Sunday, June 7, 2026

A Sunday at Mori - 07.6.2026

A Sunday in the Hills | Long Walks, Village Life & Summer in Uttarakhand

It was Sunday, so I set out on my weekly long walk through the beautiful hills of Uttarakhand.
Early in the journey, I came across a dead sparrow by the roadside, probably hit by a passing vehicle. I gently moved it away from the road before continuing my walk.
Along the way, I met several village children who recognized me from a distance. They greeted me enthusiastically, and I waved back. Their smiling faces made the morning even more special.
After covering around 7 kilometers, I reached one of my favorite tea shops, where I had planned to enjoy a bun omelette. Unfortunately, there were no eggs available that day, so I settled for a simple cup of tea while admiring the breathtaking view of Kharsadi village. Farmers were busy preparing their fields for the upcoming paddy transplantation season, a sure sign that the monsoon is not far away.
I continued walking for a few more kilometers and reached another favorite stop of mine at Danda Kyari village. This place offers a stunning panoramic view of Kharsadi village and the surrounding hills. There, I enjoyed some Pahado Wali Maggi mixed with Aloo Bhujia, along with another cup of tea. After spending some time relaxing and soaking in the peaceful atmosphere, I began my return journey to Mori.
By the end of the day, I had completed nearly 16 kilometers on foot.
On the way back, I saw a group of children enjoying their summer vacation by bathing in the Kedarganga River. As soon as they spotted me, they shouted, “BEO Sir!” I waved back, and their cheerful response reminded me how beautifully rural children spend their holidays—close to nature, free from screens, and full of joy.

It was a simple day, but a deeply fulfilling one—filled with scenic views, meaningful encounters, village life, and the quiet happiness that comes from walking through the hills of Uttarakhand.

Thank you for watching. If you enjoy village life, nature walks, and stories from the Himalayas, please like, share, and subscribe to the channel.

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ग्रामीण बच्चों की गर्मियों की छुट्टियां

ग्रामीण परिवेश के बच्चों का समर ब्रेक 

आजकल गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं । शहरी लोग तो पहाड़ों की और भागे चले जा रहे हैं और लंबे लंबे ट्रैफिक जाम में भी फंसे हुए दिखाई देते हैं लेकिन इधर हमारे पहाड़ों के गांव के बच्चों का जीवन थोड़ा अलग सा है । रोज सुबह और फिर छुट्टी के दिन की लंबी पैदल यात्रा पर नन्हे मुन्ने रास्ते में मिलते रहते हैं और पहचान कर दूर से ही आवाज देते हैं BEO सर नमस्ते । कोई अपने बड़ों की मदद करते हुए और कोई अपनी गाय और भेड़ बकरियां के साथ दिखते रहते हैं । कुछ बच्चे आजकल अपने घर से बाजार आ रहे हैं दूध बेचने के लिए । आजकल कुछ स्थानीय मेले और त्यौहार भी शुरू हो जाते हैं तो बच्चों को अपने परिवार के साथ उनमें भी जाने का अवसर मिल जाता है । कुछ नए और शहरी से बच्चे भी आजकल दिखाई दे जाते हैं जो शायद शहरों में रह कर पढ़ते हैं और गर्मियों की छुट्टियां में अपने गांव आ रहे हैं । कुल मिला कर आजकल गांव में चहल पहल तो दिखाई दे जाती है बुजुर्ग जो अकेले रह गए उनका भी अपने नाती पोतों के आ जाने से मन लग जाता है । आज की लंबी यात्रा में ये बच्चे इस नदी में नहाते मिले तो अपना गांव में बीता बचपन भी याद आ गया । हम भी अपने बचपन में घर से पशुओं को गांव से थोड़ा दूर एक राजवाहे में नहलाने ले जाया करते थे और खुद भी नहा लिया करते थे और उसी राजवाहे में तैरना भी सीख लिया था । छुट्टियों में हम भी घर के खेती के कार्य में मदद कर दिया करते थे और खैर पशुओं की देखभाल की जिम्मेदारी तो हमारी होती ही थी उनको नहलाना और पानी पिलाना, घास डालना और फिर दूध निकालना इन सारे कार्यों में हम कक्षा 6 से ही पारंगत हो गए थे । 
#beokidiary

