Sunday, March 16, 2025

एक कप चाय

सुबह की चाय की तलाश

वैसे हमारे देश में चाय जैसी चीज की दुकान खोजनी नहीं पड़ती और कई स्थानों पर तो चाय स्वयं ही आपके सामने आ जाती है क्योंकि लोग चलते फिरते भी इसको बना कर आसानी से बेचते दिखाई देते रहते हैं । 
मुझे याद नहीं आता कि चाय पीनी कब शुरू की होगी लेकिन हां इतना जरूर कह सकता हूं कि चाय की मात्रा नेवी में आने के बाद जरूर निर्धारित हुई । इधर पिछले 10 वर्षों से पहाड़ों के अलग अलग छोटे छोटे गांव और कस्बों में भी जाना होता रहता है और जगह जगह की चाय पीकर देख ली है । कई बार आपको किसी दुकान की पहली प्याली अच्छी लग जाती है और उसी स्वाद की इच्छा मन में लिए हुए आप पुनः एक और प्याली चाय मांगते हैं किंतु इतिहास जरूरी नहीं कि सदैव ही अपने आपको दोहराता है आपको दूसरी चाय में वह पहले वाला स्वाद नहीं मिल पाता । 
इधर इतने लंबे समय इस पेय का सेवन करने से इतना तो जरूर अनुभव हुआ है कि चाय का अपना भी कोई स्वाद जरूर रहता है क्योंकि कहीं की चाय अच्छी लगती है और कहीं की नहीं लगती । 
हमारे देश के कुछ राज्य और शहर तो वाकई ऐसे हैं जो चाय बनाने में महारत रखते हैं ऐसे शहरों में हर ठेले, खोमचे पर आपको वही स्वाद मिलने की संभावना रहती है । अभी हाल ही में भोपाल जाना हुआ था भले ही वहां दस रुपए वाले चाय के कप का साइज छोटा कर दिया गया है किंतु वहां की चाय बनती बड़ी ही लाजवाब है । अमूमन ऐसा ही अनुभव गत वर्ष राजस्थान भ्रमण जयपुर, उदयपुर और उससे पहले बाड़मेर शहर के भ्रमण के दौरान हुआ था । शायद पूरे राजस्थान में ही चाय का अपना एक स्वाद है तथा इसको बनाने वाले भी इसे पूर्ण मनोयोग से बनाते दिखाई देते हैं । भले ही इनके कप का आकर भी छोटा ही क्यों न हो । 
अपने क्षेत्र में ऐसा कुछ विशेष स्वाद मुझे कहीं महसूस नहीं हुआ जिसका उल्लेख किया जा सके । हालांकि कुछ कुछ दुकानों की चाय अच्छी लग जाती है । चकराता के 7 वर्ष के दौरान दो ही दुकानों की चाय आज भी याद आती है । एक तो त्यूनी रोड पर भाटिया जी की जिनके यहां ब्रेड पकौड़ा भी बनता है और दूसरी इंद्रौली के निवासी चौहान भाई की जिनकी दुकान चकराता के एकमात्र सरकारी मदिरा के ठेके के सामने हुआ करती थी । इनकी चाय सदैव एक जैसी ही बनती थी । इधर मोरी में भी चाय की तलाश में काफी सारी दुकानें ट्राई कर ली हैं और यहां त्यूनी रोड पर धन्नी भाई को फिलहाल मैं अच्छी चाय के लिए पहले स्थान पर रखता हूं किंतु कई बार धन्नी भाई का भी दूसरा प्याला इस विश्वास को थोड़ा बहुत धक्का दे ही जाता है । अभी यह वृतांत लिखते लिखते धन्नी भाई के यहां दो चाय पी चुका हूं जिनमें से दूसरे प्याले से संकेत मिला कि चल देना चाहिए । लेकिन आज चूंकि रविवार है और बारिश का दिन तो धन्नी भाई का होटल भी खाली ही है और मुझे भी कमरे पर जाकर क्या ही करना है यहां अड्डे पर यात्री आते जाते रहते हैं उनकी बातें सुनना वाकई काफी रोचक होता है । यहां अक्सर लोग महासू देवता जी के दर्शन हेतु आते हैं और दूसरी कैटेगरी ट्रैकिंग वालों की होती है जो हर की दून और केदारकांठा ट्रेक के लिए मोरी होकर जाते हैं । इनके अलावा अपने बिजनेस के लिए आने वाले लोगों की भी बातें सुनने का मौका मिलता रहता है । 
फिलहाल धन्नी भाई दुकान से बाहर खड़े हैं क्योंकि बारिश रुक चुकी है और मैं तीसरे प्याले की प्रतीक्षा कर रहा हूं जो यह लेख लिखते ही शायद मुझे मिलेगा ।
तीसरा प्याला चाय मैने पिया इस दुकान पर । और लगा कि कभी कभी इनके यहां भी चाय पी जा सकती थी । पहाड़ों में अक्सर ज्यादा मीठी चाय बनती है तो मैं बिना चीनी की तो नहीं बोलता अब मैं बोल देता हूं कि जितनी चीनी आपकी पत्ती में पहले से ही पड़ी है उसी की बना दो और मत डालना । और यकीन मानिए उतनी चीनी भी कभी कभी ज्यादा ही लगती है ।

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