरस्थ छोर कात्यान तक पहुंच जाती है । किंतु कात्यान से आगे के गांव में स्थित  स्कूलों तक पहुंच पाने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं होती है । पैदल चलना ही फिर अन्य विकल्प होता है या फिर गांव गांव से सुबह 8 बजे बाजार के लिए निकलने वाली यूटिलिटी जो कि शाम को समान व जन साधारण से लदी हुई वापस गांव तक आती हैं । चकराता से त्यूणी वाया कोटि कानासर तथा कालसी से त्यूणी वाया अताल मीनस पर ही रोडवेज की सेवा उपलब्ध होती है इसके अतिरिक्त विकास खंड की 116 ग्राम पंचायतों में स्थित 216 प्राथमिक व 47 उच्च प्राथमिक स्कूलों तक।पहुंचने हेतु या तो स्वयं के वाहन से या पैदल या फिर गांव गांव की इन्ही यूटिलिटी का सहारा लेना पड़ता है ।

मैं भी समय समय पर अपने स्कूलों तक पहुंचने के लिए इन्ही रोडवेज की बस सेवा या फिर इन्ही यूटिलिटी से सफर करता हूँ । काफी लोग बोलते भी हैं कि आप एक अधिकारी हो, ऐसे क्यों पैदल चलते हो या यूटिलिटी में पीछे या छत पर सफर करते हो उनको मेरा यही उत्तर होता है कि इससे मैं आम आदमी को होने वाली दिक्कतों को नजदीक से देखता हूँ, उनसे जुड़ाव महसूस करता हूँ और सबसे अच्छा तब लगता है जब किसी पैदल रास्ते पर कोई बच्चा हमारे किसी स्कूल का मुझे पहचान कर आकर पैर छू लेता है या किसी स्थानीय व्यक्ति, खेतों में काम करते बुज़ुर्गों से दुआ सलाम हो जाती है ।  जन यातायात से आम आदमी के साथ सफर करने का अपना ही एक आनंद है और मुझे उम्मीद है कि मैं अपने बाकी बचे हुए सेवा काल मे भी ऐसे ही सफर करता रहूंगा । कभी देहरादून की भीड़ भारी सिटी बस में खड़े होकर, कभी देहरादून के विक्रम में उस जांबाज़ चौथे आदमी के रूप में जो 3 अन्य यात्रिओ के बीच फंस कर अपने ही पैरों के सहारे व विक्रम की सीट के आभासी सहारे से अपने गंतव्य तक पहुंच जाता है । कई बार देहरादून विक्रम की फ्रंट सीट मिलने पर,  रोडवेज की त्यूणी जाने वाली बस में सीट मिलने पर और यूटिलिटी में अंदर जगह मिलने पर जो खुशी होती है वह शायद अपने खुद के वाहन में सफर करने पर भी नहीं मिलती होगी । इसके अतिरिक्त 5 सीटों वाली कार में अकेले सफर करना भी संसाधनों का अपव्यय ही नजर आता है । पहाड़ों में रह कर सीट फुल होने के बाद ही चलने की आदत पड़ चुकी है ।

 यह भी जानना आवश्यक होगा कि कालसी से त्यूणी के बीच के 120 किलोमीटर के मार्ग पर कोई भी पेट्रोल पंप नहीं है, कालसी के बाद अगला पेट्रोल पंप त्यूणी से भी आगे हिमाचल के पन्द्रानु नामक स्थान पर है । यद्यपि इस बीच मे दुकानों पर खुला पेट्रोल कुछ लोग बेचते हैं किंतु उनकी भी उपलब्धता निश्चित नहीं होती । बीच मे यदि कोई वाहन खराब भी हो जाता है तो मरम्मत करने वाले भी उपलब्ध नहीं हो पाते ।

मोरी = एक परिचय

मोरी  एक परिचय

मोरी उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले का एक दूरस्थ ब्लॉक और तहसील है । मोरी ग्राम पंचायत नानई में आता है । यह देहरादून से दो प्रमुख सड़क मार्गों से जुड़ा है । देहरादून से यहां ज्यादातर मसूरी, नैनबाग, नौगांव, पुरोला तथा जरमोला होते हुए आया जा सकता है । यह मार्ग यमुना नदी की किनारे किनारे नौगांव तक चलता है तथा नौगांव से एक सड़क सीधे बड़कोट होते हुए यमुनोत्री की और जाती है तथा दूसरी सड़क पुरोला होते हुए मोरी होकर हनोल, त्यूनी तथा हिमाचल के रोहड़ू और शिमला तथा मोरी से ही एक सड़क आजकल प्रसिद्ध हो चुके ट्रेकिंग बेस सांकरी तक जाती है । सांकरी से दो प्रमुख ट्रेक शुरू होती हैं जहां काफी बड़ी संख्या में देश विदेश के ट्रेकर हर की दून तथा केदारकांठा ट्रेक के लिए आते हैं । सांकरी से पहले नैतवाड़ नामक स्थान पड़ता है जहां रूपिन और सूपिन नदियां मिल कर टोंस नदी बनती हैं । टोंस नदी कालसी में जाकर यमुना जी में मिल जाती है । हालांकि टोंस नदी यमुना जी की सहायक नदी है किंतु यमुना जी से अधिक मात्रा में जल लेकर आती है । टोंस नदी के ही किनारे पर प्राचीन महासू देवता जी का मंदिर है जो कि त्यूनी से कुछ पहले हनोल नामक स्थान पर स्थित है । त्यूनी के ही रास्ते में एक अन्य प्रमुख महासू मंदिर मेंडरथ नामक स्थान पर भी पड़ता है ।

मोरी चूंकि पहले से आबाद कोई गांव नहीं था अतः यहां कोई पुराना घर या मंदिर स्थित नहीं है । कदाचित नदी के किनारे सिंचित और उपजाऊ भूमि होने के कारण यहां नानाई गांव के लोगों की कृषि भूमि हुआ करती थी जिन्हें पहाड़ों में छानी बोला जाता है जिनमे परिवार का कोई एक सदस्य पशुओं के साथ फसलों की देखभाल करने हेतु अस्थाई घर बना कर रहा करते थे । चूंकि कालांतर में ये दो प्रमुख सड़कें यहां से गुजरी तो आसपास के गांव के लोगों ने यहां घर बना कर रहना शुरू किया होगा, फिर दुकानें खुली होंगी, कुछ होटल भी और कालांतर में प्रशासनिक सुविधा तथा सड़क मार्ग से जुड़ा होने के कारण यहीं पर विकास खंड यानी ब्लॉक बनाया गया और तहसील भी ।  ब्लॉक और तहसील का मुख्यालय होने के ही कारण यहां अन्य सुविधाएं जैसे कि स्कूल, बैंक, पोस्ट ऑफिस तथा अन्य विभागों के सरकारी कार्यालय खोले गए होंगे । वर्तमान में यहां अच्छी संख्या में दुकानें तथा होटल खुल गए हैं और आसपास के गांव के ही साथ साथ सरकारी विभागों में कार्यरत कार्मिक भी निवास करते हैं । मोरी भी टोंस नदी के ही किनारे पर बसा है तथा चारों और से ऊंचे पहाड़ों से घिरा होने के कारण धूप सुबह को थोड़ा देर से आती है तथा शाम को जल्दी ही विदा भी हो जाती है।  आजकल सर्दियों में तो शाम के छः बजते ही यहां अंधेरा हो जाता है तथा 8 बजे तो लगता है कि आधी रात ही हो गई हो ।

