अपने गांव के इसी छोटे से रेलवे स्टेशन से बचपन से ही रेल यात्राओं की शुरुआत हुई थी । उन दिनों गांव से शहर जाने के लिए या तो साइकल या फिर ट्रैक्टर ही एकमात्र साधन हुआ करता था । हमारे गांव के इस स्टेशन पर हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून से सहारनपुर, मुरादाबाद, दिल्ली और अमृतसर तक चलने वाली पैसेंजर रेलगाड़ी मिल जाया करती थी । बचपन से ही कुछ रेलगाड़ियों के नाम सुनते हुए बड़े हुए थे मसलन यदि किसी को जल्दी कहीं जाना होता था तो पहली लोकल जो हरिद्वार से सहारनपुर और शामली होते हुए दिल्ली जाती थी को पकड़ते थे । यह हमारे इस स्टेशन पर आने वाली सबसे पहली रेल होती थी जिसका समय सुबह साढ़े चार बजे का रहता था । इसके बाद आने वाली ट्रेन को सात वाली बोलते थे यह भी हरिद्वार से चल कर सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मेरठ होते हुए दिल्ली तक जाती थी । तीसरी ट्रेन दस वाली होती थी जो देहरादून से सहारनपुर के बीच चलती थी । वापसी में भी इनके समय कुछ ऐसे थे 10 बजे सहारनपुर वाली ट्रेन सबसे पहले शाम को 5 बजे हमारे स्टेशन पर पहुंचती थी, इसके बाद दिल्ली से चलने वाली ट्रेन रात 9 बजे और तीसरी लोकल और भी लेट रात को शायद 2 बजे पहुंचा करती थी । मुझे याद आता है कि जब परिवार का कोई सदस्य या कोई मेहमान इस 9 बजे वाली ट्रेन से आया करता था तो परिवार के बड़े लाठी, डंडे और लालटेन लेकर गांव से स्टेशन उनको लिवाने जाया करते थे क्योंकि स्टेशन से गांव करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर पड़ता था और रास्ते में राहजनी इत्यादि का खतरा बराबर बना रहता था । इन बदमाशों के ज्यादातर शिकार दूधिए लोग होते थे जो शहर से रात को अपनी साइकिलों पर दूध बेच कर वापस आया करते थे । यह तो हुई पैसेंजर रेलों की बात हमारे स्टेशन से वाराणसी से देहरादून जाने वाली जनता एक्सप्रेस, देहरादून से बॉम्बे जाने वाली बॉम्बे एक्सप्रेस और देहरादून से हावड़ा जाने वाली हावड़ा तथा देहरादून से दिल्ली जाने वाली मसूरी एक्सप्रेस भी गुजरा करती थी । इन सभी में डीजल इंजन होता था मात्र जनता एक्सप्रेस में ही कोयले का इंजिन आया करता था । कई बार इस छोटे से स्टेशन पर जनता एक्सप्रेस के उस दैत्य की भांति धुआं उगलते और भीषण गर्जना करते इंजिन को ट्रेन के डब्बों को खिलौनों की भांति काफी तीव्र गति से ले जाते देखने का भी अवसर मिला था । चूंकि बचपन का ज्यादातर सफर कोयले के इंजिन से चलने वाली सवारी गाड़ियों में हुआ था तो मुझे लगता था कि कोयले का इंजिन शायद डीजल इंजिन से शायद धीमा चलता होगा । लेकिन जनता एक्सप्रेस के इंजिन की गर्जना ने यह धारणा काफी बदल दी । हमारे इस छोटे से स्टेशन से गुजरने वाली एक सवारी गाड़ी का किस्सा भी काफी रोचक है इसको लाहौरी बोलते थे क्योंकि विभाजन से पूर्व यह ट्रेन लाहौर से हरिद्वार के बीच चला करती थी और विभाजन के बाद अमृतसर से हरिद्वार के बीच । यह ट्रेन आज भी चलती है किंतु अब यह एक्सप्रेस हो गई है तथा देहरादून से अमृतसर तक चलती है । उन दिनों गांव से हरिद्वार या देहरादून जाने हेतु यही ट्रेन एकमात्र साधन हुआ करती थी जो अक्सर अमृतसर की और से काफी देरी से आया करती थी । हमारे स्टेशन पर इसके आने का समय सुबह आठ या नौ बजे का हुआ करता था लेकिन अक्सर यह 12 या 1 बजे ही आया करती थी अतः लोग इसे पकड़ने 11 बजे के बाद ही आया करते थे । वर्ष 1984 में मेरा प्रवेश कक्षा 6 में गांव से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नजदीकी शहर ज्वालापुर हो गया था हमारे स्कूल का समय दूसरी शिफ्ट यानी 12 बजे से होता था तो हम तीन चार बच्चे अक्सर बिना टिकट इस ट्रेन से चले जाया करते थे । एक दिन हम 11 बजे स्टेश। पर पहुंचे और स्टेशन मास्टर जी से पूछा कि लाहौरी कब आएगी उनका जवाब था कि कल आएगी । मुझे लगा कि इतना लेट हो गई होगी तो उन्होंने बताया कि आज सही समय पर चली गई है और अब कल वाली ही ट्रेन मिलेगी । रात्रि समय चलने वाली तीनों एक्सप्रेस ट्रेन की आवाज गांव तक आ जाती थी क्योंकि ये बहुत तेज गति से गुजरा करती थी । इनमें से सबसे पहले रात 8 बजे जनता एक्सप्रेस जाया करती थी इस समय तक हमारा रात्रि भोजन हो चुका होता था, रात करीब 9.30 बजे हावड़ा गुजरा करती थी उस समय हम सोने की तैयारी में हुआ करते थे और अंत में रात करीब 11 बजे मसूरी एक्सप्रेस जाया करती थी जिसकी आवाज कभी कभी सुन लिया करते थे । उसी प्रकार सुबह भी सबसे पहले मसूरी, फिर हावड़ा और 8 बजे जनता हरिद्वार की तरफ जाया करती थी ।
हमारे स्टेशन से गुजरने वाली देहरादून बॉम्बे सेंट्रल ट्रेन भी काफी मशहूर हुआ करती थी हम बच्चे अक्सर सुना करते थे कि जिसको भी हीरो बनना होता है वह इसी ट्रेन से बॉम्बे भाग जाता है । हमारे गांव से भी दो लोग यह प्रयास कर चुके थे । इस ट्रेन को गांव में हम बॉम्बे से आने वाली ट्रेन को डेढ़ वाला बंबा और देहरादून से बॉम्बे जाने वाली ट्राई को दो वाला बंबा बोला करते थे । ये दोनों ही आपस में कई बार हमारे इस छोटे से स्टेशन पर क्रॉसिंग हेतु रुक जाया करती थी और हम बच्चों को इन एक्सप्रेस ट्रेनों में चलने वाले अलग से लोगो के दर्शन हो जाया करते थे क्योंकि सवारी गाड़ियों से तो अक्सर ज्यादातर हम जैसे साधारण ग्रामीण लोग ही यात्रा किया करते थे । सबसे कोतूहल वाली बात हम बच्चों के लिए यही हुआ करती थी कि आखिर इन ट्रेन में तीन दिन की यात्रा लोग कैसे कर लेते होंगे । खैर यह तो हुई बचपन से कक्षा 12 यानी वर्ष 1990 तक के दिनों की बात उसके बाद तो लंबी रेल यात्राएं भी हुई पर बचपन के दिनों की शुरुआत के दिनों में रेलगाड़ियों से अपना परिचय इस छोटे से स्टेशन ने ही कराया था ।
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