एक कहानी ।
जिस स्थान पर मेरी ड्यूटी है यहां नेपाल से आए बहुत से लोग रहते हैं कुछ तो अच्छे से सेटल हो जाते हैं और ज्यादातर अपनी युवावस्था को यहां के बाजारों और खेतों में खपा देने के बाद भी प्रवासी ही बने रहते हैं, न उनका अपना कोई घर होता और न ही कोई स्थाई पता । ऐसे ही लोग मुझे प्रतिदिन चाय की दुकानों में होटलों में मिलते रहते हैं वर्षों पूर्व ऐसे ही भारत से बड़ी संख्या में अंग्रेजों द्वारा मजदूर ले जाने की परंपरा थी जिन्हें गिरमिटिया बोला जाता था।उनके जीवन पर तो बहुत कुछ लिखा गया है किंतु नेपाली मजदूर जो यहां आते हैं उनके जीवन पर कुछ लिखा नहीं मिलता।एक छोटा सा प्रयास एक काल्पनिक कहानी के रूप में ।
उसे पता ही नही था कि वह यहां भारत के इस पहाड़ी गांव में कब आया।आज 72 साल बीत गए हैं अब याद भी कैसे रखा जाएगा।अब काम तो कोई देता नहीं क्योंकि सबको लगता है कि भगत अब पुराना भगत नहीं रहा जो भारी बोझ को भूसे की गठरी समझ कर अच्छी से अच्छी चढ़ाई चढ़ कर पहुंचा दिया करता था।बाजार में लोगों का बोझा ढोते ढोते ही उसका जीवन निकल गया।आज सहसा एक बाबू से बात करते हुए उसे अपने बचपन की याद आ गई ।बचपन में उसने अपने आपको एक नदी के किनारे इस छोटे से गांव में बहुत सारे अन्य पल्लेदारों के बीच पाया था।उसे किसी ने भी नहीं बताया कि उसे कौन और कब यहां छोड़ गया था। खैर उसके दिन की शुरुआत होती उस छोटी सी झोंपड़ी में सुबह सुबह एक दूसरे को गालियाँ देते अन्य पल्लेदारों की आवाजों से । उठ कर वह भी सभी की तरह नदी किनारे चला जाया करता फिर जो भी कपड़े होते पहन कर एक रस्सी लेकर बाजार में आने वाली बसों और समान से लदी गाड़ियों का इंतजार करता । चूंकि उम्र में छोटा ही था तो थोड़ा कम वजन का समान ही उसे मिलता था । धीरे धीरे बड़ा हुआ और मेहनत करते करते शरीर भी सुडौल हो ही चुका था अब बाजार में धीरे धीरे भगत के नाम की धाक सी जम गई । उसे याद है कि एक लाला जी के लड़के की शादी में दहेज में बड़ा सा फ्रिज आया था जिसे ऊपर उनके घर ले जाना था चूंकि रास्ता बहुत संकरा था और दो या तीन लोग एक साथ चल ही नहीं सकते थे भगत ने अकेले की उसे ऊपर ले जाने की हामी भर दी । अपनी रस्सी बाँधी और फिर इतने भारी फ्रिज को एक खिलौने की भांति भगत सीढिय़ों के ऊपर बढ़ चला । लाला ने उसे खुश होकर उस दिन थोड़ा बहुत इनाम भी दिया था । अन्य पल्लेदारों की तरह उसकी शाम भी देसी दारू के साथ शुरू होकर बहादुर के ढाबे पर खत्म होती जहां वह कम से कम 12 रोटी जरूर खाया करता था । अपनी बचत का ज्यादातर हिस्सा वह बाजार के बच्चों को कुछ भी खिलाने पिलाने में खर्च कर दिया करता ।
समय बीतता गया भगत जब 26 वर्ष का हुआ तो किसी ने एक सीधी सादी सी लड़की से उसकी शादी करा दी । शादी के बाद उसने बाजार में ही लकड़ी की बनी एक झोंपड़ी सी किराए पर ले ली अब उसे खाने के लिए ढाबे पर जाने की कोई जरूरत नहीं पड़ती थी । समय गुजरा भगत के यहां पहले एक बेटी हुई और फिर एक बेटा । अगस्त की वह मनहूस रात थी भगत तो किसी के बोझ के साथ किसी दूसरे गांव में गया हुआ था और उसी रात उस छोटे से गांव में बादल फटा और भगत के दोनों बच्चे और पत्नी असमय ही काल के गाल में समा गए । भगत की दुनिया उसी दिन उजड़ सी गई अब उसे जीने की कोई भी लालसा नहीं बची थी और फिर वह उसी गांव के एक मंदिर में सदा का वासी हो गया । वहां रहने वाले साधु बाबा की सेवा करना, मंदिर की साफ सफाई करना और जो भी रूखा सूखा साधु बाबा को मिलता मिल बाँट कर खा लेना । आज भी भगत जब भी बाजार में दिखाई देता है तो लोग बड़ी इज्जत देते हैं और भगत को भी अपने पुराने दिन याद आ जाते हैं ।
No comments:
Post a Comment