मोरी में एक सरकारी प्राइमरी स्कूल, एक सरकारी बालिका हाई स्कूल तथा एक इंटर कॉलेज के साथ ही साथ वर्ष 2021 में एक राजकीय डिग्री कॉलेज भी खोल दिया गया है । जहां बड़ी संख्या में आसपास के दूरस्थ गांव से आए बच्चे यहां कमरे किराए पर लेकर रहते हैं तथा अपनी पढ़ाई करते हैं । यहां घर से दूर रह कर पढ़ने वाली बच्चियां अपने छोटे भाई बहनों की भी देखभाल करती हैं जिनके माता पिता गांव में ही रहते हैं ।

 मोरी के आसपास कुछ बड़े गांव भी हैं जैसे खरसादी, देई, मोटाड इत्यादि । यहां रुकने के लिए होटल भी खुल गए हैं तथा भोजन हेतु भी काफी होटल उपलब्ध हैं । मोरी का बाजार ज्यादा बड़ा नहीं है किंतु बड़ी बड़ी दुकानों में जरूरत का प्रायः सारा समान मिल जाता है । मोरी में एक शिव मंदिर तथा एक देवी का मंदिर भी स्थित है । मोरी से टोंस नदी पार करने के लिए एक झूला पुल है तथा त्यूनी की तरफ चलने पर मोटाड़ गांव जाने के लिए बड़ा पुल भी बनाया गया है।  सांकरी के नजदीक होने के कारण यहां से बड़ी संख्या में पर्यटक होकर गुजरते हैं जिनमे से कुछ चाय और खाने के लिए रुकते भी होंगे किन्तु चूंकि बाजार में सड़क मार्ग बहुत ही संकरा है अतः यहां के बाजार को इन पर्यटकों का शायद कम ही लाभ मिल पता है क्योंकि उनके वाहनों के लिए पार्किंग की बड़ी समस्या रहती होगी ।

कुल मिला कर एक शांत सी जगह है जहां आप दो नदियों के कलरव के बीच समय व्यतीत कर सकते हैं । दूसरी नदी जिसे स्थानीय लोग खड्ड बोलते हैं केदार गंगा के नाम से जानी जाती है जिसका उद्गम स्थान केदारकांठा बताया गया है। मोरी से आगे सांकरी रोड पर नैतवाड है जहां पर दानवीर कर्ण का मंदिर है तथा दूसरा प्रसिद्ध मंदिर यहां के स्थानीय देवता पोखू जी का मंदिर भी स्थित है । सांकरी से आगे का क्षेत्र पर्वत क्षेत्र बोला जाता है जहां पर ज्यादातर पैदल मार्ग वाले गांव जैसे ओसला, धातमीर, गंगाड, पावनी इत्यादि और अन्य बहुत से गांव हैं । #beopankaj #mori #uttarkashi #uttarakhand

प्रारंभिक शिक्षा - मेरा अनुभव

प्रारंभिक शिक्षा और चुनौतियां ।

नई शिक्षा नीति प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल तथा क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आई है । सबसे बड़ा परिवर्तन प्री प्राइमरी शिक्षा को लेकर आया है जो कि अभी तक सरकारी स्कूलों में उपलब्ध नहीं थी । इसकी शुरुआत ऐसे आंगनवाड़ी केंद्रों से कर दी गई है जो कि किसी राजकीय प्राथमिक स्कूल के ही परिसर में संचालित हो रहे हैं । हालांकि इनमें कार्यरत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को अभी ECCE में प्रशिक्षित नहीं किया गया है इनके प्रशिक्षण की रूपरेखा अभी तैयारी की अवस्था में है । 
आने वाले समय में निश्चित ही स्वतंत्र रूप से संचालित हो रहे आंगनवाड़ी केंद्रों में भी प्री प्राइमरी शिक्षा प्रारंभ हो सकेगी जिसका बहुत बड़ा लाभ ग्रामीण क्षेत्रों में निवास रत बच्चों को होगा जो कि किसी प्ले स्कूल इत्यादि में नहीं जा पा रहे थे । प्री प्राइमरी कक्षाओं के संचालन से एक उम्मीद यह भी है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन में वृद्धि भी देखी जा सकती है क्योंकि पूर्व में सरकारी स्कूलों में सबसे छोटी कक्षा १ में प्रवेश की आयु कम से कम ६ वर्ष निर्धारित थी किंतु अभिभावकों के अनुरोध तथा बच्चे की योग्यता को देखते हुए ५ वर्ष पूर्ण कर चुके बालक को भी प्रवेश दे दिया जाता था ।