Friday, June 5, 2026

पर्यावरण दिवस - 05.6.2026

श्री फलाना जी आज सुबह AC वाले कमरे में से सोकर उठे, तुरंत फटाफट व्हाट्सएप्प चलाया और देखा कि लोग एक दूसरे को पर्यावरण दिवस की शुभकामनाएं दनादन दे रहे हैं । उन्होंने भी तत्काल कम से कम 10 ग्रुप में सभी को पेड़ लगाए जाने की जरूरत वाले मैसेज चिपका दिए । तभी याद आया कि घर में काम चल रहा है और उसके लिए किसी को लकड़ी का जुगाड़ करने के लिए बोला था तो उससे भी पूछ लिया कि पेड़ कब तक कट जाएंगे । इधर घर में राशन भी खत्म था तो जल्दी से swiggy वाले को कॉल कर दी और वो बहुत थोड़े से आइटम बहुत सारी पैकिंग में लाकर दे गया । इधर कुछ ऑनलाइन भी ऑर्डर कर रखा था वो समान भी आ गया और समान से ज्यादा तो उसकी भी पैकिंग थी । खैर तब तक कूड़े वाली गाड़ी का गाना भी सुनाई दिया और कचरा भी उनको देना था तो सूखा और गीला दोनों ही तरह का कचरा जल्दी से पॉलीथिन में पैक किया और उनकी गाड़ी में फेंक दिया । फिर तुरंत टी बैग वाली ग्रीन टी भी पी ली लोग बताते हैं कि हेल्थी होती है और ये कंपनी वाले भी बहुत अच्छे हैं टी बैग को भी एक प्लास्टिक वाले रैपर में पैक करते हैं ताकि आसाम के बागान की ताजगी सीधे घर तक आ सके ।

ऑफिस जाना ही था तो ड्राइवर को बोल कर रखा था कि पहले से गाड़ी चला कर रखे और AC भी फुल क्या करें आजकल गर्मी भी बहुत ज्यादा है । खैर ऑफिस के लिए निकले और आगे लाल बत्ती पर भी गाड़ी और एसी चलता ही रहने दिया आखिर गर्मी बहुत ज्यादा है । इधर लोग साइकिल पर भी आते जाते दिखाई दिए क्या करें बेचारे गरीब जो हैं सरकार भी ऐसी है कि महंगी EV गाड़ी पर तो सब्सिडी की बात करती है किंतु साइकिल पर कोई सब्सिडी नहीं देती खैर यह आज के दिन ऑफिस में भाषण देने के लिए एक अच्छा प्वाइंट भी मिल गया था । ऑफिस जाते ही पता चला कि पर्यावरण दिवस पर कार्यक्रम के लिए कोई बड़े साहब आने वाले हैं अब साहब बड़े हैं RO का पानी थोड़े ही पियेंगे फटाफट 50 बोतलें बिसलेरी और चाय नाश्ते के लिए डिस्पोजेबल प्लेट्स इत्यादि और कप भी मंगवा ही लिए । अब सब लोग चाय कॉफी तो पीते नहीं इसलिए सॉफ्ट ड्रिंक्स की प्लास्टिक वाली बोतल मंगवानी पड़ी । इधर नमकीन और बिस्कुट के पैकेट भी आए । खैर मीटिंग के बाद लंच भी था ही मीटिंग हाल के एसी भी सुबह से चला कर रखे गए थे ताकि मेहमानों को पर्यावरण पर भाषण देने हेतु एक अच्छा सा वातावरण मिल सके । 
एसी के माहौल में चाय नाश्ता और लंच करने के बाद फाइनली पर्यावरण दिवस पर गोष्ठी आयोजित की गई और सभी वक्ताओं द्वारा बहुत ही सुंदर भाषण दिए गए इसी बीच तीन चार बार अच्छे कागज पर प्रेस विज्ञप्ति देने के लिए प्रिंट आउट लिए गए क्योंकि हर बार कोई ना कोई गलती आ ही जाती थी आजकल के युवाओं को भी हिंदी अच्छे से आती ही नहीं अरे भाई पेड़ होता है पेड थोड़े ही एक पेज तो इसी बिन्दी के लिए फाड़ना पड़ गया था । 
खैर आज अच्छे से पर्यावरण दिवस निबट गया था । शाम को फिर एसी वाली गाड़ी से एसी वाली शॉपिंग माल से कुछ खरीदारी करते हुए और अपने एसी वाले घर की और बढ़े । शॉपिंग वाले लोग भी बड़े कमाल के होते हैं अपने गली मोहल्ले के दुकानदार तो चीजें ऐसे ही पकड़ाने के चक्कर में रहते हैं इन्हें देखो छोटे से छोटे आइटम के लिए भी इनके पास कैरी बैग उपलब्ध रहते हैं । खैर सुबह से शाम तक पर्यावरण की सेवा करने के बाद थकान तो हो ही जाती है तो उसके लिए एसी वाला कमरा तैयार ही था ।

