उत्तराखंड राज्य की राज्य सिविल सेवा परीक्षा 2010 में उत्तीर्ण होने के उपरांत विभागीय प्रक्षिक्षण की समाप्ति पर गत वर्ष दिनांक 01 अप्रैल 2015 को मैंने उप शिक्षा अधिकारी, विकास खंड, चकराता जनपद देहरादून में कार्यभार ग्रहण किया । इस पद पर मेरी जिम्मेवारी कक्षा 1 से 8 तक की प्रारंभिक शिक्षा के सम्पूर्ण कार्य दायित्वों का निर्वहन किये जाने की है । चकराता विकास खंड अपनी अनूठी संस्कृति तथा जीवन शैली, रीति रिवाजों के कारण एक पृथक पहचान रखता है । विकास खंड कालसी तथा चकराता को मिला कर इस पूरे क्षेत्र को जौनसार भावर के नाम से भी जाना जाता है । इस विकास खंड में कुल 216 प्राइमरी तथा 47 जूनियर हाई स्कूल हैं जिनमे लगभग 542 अध्यापक कार्यरत हैं । बहुत से स्कूल आज भी सड़क से काफी दूर दुर्गम गाँव में स्थित हैं जहाँ पहुँचाने का एक मात्र रास्ता पैदल ही है । किन्तु फिर भी क्षेत्र के अधिकांश हिस्सों को सड़क मार्ग से जोड़ दिया गया है जो की फिलहाल कच्ची सड़कें ही हैं तथा जिन पर सिर्फ यहाँ चलने वाली बोलेरो गाडी ही चल सकती हैं । पिछले एक वर्ष में मै सभी तो नहीं किन्तु लगभग आधे विद्यालयों में जा चूका हूँ । जिनमे से यहाँ के अति दुर्गम माने जाने वाले खटुवा तथा उड़ावां जैसे गाँव भी सम्मिलित हैं ।
आज शिक्षा की अगर बात होती है तो सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा की बात सबसे प्रमुख बात होती है । कि इन स्कूलों में पढाई नहीं होती, अध्यापक नदारद रहते हैं, बच्चे साफ़ सुथरे नहीं होते, स्कूल भवन जीर्ण शीर्ण होते हैं, उनमे फर्नीचर भी उपलब्ध नहीं हो पाता । मेरा अनुभव भी कहता है कि इनमे से कुछ बात सच भी हैं । हमारे पास उच्च शिक्षित टीचर होने के बावजूद भी हमारे स्कूल दुर्दशा के शिकार हैं । आखिर क्या कारण हैं इन सबके पीछे । सरकार भी पूरा प्रयास कर रही है, बच्चों को फ्री खाना, ड्रेस, किताबें तथा कुछ भी फीस नहीं और फिर भी इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या लगातार घट रही है । ज्यादातर बच्चे निजी स्कूलों की और रुख कर रहे हैं । अपने एक वर्ष के अनुभव के आधार पर मै कुछ समझ पाया हूँ जो की यहाँ सबके साथ साझा कर रहा हूँ ।
1. अध्यापकों का मनोबल :- प्रत्येक युवा जो कि बी, एड की डिग्री लेता है कुछ समय निजी स्कूलों में बिताने के बाद जल्द ही सरकारी शिक्षक बनने के लिए प्रयास शुरू कर देता है । सरकारी सेवा में वेतन ज्यादा है, छुट्टियां भी ज्यादा होती हैं तथा एक जॉब सिक्यूरिटी भी होती है । जबकि निजी स्कूलों में काम ज्यादा, छुट्टी कम और वेतन और भी कम और जॉब कभी भी जाने का डर । एक बार जो शिक्षक सरकारी जॉब में आ जाता है क्या कारण है कि उसका मोटिवेशन एक अंतराल के बाद ख़त्म हो जाता है, वह अपने काम से ऊब जाता है और अपने कार्य के प्रति उदासीन हो जाता है । इसके कुछ कारण मुझे प्रतीत हुए हैं ।
1. घर से बाहर की नौकरी :- उत्तराखंड चूँकि एक पहाड़ी राज्य है जिसका अधिकांश हिस्सा पर्वतीय तथा दुर्गम है जहाँ पर अधिकांश गाओं में आज भी आधुनिक सुख सुविधाओं का अभाव है । यदि एक शिक्षक की नियुक्ति किसी ऐसे ही दुर्गम गाँव में हो जाती है तो उसे लंबे समय तक वहीँ रुक कर सेवारत रहना पड़ता है । अधिकांश शिक्षकों की उदासीनता का सबसे मुख्य कारण मुझे यही प्रतीत हुआ है कि उनको काफी लंबे समय तक एक ही स्थान पर घर परिवार से दूर रह कर नौकरी करनी पड़ती है । पुरुष शिक्षक तो फिर भी इस परिस्थिति से समझौता कर लेते हैं परंतु महिलाओं के लिए इस प्रकार की सेवा वाकई एक सजा जैसी ही है जिसमे उनको अपने बच्चों से दूर रहकर नौकरी करनी पड़ती है । चूँकि घर में कोई ना कोई दिक्कत आती ही रहती है जिसके कारण इनको घर भी जाना होता है और अगर समय पर छुट्टी ना मिले तो फिर इनके लिए एक अत्यंत मानसिक दिक्कत भी हो जाती है । और एक समय के उपरांत इनके कार्य करने की क्षमता समाप्त होने लगती है तथा फिर बाकी का समय ट्रान्सफर के इंतज़ार में ही गुजरता है ।
