सर द्वारा एक बहुत ही विचारणीय प्रकरण उठाया गया है। बढ़ती आयु शायद अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग चैलेंज लेकर आती है और शायद नौकरी वालों के लिए खास कर जो उच्च पदों से रिटायर होते हैं उनके लिए तो यह एक आघात जैसा भी महसूस हो सकता है। क्योंकि एक दिन अचानक आप एक बहुत बड़े अधिकारी से आम लोगों की भीड़ में खड़े हो जाते हैं । हालांकि आम लोगों से अलग दिखने की चाह में नाम के साथ रिटायर्ड भी जोड़ना नहीं भूलते और घर भी अपने ही स्तर के रिटायर्ड लोगों के बीच कॉलोनी में लेना पसंद करते हैं और साथ ही दिल्ली के जिमखाना क्लब जैसी एलीट जगहों के सदस्य भी इसी खास दिखने की चाह में बने रहना पसंद करते होंगे । मैने पाया है कि किसान और जो लोग अपने व्यवसाय में रहते हैं उन्हें बढ़ती आयु की कोई चिंता नहीं होती क्योंकि उनके लिए रिटायर नामक कोई शब्द ही नहीं होता। मैने अपने पिताजी को 82 वर्ष की आयु तक खेतों में जाते देखा है और एक दिन अपने प्रिय खेत में ही उनका स्वर्गवास हुआ । पिताजी किसान थे और कभी उनके मन में अपनी आयु को लेकर कोई भी जिक्र मैने नहीं सुना कि अब यह कार्य मैं नहीं कर पाता अपने सामर्थ्य के अनुसार अंतिम समय तक कार्य करते रहे और अपने अंतिम दिन भी साइकिल चला कर ही खेत में गए थे। यहां पहाड़ों में भी अनेकों बुजुर्ग मिलते हैं जिन्हें अपनी आयु ही नहीं पता होती और अपने सामर्थ्य के अनुसार अपने कार्य में लगे रहते हैं । बढ़ती आयु शायद नौकरी और खास कर उच्च पद पद से रिटायर होने वाले लोगों को ज्यादा परेशान करती होगी । ऐसा मुझे प्रतीत होता है। ग्रामीण इलाकों में आयु का कोई खास फर्क पड़ता नहीं देखा जाता। क्योंकि बचपन से आप वहीं रहे और उन्हीं लोगों के बीच अपना जीवन जिया और अंत समय भी उन्हीं के बीच विदाई ले ली । इसलिए शायद सर की पोस्ट का मर्म यही है कि कितने भी उच्च पद पर रहो लेकिन जीवन बिल्कुल साधारण सा जियो क्योंकि एक ना एक दिन तो साधारण बनना ही होगा । मेरे कार्यालय के एक चतुर्थ श्रेणी कार्मिक इस माह रिटायर होने वाले हैं शायद रिटायर होने का उन पर भी कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन इसी माह विभाग से एक डायरेक्टर भी रिटायर होंगे हो सकता है रिटायरमेंट उनके लिए खास से आम बनने की प्रक्रिया जैसा हो ।
#beokidiary
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