Sunday, March 16, 2025

यात्रा वृतांत


[16/03, 09:16] Pankaj Kumar: बारिश में लंबी यात्रा

होली की छुट्टी पर 12 मार्च 2025 को मोरी से चलना हुआ । 13 और 14 की तो छुट्टी थी ही इधर 15 की भी छुट्टी घोषित हो गई थी और 16 को रविवार था । मेरा प्लान वापसी का 16 को ही था । जाते समय भी मोरी से रुड़की की बाइक यात्रा काफी लंबी और थकाने वाली ही रही । उससे अगले दिन मुजफ्फर नगर जाना पड़ गया होली पर । 14 को दिन में होली के कार्यक्रम में व्यस्त रहने के बाद थोड़ा आराम करने के लिए सोच ही रहा था कि लगभग शाम के 7 बजे जिला शिक्षा अधिकारी महोदय का मैसेज मिला कि दिनांक 17 मार्च को राज्यपाल महोदय का आराकोट भ्रमण है तथा विभागीय स्टाल भी लगाई जानी है।  मैं सोच रहा था कि 16 को चलूंगा लेकिन 17 को तो कार्यक्रम ही निर्धारित है अतः सोचा कि 16 का दिन तैयारी के लिए मिल जाएगा तो 15 को ही चल कर शाम तक मोरी पहुंच जाता हूं । अब चूंकि 15 को सुबह देहरादून से ही बस पकड़नी है तो मुजफ्फर नगर से 14 की शाम को चल कर रुड़की रुकने का सोच कर चल दिया । चूंकि होली थी तो बस मिलने की उम्मीद कम ही थी ट्रेन टाइम टेबल देखा तो पता चला कि  रात 8 बजे दिल्ली से हरिद्वार के लिए एक ट्रेन है जो रुड़की रात 10 बजे पहुंचा देगी । रात को रुड़की घर पर रुक कर वहीं से सुबह निकल लूंगा । इधर रेलवे स्टेशन पर आया तो पता चला कि हरिद्वार वाली ट्रेन तो 3 घंटे की देरी से चल रही है । अब यानी जो भी ट्रेन सहारनपुर तक की मिलेगी उसको लेने का प्लान किया । खैर एक ट्रेन आई मेमू उसमें बैठ गया टिकट तो हरिद्वार तक था ही । सहारनपुर ट्रेन करीब 11 बजे पहुंच गई स्टेशन से bahar बस स्टैंड पर किसी बस की तलाश में आया तो up रोडवेज की दो बस खड़ी दिखाई दी । जिनमें दोनों ही में थोड़े थोड़े यात्री थे । एक देहरादून की और दूसरी हरिद्वार जानी थी ।

अब अजब संशय की स्थिति मेरे लिए बन गई की कौन सी बस लूं हरिद्वार वाली से दो ऑप्शन मन में आ रहे थे कि या तो रुड़की जाकर रात रुक कर जल्दी सुबह उठ कर देहरादून जाऊं या फिर हरिद्वार ही पहुंच जाए और सुबह 5 बजे हिमाचल वाली रोहड़ू बस से मोरी पहुंचा जाए। 

थोड़ी देर बाद पता चला कि हरिद्वार वाली बस नहीं जाएगी देहरादून वाली में लोग भी ज्यादा थे और उस बस को चलने का संकेत मिल गया । इधर सहारनपुर में भी बारिश शुरू हो चुकी थी अब मैं देहरादून वाली बस में बैठ गया लेकिन कंट्रोल रूम ने बस को फिर से रोक दिया । सवारियों ने शोर शराबा मचाना शुरू किया तो कंट्रोल रूम वाले सज्जन ने बताया कि देहरादून वाले चालक महोदय ने मदिरा पान कर लिया है तथा बस को अब रात के इस समय देहरादून भेजना उचित नहीं होगा । खैर सवारियों के कहने पर हरिद्वार के ड्राइवर महोदय को देहरादून की बस पर भेजा गया और मैं देहरादून के लिए निकल पड़ा ।