Monday, June 1, 2026

Retired Life

सर द्वारा एक बहुत ही विचारणीय प्रकरण उठाया गया है। बढ़ती आयु शायद अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग चैलेंज लेकर आती है और शायद नौकरी वालों के लिए खास कर जो उच्च पदों से रिटायर होते हैं उनके लिए तो यह एक आघात जैसा भी महसूस हो सकता है। क्योंकि एक दिन अचानक आप एक बहुत बड़े अधिकारी से आम लोगों की भीड़ में खड़े हो जाते हैं । हालांकि आम लोगों से अलग दिखने की चाह में नाम के साथ रिटायर्ड भी जोड़ना नहीं भूलते और घर भी अपने ही स्तर के रिटायर्ड लोगों के बीच कॉलोनी में लेना पसंद करते हैं और साथ ही दिल्ली के जिमखाना क्लब जैसी एलीट जगहों के सदस्य भी इसी खास दिखने की चाह में बने रहना पसंद करते होंगे । मैने पाया है कि किसान और जो लोग अपने व्यवसाय में रहते हैं उन्हें बढ़ती आयु की कोई चिंता नहीं होती क्योंकि उनके लिए रिटायर नामक कोई शब्द ही नहीं होता। मैने अपने पिताजी को 82 वर्ष की आयु तक खेतों में जाते देखा है और एक दिन अपने प्रिय खेत में ही उनका स्वर्गवास हुआ । पिताजी किसान थे और कभी उनके मन में अपनी आयु को लेकर कोई भी जिक्र मैने नहीं सुना कि अब यह कार्य मैं नहीं कर पाता अपने सामर्थ्य के अनुसार अंतिम समय तक कार्य करते रहे और अपने अंतिम दिन भी साइकिल चला कर ही खेत में गए थे। यहां पहाड़ों में भी अनेकों बुजुर्ग मिलते हैं जिन्हें अपनी आयु ही नहीं पता होती और अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने कार्य में लगे रहते हैं । बढ़ती आयु शायद नौकरी और खास कर उच्च पद पद से रिटायर होने वाले लोगों को ज्यादा परेशान करती होगी । ऐसा मुझे प्रतीत होता है। ग्रामीण इलाकों में आयु का कोई खास फर्क पड़ता नहीं देखा जाता। क्योंकि बचपन से आप वहीं रहे और उन्हीं लोगों के बीच अपना जीवन जिया और अंत समय भी उन्हीं के बीच विदाई ले ली । इसलिए शायद सर की पोस्ट का मर्म यही है कि कितने भी उच्च पद पर रहो लेकिन जीवन बिल्कुल साधारण सा जियो क्योंकि एक ना एक दिन तो साधारण बनना ही होगा । मेरे कार्यालय के एक चतुर्थ श्रेणी कार्मिक इस माह रिटायर होने वाले हैं शायद रिटायर होने का उन पर भी कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन इसी माह विभाग से एक डायरेक्टर भी रिटायर होंगे हो सकता है रिटायरमेंट उनके लिए खास से आम बनने की प्रक्रिया जैसा हो ।
#beokidiary