 अब यह भी समस्या नहीं रहेगी हालांकि अभी भी कक्षा १ में प्रवेश की आयु ६ वर्ष ही निर्धारित कर दी गई है किंतु बाल वाटिका की शुरुआत से बच्चा कक्षा १ में कुछ तो सीख कर आएगा ही । वर्तमान में नई शिक्षा नीति की अनुशंसाओं के आलोक में अध्यापकों का भी प्रशिक्षण प्रारंभ कर दिया गया है जिसमे कि उन्हें  निपुण भारत मिशन के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु दक्ष किया जा रहा है । मिशन निपुण भारत के अंतर्गत वर्ष २०२५ तक कक्षा ३ तक पहुंचने वाले समस्त छात्र छात्राओं को प्रारंभिक गणित तथा भाषा में निर्धारित योग्यता प्राप्त कराए जाने पर बल दिया जा रहा है ताकि बच्चे कक्षा ३ से आगे की अपनी पढ़ाई बिना किसी भय और किसी भी विषय से डरे बिना करते रहें ।
लोक शिक्षा के क्षेत्र में निपुण भारत मिशन भी अपने ही आप में एक अत्यंत क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है यदि इसका संचालन सही प्रकार से किया जा सके तो । इसके संचालन में सबसे बड़ी कठिनाई ऐसे दुर्गम और दूर दराज के क्षेत्रों में आ सकती है जहां पर मानक के अनुरूप शिक्षक तैनात नहीं है तथा बड़ी संख्या में ऐसे क्षेत्रों के प्राइमरी स्कूलों में सभी ५ कक्षाओं का संचालन मात्र एक ही शिक्षक द्वारा किया जा रहा है । अतः किसी भी प्रकार से ऐसे क्षेत्रों में जल्द से जल्द शिक्षकों की तैनाती की जानी आवश्यक होगी नहीं तो ऐसे क्षेत्रों के बच्चे आवश्यक दक्षता की प्राप्ति से वंचित रह जाएंगे । ऐसे क्षेत्रों में निर्धारित समय हेतु मानदेय पर स्वयंसेवी शिक्षकों की सेवा लेने पर विचार किया जा सकता है । ऐसे शिक्षक प्रशिक्षण केंद्रों से भी MoU किया जा सकता है जहां के प्रशिक्षु इन क्षेत्रों में आकर निर्धारित मानदेय पर निश्चित अवधि तक अपनी सेवा देने को तैयार हों तथा बाद में स्थाई नौकरी हेतु इन्हे इनके कार्य के अनुभव के आधार पर कुछ अतिरिक्त अंक देकर भर्ती होने में सहायता प्रदान की जा सकती है ।
प्रारंभिक शिक्षा की दूसरी बड़ी चुनौती विद्यालय भवनों की स्थिति भी है । अधिकांश राज्यों में प्राइमरी और जूनियर हाई स्कूल के भवन निर्माण का कार्य अभिभावकों द्वारा बनी हुई विद्यालय प्रबंध समिति द्वारा ही कराया जाता है जिसकी देखरेख हेतु संविदा पर भर्ती जूनियर इंजीनियर रखे जाते हैं । देखने में आया है कि SMC भवन निर्माण में तकनीकी रूप से सक्षम नहीं हो पाती है तथा संविदा पर रखे JE भी निर्मित भवन की खराब गुणवत्ता हेतु जिम्मेदार नहीं ठहराए जा सकते अतः किसी भी प्रकार तत्काल ही समस्त प्रकार के निर्माण कार्य कार्यदाई संस्थाओं के ही द्वारा उनकी देख रेख में ही कराए जाने की नितांत आवश्यकता है ताकि विद्यालय में कार्यरत शिक्षक भी बिना किसी विवाद में फंसे अपना शिक्षण कार्य सुचारू रूप से करते रहें । SMC द्वारा निर्माण की अवस्था में विद्यालय में कार्यरत शिक्षक पर स्थानीय लोगों का भी बहुत बड़ा दबाव होता है तथा कई बार आपसी विवाद के ही चलते विद्यालय भवन या तो आधा अधूरा ही बन पता है या फिर उसकी गुणवत्ता भी सही नहीं रहती जिसमे कि शिक्षक की कोई भी भूमिका नहीं होने पर भी उन्ही को दोषी भी ठहरा दिया जाता है ।
देखने में यह भी आया है कि उपरोक्त तथा अन्य काफी प्रकार की चुनौतियों का सामना करने के उपरांत भी प्रारंभिक शिक्षा में कार्यरत शिक्षक पूर्ण मनोयोग से अपना कार्य संचालित कर रहे हैं । एकल शिक्षक होने के उपरांत भी शिक्षण कार्य करने के ही साथ अन्य कई प्रशासनिक कार्य भी कुशलतापूर्वक निपटाते हैं ।
यह भी देखने में आया है कि प्रारंभिक शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत शिक्षकों को उनकी योग्यता के अनुरूप शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों जैसे DIET, SCERT, जिला समन्वयक, ब्लॉक समन्वयक, संकुल समन्वयक इत्यादि जैसे पदों पर कार्य करने के अवसर भी उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं ऐसे में प्रारंभिक शिक्षा में कार्यरत शिक्षकों का मनोबल बनाए रखने हेतु तथा इनके अनुभव का लाभ उठाए जाने हेतु यह भी अत्यंत आवश्यक है कि निर्धारित योग्यता प्राप्त जैसे कि M.Ed, NET, PhD प्राप्त अनुभवी शिक्षकों को भी अन्य शिक्षकों के समान अवसर प्रदान कराए जाने चाहिए ताकि इनके अंदर किसी भी प्रकार से कमतर आंके जाने की भावना भी विकसित न होने पाए । अनेक दूर दराज के स्थानों पर प्राथमिक विद्यालयों का एकाकीपन भी एक बड़ी समस्या है जहां पर कार्यरत शिक्षक को किसी भी प्रकार की मदद नहीं मिल पाती ऐसे में ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों, सरकार के साथ कार्य कर रहे विभिन्न फाउंडेशन तथा एनजीओ को भी शहर ही नहीं वरन दूर दराज के क्षेत्रों तक अपनी पहुंच बनानी होगी ताकि एकल शिक्षकों को भी किसी न किसी प्रकार की मदद मिल सके ।

