ग्रामीण परिवेश के बच्चों का समर ब्रेक
आजकल गर्मियों की छुट्टियां चल रही हैं । शहरी लोग तो पहाड़ों की और भागे चले जा रहे हैं और लंबे लंबे ट्रैफिक जाम में भी फंसे हुए दिखाई देते हैं लेकिन इधर हमारे पहाड़ों के गांव के बच्चों का जीवन थोड़ा अलग सा है । रोज सुबह और फिर छुट्टी के दिन की लंबी पैदल यात्रा पर नन्हे मुन्ने रास्ते में मिलते रहते हैं और पहचान कर दूर से ही आवाज देते हैं BEO सर नमस्ते । कोई अपने बड़ों की मदद करते हुए और कोई अपनी गाय और भेड़ बकरियां के साथ दिखते रहते हैं । कुछ बच्चे आजकल अपने घर से बाजार आ रहे हैं दूध बेचने के लिए । आजकल कुछ स्थानीय मेले और त्यौहार भी शुरू हो जाते हैं तो बच्चों को अपने परिवार के साथ उनमें भी जाने का अवसर मिल जाता है । कुछ नए और शहरी से बच्चे भी आजकल दिखाई दे जाते हैं जो शायद शहरों में रह कर पढ़ते हैं और गर्मियों की छुट्टियां में अपने गांव आ रहे हैं । कुल मिला कर आजकल गांव में चहल पहल तो दिखाई दे जाती है बुजुर्ग जो अकेले रह गए उनका भी अपने नाती पोतों के आ जाने से मन लग जाता है । आज की लंबी यात्रा में ये बच्चे इस नदी में नहाते मिले तो अपना गांव में बीता बचपन भी याद आ गया । हम भी अपने बचपन में घर से पशुओं को गांव से थोड़ा दूर एक राजवाहे में नहलाने ले जाया करते थे और खुद भी नहा लिया करते थे और उसी राजवाहे में तैरना भी सीख लिया था । छुट्टियों में हम भी घर के खेती के कार्य में मदद कर दिया करते थे और खैर पशुओं की देखभाल की जिम्मेदारी तो हमारी होती ही थी उनको नहलाना और पानी पिलाना, घास डालना और फिर दूध निकालना इन सारे कार्यों में हम कक्षा 6 से ही पारंगत हो गए थे ।
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