Monday, June 1, 2026

BEO Ki Diary - Out of School Kids and Education

शिक्षा से वंचित बच्चे - समस्या और समाधान
तमाम सरकारी प्रयासों के उपरांत भी बड़ी संख्या में बच्चे आज भी स्कूलों से बाहर रह जाते हैं । पिछले 11 वर्ष में मेरा भी यह अनुभव रहा है और यह भी विचारणीय प्रश्न है कि ये स्कूल से बाहर बच्चे ज्यादातर शहरों में दिखाई देते हैं । इस
मेरे अनुभव में कुछ कारण हैं जिनके चलते बड़ी संख्या में आज भी बच्चे स्कूल से बाहर रह जाते हैं ।
1. प्रवासी मजदूरों का समय समय पर अपने परिवार के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करते रहना ।
2. काम के लिए घर से बाहर जाने वाले लोगों के बच्चे भी उनकी अनुपस्थिति में अपने छोटे भाई बहनों की देखभाल हेतु घर में ही रह जाते हैं ।
3. गरीबी भी एक बहुत बड़ा कारण है जिसके चलते बच्चे स्कूल से बाहर रह जाते हैं । हालांकि स्कूलों में सब कुछ फ्री मिलता है फिर भी बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल नहीं जा पाते क्योंकि वे भी दिन भर छोटे छोटे काम करते हैं और अपने परिवार की आय में योगदान देते हैं । कूड़ा बीनना, भीख मांगना या फिर ढाबों और होटलों में काम करना ऐसे कुछ कार्य हैं जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे लगे हुए दिखाई देते हैं । हालांकि ऐसे बच्चे ग्रामीण इलाकों में दिखाई नहीं देते । ग्रामीण इलाकों में गरीबी तो हो सकती है किंतु उसके कारण बच्चों का स्कूल तो नहीं छूटता। ग्रामीण परिवारों में बच्चे पढ़ाई लिखाई से इसलिए भी दूर हो जाते हैं कि वे अपने घर के कार्यों में बड़ों का हाथ बंटाना शुरू कर देते हैं । जैसे कि वन गुज्जरों के बच्चे जो कम आयु से ही अपने पशुओं की देखभाल में दक्ष हो जाते हैं और बड़े होकर दूध के कुशल व्यवसायी भी बन जाते हैं ।
अब इन बच्चों को मुख्य धारा में कैसे लाया जाये यह एक बड़ी चुनौती है । 
1. सबसे पहले तो ऐसे बच्चों और परिवारों को देखना होगा जो वाकई पढ़ना चाहते हैं क्योंकि बहुत से परिवारों के बच्चों के नाम स्कूल में होने के बाद भी उनके अभिभावकों की कोई इच्छा नहीं होती कि बच्चे स्कूल जाएं क्योंकि बच्चे भी खुशी खुशी उनकी मदद करते हैं । जैसे कि वन गुज्जरों के बच्चे ये अपने पशुपालन के कार्य को बड़ी ही प्रसन्नता से करना सीख जाते हैं और इनके माता पिता की भी कोई इच्छा नहीं होती कि ये स्कूल जाएं ।
2. अधिकतर ऐसे स्कूल से बाहर रह गए बच्चों के लिए परंपरागत स्कूलिंग कारगर नहीं होती क्योंकि दिन का समय ही है जिसमें ये अपने परिवार की मदद करते हैं इनके लिए संध्या समय ही पढ़ाई के लिए उपयुक्त हो सकता है । अतः परंपरागत स्कूल इनकी आवश्यकता को पूर्ण करने में असफल रहते हैं ।