Monday, December 25, 2023

उत्तराखंड के चार महासू देवता

इस पोस्ट में उत्तराखंड और हिमाचल राज्यों के एक बड़े भाग के इष्ट देवता महासु देवता का इतिहास जो मेरे द्वारा यहां रहते हुए सुना गया लिखने का प्रयास किया गया है । महासू देवता न्याय के देवता के रूप में भी जाने जाते हैं, जब यहां के लोग सभी जगह से निराश हो जातें हैं तो यहां अपनी बात कहते हैं और न्याय की गुहार लगाते हैं । उन्हे न्याय मिलता भी है, गलत करने वाला स्वयं यहां आकर देवता महाराज के सामने माफी मांगता है ।
जिन लोगों ने उत्तराखंड में देहरादून जिले के जोनसार बावर क्षेत्र का भ्रमण किया होगा उन्हे स्थानीय गाड़ियों पर जय महासू या जय चार  महासू लिखा हुआ जरूर मिला होगा । महासू देवता की पूजा पूरे जोनसार बावर क्षेत्र में जिसने देहरादून जिले के दो ब्लॉक और दोनो तहसील कालसी और चकराता के गांव आते हैं में की जाती है । इसके अलावा जोनसार की सीमा से लगते जिला टेहरी के जोनपुर, जिला उत्तरकाशी के रवाई तथा फतेह पर्वत क्षेत्र में और हिमाचल के सिरमौर तथा शिमला जिलों में भी महासू जी की पूजा की जाती है । माना जाता है कि महासू मंदिर के ही समीप रहने वाली नदी जिसे आज टोंस के नाम से जाना जाता है और पहले तमसा के नाम से उसमे एक राक्षस किरमिरी का निवास था जो कि स्थानीय लोगों को खा जाया करता था । इसी क्रम यहां के स्थानीय निवास ऊना भाट नामक ब्राह्मण का भी नंबर आने वाला था जिसका इकलौता ही पुत्र था । ऊना भाट चिंतित हुए और रात्रि सपने में उन्हे निर्देश प्राप्त हुए कि इस राक्षस का वध करने वाले देवताओं को कश्मीर से लाना होगा । ऊना भाट इस लंबी और कठिन यात्रा पर चल दिए और कश्मीर पहुंच कर उन्हें निर्देश हुए कि आप वापस जाओ और अमुक तिथि और समय पर एक खेत में हल लगाना जहां हम स्वयं ही प्रकट हो जाएंगे । ऊना भाट वापस लौट आए और उन्होंने चिंता वश हल निर्धारित समय से पहले ही लगा दिया । हल का फल एक देवता को लगा जो बौंठा महासू के रूप में हनोल में स्थापित हुए, एक और भाई प्रकट हुए पबासी महासू जिन्होंने अपना निवास तमसा के पर थाड्यर नामक स्थान पर बनाया, तीसरे बाशिक देवता का मंदिर मेंडराथ नामक स्थान पर है और चौथे का कहीं कोई स्थाई निवास नहीं है ये अपने पूरे लाव लश्कर के साथ एक बड़े क्षेत्र का निश्चित समय में निर्धारित स्थानों पर रुक पर आगे बढ़ जाते हैं । कुछ समय पूर्व इनका प्रवास कोटि कानासर था, वहां से मोहना गांव और फिर समलता और अब इनका निवास दसू नामक गांव में है । जहां बने मंदिर में इनकी पूजा होती है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इनके दर्शन हेतु पहुंचते हैं । इन सभी मंदिरों में हनोल स्थित मंदिर अत्यधिक प्राचीन माना जाता है जिसका निर्माण पांडवों द्वारा किया माना जाता है यहां खुदाई में प्राचीन मंदिर के मिले अवशेषों को पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है ।

Thursday, October 5, 2023

चाय की दुकान

आज सुबह चाय की दुकान पर ।

आज सुबह सुबह ही कहीं के लिए निकलना था तो धन सिंह भाई को रात को ही बोल दिया था कि थोड़ा जल्दी आऊंगा सुबह कुछ खिला देना । भाई ने बोला बंद ऑमलेट बन जाएगा । खैर मैं भाई के पास लगभग 5.30 पहुंच गया तो दृश्य कुछ अलग ही था । कुछ रिटायर्ड से संभ्रांत से दिखने वाले बुजुर्ग महिला पुरुष बैठे हुए थे । धन सिंह भाई बड़ी ही तत्परता के साथ उनकी अलग अलग फरमाइश सुन रहे थे, मुझे चाय की दुकान पर बैठने के बाद यह अनुभव हुआ कि एक साधारण सी दिखने वाली चाय भी कितने ही प्रकार की हो सकती है । कोई बोलता, फीकी, कोई बोलता कम मीठे वाली, कोई अदरक इलायची की फरमाइश और कोई तो धन सिंह भाई को सख्त ताकीद दे रहे थे कि जल्दी बनाओ, चाय का गिलास साफ होना चाहिए, डिस्पोजल में दे दो आदि इत्यादि ।

ये सभी लोग दुकान के पास ही स्थित तपोवन आश्रम आए हुए हैं किसी शिविर में कदाचित आश्रम में सुबह की चाय नहीं मिलती इसलिए आजकल ये यहां धन सिंह भाई की दुकान में सुबह सुबह दिखाई पड़ जाते हैं । इनकी बातें सुन कर भी मजा आ जाता है एक सज्जन अपनी बहुत ही बुलंद आवाज में बता रहे थे कि वे कैसे फलाने बैंक से चीफ मैनेजर बन कर रिटायर हुए थे और इस पद तक पहुंचने में उनको कितनी मेहनत और समय लगा था और आज के लोग तो बहुत जल्दी ही बन जा रहे हैं । उन्होंने साथ ही साथ यह भी बताया कि वे आज की पीढ़ी से कहीं अधिक पढ़े लिखे हैं और अगर अपनी डिग्री बताने पर आ जाएं तो पूरे तीन मिनट लगेंगे जो फिलहाल बहुत कीमती हैं चूंकि उन्हे वापस आश्रम में जाकर तैयार होना है हवन पूजन में बैठने हेतु । इसी बीच एक बुजुर्ग सी महिला भी आई और बड़ी अधिकारपूर्ण आवाज में धन सिंह भाई को बहुत जल्दी एक कप फीकी चाय का ऑर्डर फेंक कर आगे की तरफ चल दी । धन सिंह भाई इन अलग अलग तरीके की चाय बनाने में व्यस्त थे कि थोड़ी ही देर बाद महिला आ धमकी और लगभग धमकाने वाले अंदाज में बोली कि मेरी चाय कहां है मैं एक घंटे से खड़ी हूं, धन सिंह भाई बोला मैडम एक घंटा तो दुकान खुले भी नहीं हुआ । महिला की चाय रेडी हो थी धन सिंह भाई ने उनको देनी चाही महिला तुनक कर बोली नहीं चाहिए चाय ये रखो दस रुपए, धन भाई भी ठहरा स्वाभिमानी आदमी बोला चाय पियो तभी पैसे लूंगा, महिला की नाराजगी खैर थोड़ा कम हुई चाय की एक चुस्की ली और फिर वही खतरनाक सास वाले अंदाज में बोली इसमें चीनी नहीं डाली, भाई बोला आप फीकी बोल कर गई थी । खैर धन सिंह भाई ने चीनी भी डाल दी ।

इसी बीच बाहर बैठे कुछ हम जैसे डेली वालों में खुसर फुसर होने लगी कि कैसे कई बार चाय वाले ये फीकी मीठी के झंझट में नहीं पड़ते और मना कर देते हैं ।
खैर इन चाय की दुकानों में बैठ कर यह अनुभव तो होता है कि ये जो तथा कथित बड़े लोग होते हैं कई ऐसी आदतें पाल लेते हैं की अपने घर से कहीं बाहर जाकर इनका गुजारा मुश्किल ही होता होगा । घर में भी शायद ये अकेले ही रहते हैं बच्चे, बेटा, बहु सब बाहर कहीं और । इनके तो नौकर भी इनके बरताव से जल्दी जल्दी काम छोड़ देते होंगे ।

वहीं एक आम आदमी चुपचाप आता है बिना किसी टीका टिप्पणी के अपनी चाय पीता है और अपने काम पर चल देता है ।

