Thursday, March 12, 2026

ग्रामीण भारत में जीवन

ग्रामीण भारत में शिक्षा को नौकरी का माध्यम माना जाता है । मैं स्वयं भी ग्रामीण परिवेश से ही आता हूं और पिछले 11 वर्ष से उत्तराखंड राज्य के ग्रामीण पर्वतीय क्षेत्रों में कार्यरत हूं । हमको भी बचपन से यही बताया गया था कि पढ़ाई का उद्देश्य नौकरी कर गांव से शहर में जाकर रहना होता है। एक समय के गांव शहरों के मुकाबले वाकई पिछड़े हुआ करते थे । अपने बचपन में मेरे अपने ही गांव के रास्ते कच्चे थे, पानी की निकासी न होने के कारण रास्तों पर सदैव ही कीचड़ रहा करती थी । शहर से गांव आने के लिए सड़कें भी नहीं हुआ करती थी और न ही यातायात के साधन होते थे । मैने स्वयं ही कक्षा 9 से ही गांव से करीब 12 किलोमीटर प्रतिदिन साइकिल चला कर पढ़ाई करना शुरू कर दिया था । उन दिनों गांव में स्कूल भी कक्षा 8 तक ही हुआ करता था । आज हमारे गांव में भी बहुत बड़ा परिवर्तन देखने में आया है गांव अब गांव सा नहीं रह गया और सड़कें भी पक्की हो गई और यातायात के साधनों की भी बहुतायत हो गई है । हालांकि गांव के युवा नौकरी की तैयारी करते हैं और नौकरी मिलने पर गांव से बाहर भी चले जाते हैं । किंतु एक अंतर तो आया है कि यदि युवाओं को घर के 30 से 50 किलोमीटर की दूरी पर नौकरी मिल रही है तो फिर वो गांव में ही रह कर इस नौकरी को कर लेते हैं क्योंकि अच्छी सड़कों और यातायात के साधनों से यह संभव हो गया है ।

पहाड़ों में चूंकि विकास की गति अभी धीमी दिखाई देती है इसलिए वहां का युवा नौकरी मिलने पर शहर चला जाता है । हालांकि बहुत से स्थानीय युवा जिनको कोई सरकारी नौकरी घर के निकट मिल जाती है तो अपने गांव में रह लेते हैं जैसे कि हमारे काफी सारे स्थानीय अध्यापक अपने अपने गांव में रह कर अपनी सेवा कर रहे हैं ।

सरकारी नौकरी को आज भी समाज में एक स्टेटस सिंबल माना जाता है और काफी युवा बहुत मेहनत कर सफल भी हो रहे हैं । ऐसे में भेड़ पालन जैसे पुश्तैनी कार्य करने वालों की शायद यह अंतिम पीढ़ी हम देख रहे हैं ।
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BEO Ki Diary


लोकतंत्र, जनता और राजकीय सेवक ।

भारतवर्ष के अधिकांश मध्यम और निम्न माध्यम वर्ग का सबसे पहला लक्ष्य सरकारी नौकरी पाने का सपना होता है । उच्च वर्ग या तो अपने कारोबार देखता है या फिर अन्य कोई कार्य । एक समय एलीट मानी जाने वाली सेवाओं में भी अब सामान्य परिवारों के बच्चे अपनी मेहनत से चयनित होकर आ रहे हैं जैसे कि सेना के अधिकारी और UPSC या फिर राज्यों की सिविल सेवाएं । यानी उसी जनता के बीच से चयनित होकर आये सरकारी लोग कुछ ही समय के बाद जनता के ही बीच में खलनायक के रूप में प्रस्तुत कर दिये जाते हैं । अन्य लोगों की ही भांति सरकारी कार्मिकों का भी कोई ना कोई परिवार होता है और सरकारी सेवा में मात्र अधिकारी या कर्मचारी ही तो है उसका परिवार भी तो जनता ही है । और स्वयं सरकारी कर्मचारी भी उसी देश की व्यवस्थाओं से चयनित होकर आता है । कहीं न कहीं वर्तमान समय में सरकारी कार्मिकों को विलेन साबित करने का प्रयास किया जा रहा है । ऐसे में एक होड़ सी चल पड़ी है कि कौन अपने आपको जनता का कितना बड़ा हितैषी दिखा सकता है । बड़े IAS, DM स्तर के लोग इस हेतु अपनी स्ट्रॉन्ग PR रखते हैं अपने सोशल मीडिया हैंडल्स के जरिए अपनी छवि बनाए जाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं वहीं राजनेता भी विभिन्न बैठकों में सरकारी लोगों को जनता के सामने डांट डपट कर, फोन करते हुए वीडियो बना कर अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर जनता की सहानुभूति पाने का प्रयास करते हैं । ऐसे में सरकारी कार्मिक एक निरीह सा बन जाता है खास कर शिक्षा विभाग के अध्यापक और अधिकारी जिनके पास ऐसी कोई पावर नहीं होती कि किसी का कुछ बुरा कर सकें । बाकी जिन विभागों से नेता जी लोगों का काम पड़ता है मसलन तहसील, ब्लॉक, पुलिस इत्यादि उनकी ये लोग शिकायतें भी नहीं करते और विभिन्न बैठकों में अध्यक्षता भी इन्हीं के अधिकारी करते हैं तो ये स्वयं सुरक्षित बने रहते हैं और अन्य विभागों के लोगों को जनता के सामने प्रस्तुत कर देते हैं । यदि ऐसा ही चलता रहा तो आज तो एक निदेशक पर हमला ही हुआ है कल किसी भी आम अधिकारी, और कर्मचारी की मॉब लिंचिंग भी हो सकती है । जिन स्थानों पर सरकारी कर्मचारी के नाम पर मात्र एक शिक्षक दिखाई देता है, पैदल के खतरनाक रास्तों वाले गांव के बच्चों को उनके घर में कैसे कैसे हमारे शिक्षक सभी सुविधाएं जैसे फ्री किताबें, यूनिफॉर्म, मध्यान्ह भोजन, फर्नीचर इत्यादि यह कोई नहीं देखता । बाकी कोई विभाग इन गांव तक कभी कभार ही जाता है लेकिन सबसे बड़े विलेन भी हम ही लोग हैं ।  अपनी पूरी मेहनत करने के बाद भी बुरा भला सुनना कदापि अच्छा नहीं लगता किंतु वर्तमान समय बड़ा ही बुरा चल रहा है।  
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