लघु कथा
ग्रुप सी की तैयारी
रिया आज बहुत खुश थी । आखिर उसका कक्षा 12 का बोर्ड का आज आखिरी एग्जाम था । पिछले एक साल से वह अपने माता पिता को समझाती रही कि उसे 12 के बाद देहरादून ही जाकर पढ़ना है । पर दोनों उसे समझाते रहते कि डिग्री कॉलेज तो यहां भी खुल ही गया है और BA ही तो करनी है आखिर क्यों शहर का फालतू का खर्चा करना ।
लेकिन रिया ने अब तक गांव और आसपास के और गांव की दसियों लड़कियों के नाम उन्हें गिनवा दिए थे कि ये सब भी देहरादून चली गई हैं और वहीं रह कर ग्रुप सी की तैयारी भी करती हैं और पढ़ाई के साथ साथ नौकरी भी ।
माता पिता सीधे सादे थे उन्हें लगता था कि चलो यह परिवार की बड़ी बेटी है इसके बाद तीन और भी हैं बेटा तो कोई हुआ ही नहीं अगर ये कुछ नौकरी कर लेगी तो शायद बाकी छोटी जो हैं उनको भी आगे का रास्ता मिलेगा ।
इधर डिग्री कॉलेज के टीचर लोग भी प्रतिदिन गांव गांव जाकर सबको समझा रहे थे कि सरकार ने डिग्री कॉलेज खोल दिया है और यदि बच्चे इसमें नहीं रहेंगे तो फिर यह बंद भी हो सकता है ।
किंतु ज्यादातर बच्चे देहरादून जाकर ही पढ़ने की जिद में थे । वो रोज अपने गांव के बच्चों की रील इंस्टाग्राम पर देखा करते कि आज कौन सा बच्चा देहरादून के किस मॉल में गया है । अब तो उनका पहनावा भी बदल गया है सबके सब शहरी कपड़ों में दिखाई देते जो शायद देहरादून में सस्ते मिल जाते होंगे ।
गांव में आकर भी ये बच्चे अन्य सारे बच्चों को देहरादून की बातें बताया करते कि वहां कैसा है और क्या क्या होता है। पढ़ाई के अलावा भी बहुत सारी चीजें होती हैं करने को।
अब रिया भी जल्दी ही अपनी किसी दोस्त को बोलेगी कि उसके लिए भी कमरा ढूंढ कर रखे वो भी आ रही है देहरादून पढ़ने। वो स्कूल जाते हुए देखती भी है कि गांव से रोडवेज की सुबह चलने वाली बस में प्रतिदिन कोई ना कोई बुजुर्ग अपने नातियों के लिए दिखाई दूध, मठ्ठा या गेहूं और चावल का कट्टा लेकर फ्री के टिकट में देहरादून जाता रहता था। कितना अच्छा लगता है कि उसके दादा जी भी उसके पास ये सब भेज दिया करेंगे ।
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