BEO Ki Diary - Out of School Kids and Education

शिक्षा से वंचित बच्चे - समस्या और समाधान
तमाम सरकारी प्रयासों के उपरांत भी बड़ी संख्या में बच्चे आज भी स्कूलों से बाहर रह जाते हैं । पिछले 11 वर्ष में मेरा भी यह अनुभव रहा है और यह भी विचारणीय प्रश्न है कि ये स्कूल से बाहर बच्चे ज्यादातर शहरों में दिखाई देते हैं । इस
मेरे अनुभव में कुछ कारण हैं जिनके चलते बड़ी संख्या में आज भी बच्चे स्कूल से बाहर रह जाते हैं ।
1. प्रवासी मजदूरों का समय समय पर अपने परिवार के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करते रहना ।
2. काम के लिए घर से बाहर जाने वाले लोगों के बच्चे भी उनकी अनुपस्थिति में अपने छोटे भाई बहनों की देखभाल हेतु घर में ही रह जाते हैं ।
3. गरीबी भी एक बहुत बड़ा कारण है जिसके चलते बच्चे स्कूल से बाहर रह जाते हैं । हालांकि स्कूलों में सब कुछ फ्री मिलता है फिर भी बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल नहीं जा पाते क्योंकि वे भी दिन भर छोटे छोटे काम करते हैं और अपने परिवार की आय में योगदान देते हैं । कूड़ा बीनना, भीख मांगना या फिर ढाबों और होटलों में काम करना ऐसे कुछ कार्य हैं जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे लगे हुए दिखाई देते हैं । हालांकि ऐसे बच्चे ग्रामीण इलाकों में दिखाई नहीं देते । ग्रामीण इलाकों में गरीबी तो हो सकती है किंतु उसके कारण बच्चों का स्कूल तो नहीं छूटता। ग्रामीण परिवारों में बच्चे पढ़ाई लिखाई से इसलिए भी दूर हो जाते हैं कि वे अपने घर के कार्यों में बड़ों का हाथ बंटाना शुरू कर देते हैं । जैसे कि वन गुज्जरों के बच्चे जो कम आयु से ही अपने पशुओं की देखभाल में दक्ष हो जाते हैं और बड़े होकर दूध के कुशल व्यवसायी भी बन जाते हैं ।
अब इन बच्चों को मुख्य धारा में कैसे लाया जाये यह एक बड़ी चुनौती है । 
1. सबसे पहले तो ऐसे बच्चों और परिवारों को देखना होगा जो वाकई पढ़ना चाहते हैं क्योंकि बहुत से परिवारों के बच्चों के नाम स्कूल में होने के बाद भी उनके अभिभावकों की कोई इच्छा नहीं होती कि बच्चे स्कूल जाएं क्योंकि बच्चे भी खुशी खुशी उनकी मदद करते हैं । जैसे कि वन गुज्जरों के बच्चे ये अपने पशुपालन के कार्य को बड़ी ही प्रसन्नता से करना सीख जाते हैं और इनके माता पिता की भी कोई इच्छा नहीं होती कि ये स्कूल जाएं ।
2. अधिकतर ऐसे स्कूल से बाहर रह गए बच्चों के लिए परंपरागत स्कूलिंग कारगर नहीं होती क्योंकि दिन का समय ही है जिसमें ये अपने परिवार की मदद करते हैं इनके लिए संध्या समय ही पढ़ाई के लिए उपयुक्त हो सकता है । अतः परंपरागत स्कूल इनकी आवश्यकता को पूर्ण करने में असफल रहते हैं ।