Thursday, September 14, 2023

अनजाने में ही कर ली धनुष कोड़ी की यात्रा

जब मैं अनजाने में ही धनुषकोडी तक हो आया था । 

बात है वर्ष 1992 की शायद दिसंबर का माह रहा होगा । नौसेना की सेवा के दौरान गोवा से मुझे अस्थाई रूप से कुछ समय हेतु रामेश्वरम से लगभग 40 किलोमीटर पहले एक स्थान पर भेजा गया । चूंकि रामेश्वरम नजदीक ही था तो हम युवा नौसैनिक किसी भी छुट्टी के दिन स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस पकड़ कर रामेश्वरम चल दिया करते थे । रामेश्वरम जाने का एक अन्य आकर्षण वहां के एक राजस्थानी होटल में मिलने वाले शुद्ध उत्तर भारतीय भोजन को चखने का भी हुआ करता था । मुझे याद आता है कि एक बार तो हम चार साथियों ने उस होटल में कुछ भी न हो तो 10=10 रोटियां तो खा ही ली थी जिसकी उन दिनों डाइट थी शायद 25 रूपये की भरपेट थाली । चूंकि हमारी मेस में रोटी नहीं बनती थी तो हम उत्तर भारतीयों के लिए तो देश के अंतिम छोर पर राजस्थानी रामदेव होटल किसी वरदान के समान ही था ।

खैर एक बार ऐसे ही अवसर पर मैं अपने साथियों से थोड़ा अलग होकर अकेले ही एक यात्रा पर निकल गया । पहले तो वह स्थान देखा जहां से हनुमान जी ने श्रीलंका हेतु खड़े होकर छलांग लगाई थी । उस स्थान से आगे भी कुछ स्थानीय लोग पैदल ही जा रहे थे जो कि कदाचित मछुआरे थे और अपनी नौका के पास जा रहे होंगे ।  मैं भी उनके साथ ही चलता रहा बातचीत बस थोड़ी बहुत ही हो पा रही थी क्योंकि उनको हिंदी बहुत कम आती थी और अपना तमिल में हाथ बहुत तंग था । खैर काफी दूर तक तो मैं अकेला ही चलता गया और फिर रेत में दबी दिखाई दी रेलवे लाइन और कुछ टूटी फूटी पुरानी बिल्डिंगों के खंडहर । जिनको देख कर ऐसा लगा मानो कि यहां कभी कोई बहुत ही खतरनाक तूफान आया होगा या फिर कोई भूकंप । खैर वह स्थान घूम घाम पर मैं वापस शाम को अपने स्थान पर पहुंच गया और बाद में पता चला कि मैं तो गलती से धनुषकोडी तक की यात्रा कर आया था ।

हमारी जैसलमेर यात्रा

बहुत दिनों से सोच रहे थे कि कही घूम कर आया जाए. ऐसा अवसर ही प्राप्त नहीं हो पा रहा था. कारण आर्थिक भी थे तथा सामाजिक भी. आर्थिक समस्या जब सुलझी तो सोचा कि अब और नहीं अब टी कहीं न कहीं  जाना ही है, क्योंकि मैं इधर देख रहा था कि नौसेना की नौकरी छोड़ने के बाद एवं रूडकी रहना शुरू करने के बाद कहीं जाया ही नहीं गया था तथा इसलिए लम्बे सफ़र से डर सा भी लगने लगा था . मैंने इस यात्रा के लिए अक्टूबर के महीने का चुनाव इसलिए किये कि सफ़र में ज्यादा गर्म कपडे भी नहीं रखने पड़ेंगे, क्योंकि भाई मध्यम वर्गीय परिवार बिन तथा बन्दे की पूरी आस्था समाजवाद में है इसलिए समाजवादी विचार पर आस्था रखते हुए स्लीपर श्रेणी में ही जाने का प्लान बनाया. 
जब बच्चो को पता चला तो वे भी बड़े खुश हुए कि चलो स्लीपर क्लास की कम से कम खिड़कियाँ खुल तो जाती हैं, और बस या रेल के सफ़र का मजा ही जब आता है जब आपको सीट खिड़की की मिल जाए. मुझे याद आता है नौसेना की नौकरी के दौरान जब एक बार मुझे उडुपी से दिल्ली तक राजधानी एक्सप्रेस गाडी में ए.सी. 3 स्लीपर में यात्रा का अवसर (मुफ्त में) प्राप्त हुआ था तो बड़ी बेटी उस समय 02 वर्ष की थी गाडी में बैठते ही फटाफट खिड़की पर पहुंची तथा अपनी तोतली आवाज में बोली पापा जल्दी से डिंग-डोंग खोल दो (विंडो को वह ऐसा कह कर बोल रही थी). अब मेरे सामने यक्ष प्रश्न कि इस बच्ची को कैसे बताया जाए कि बेटा यह महँगी वाली ट्रेन है तथा इसमें ऐसे ही  बैठ कर जाया जाता है . बेटी बड़ी नाराज हुई बोली यह तो ख़राब ट्रेन है इसमें क्यों बैठे, मैं उसी दिन समझ गया था कि बच्ची में अपने पापा के समाजवादी विचारों का  समावेश हो चुका है. 
खैर साब अब बात इस सफ़र  की करते हैं, हमारा आरक्षण रात की गाडी में था जो हरिद्वार से चलती है तथा सीधे बाड़मेर तक जाती है. धर्मपत्नी ने जाने की सारी  तैयारी कर ली थी (सबसे बड़ी तैयारी सफ़र के दौरान खाने पीने की व्यवस्था करने की होती है) तथा इस कार्य में हमारी लेडीज एकदम एक्सपर्ट होती हैं पूरी, आलू वगैरा बन गए तथा बच्चों के लिए भी काफी मात्रा में चिप्स आदि सामन रख लिया गया था. बच्चों में ऐसा देख जाता है कि चाहे हमारा सफ़र बस या ट्रेनमें थोड़े से ही समय का क्यों न हो बैठते ही उन्हें अचानक भूख लग ही जाती है तो इस संभावना पर विचार हमारी श्रीमति जी ने पहले से ही कर लिया था तथा उनकी उदरपूर्ति की सारे साधन जमा कर लिए गए थे.
अगली सुबह गाडी राजस्थान राज्य में प्रवेश कर चुकी थी. अब ट्रेन की खिड़की से बाहर का नजारा बदलने लगा था दूर दूर तक खाली जमीन जो कि अपने इलाके में असंभव बात है (जनसँख्या घनत्व अधिक होने की कारण) . रास्ते मैं बीकानेर व नागौर जैसे कुछ बड़े स्टेशन पड़े खैर रात करीब आठ बजे हमारी ट्रेन बाड़मेर पहुँच गयी. स्टेशन के पास ही के होटल में कमरे का इंतजाम हो जाने के उपरांत खाने की लिए निकले . 
इस मुद्दे पर भी मेरी समाजवादी विचारधारा तथा बन्दे का पहले से किये गए कई बार के ऐसी यात्राओं का  अनुभव काम आया बन्दे ने स्टेशन सी बाहर निकलते ही एक ढाबा नुमा होटल देख लिया था, खैर उस स्थान का खाना हमें काफी पसंद आया, एक सब्जी तथा एक दाल का आर्डर दिया गया. बड़ी बेटी भले ही सफ़र के मामले में समाजवादी है पर खान -पान पर वह बाजारवादी ताकतों का शिकार हो चुकी है परिणामस्वरूप उसने खाना खाने में शुरुआत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, परन्तु हम सबको खाना न्जोय करते देख उसने भी खाना शुरू किया तो उसे भी खाना पसंद आया. खाना खा चुकने की बाद थोड़ी आईस क्रीम खाई गयी तथा फिर वापस आकर आराम किया क्योंकि अगले सुबह हमें बस द्वारा जैसलमेर के लिए निकलना था. 

