Monday, August 31, 2026

भगत

एक कहानी ।

जिस स्थान पर मेरी ड्यूटी है यहां नेपाल से आए बहुत से लोग रहते हैं कुछ तो अच्छे से सेटल हो जाते हैं और ज्यादातर अपनी युवावस्था को यहां के बाजारों और खेतों में खपा देने के बाद भी प्रवासी ही बने रहते हैं, न उनका अपना कोई घर होता और न ही कोई स्थाई पता । ऐसे ही लोग मुझे प्रतिदिन चाय की दुकानों में होटलों में मिलते रहते हैं वर्षों पूर्व ऐसे ही भारत से बड़ी संख्या में अंग्रेजों द्वारा मजदूर ले जाने की परंपरा थी जिन्हें गिरमिटिया बोला जाता था।उनके जीवन पर तो बहुत कुछ लिखा गया है किंतु नेपाली मजदूर जो यहां आते हैं उनके जीवन पर कुछ लिखा नहीं मिलता।एक छोटा सा प्रयास एक काल्पनिक कहानी के रूप में । 

उसे पता ही नही था कि वह यहां भारत के इस पहाड़ी गांव में कब आया।आज 72 साल बीत गए हैं अब याद भी कैसे रखा जाएगा।अब काम तो कोई देता नहीं क्योंकि सबको लगता है कि भगत अब पुराना भगत नहीं रहा जो भारी बोझ को भूसे की गठरी समझ कर अच्छी से अच्छी चढ़ाई चढ़ कर पहुंचा दिया करता था।बाजार में लोगों का बोझा ढोते ढोते ही उसका जीवन निकल गया।आज सहसा एक बाबू से बात करते हुए उसे अपने बचपन की याद आ गई ।बचपन में उसने अपने आपको एक नदी के किनारे इस छोटे से गांव में बहुत सारे अन्य पल्लेदारों के बीच पाया था।उसे किसी ने भी नहीं बताया कि उसे कौन और कब यहां छोड़ गया था। खैर उसके दिन की शुरुआत होती उस छोटी सी झोंपड़ी में सुबह सुबह एक दूसरे को गालियाँ देते अन्य पल्लेदारों की आवाजों से । उठ कर वह भी सभी की तरह नदी किनारे चला जाया करता फिर जो भी कपड़े होते पहन कर एक रस्सी लेकर बाजार में आने वाली बसों और समान से लदी गाड़ियों का इंतजार करता । चूंकि उम्र में छोटा ही था तो थोड़ा कम वजन का समान ही उसे मिलता था । धीरे धीरे बड़ा हुआ और मेहनत करते करते शरीर भी सुडौल हो ही चुका था अब बाजार में धीरे धीरे भगत के नाम की धाक सी जम गई । उसे याद है कि एक लाला जी के लड़के की शादी में दहेज में बड़ा सा फ्रिज आया था जिसे ऊपर उनके घर ले जाना था चूंकि रास्ता बहुत संकरा था और दो या तीन लोग एक साथ चल ही नहीं सकते थे भगत ने अकेले की उसे ऊपर ले जाने की हामी भर दी । अपनी रस्सी बाँधी और फिर इतने भारी फ्रिज को एक खिलौने की भांति भगत सीढिय़ों के ऊपर बढ़ चला । लाला ने उसे खुश होकर उस दिन थोड़ा बहुत इनाम भी दिया था । अन्य पल्लेदारों की तरह उसकी शाम भी देसी दारू के साथ शुरू होकर बहादुर के ढाबे पर खत्म होती जहां वह कम से कम 12 रोटी जरूर खाया करता था । अपनी बचत का ज्यादातर हिस्सा वह बाजार के बच्चों को कुछ भी खिलाने पिलाने में खर्च कर दिया करता ।
समय बीतता गया भगत जब 26 वर्ष का हुआ तो किसी ने एक सीधी सादी सी लड़की से उसकी शादी करा दी । शादी के बाद उसने बाजार में ही लकड़ी की बनी एक झोंपड़ी सी किराए पर ले ली अब उसे खाने के लिए ढाबे पर जाने की कोई जरूरत नहीं पड़ती थी । समय गुजरा भगत के यहां पहले एक बेटी हुई और फिर एक बेटा । अगस्त की वह मनहूस रात थी भगत तो किसी के बोझ के साथ किसी दूसरे गांव में गया हुआ था और उसी रात उस छोटे से गांव में बादल फटा और भगत के दोनों बच्चे और पत्नी असमय ही काल के गाल में समा गए । भगत की दुनिया उसी दिन उजड़ सी गई अब उसे जीने की कोई भी लालसा नहीं बची थी और फिर वह उसी गांव के एक मंदिर में सदा का वासी हो गया । वहां रहने वाले साधु बाबा की सेवा करना, मंदिर की साफ सफाई करना और जो भी रूखा सूखा साधु बाबा को मिलता मिल बाँट कर खा लेना । आज भी भगत जब भी बाजार में दिखाई देता है तो लोग बड़ी इज्जत देते हैं और भगत को भी अपने पुराने दिन याद आ जाते हैं ।