3. देखने में यह भी आता है कि बहुत सारे फाउंडेशन और एनजीओ ऐसे बच्चों की मदद करने के उद्देश्य से स्कूल खोल देते हैं । यदि स्कूल खोलना है तो सरकार से मान्यता भी लेनी पड़ती है और मान्यता की शर्तें भी होती हैं इसके अतिरिक्त आजकल सभी सरकारी और निजी स्कूलों के बच्चों का ऑनलाइन पंजीकरण भी अनिवार्य कर दिया गया है जिसमें इनके विभिन्न अभिलेखों जैसे जन्म प्रमाण पत्र, आधार, जाति प्रमाण पत्र और डोमिसाइल इत्यादि की भी जरूरत पड़ती है जो कि अमूमन इस बच्चों के पास नहीं होते अतः एनजीओ और फाउंडेशन चाह कर भी ऐसे बच्चों की मदद नहीं कर पाते ।
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 इसलिए प्रतीत होता है कि ऐसे बच्चों को स्कूल के स्थान पर शिक्षा की ज्यादा आवश्यकता है जो कि उन्हें किसी भी अलग प्रकार से दी जानी होगी । जिस हेतु किसी मान्यता प्राप्त निजी स्कूल या सरकारी स्कूल के स्थान पर विभिन्न ngo और फाउंडेशन के द्वारा आयु अनुरूप शिक्षा दिए जाने का प्रयास किया जा सकता है । ऐसे शिक्षा केंद्र मात्र ऐसे ही बच्चों के लिए होने चाहिए जो बच्चे परंपरागत स्कूलों में जा सकते हैं उनके लिए वही स्कूल उचित होंगे । इन कक्षाओं का संचालन स्कूल समय के बाद सरकारी स्कूलों के ही भवनों या फिर किराए के भवनों में किया जा सकता है ।
5. अभिभावकों को भी स्पष्ट कर दिया जाएगा कि हम स्कूल नहीं हैं और आपका बच्चा यहां एक क्लास से दूसरी क्लास में नहीं जाएगा और ना ही हम किसी सरकारी नौकरी के लिए आपके बच्चों को पढ़ा रहे हैं हम सिर्फ उसके जीवन में काम आने वाली शिक्षा देंगे और कोई ना कोई काम भी बच्चे को उसकी रुचि के अनुसार सिखाये जाने का प्रयास किया जाएगा । यदि बच्चे रिजल्ट और कक्षा पास इत्यादि की भी इच्छा रखते हैं तो ऐसे बच्चों को कुछ समय इन शिक्षा केंद्रों में रख कर फिर उनका किसी नजदीकी सरकारी स्कूल में RTE act के प्रावधानों के अनुसार आयु अनुरूप कक्षा में प्रवेश कराया जा सकेगा जहां प्रवेश हेतु फिर सभी आवश्यक सरकारी दिशा निर्देशों का अनुपालन भी किया जाना होगा ।

अतः मेरा सभी ngo और फाउंडेशन से अनुरोध भी रहेगा कि यदि वाकई आप ऐसे बच्चों की मदद करना चाहते हैं तो कृपया स्कूल ना खोलें बल्कि बिना किसी फॉर्मेलिटी के ऐसे ही बच्चों को उनके अभिभावकों की ही इच्छा पर शिक्षा प्रदान करने में सहयोग प्रदान कर दें जो कि वाकई एक बड़ी समाज सेवा होगी । ऐसे शिक्षा केंद्रों का संचालन भी बड़ी आसानी से हो सकेगा क्योंकि आपको सरकार से कोई मान्यता भी नहीं लेनी होगी और फिर यह भी दिक्कत नहीं कि शिक्षक के तौर पर डीएलएड या फिर बीएड और टीईटी इत्यादि की बाध्यता रखनी होगी । क्योंकि आप स्कूल नहीं चला रहे होंगे बस एक ऐसा स्थान जहां आकर बच्चे अपना बचपन जीने के साथ ही साथ कुछ सीख भी रहे होंगे । इन बच्चों को TaRL aur Learning Outsome Based आयु और कक्षा अनुरूप शिक्षा दिए जाने की भी आपको स्वतंत्रता रहेगी ।