3. देखने में यह भी आता है कि बहुत सारे फाउंडेशन और एनजीओ ऐसे बच्चों की मदद करने के उद्देश्य से स्कूल खोल देते हैं । यदि स्कूल खोलना है तो सरकार से मान्यता भी लेनी पड़ती है और मान्यता की शर्तें भी होती हैं इसके अतिरिक्त आजकल सभी सरकारी और निजी स्कूलों के बच्चों का ऑनलाइन पंजीकरण भी अनिवार्य कर दिया गया है जिसमें इनके विभिन्न अभिलेखों जैसे जन्म प्रमाण पत्र, आधार, जाति प्रमाण पत्र और डोमिसाइल इत्यादि की भी जरूरत पड़ती है जो कि अमूमन इस बच्चों के पास नहीं होते अतः एनजीओ और फाउंडेशन चाह कर भी ऐसे बच्चों की मदद नहीं कर पाते ।
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 इसलिए प्रतीत होता है कि ऐसे बच्चों को स्कूल के स्थान पर शिक्षा की ज्यादा आवश्यकता है जो कि उन्हें किसी भी अलग प्रकार से दी जानी होगी । जिस हेतु किसी मान्यता प्राप्त निजी स्कूल या सरकारी स्कूल के स्थान पर विभिन्न ngo और फाउंडेशन के द्वारा आयु अनुरूप शिक्षा दिए जाने का प्रयास किया जा सकता है । ऐसे शिक्षा केंद्र मात्र ऐसे ही बच्चों के लिए होने चाहिए जो बच्चे परंपरागत स्कूलों में जा सकते हैं उनके लिए वही स्कूल उचित होंगे । इन कक्षाओं का संचालन स्कूल समय के बाद सरकारी स्कूलों के ही भवनों या फिर किराए के भवनों में किया जा सकता है ।
5. अभिभावकों को भी स्पष्ट कर दिया जाएगा कि हम स्कूल नहीं हैं और आपका बच्चा यहां एक क्लास से दूसरी क्लास में नहीं जाएगा और ना ही हम किसी सरकारी नौकरी के लिए आपके बच्चों को पढ़ा रहे हैं हम सिर्फ उसके जीवन में काम आने वाली शिक्षा देंगे और कोई ना कोई काम भी बच्चे को उसकी रुचि के अनुसार सिखाये जाने का प्रयास किया जाएगा । यदि बच्चे रिजल्ट और कक्षा पास इत्यादि की भी इच्छा रखते हैं तो ऐसे बच्चों को कुछ समय इन शिक्षा केंद्रों में रख कर फिर उनका किसी नजदीकी सरकारी स्कूल में RTE act के प्रावधानों के अनुसार आयु अनुरूप कक्षा में प्रवेश कराया जा सकेगा जहां प्रवेश हेतु फिर सभी आवश्यक सरकारी दिशा निर्देशों का अनुपालन भी किया जाना होगा ।

अतः मेरा सभी ngo और फाउंडेशन से अनुरोध भी रहेगा कि यदि वाकई आप ऐसे बच्चों की मदद करना चाहते हैं तो कृपया स्कूल ना खोलें बल्कि बिना किसी फॉर्मेलिटी के ऐसे ही बच्चों को उनके अभिभावकों की ही इच्छा पर शिक्षा प्रदान करने में सहयोग प्रदान कर दें जो कि वाकई एक बड़ी समाज सेवा होगी । ऐसे शिक्षा केंद्रों का संचालन भी बड़ी आसानी से हो सकेगा क्योंकि आपको सरकार से कोई मान्यता भी नहीं लेनी होगी और फिर यह भी दिक्कत नहीं कि शिक्षक के तौर पर डीएलएड या फिर बीएड और टीईटी इत्यादि की बाध्यता रखनी होगी । क्योंकि आप स्कूल नहीं चला रहे होंगे बस एक ऐसा स्थान जहां आकर बच्चे अपना बचपन जीने के साथ ही साथ कुछ सीख भी रहे होंगे । इन बच्चों को TaRL aur Learning Outsome Based आयु और कक्षा अनुरूप शिक्षा दिए जाने की भी आपको स्वतंत्रता रहेगी ।

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