Wednesday, August 19, 2026

पहाड़ों का जीवन

अभी सोशल मीडिया पर एक पोस्ट देखी किसी सज्जन द्वारा दिल्ली छोड़ कर मनाली में ही स्थाई रूप से रहने का मन बनाया और दो ही महीने में वापसी कर ली । मैं स्वयं मैदानी क्षेत्र जिला हरिद्वार से आता हूं और पिछले 10 वर्षों से पहाड़ों में तैनात हूं और किराए के कमरों में अकेला ही रहा हूं । कई बार मेरे फोटो जो मैं सोशल मीडिया पर डालता हूं काफी लोग पूछते हैं कि जमीन मिलेगी क्या, हमको भी रहना है वगैरह । लेकिन अपने दस वर्षों के अनुभव में मैने पाया है कि 
1. पहाड़ों में वही रह सकता है जिसने कम साधनों और सुविधाओं में रहना सीख लिया है । खास कर बरसात और बर्फबारी के दिनों में बिना नेटवर्क, सड़क और बिजली के आपको लंबे समय तक रहना पड़ सकता है तो की काफी उबाऊ अनुभव भी हो सकता है और जब चारों तरफ की सड़कें टूट चुकी हैं और आपको कहीं अर्जेंट जाना है तो आप अपने आपको फंसा हुआ सा महसूस करते हैं ।
2. कई बार आपको अकेलापन भी महसूस हो सकता है क्योंकि आप चाहे जितना भी लंबे समय अपने स्थान से अलग कहीं गुजार लें स्थानीय लोगों के लिए आप बाहरी ही रहते हैं फिर आपकी बोली, भाषा, रीति रिवाज और पहनावा त्यौहार भी अलग होते हैं जिनमें आप प्रतिभाग नहीं कर पाते। अमूमन ऐसा होता है कि स्थानीय जन जीवन के एक दायरे से आपको बाहर ही रखा जाता है । स्थानीय लोग आपको कई बार बहुत साधन संपन्न और अमीर आदमी भी समझ कर आर्थिक मदद की भी अपेक्षा रख सकते हैं जो यदि आपने कर दी तो सही है और नहीं कर पाए तो फिर आपको अत्यंत हेय दृष्टि से भी देखा जा सकता है । कई बार लोगों की अपेक्षा रहती है कि उनके बच्चों को शहर कहीं रख दिया जाय, नौकरी लगवा दी जाय, पढ़ाई में मदद कर दी जाय यदि आप कर सके तो सही और नहीं कर सके तो फिर आपको एक मतलबी सा समझ लिया जाता है। 
3. पहाड़ों में छोटी सी दूरी तय करने में भी आपको पूरा दिन लग सकता है खास कर बारिश और बर्फबारी में ऐसे में यदि किसी मेडिकल आकस्मिकता की स्थिति में आपको जल्दी कहीं जाना हुआ तो आप फंस सकते हैं। 
4. मैदानी लोगों को पहाड़ों के चढ़ाई वाले रास्तों पर चलने का भी अभ्यास नहीं होता जिसके कारण थोड़ी बहुत दूरी भी उनके लिए मुश्किल पैदा कर देती है खास कर जब सड़क बंद हो । कई बार घर भी ऐसे स्थान पर हो सकता है जहां आप कोई भी वाहन नहीं ले जा सकते आपकी पार्किंग बहुत दूर होती है तो आपको घरेलू सामान, गैस सिलेंडर इत्यादि के लिए भी किसी और पर निर्भर होना पड़ सकता है पहाड़ों में आपको हर चीज होम डिलीवरी करना संभव नहीं हो पाता । 
यदि आप उपरोक्त सभी चैलेंज झेल सकते हैं तो अवश्य ही पहाड़ों में स्थाई रूप से रहने के बारे में सोचें अन्यथा तो साल के कुछ महीनों के लिए ही आएं और अपना ठिकाना मैदानी इलाकों में भी रखें । स्थानीय लोग इसलिए यहां खुशी खुशी रह लेते हैं कि उनका अपना परिवेश है कदम कदम पर गांव गांव में उनके अपने रिश्ते नातेदार होते हैं समय समय पर शादी विवाह और अन्य उत्सव, स्थानीय मेले, धार्मिक अनुष्ठान होते रहते हैं तो उनका तो मन लगा रहता है लेकिन आप ऐसे समय अपने आपको अकेला महसूस कर सकते हैं । सुबह भ्रमण पर अपनी गायों को चरने के लिए ले जाते एक स्थानीय सज्जन से बातचीत हुई । यही है पहाड़ों का सीधा सादा जीवन । 
#beokidiary

