ग्रामीण भारत में शिक्षा को नौकरी का माध्यम माना जाता है । मैं स्वयं भी ग्रामीण परिवेश से ही आता हूं और पिछले 11 वर्ष से उत्तराखंड राज्य के ग्रामीण पर्वतीय क्षेत्रों में कार्यरत हूं । हमको भी बचपन से यही बताया गया था कि पढ़ाई का उद्देश्य नौकरी कर गांव से शहर में जाकर रहना होता है। एक समय के गांव शहरों के मुकाबले वाकई पिछड़े हुआ करते थे ।
अपने बचपन में मेरे अपने ही गांव के रास्ते कच्चे थे, पानी की निकासी न होने के कारण रास्तों पर सदैव ही कीचड़ रहा करती थी । शहर से गांव आने के लिए सड़कें भी नहीं हुआ करती थी और न ही यातायात के साधन होते थे । मैने स्वयं ही कक्षा 9 से ही गांव से करीब 12 किलोमीटर प्रतिदिन साइकिल चला कर पढ़ाई करना शुरू कर दिया था । उन दिनों गांव में स्कूल भी कक्षा 8 तक ही हुआ करता था ।
आज हमारे गांव में भी बहुत बड़ा परिवर्तन देखने में आया है गांव अब गांव सा नहीं रह गया और सड़कें भी पक्की हो गई और यातायात के साधनों की भी बहुतायत हो गई है । हालांकि गांव के युवा नौकरी की तैयारी करते हैं और नौकरी मिलने पर गांव से बाहर भी चले जाते हैं । किंतु एक अंतर तो आया है कि यदि युवाओं को घर के 30 से 50 किलोमीटर की दूरी पर नौकरी मिल रही है तो फिर वो गांव में ही रह कर इस नौकरी को कर लेते हैं क्योंकि अच्छी सड़कों और यातायात के साधनों से यह संभव हो गया है ।
पहाड़ों में चूंकि विकास की गति अभी धीमी दिखाई देती है इसलिए वहां का युवा नौकरी मिलने पर शहर चला जाता है । हालांकि बहुत से स्थानीय युवा जिनको कोई सरकारी नौकरी घर के निकट मिल जाती है तो अपने गांव में रह लेते हैं जैसे कि हमारे काफी सारे स्थानीय अध्यापक अपने अपने गांव में रह कर अपनी सेवा कर रहे हैं ।
सरकारी नौकरी को आज भी समाज में एक स्टेटस सिंबल माना जाता है और काफी युवा बहुत मेहनत कर सफल भी हो रहे हैं । ऐसे में भेड़ पालन जैसे पुश्तैनी कार्य करने वालों की शायद यह अंतिम पीढ़ी हम देख रहे हैं ।
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