वर्ष 2004 की आगम्बे और श्रृंगेरी यात्रा

अचानक से की गई एक यादगार यात्रा । वर्ष 2004 रहा होगा शायद उस समय मैं कर्नाटक की श्रीकृष्ण जी की नगरी दक्षिण की काशी कही जाने वाले स्थान उडुपी में था । हमारे पास उन दिनों अपना कोई दोपहिया वाहन नहीं था संयोग से एक दिन किसी मित्र की बाइक मिल गई हम पति पत्नी और एक दो वर्ष की बेटी ने सोचा चलो किसी नजदीक की जगह घूम आते हैं । हम उडुपी से कारकला के लिए निकले वहां भगवान बाहुबली की बहुत विशाल मूर्ति के दर्शन के बाद करकला का मशहूर चर्च भी देखा और वापसी के लिए निकल पड़े । रास्ते में कुछ दूरी बताने वाले साइन बोर्ड दिखाई दिए तो देखा कि श्रृंगेरी भी कहीं आसपास ही है हमने सोचा चलो श्रृंगेरी भी घूम लेते हैं और शाम को वापस आ जायेंगे । हमारे पास कपड़े भी नहीं थे और ना ही रास्ते का कोई अंदाज था ।खैर शुरू में तो सब सही रहा परंतु जब हम आगंबे के आसपास पहुंचे तो सारा नजारा बदल चुका था, सड़क पर जबरदस्त चढ़ाई और बारिश और बादल इतने जैसे कि हमारे हरिद्वार में सर्दियों के दिनों में कोहरा रहता है । ऊपर से बारिश में भीग गए थे तो ठंड भी लगने लगी थी खैर बच्ची को तो जैसे कैसे श्रीमती जी ने अपनी चुन्नी में लपेट लिया था । रास्ता देख कर एक बार मन में आया कि वापस ही हो लेते हैं पर देखा कि अब भीग भी चुके हैं और अंधेरा भी हो चला था और उडुपी वापसी में भी रात ही हो जाती । श्रृंगेरी की दूरी कम ही रह गई थी खैर भगवान का नाम लिया और श्रृंगेरी तक पहुंच गए । 

वहां श्रृंगेरी मठ की धर्मशाला में कमरा लिया और मंदिर दर्शन करने के उपरांत मठ में ही प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण किया और रात्रि विश्राम किया । उन दिनों श्रृंगेरी बहुत ही शांत था और ऐसा ही नजारा लग रहा था मानों कि हम ऋषिकेश में ही कहीं हैं । अगले दिन सुबह फिर मंदिर दर्शन किए और शंकराचार्य जी के भी दर्शन किए । वापसी के लिए हमने फिर अगंबे के खतरनाक ढलान वाला रास्ता नहीं लिया बल्कि थोड़ा लम्बा रास्ता लिया था जो कि कुद्रेमुख जंगल  के बीच से होकर गुजर रहा था । यह भी पहाड़ी सा रास्ता था लेकिन बहुत ही सुंदर और हरा भरा । रास्ते में रुकते रुकाते फोटो खींचते हुए हम शाम तक उडुपी वापस लौट आए थे । यह सफर आज भी याद करते हैं तो बड़ा ही रोमांच हो उठता है क्योंकि हमको आगंबे के बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि यह स्थान भी अपनी बारिश के लिए मशहूर है और रास्ता भी इतनी चढ़ाई का होगा । उसी यात्रा की कुछ स्मृतियां ।

Tuesday, May 2, 2023

आम आदमी का जीवन


 संघर्षों की कहानी बयां करती हैं ये छोटी छोटी सी जगह

अक्सर कहीं न कहीं ऐसा मौका मिल जाता है जहां मैं किसी छोटी चाय की दुकान या फिर किसी आम साधारण से ढाबे पर लंबे समय तक खाना खाता हूं । इन जगहों पर हम जैसे रोज आने वाले ग्राहक तो आते ही हैं रोज आने वालों के अलावा यहां नए नए लोग भी आते रहते हैं ।

इन जगहों पर समय व्यतीत करना अपने आप में एक बड़ा अनुभव प्राप्त करना होता है ।
यहां बैठ कर यहां आने वाले ग्राहकों के जीवन के संघर्ष की कहानियों से भी जुड़ना हो जाता है । इन आम आदमियों का जीवन सुबह बड़ी जल्दी शुरू हो जाता है और उनके ही हिसाब से जल्दी खुलने वाली ये चाय की दुकानें उनकी जीवन रेखा जैसी होती हैं । जहां ये सुबह सुबह आकर चाय का ऑर्डर देकर एक बीड़ी सुलगा लेते हैं और जब तक चाय बन कर आ जाती है तब तक बीड़ी के धुएं में खोए हुए जीवन के कुछ पलों को इनकी आंखे तलाश करती रहती हैं । बीड़ी और चाय पीना इनके लिए कोई आम सी बात नहीं होती बल्कि यूं कहें कि एक मेडिटेशन सरीखी है जिसे करके ये पुनः तरो ताजा हो उठते हैं । खाने का ऑर्डर दिया और जो भी ढाबे वाले ने परोस दिया बिना कुछ पूछे कहे मजे से खा कर चल देते हैं । अमूमन हम लोग किसी होटल में जाकर डिसाइड ही नहीं कर पाते कि क्या ऑर्डर करना है इतनी देर में तो इनका खाना ही पूरा हो जाता है ।
[02/05, 20:37] Pankaj Kumar: ढाबे और दुकान के मालिकों के जीवन का भी ये दैनिक ग्राहक अभिन्न अंग बन जाते हैं यदि कोई प्रतिदिन का ग्राहक कुछ दिन इनकी दुकान पर नहीं आता तो दुकान मालिक भी चिंतित हो उठते हैं और फिर अपने अनुमान भी लगाने शुरू कर देते हैं कि उनके ना आने के पीछे क्या कारण हुआ होगा । और अमूमन यह कारण सत्य ही निकलता है ।
 इन छोटे ढाबों पर खाना ताजा मिलता है क्योंकि इन छोटे दुकानदारों के पास बचे खाने को अगले दिन के लिए रखने का कोई जुगाड नहीं होता तो जो भी बनता है या तो खत्म हो जाता है या फिर ज्यादा से ज्यादा सुबह बनी हुई सब्जी या दाल यदि बच भी गई तो शाम को काम आ जाती है ।  इन ढाबों और दुकानों पर जीवन को निकट से देखने का मौका मिल जाता है और लगता है कि खुशी प्राप्त करने के लिए ज्यादा सुख सुविधाओं या पैसों की शायद जरूरत नहीं पड़ती । जीवन जीने का संघर्ष जरूर होना चाहिए ।