रात्रि करीब 1 बजे बस देहरादून isbt आई अब अगला प्रश्न था कि रात्रि विश्राम कहां किया जाते ताकि सुबह जो रोहड़ू बस हरिद्वार से 5 बजे चलती है उसे देहरादून से ही पकड़ा जाए । देहरादून यह करीब सुबह 6 बजे पहुंच जाती है ।
[16/03, 09:16] Pankaj Kumar: देहरादून के बस अड्डे पर पहले भी मेरा एक रात्रि बैठ कर गुजरने का अनुभव था ही तो यही सोचा कि 1 तो बज गया है 5 बजे फिर से लंबी बस यात्रा हेतु रेडी होना ही है तो पिछली बार की तरह कहीं बैठ कर ही समय व्यतीत हो जाएगा । किंतु इस बार की स्थिति जरा अलग सी मिली, एक तो मार्च ऊपर से बारिश यानी सर्दी और फिर रंग वाली होली की रात तो isbt खाली ही नजर आ रहा था कोई दुकान भी खुली नहीं मिली और बसें भी कम ही थी । इधर चूंकि इस मौसम का कोई आभास भी नहीं था तो मेरे कपड़े भी गर्म नहीं थे । खैर सबसे पहले तो बैग से गर्म शर्ट और जर्सी निकाल कर पहनी साथ ही कैप भी । अब सर्दी थोड़ा कम लगनी शुरू हुई । कहीं उचित बैठने का स्थान भी ढूंढ ही रहा था । फिर सोचा चलो यहां का जायजा लिया जाते क्या पता कोई चाय की दुकान ही खुली मिल जाए । चाय की दुकान की तलाश में सारा isbt घूम घाम लिया लेकिन कोई दुकान खुली नहीं मिली । रात्रि भोजन भी नहीं किया था।  सोचा था कि रुड़की पहुंच कर खा लूंगा।  लेकिन रुड़की जाना ही नहीं हुआ और सहारनपुर पहुंच कर बस लेने की जल्दी थी ।

खैर चाय तो नहीं मिली लेकिन कुछ विश्राम घर जैसा लिखा हुआ दिखाई दिया तो मैं विश्राम घर की और ही बढ़ गया । यहां कुछ लिखा हुआ था कि बिस्तर 200 में मिल सकता है।  मैं ऊपर सीढ़ियों पर गया तो वाकई कुछ विश्राम घर सा था । और शायद उसकी देखभाल करने वाला आदमी भी निद्रा देवी की गोद में था । मैने स्थान का जायजा लिया कि रुका जा भी सकता है या नहीं खैर देखा तो एक बड़े से हॉल में बेड लगे हैं और बिस्तर भी रजाई के साथ । कुछ लोग वहां सो भी रहे थे । मुझे स्थान उपयुक्त लगा मैने सोते हुए भाई को जगाया तो उसने वही 200 रुपए बोले मैने कहा भाई 1 तो बज ही गया 4 बजे मैं चल ही दूंगा 100 रुपए दे देता हूं थोड़ा कमर सीधी कर लूंगा । भाई मान गया और मेरा आधार नींद में ही देख कर 100 रुपए लेकर बोला जाओ ।
[16/03, 09:16] Pankaj Kumar: मैं कमरे की तरफ बढ़ा जिसमें दो बेड थे और खाली ही थे मैने सोचा कि यहीं सो जाऊंगा लेकिन भाई ने बोला ये कमरा है उधर आगे जाओ । खैर मैं वहीं आ गया।  बैग को बेड पर ही रखा और उसे भी रजाई उढ़ाई लेकिन उसे रजाई से ढकने के चक्कर में रजाई छोटी पड़ गई अब बैग को तो सर्दी लगनी नहीं थी बस उसे अदृश्य सा ही रखना था कि कोई भाई लेकर ना चल दे । खैर ट्रेन यात्राओं में भी काफी अनुभव ऐसे रहे हैं जहां अपना सूटकेस और बैग साथ ही रख कर ऊपर बर्थ पर काफी बार सोकर सफर किया है । सोने का प्रयास किया ही था कि केयर टेकर भाई और किसी थके मांदे यात्री को उसकी जगह दिखाने आया । मैं फिर सोया और पता नहीं कितनी देर सोया हूंगा भाई फिर से आया अब मेरे मोबाइल की बैटरी मृतप्राय सी हो चुकी थी तो मैने उसे बंद ही करना उचित समझा । और भाई से ही टाइम पूछा भाई ने बताया कि 4 बज गए मैने सोचा अपने 100 रुपए का यही समय था तो मैं उठ ही गया और नीचे आकर हरिद्वार से आने वाली रोहड़ू बस की इंतजार में खड़ा हो गया ।
[16/03, 09:16] Pankaj Kumar: रोहड़ू बस करीब 6 बज कर 10 मिनट पर आ गई थी और उसमें मुझे स्थान भी मिल गया था । उस साधारण रोहड़ू बस में बैठ कर ऐसा ही लगा मानों ट्रेन के ac या हवाई जहाज की सीट मिल गई है क्योंकि अब मुझे निश्चिंतता थी कि अगले 8 घंटे की यात्रा के बाद मैं अपने गंतव्य पर अब तो पहुंच ही जाऊंगा ।
[16/03, 09:16] Pankaj Kumar: रोहड़ू बस ठीक ही चली और करीब डेढ बजे मोरी बारिश और सर्दी के बीच पहुंच ही गई ।
इधर चाय की दुकान पर दो चाय पीने के बाद यह सब लिखा और अब तीसरी चाय के बाद कमरे की तरफ बढूंगा क्योंकि बारिश भी कुछ कम हो गई है ।

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