2, स्कूलों में सुविधाओं का अभाव :- वर्तमान में जो भी स्कूल बनाये जा रहे हैं इनको स्थानीय समुदाय की मदद से ही निर्मित कराया जा रहा है । यानी उस गाँव के ही लोग स्कूल बनाएंगे । कई बार इन लोगों को तकनिकी ज्ञान नहीं होता तथा इस कार्य को देखने वाले जूनियर इंजीनियर जो कि एक कम वेतन का संविदा पर रखा गया टेम्पररी कर्मचारी होता है उसकी मिलीभगत से एक अत्यंत ही कमजोर ईमारत स्कूल की तैयार कर दी जाती है । मेरा अनुभव यह भी बताता है कि चूँकि स्कूल गांव के ही किसी व्यक्ति द्वारा दान दी गयी भूमि पर बनता है, तो प्रायः गाँव में निष्प्रयोज्य पड़ा हुआ वो भूखंड स्कूल के लिए दिया जाता है जो कि सबसे बेकार होता है । स्कूल तो बन गया किन्तु उसमें पानी की व्यवस्था, बिजली की व्यवस्था, शौचालय की व्यवस्था तथा फर्नीचर की व्यवस्था आने वाले कई वर्षों तक नहीं हो पाती । अलग अलग सुविधा के लिए अलग अलग विभागों के चक्कर लगाने के बाद कहीं जाकर यह कार्य कराया जाता है । जब स्कूल एक सरकारी बिल्डिंग है तो क्यों नहीं निर्माण के समय ही उसमे सभी आवशयक सुविधाएं दी जाती ? क्यों स्कूलों का निर्माण लोक निर्माण विभाग द्वारा नहीं कराया जा सकता ??
3, शिक्षक पर गैर शिक्षण कार्यों का दबाव :-
वर्तमान समय में एक प्राइमरी शिक्षक पर टीचिंग के आलावा निम्नलिखित अन्य कार्यों की भी जिम्मेदारी दी गयी है
1, मिड डे मील का प्रबंधन
2, बच्चों के आधार कार्ड का निर्माण
3, बच्चों को साप्ताहिक आयरन तथा फोलिक एसिड की दवा देना और इसका विवरण प्रेषित करना
4, बच्चों का स्वास्थय परिक्षण कराना तथा उसका विवरण प्रेषित करना ।
5, देश में मनाये जाने वाले प्रायः सभी दिवसों को स्कूल में मनाया जाना ।
6, स्कूल में चलने वाले निर्माण कार्य को देखना तथा उसके सभी बिल वाउचर इत्यादि संभल कर रखना तथा समय पर इसका ऑडिट भी कराना ।
7, बी एल ओ की ड्यूटी में घर घर जाकर मतदाता सूचियों का मिलान करना ।
8, स्कूल के रख रखाव, तथा साफ़ सफाई के लिए भी खुद ही जिम्मेवार होना क्योंकि प्राइमरी स्कूलों में सफाई कर्मचारी का भी पद नहीं होता है ।
9, विभिन्न प्रकार के बैंक खातों तथा उनसे सम्बंधित कैश बुक तथा लेजर इत्यादि को अपडेट करना ।
उपरोक्त के अतिरिक्त और भी अन्य काम हमारे अध्यापकों द्वारा किये जा रहे होंगे जो कि शायद मुझसे छूट गए होंगे ।
3, शिक्षक पर गैर शिक्षण कार्यों का दबाव :-
वर्तमान समय में एक प्राइमरी शिक्षक पर टीचिंग के आलावा निम्नलिखित अन्य कार्यों की भी जिम्मेदारी दी गयी है
1, मिड डे मील का प्रबंधन
2, बच्चों के आधार कार्ड का निर्माण
3, बच्चों को साप्ताहिक आयरन तथा फोलिक एसिड की दवा देना और इसका विवरण प्रेषित करना
4, बच्चों का स्वास्थय परिक्षण कराना तथा उसका विवरण प्रेषित करना ।
5, देश में मनाये जाने वाले प्रायः सभी दिवसों को स्कूल में मनाया जाना ।
6, स्कूल में चलने वाले निर्माण कार्य को देखना तथा उसके सभी बिल वाउचर इत्यादि संभल कर रखना तथा समय पर इसका ऑडिट भी कराना ।
7, बी एल ओ की ड्यूटी में घर घर जाकर मतदाता सूचियों का मिलान करना ।