Monday, August 3, 2026

Rail Tale

अपने गांव के रेलवे स्टेशन पर हमारे बचपन के दिनों से आज तक मिलने वाली सवारी गाड़ी । जब यह देहरादून की तरफ से आती थी तो दस वाली कहलाती थी और शाम को वापसी में सहारन पुर की तरफ से आने में इसको LD बोला जाता था । बचपन में इस नाम का अर्थ समझ नहीं आता था बड़े हुए तो देखा कि इसका पूरा नाम DLS है यानी देहरादून, लक्सर और सहारनपुर । जिसे शॉर्ट में आम जन LD बोल दिया करते थे । इस ट्रेन की सबसे खास बात थी कि यह कभी लेट नहीं होती थी क्योंकि देहरादून की तरफ से लक्सर पहुंच कर सहारनपुर से चल कर इलाहाबाद तक जाने वाली सवारी गाड़ी इसकी सवारियों की प्रतीक्षा किया करती थी जो उन दिनों सहारनपुर से मुरादाबाद जाने वाले यात्रियों के लिए सहारन पुर मुरादाबाद पैसेंजर जिसका समय सुबह 4 बजे का होता था के बाद दिन में यही गाड़ी होती थी । इसके बाद तो शाम को मात्र हरिद्वार से आगरा कैंट जाने वाली सवारी गाड़ी ही अन्य विकल्प था । खैर अब सुना है कि रेलवे द्वारा काफी सारी सवारी गाड़ियों को बंद भी किया गया है और कुछेक को एक्सप्रेस भी बनाया गया है । किंतु आम आदमी के लिए शायद एक पैसेंजर रेलगाड़ी ही अत्यंत किफायती विकल्प है दूर स्थानों की यात्रा का । वंदे भारत जैसी ट्रेन आम आदमी की पहुंच के बाहर हैं, हां जन शताब्दी अवश्य ही एक दूसरा किफायती विकल्प है प्रतीत होता है वंदे भारत के स्थान पर कुछ रूट जहां यह कम सवारी लेकर चलती हैं यदि जन शताब्दी को लाया जाय तो शायद रेलवे को मुनाफा हो सकता है । देहरादून से दिल्ली एक ऐसा ही रूट है जिस पर लगभग एक ही समय जन शताब्दी और वंदे भारत दोनों ही चलती हैं किंतु मार्ग ऐसा होने के कारण वंदे भारत उतनी गति से नहीं चल पाती । यहां जन शताब्दी ही एक अच्छा विकल्प रहेगा । हो सकता है कि रेलवे का प्रयास हो कि आम जन को जन शताब्दी से वंदे भारत पर लाया जाय और एक दिन जन शताब्दी को बंद किया जाय किंतु ऐसा करना शायद उचित नहीं होगा ।
#railtale 
#indianrailways