Sunday, March 16, 2025
पहाड़ और पलायन
पहाड़ों से पलायन की बात अक्सर होती आई है । और उत्तराखंड राज्य ने तो इसके अध्ययन हेतु बकायदा एक पलायन आयोग का भी गठन कर दिया है ताकि इसके कारणों का पता चल सके । खैर इस विषय पर विशेषज्ञों का कोई भी नतीजा हो पर मेरा अनुभव कहता है कि जिसे पलायन बोला जा रहा है वह शायद प्रगति है । ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवाओं का भी सपना होता है कि वे पढ़ लिख कर बाहर निकलें और नौकरी करें तथा नौकरी लगने के बाद किसी शहर में ही प्लॉट लेकर अपना मकान बनाएं, शहर में ही रह कर अपने बच्चों को पढ़ाएं तथा फिर पढ़ लिख कर उनके बच्चे भी किसी शहर में ही नौकरी करें । लंबा समय शहर में गुजारने के बाद गांव में जाकर रहना सभी के लिए मुश्किल ही होता है क्योंकि बढ़ती आयु में आप ज्यादा शारीरिक श्रम नहीं कर सकते । जो लोग गांव में ही रहते हैं वे अपने काम में अभ्यस्त हो जाते हैं तथा बढ़ती आयु में भी उनका शरीर गांव के जीवन से तालमेल बिठा ही लेता है । लंबे समय तक शहर में रहने वाले लोग अपने घर की छत पर या लॉन में तो फूल उगा सकते हैं किंतु गांव में जाकर हल नहीं चला सकते । चूंकि ग्रामीण जीवन में आज भी प्रगति का एक बड़ा मानक पढ़ लिख कर नौकरी करना ही माना जाता है तथा दूसरा मानक शहर में मकान और तीसरा बच्चों को अंग्रेजी मीडियम के स्कूल में पढ़ाना। ये सब कुछ गांव नहीं दे सकता । गांव एक सामान्य जीवन आज भी से ही रहा है जिसे आज की युवा पीढ़ी शायद पसंद ही नहीं कर रही अब चूंकि सभी के पास सपनों की दुनिया दिखाने वाला मोबाइल भी आ गया है अतः अब ग्रामीण युवा भी गांव की चौपाल छोड़ कर किसी बड़े शहर की मॉल में घूमने को उत्सुक है । पढ़ाई लिखाई के बाद नौकरी ही लक्ष्य होता है, नौकरी के बाद शहर में ही मकान भी दूसरा लक्ष्य अतः इसे आप पलायन कह लें या प्रगति यह अपनी अपनी सोच ही है । #पलायन #migration #uttarakhand
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