8, स्कूल के रख रखाव, तथा साफ़ सफाई के लिए भी खुद ही जिम्मेवार होना क्योंकि प्राइमरी स्कूलों में सफाई कर्मचारी का भी पद नहीं होता है ।
9, विभिन्न प्रकार के बैंक खातों तथा उनसे सम्बंधित कैश बुक तथा लेजर इत्यादि को अपडेट करना ।
उपरोक्त के अतिरिक्त और भी अन्य काम हमारे अध्यापकों द्वारा किये जा रहे होंगे जो कि शायद मुझसे छूट गए होंगे ।
स्थानीय समुदाय की उदासीनता :- देखने में आया है कि अब स्थानीय समुदाय ने सरकारी स्कूलों से अपनी दुरी बढ़ा ली है । शहरी और मैदानी इलाकों में तो यह स्वाभाविक भी है किन्तु पहाड़ी क्षेत्र में जहाँ सिर्फ सरकारी स्कूल ही हैं वहां इस बात को देखना वाकई ताज्जुब की बात है । हमारे शिक्षक हमेशा मुझे बोलते हैं कि अभिभावक अपने बच्चों पर बिलकुल भी ध्यान नहीं देते । जो चीज स्कूल से फ्री में मिल जाती है बच्चे सिर्फ उसी चीज का इस्तेमाल करते हैं । उनको कॉपी, पेंसिल, रबर जैसी अत्यावश्यक वस्तु भी अभिभावक खरीद कर नहीं देते जबकि इस क्षेत्र में सभी जनजातीय होने के कारण बच्चों को छात्रवृत्ति भी दी जा रही है , किन्तु वो पैसा अभिभावक शायद अन्य प्रयोजनों में व्यय कर लेते हैं । बच्चों की पढाई को देखना तो दूर की बात बच्चों को नहला धुला कर साफ़ सुथरे कपड़ों में स्कूल भी नहीं भेजा जाता है । वहीँ अगर उसी अभिभावक का एक बच्चा प्रायः लड़का यदि आसपास के किसी निजी स्कूल में जा रहा है तो वही माता उसको तो नहला धुला कर, साफ़ सुथरे कपड़ों में टिफिन इत्यादि देकर भेजेगी परंतु सरकारी स्कूल के बच्चे का कलेवर उसके स्कूल की बिल्डिंग जैसा ही होगा ।
जबसे स्कूलों में निर्माण या मरम्मत संबंधी सरकारी पैसा आना शुरू हुआ है तबसे तो शिक्षक का और भी ज्यादा बुरा हाल हो गया है । आज गाँव का एक चलता फिरता आदमी भी उससे हिसाब किताब मांगने को तैयार हो जाता है । और उसको संदेह की दृष्टि से देखा जाता है । क्यों नहीं ये निर्माण या मरम्मत के सभी काम PWD जैसे विभाग से करा लिए जाते ?? यह मेरी भी समझ से बाहर है ।
मुझे लगता है कि शिक्षकों से सिर्फ पढाई लिखाई का ही कार्य कराया जाय क्योंकि बाकी कार्यों को करने के लिए अलग अलग सरकारी विभाग जब हैं तो क्यों नहीं उनकी जिम्मेवारी बनती कि वो अपना कार्य खुद करें । समय समय पर शिक्षकों के ट्रान्सफर पारदर्शी तरीके से हो ताकि सभी को दुर्गम और सुगम स्थानों पर नौकरी करने का मौका मिले । तभी हम अपने शिक्षक का मनोबल बनाये रख सकते हैं और तभी शायद किसी परिवर्तन की उम्मीद भी कर सकते हैं ।
सभी पाठकों से विनम्र अनुरोध कृपया इस ब्लॉग पर अपनी राय जरूर व्यक्त करें । धन्यवाद ।
जबसे स्कूलों में निर्माण या मरम्मत संबंधी सरकारी पैसा आना शुरू हुआ है तबसे तो शिक्षक का और भी ज्यादा बुरा हाल हो गया है । आज गाँव का एक चलता फिरता आदमी भी उससे हिसाब किताब मांगने को तैयार हो जाता है । और उसको संदेह की दृष्टि से देखा जाता है । क्यों नहीं ये निर्माण या मरम्मत के सभी काम PWD जैसे विभाग से करा लिए जाते ?? यह मेरी भी समझ से बाहर है ।
मुझे लगता है कि शिक्षकों से सिर्फ पढाई लिखाई का ही कार्य कराया जाय क्योंकि बाकी कार्यों को करने के लिए अलग अलग सरकारी विभाग जब हैं तो क्यों नहीं उनकी जिम्मेवारी बनती कि वो अपना कार्य खुद करें । समय समय पर शिक्षकों के ट्रान्सफर पारदर्शी तरीके से हो ताकि सभी को दुर्गम और सुगम स्थानों पर नौकरी करने का मौका मिले । तभी हम अपने शिक्षक का मनोबल बनाये रख सकते हैं और तभी शायद किसी परिवर्तन की उम्मीद भी कर सकते हैं ।
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