Saturday, February 4, 2023

छोटी छोटी खुशियां


छोटी छोटी सी खुशियां

कल बहुत दिनों के बाद पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करने का मौका मिला । इधर कुछ महीनों से रुड़की से देहरादून के बीच प्रति सप्ताह अपनी ही गाड़ी से आना जाना हो रहा था । क्योंकि जिस स्थान पर देहरादून में हमारा कार्यालय है वह मुख्य सड़क से थोड़ा अंदर है जहां कोई भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं मिलता । तो स्थिति ऐसी होती है कि यदि रुड़की से बस देहरादून isbt तक आजकल आपको एक या डेढ़ घंटे में पहुंचा देती है तो आईएसबीटी से ऑफिस तक लगभग 12 से 15 किलोमीटर की दूरी के लिए ही एक घंटा लग जाता है जिससे कि ऑफिस में देर से पहुंचने के चांस बन जाते हैं । खैर कल शनिवार को सोचा कि चलो आज गाड़ी से नहीं पब्लिक ट्रांसपोर्ट से ही सफर किया जाय । कार्यालय के ही एक सहयोगी महोदय जिनका घर धर्मपुर में पड़ता है मुझे अपनी स्कूटी से सर्वे चौक तक छोड़ दिया । सर्वे चौक से ही आईएसबीटी के लिए 5 नंबर वाले विक्रम मिल जाते हैं । देहरादून शहर में अलग अलग रूट पर चलने वाले इन वाहनों की कुछ खास बात मैने नोट की हैं ।  क्योंकि वर्ष 2012 से 2015 के बीच मैं रुड़की से देहरादून के बीच डेली अप डाउन भी कर चुका हूं । 

देहरादून में चलने वाले विक्रम में आराम से तो 7 ही लोग बैठ सकते हैं जिनमे एक तो फ्रंट सीट पर ड्राइवर के पास तथा 3 /3 लोग पिछली दोनो सीटों पर । लेकिन ड्राइवर लोग पीछे की दोनो ही सीटों पर 4 लोग बिठाते हैं और यदि आप पीछे की सीट पर बैठने वाले अंतिम वाले चौथे आदमी हैं तो समझिए कि आप सीट पर तो आभासी रूप से ही बैठते हैं ज्यादातर वजन आपके अपने ही पैरों पर रहता है । कभी कभार अन्य सवारियों के शारीरिक बनावट के अनुसार आप उनके बीच अपने को फंसाए रखने की कोशिश भी करते रहते हैं किंतु यदि बाकी तीनों ही लोग खाते पीते घर के दिखाई दे रहे हैं तो फिर आपका सफर अपने आपको सीट पर छोटी सी जगह पर टिकाए रखने के संघर्ष में ही निकल जाएगा । खैर ऐसे ही अनुभवों की भट्टी में तप कर मैने निर्णय लिया कि विक्रम की ड्राइवर की सीट पर ही बैठने का प्रयास किया करूंगा और पीछे की चौथी सवारी बनने का तो बिलकुल भी प्रयास नहीं करूंगा फिर चाहे एक के बाद दो और कई सारे भरे हुए विक्रम सामने से निकल जाएं । 

खैर ये विक्रम चालक भी अलग अलग प्रकार के प्राणी होते हैं कई बार अपने पास वाली सीट खाली होते हुए भी पीछे बैठने को बोल देते हैं, हो सकता है अपने पास वाली सीट किसी महिला सवारी के लिए रिजर्व रखना चाहते होंगे । खैर मैं पीछे नहीं बैठता दूसरे किसी विक्रम की वेट ही करना उचित समझता हूं क्योंकि पीछे की सीट पर यदि आप पहली तीन सवारियों में से भी एक हैं तो चौथी सवारी के आते ही आपको लगने लगता है कि शायद आपकी सेहत कुछ ज्यादा ही अच्छी है, आपकी लंबाई भी ज्यादा ही है क्योंकि विक्रम के बिल्कुल किनारों वाली छत आपके सर से टकराती रहती है अतः आप सीधे बैठ नहीं सकते ऊपर से पूरे रास्ते यही सुनते रहो कि भाई साहब थोड़ा खिसक जाओ, जगह बनाओ, ऊपर से विक्रम ड्राइवर भी अपनी सीट पर बैठा उपदेश देता रहता है कि चार सवारी आराम से बैठ जाती हैं, आप कैसे लोग हो एडजस्ट नहीं हो रहे और सवारियों को बड़ी हिकारत भरी नजर से घूरता है तो बेचारी सवारी एडजस्ट हो ही जाती है । वैसे कई बार समझदार सवारी जिनको अपनी शारीरिक बनावट का आभास है तथा यह भी पता है उनको आराम से बैठने हेतु कम से कम कितने क्षेत्रफल की आवश्यकता होती है तो वो लोग विक्रम की पिछली सीट की चौथी सवारी बनने से स्वयं ही बच जाते हैं । किंतु कई लोग जो संघर्ष में तपे होते हैं यह जान कर भी कि पीछे उनके लिए गुंजैयाश नहीं बची है अपने डील डौल के भरोसे बैठ ही जाते हैं कि थोड़ा बहुत खुद हिल डुल कर, थोड़ा बहुत विक्रम हिल डुल कर उनके लिए जगह बना ही देगा ।

खैर ऐसे सभी अनुभवों से परिपक्व होता हुआ अब मैं विक्रम की फ्रंट सीट ही लेने की कोशिश करता हूं । खैर मुझे दो कल दो विक्रम छोड़ने के बाद तीसरे में फ्रंट सीट मिल ही गई । विक्रम की फ्रंट सीट से आप सड़क के दोनो और के बाजार, दुकानों को अच्छी तरह से देख सकते हैं तथा पिछली सीटों पर स्थान के लिए जारी संघर्ष को देखते हुए अपने आपको वीआईपी होने का भी आभास करा सकते हैं । अपनी गाड़ी से चलते हुए भीड़ भाड़ वाली जगह पर किसी दूसरी गाड़ी से टच होने का भी खतरा बराबर बना रहता है पब्लिक ट्रांसपोर्ट में आप इस चिंता से भी बचे रहते हैं और अपने गंतव्य पर पहुंच जाते हैं । इधर कई बार आईएसबीटी से रुड़की की बस भी मिलने में दिक्कत हो जाती है क्योंकि आजकल बायपास बहुत सारे बन गए हैं लेकिन कल अंदर से ही जाने वाली बस भी मिल गई तथा उसमे भी कंडक्टर के पीछे वाली मेरी पसंदीदा सीट भी मिल ही गई ।

पाठक सोचेंगे कि कंडक्टर के ही पीछे वाली फेवरेट कैसे ? तो सज्जनों यह भी तीन साल की डेली पसेंजरी ने सिखा दी है । होता क्या है कि कंडक्टर लोग कई बार चेंज न होने के कारण आपके बाकी बचे हुए पैसे टिकट पर लिख देते हैं तथा इनमे से चूंकि ज्यादातर की याददाश्त खराब होती है तो लिखे पैसे आपका गंतव्य आ जाने तक वापस देना भूल जाते हैं हालांकि आपके उतरते ही उनकी याददाश्त वापस आ जाती होगी कि चलो आज इतने पैसे बच गए तो इनकी याददाश्त को बनाए रखने तथा बचे हुए पैसे वापस लेने हेतु कंडक्टर महोदय के पीछे वाली सीट ही ज्यादा सुविधाजनक रहती है । कल खैर ऐसी दिक्कत नहीं हुई जब कंडक्टर महोदय ने बताया कि अब हम पेटीएम से भी टिकट का भुगतान कर सकते हैं । इसके अलावा आप टिकट लेते हो एक बढ़िया सी नींद भी बस में ले सकते हैं जो कि अपनी कार में संभव नहीं हो पाता । तो बंधुओं इस प्रकार हम सभी को समय समय पर इन छोटी छोटी खुशियों का अनुभव करते रहना चाहिए ।

Friday, January 20, 2023

My Father

[20/01/2023 15:47] Pankaj Kumar: My father, the Farmer, Entrepreneur,  head of the joint family, a problem solver for everyone....

Now a days there are many courses online and offline, MBAs etc. Where they teach abt various branches of Management and how to do things etc...

I have grown up in a village in the then Western Part of the undivided Uttar Pradesh  watching my father playing all the above roles with many more additional responsibilities...Being the eldermost Son of my grandfather, the responsibility of a joint family of 3 younger brothers and 02 sisters too came to his duties....

[20/01, 15:49] Pankaj Kumar: At very early age he started looking after his duties as the grandfather was very fond of starting some new venture one after the another  pinning his hope on his eldermost son who had to be recalled in between from his LLB course....

[20/01, 15:55] Pankaj Kumar: Having born in 1933, father got married in 1957 and I guess he started to take the family responsibilities from the age of 20-22 yrs only....Grandfather was the first entrepreneur in the family of simple farmers who knew only tilling the land with their ploughs...

Grandfather decided to install the first ever Ata Chakki in the village, later the Rice machine too was added...After that grandfather earmarked 50 Bighas of land for Mango and Leechi Bagh....

After this Grandfather went ahead to install first ever Sugar Cane Crusher in the village and also bought the famous Russian made Field Marshal Tractor for our 150 bighas of land which was being ploughed with the Oxen and ploughs only
[20/01, 15:55] Pankaj Kumar: There started the machenisation of farming with few more machines were added to the family kitty...
[20/01, 15:57] Pankaj Kumar: Now grandfather was also a trained Homeopath and he was also fond of travelling to relatives and used to be away from home for longer durations so the father has to step in to look after everything which was started by the grandfather...
[20/01, 15:58] Pankaj Kumar: By then he was also started getting help from 02 of his younger brothers full time and 01 part time as one of my uncles got the govt job of a Gram Vikas Adhikari and was posted away from home...
[20/01, 16:01] Pankaj Kumar: My father used to manage all the businesses apart from the farming...At times there used to be around 35 workers engaged in all these diff activities, who were paid and fed by the family. I always found father busy doing one or the other task yet never found him tired or angry or annoyed. He used to be ready for every responsibility which used to come to him being the Head of the family of around 30 to 35 members...

Monday, January 9, 2023

Perks of living at a Small Place


[09/01, 18:53] Pankaj Kumar: Perks of Living at a small place....

I spent the best 7 years of my life at one of the most beautiful and serene place in the hills of Uttarakhand, Chakrata....

Chakrata is not so famous hill station nestled in the hills of middle Himalayas situated on an altitude of around 7200 feet MSL....

A nominal distance of just the 40 kms from the plains make this place unique as one just can find himself at an altitude of 2100 mtrs MSL jus withing a travel time of around 2 hrs from the plains...
[09/01, 18:58] Pankaj Kumar: Chakrata do attract tourists but only during the summer and winter months for very short duration of time unlike many other hill station where you may find people on the roads round the year...The tourist season of Chakrata do start in the summers from around mid May and lasts till the first monsoon showers by 15 or 20 June...Thereafter till Oct you can just count the numbers residents on your fingers here. After June its just the locals and shopkeepers here. 

Another tourist season starts from the Month of Oct where few tourists start coming here but most of them do drop for Christmas and New Years eve only. And after New year eve people do come only for snowfall....
[09/01, 19:07] Pankaj Kumar: So basically throughout the year barring few months one can just enjoy the life of leisure at this beautiful but small hill station where everyone know everybody and even if you are there for your job you are easily accepted as one of their own....

You become the part of humble celebrations of few local festivals and fairs like Maroj, Magh and Bissu and being the small yet cosmopolitan place you can join the locals during the celebrations of Lohadi, Baisakhi, Navratra, Dashahara, Janmashtmi and Diwali too.....Apart from these festivals you become the invitee of many marriages and other local festivals religious and social ones ...

Even if its the small place with few shops and very small market you dont feel alone and you seldome encounter the feeling of lonliness which a stay in a big city at times can give you....

At small place you become the part of lives of all the residents, rich or poor, big or small as on daily basis you encounter just the same sets of people who you meet daily.....During these 7 years I was invited to lot many villages, lot many marriages and functions and fairs etc. I enjoyed a lot and now I am staying in a big city like Dehradun but here you feel like cut off from the humanity as if you are a non person for others....